Tuesday, August 23, 2016

कपास सी छुअन


सहलाया
अंतस के खुरदुरेपन को
पांवों पर धर दी अपनी गर्म हथेली
कि‍ सि‍हरन
पूछने लगी अपनी ही प्रज्ञा से
तन सि‍हराऊं कि‍ मन
दोनाें ही रहि‍त है
कपास सी कोमल छुअन से

एक घूंट भरी थी
बची हुई केसर की तली से
धड़का था हृदय
स्‍वाद चखने से  ही नहीं आता
संवेदनाएं
सम्‍मोहि‍त भी करती हैं
कि‍सी की चोट का दर्द दूजा सह लेता है

हथेलि‍यों की कि‍स्‍मत में
जुड़ना न भी लि‍खा हो
दि‍शाएं तय कर देती है
एक सी राह के ध्‍ूाल में लि‍पटना
कांधाें पर ही बोझ उठाया नहीं जाता हरदम
कोई मुस्‍कान देकर जग जीत लेता है
साथ रहता है जैसे एकात्‍मा। 

Friday, August 19, 2016

'' वि‍श्‍व फोटोग्राफी डे ''

मेरी पसंद की, कुछ मेरी खींची हुई तस्‍वीरें 

ओस में भीगा गुलाब

पि‍छोला झील पर उड़ान भरती जलडुब्‍बि‍यां 

फतेहसागर झील 
सम में एक खूबसूरत सुबह 
चंबा का चमेरा बांध 

पठानकोट के रास्‍ते का सौंदर्य 
डलहौजी की एक शाम 
डायनकुंड की बेहि‍साब खूबसूरती 
झारखंड की हरि‍याली 
झारखंड की सड़क पर घूमती बच्‍चि‍ि‍यां 
रांची के पास पलाश का जंगल 
बारि‍श में पत्‍ति‍यों की नोंक पर अटकी बूंदे 
कौसानी की एक सुबह 

रांची शहर की शाम

Tuesday, August 16, 2016

अवि‍स्‍मरणीय गीत....


सबने कहा
अब जाकर मैंने गाया
अपने जीवन का सबसे सुंदर गीत
दरअसल वो
मेरा मौन रूदन था
छलनी दि‍ल से नि‍कलती धुन
जो कहलाया दुनि‍या का सुंदरतम गीत

यह उपजा था
प्‍यार के सात रंगों के आने और
दर्द के समंदर के ठाठें मारने से

कैसी त्रासदी है
शरीर, मन और आत्‍मा की
अलग-अलग ख्‍वाहि‍शें होती हैं
एक दूसरे की इच्‍छा को दरकि‍नार करते

कोई रसायन
हृदय में उद्दीप्‍त करता है प्रेम
लगता है प्‍यार चरम पर पहुंचा
ठीक उसी क्षण
मस्‍ति‍ष्‍क देता है चेतावनी
यह अंति‍म क्षण है, बाद पल के सब समाप्‍त

जि‍ओ, समेटे हर संवेदना
फि‍र बि‍ंध जाओ शूलों में
नि‍यति‍ यही है, परि‍णति‍ भी यही
जीवन का
एक गीत तो खूबसूरत धुनों से सजा रहे
सबसे यादगार पलों की नि‍शानी

सब तजने से पहले
एक कटार सीने में अपने ही हाथों चुभोना
आत्‍मा को बदन से अलग करने के ठीक पहले
एक चीख उभरेेगी,  प्रेम और दर्द में लि‍पटी
जो बन जाएगी
दुनि‍या के लि‍ए अवि‍स्‍मरणीय गीत।

रावणहत्‍था बजाती मैं....

Friday, August 12, 2016

घि‍सते शब्‍द...


कुछ शब्‍द घि‍सते हैं
कुएं के पाट पर लगे पत्‍थर से
रोज ही
फि‍र भी बोलते हैं हम
आदतन
जैसे पाट पर रखते ही
रस्‍सी ढूंढ लेती है
रगड़ी गई जगह
जहां से सुवि‍धा हो उसे
तल तक जाने की
वैसे ही
कुछ शब्‍द, घि‍से होते हैं
रगड़ खाए भी
मगर बोलते हैं हम
संबंधों की सहुलि‍यत के लि‍ए
जहां
असत्‍य सही, ध्‍वनि‍त हो
एक अनुराग
और हम रि‍श्‍ते की बाल्‍टी में
भर लाएं, कुछ बूंद पानी के।

तस्‍वीर....गांव में एक कुएं की, जहां स्‍त्रि‍यां कपड़े धो रही हैं....

Tuesday, August 9, 2016

नफरतों के जंगल में....



