Monday, September 3, 2018

गरम हथेली ....

                   

ज़रूरत होती है
हथेलियों को भी
एक ऐसी गरम हथेली की
जो टूटन के पलों में
आकर कस ले 
और अहसास दिला दे
कि कोई है
जिसे हम अपने
सारे दुःख सौंप सकते हैं।

Friday, August 31, 2018

बीती बात की तरह......



डरती हूँ
तुमसे नहीं
न उस प्यार से, जो
फूलों की तरह बरसा रहे तुम
और मैं भीग रही 
सुबह की ओस में गुलाब की तरह


डरती हूँ
इस साथ से
दिन-रात की बात से
जो हो नहीं पाई उस मुलाक़ात से
कि आदतें जीने नहीं देती पहले की तरह

डरती हूँ
अंतहीन इंतज़ार के ख़्याल से
कि एक दिन कहकर भी
जो नहीं आओगे
मैं राह तकती, जागती रहूँगी रात की तरह
और तुम भूलकर मुझे
बढ़ जाओगे आगे, बीती बात की तरह। 

Tuesday, August 28, 2018

आँखों में वो है बाक़ी...


भोर की तलछट में झाँका एक चेहरा।बहुत दिनों बाद शगुन की भीड़ में शामिल हुआ। नज़रें मिलीं, टिकीं फिर मुड़ गयी भीड़ की ओर।
ढोलक की थाप गूँजती रही। बुलाहट हुई ...जाओ कर लो चुमावन...पीछे से आवाज़ लगाई ..लो, ये लेकर जाओ। पॉकेट की तरफ़ हाथ बढ़ा....
क्यों जी...आपसे क्यूँ.....नहीं देखा मुड़कर, मगर टिकी निगाहों के ताप से मन में बताशे घुल रहे थे।आते-जाते कई बार देखना अच्छा लगता है। कोई ख़ास हो तो फिर ख़्याल रखना ही पड़ता है।

सारे रस्म चल रहे...लौट-लौट पूछना, देखना सबने देखा। ध्रुव तारे के उगने से सब तेज़ी में आए।बैठा रहा वो वहीं, निहारता सा। अधखुली आँखों में समेट ले जो एक सपना।
सारी हिदायतें फिर एक बार और फ़िक्र भी पुरानी सी। सब जाने को हैं। कोई कहता है उसे उठाओ, किसे...अरे वही जो तेरा ......
कोई सिर्फ़ देखने के लिए ही कभी सैकड़ों मील चलकर आ जाता था। उठो...जाओ...देख लो एक बार फिर। ढूँढ लो उन आँखों में वो है बाक़ी, जो मंदिर के पीछे आकर झाँक कर देखा करते थे...


Friday, July 27, 2018

दिल भी दफ़्तरी हो गया


ये तुम्हारे चले जाने के बाद की बात है
लोग लेते हैं जैसे
बारिश का मौसम बीतने के बाद
बरसात का जायज़ा
लगाते हैं हिसाब कि किस जिले में 
पड़ा है सुखाड़
कहाँ उतरा है नादियों का पानी खेत में
कहाँ कैसी है दरकार
जोड़-तोड़ कर करते हैं सरकार से
मुआवज़े की माँग

ऐसे ही तुम्हारे जाने के बाद
बड़ी कड़ाई से लेती हूँ
अपने दिल का हिसाब
किन बातों पर यह पिघलता है
और किन बातों से प्यार मरता है बार-बार
कब मजबूर होकर देती हूँ
तुमको आवाज़
कब चाहती हूँ लौटा लाना अपने पास
और बीते दिनों के खोए एहसासों का
मुआवजा भरना चाहती हूँ

पर लगता है अब
ये दिल भी दफ़्तरी हो गया है
भावनाएँ सरकारी माल की तरह
आधा देना चाहता है
और चाहता है
आधा दबा लेना ख़ुद के पास
फिर एहसान भी जताना चाहता है इसका
कि उम्मीद से अधिक दिया जा चुका तुमको
जो है, जितना है लो और दस्तखत करो बस
कि मौसम और मन का ठिकाना नहीं कब बदल जाए।

Monday, July 23, 2018

भरोसा ज़िंदा रहता


तुम रोज़ की तरह इंतज़ार करते मिलते
तो लगता
दिल के किसी खाने में अब तक
प्यार ज़िंदा है, गहरी साँस लेता हुआ
किसी करिश्मे की उम्मीद में 
ठहरा हुआ

