Wednesday, August 10, 2011

क्‍यों है ये दूरि‍यां

जब-तब बज उठती है
कानों में
शहनाइयों सी
आपकी बातें .......
और
सावन की इस रुत में
बेताब हो
मन मचल उठता है
पूछता है
आखि क्यों हैं
वो मुझसे दूर इतने
कि रिमझि का राग भी
हम मिलकर
नहीं गा सकते ....
बारि की इन
बूंदों की तरह
क्या हम
धरती से मिलने
अपनी मर्जी से
नहीं सकते---
क्यों है ये दूरियां ?
भीगी सड़क पर
भीगा तन
भीगा मन लि‍ए
हम यूं ही चलेंगे
अनवरत .......
क्या हम
कभी पास नहीं सकते ????


1 comment:

राजीव थेपड़ा said...

rashmi ji.....thoda aur gahari ho jaaye kavitaa.....tab sach men aur mazaa aa jaaye.....thodi aur sabra se likhi jaaye yah kavitaa to thodi aur gahari ho jaaye.....