प्रेम राख है या
राख्‍ा तले दबी चि‍ंगारी
कुरेदकर देखो
शोला लपकता है या टूटता है बांध
जैसे बारि‍श से उफनाती कारो नदी

गुम गया प्रेम भी
स्‍वर्णरेखा के स्‍वर्ण की तरह
बस
नाम से इति‍हास झांकता है
जैसे याद से प्रेम

पुरानी बदरंग तस्‍वीरों में
गया वक्‍त ठहरा होता है
कि‍सी के जि‍क्र से
चौंक उठते हैं
पलटते हैं पुराना अलबम
अनजाने कराहते हैं  कि‍
वक्‍त था एक जब प्रेम
सारंडा के जंगलों की तरह हरा-भरा और
घनघोर था

मगर
नि‍त के छल-प्रपंच से
आहत हुए जज्‍बात
और हम भी माथे पर बांध कर
वि‍रोध का लाल फीता
उपद्रवी बन गए, बस उत्‍पात करते हैं
कभी शब्‍दों, कभी कृत्‍य से

ध्‍वस्‍त रि‍श्‍ते की सारी सुंदरता
तज एकांत चुन
लाल कंकरीली मि‍ट्टी के 'रेड कार्पेट' पर
नंगे पांव चलते हैं
दर्द रि‍सता है
राख हुए प्रेम में
तलाशते हैं कोई बची-खुची चि‍ंगारी

नफरतों के जंगल में
साल के पत्‍तों की तरह सड़ते-गलते हैं
लौटते नहीं वापस
प्रेम बचा सकता था सब कुछ
मगर
हर उस चिंगारी के ऊपर
राख तोपते हैं
जि‍सके लहकने से गांव का रास्‍ता
खुल सकता है अब भी

चुनते हैं बीहड़
छुप जाते हैं कि‍सी सारंडा या
पोड़ाहाट के जंगल से घने
मन के घोर अंधेरे में
प्रेम नकार बनते है आत्‍महंता
करते हैं जंगलों से प्रेम का दि‍खावा
पालते हैं घाव

कि‍सी एक के बदले में मारते हैं सौ
फि‍र अतंत: अपनी ही आत्‍मा
झूठे दंभ में जीते है
वास्‍तव में
उसी दि‍न मर जाते हैंं हम
जि‍स दि‍न से दि‍ल में बसे प्रेम का वध कि‍या था।

तस्‍वीर- पानी में भीगती हुई एक आदि‍वासी महि‍ला..

Wednesday, August 3, 2016

मोहब्‍बत बूंद है..


मोहब्‍बत
गुलाबी गुलाब पर
ठहरी
ओस की बूंद है
.......

रहती है पंखुडि‍यों के
सि‍मटने तक
या हवा के झोंके से
कांपकर गि‍रने तक
....
मोहब्‍बत
पारदर्शी बूंद है
दूबों की नोक पर ठहरी
लि‍ए बेपनाह खूबसूरती
........
मोहब्‍बत
ठहरती है गुलाब पर
हरी दुबकि‍यों पर भी
मगर कि‍सी के दि‍ल में
जाने कब तक ?

Tuesday, August 2, 2016

यह एन एच 91 नहीं......



यह एन एच 91 नहीं
छोटा सा  कोई गांव हैं
लड़कि‍यां हैं कुछ हद तक बेखौफ
मगर
महानगरों के वहशी दरि‍ंदों से
संक्रमि‍त होने लगी है
गांव की आबो-हवा भी

कभी शेर आैर हाथि‍यों से
डरते थे लोग रातों में
मगर अब
पता भी नहीं चलता और
फलाना चाचा, बगल गांव का मामा
या रि‍श्‍ते का दादा
अपने पंजे नि‍काल
घसीट ले जाता है खेत-झाड़ों में

लड़कि‍योंं
रात-बि‍रात तो पहले भी
नहीं नि‍कलती थी तुम अकेली
इंसानी खाल वाले जानवरों के डर से
मगर अब
पि‍ता के साए में भी बेखौफ न रहना
जमाना वाकई खराब हो चुका है
और तुम
कि‍सी की बेटी-बहन नहीं, बस मादा हो

भले सीख लेना मार्शल आर्ट,
जेब में मि‍र्ची पाउडर रखना
नाखून भी अपने बढ़ा लेना
मगर जान लो
कानून अंधी-बहरी है
नपुंसक है प्रशासन, पंगु है सरकार

सींखचों में गर
बंद हो भी जाए कोई दरि‍ंदा
तो भी छूट कर करेगा नया शि‍कार
अब तमंचे के बि‍ना
काम नहीं चलने वाला
कर देना एक बार में काम तमाम

मरोगी तब भी घुट-घुट कर
शरीर और आत्‍मा पर हुए
बलात्‍कार के बाद
नहीं मि‍लेगा उन हैवानों को उनके कि‍ए का
भरपूर दंड , न फांसी न अंग-भंग