पर तुम जा चुके थे,
जैसे ठीक नौ बजे किसी स्कूल का
गेट बंद हो जाता है
किसी दफ़्तर के बायोमेट्रिक सिस्टम में
लेट आना दर्ज हो जाता है
उसी तरह
हमारा विदा होना इतना सहज था
कि मुड़ना या ठहरना
या कि देर तक, दूर तलक
पलट-पलट के देखना
असंभव होना मानकर निकल जाए कोई

दुनिया नश्वर है , मनुष्य भी
यह मान लेने में
अब कोई हर्ज नहीं कि प्रेम भी नश्वर है
कोई सदा के लिए किसी का नहीं होता
मर जाता है प्रेम भी एक दिन
खो जाती हैं सारी अनुभूतियाँ
यह अलग बात है कि
आदतन जुड़ने का दिखावा करते हैं कुछ लोग

प्रेम शब्दों में होता है, रहता है
हथेली में थमी गरम चाय की तरह
इसकी ऊष्णता की भी सीमा होती है
एक रोज़
फेंक देते है इस प्यार को ठंडी चाय की तरह
निकल आते हैं आगे
पिछली सारी तासीर भुलाकर

काश! तुम पलटकर देखते एक बार
दिल के किसी ख़ाने में
प्यार ना सही, भरोसा ज़िंदा बचा रहता
कि अनश्वरता भी है इस दुनिया में।

Tuesday, July 17, 2018

मृत्युगंध.....



नहीं, बिल्कुल नहीं भीगी थी 
बारिश की फुहारों में 
मगर 
पसलियों में अकड़न है 
ऐंठ रही पिंडलियां
ताप बढ़ता ही जाता है
फूलदान में सजे रजनीगंधा से
कोई ख़ुशबू नहीं आती
बेस्वाद है सब
बड़बड़ाहट तेज़ हुई जा रही
हाँ, नहीं जी सकती तुम्हारे बिना
भूलना असम्भव है
पास आओ, रख दो माथे पर हाथ
कहीं धुनिया धुनक रहा रुई
आसमान से बर्फ़ के फ़ाहे गिर रहे
देखो
तुम हो ना, तुम जानते हो न
कितना कुछ बदल जाएगा
तुम्हारे न होने से
आदत, ज़रूरत, सपने और
गहरी नींद सोने के लिए चाहिए
तुम्हारे बदन से उठती पहचानी ख़ुशबू
सुला दो अब, मान भी जाओ
तुम्हारी क़सम, जब से मना किया
नहीं भीगी हूँ बौछारों में
बस ज़रा सी हरारत है, परेशान ना हो
सो जाऊँ , रख दूँ सीने पर सर
ओह, ये वो गंध नहीं
तुम्हारी देहगंध नहीं
जाने दो अब, कोई बुलाता है
आँखें झपकी जा रही
पहचान पा रही हूँ अच्छे से
चिरप्रतिक्षित, यह तो मृत्युगंध है।

Saturday, July 14, 2018

हवा सा आता-जाता रहा ....


दुःख उलीचती रही 
प्रतिदिन
अँजुरी भर-भर 
सागर उफनता रहा 
दुःख बढ़ता गया 
संबंध
टूटने और जुड़ने के बीच
उभरती, सिहरती पीड़ा
सघन होती गई
दर्द हैं, अपेक्षाएँ हैं
फिर
निपट सूनी ज़िंदगी
गरम दिन में
छांव तलाशती सी
कि कोई हवा सा
आता-जाता रहा
आया समझ
दुःख सागर है
निस्पृह होना ज़रूरी
कँवल पत्ते पर
ठहरी बूँद की तरह
कि रिश्ते मोह के
कच्चे धागे हैं...।

Tuesday, July 10, 2018

मीठी छुवन....


“ मेरी मुट्ठियों में बंद है
एक मीठी छुवन
जिस दिन खुलेंगी हथेलियाँ
मैं अकेली हो जाऊँगी
जीवन भर के लिए...”

Saturday, July 7, 2018

दर्द सहलाता है


झकझोरा तुमने 
लौटी हूँ मानो नींद के गाँव से 
खिंचता सन्नाटा 
जैसे बस टूटना ही चाहता हो 
अब दर्द सहलाता है 
आवाज़ की दुनियाँ में
रंगों की सतरंगी चमक बरक़रार है।

Friday, July 6, 2018

आषाढ़ का दिन


रात की छाती पर
नहीं है चाँद
काली घटाएँ घिर-घिर
खोल रही स्मृति के पिंजरे
मेघ देख हृदय का माटी 
फिर दूब सा हरा हुआ
है बारिश की झड़ी
पत्तों-पत्तों में छुपा संदेश
मेघों से पर्वतों के लिपटने का
आया दिन
हाँ है ये आषाढ़ का दिन