डरो मत, लैस रहो हि‍म्‍मत और हथि‍यारों से
अपनी सुरक्षा के लि‍ए
मत मुंह देखो कि‍सी और का
अपने दर्द का मुआवजा न लेना कभी
दो दंड, उनके कुकृत्‍यों का
ऐसा दंड की पापि‍यों की आत्‍मा कांपे
सुरक्षि‍त रहे  एन एच 91
अौर मेरा-तुम्‍हारा हर गांव, हर शहर।

तस्‍वीर- एक गांव में इस लउ़की को देख बहुत अच्‍छा लगा सो ले ली थी तस्‍वीर 

Thursday, July 28, 2016

रुगड़ा और खुखड़ी : सावन में मजेदार स्‍वाद

 रुगड़ा 
बरसात के मौसम में रुगड़ा होता है। यह साल के जंगलाें में मि‍लता है।रुगड़ा दाे प्रकार का होता है, सफेद और काला रुगड़ा। आदि‍वासी महि‍लाएं इसे जंगलों से चुनकर लाती हैं।
जहां से रुगड़ा नि‍कलता है उस जगह पर जमीन में दरारें पड़ जाती है। यह दोनों तरह से बि‍कता है, मि‍ट्टी सहि‍त या धाेकर। धोने के बाद गोल-गोल सफेद दि‍खता है।इसे काटकर या फोड़कर पकाया और खाया जाता है। स्‍वाद में बि‍ल्‍कुल मांसाहारी। ग्रामीणों का कहना है कि‍ रूगड़ा तभी नि‍कलता है जब बादल गरजते हैं। जि‍तनी अधि‍क बरि‍श होगी, रूगड़ा उतना ही नि‍कलेगा।
दरअसल जहां साल या सखुआ वृक्ष की पत्‍ति‍यां गि‍र कर सड़ती हैं, वहीं रूगड़ा उत्‍पन्‍न होता है। आदि‍वासि‍यों का मानना है कि‍ जि‍तना अधि‍क बादल कड़केगा, रूगड़ा उतना ही मि‍लेगा। यह मशरूम की प्रजाति‍ का होता है और स्‍वाद के साथ-साथ भरपूर पौष्‍टि‍क भी होता है। इसलि‍ए इसका दाम भी बहुत ज्‍यादा है। इस मौसम में रूगड़ा 400 रूपए कि‍लो बि‍का शुरूआत में और अभी भी बाजार में इसकी कीमत 160 रूपये कि‍लो है।

खुखड़ी 

रुगड़ा के बाद अब खुखड़ी की बारी....हो सकता है कि‍ अलग-अलग जगहों पर इसके भी अलग नाम हो जैसा कि‍ रुगड़ा के बारे में पता चला हमें।
खुखड़ी, गांव में जि‍से लोग खुखड़ी के नाम से जानते हैं, शहर में उसे मशरूम कहा जाता है। दोनों में अंतर बस इतना है कि‍ जहां खुखड़ी जंगल, खेत, मेड़ आदि‍ में प्राकृति‍क रूप से नि‍कलता है, वहीं मशरूम की खेती की जाती है। खुखड़ी या मशरूम फफूंदो का फलनकाय है, जि‍स छत्‍ता या छाती, कुकुरमुत्‍ता या खुखड़ी कहा जाता है। खुखुड़ी के कई प्रकार होते हैं। पाए जाने वाले सभी खुखड़ी खाद्य योग्‍य नहीं होते। इसकी पहचान जरूरी है। आदि‍वासि‍यों और ग्रामीणों को इसकी पहचान हाेेती है और इन्‍हें जंगलों से लाकर शहर के बाजारों में बेचा जाता है।
इसका स्‍वाद भी बहुत अच्‍छा होता है। खुखड़ी में प्रोटीन भरपूर मात्रा में होता है और यह स्‍वास्‍थ्‍य और स्‍वाद दोनों तरह से बेहतरीन है। अभी रांची में 400 रूपये कि‍लो के भाव से बि‍क रही है खुखड़ी। स्‍वाद में मांसाहार को टक्‍कर देता हुआ मगर पूर्णत: शाकाहार है यह। इसके स्‍वाद का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि‍ लोग 400 रूपये कि‍लो में भी खूब खरीदते हैं। इसे सिर्फ प्‍याज से भूनकर खाया जाता है तो कई लोग हल्‍का मसाले का प्रयोग करते हैं।
गांव में इसे सखुआ के पत्‍ते में रखकर नमक डालने के बाद पत्‍ते का मुंह बंद कर दि‍या जाता है। इसके बाद चूल्‍हे के अंगारे नि‍काल कर उसके ऊपर रखकर पकाया जाता है। इसकी सोंधी खुश्‍बू और स्‍वााद के दीवाने होते हैं ग्रामीण।
जो स्‍वाद प्राकृति‍क रूप से नि‍कले खुखड़ी का होता है वो कृत्रि‍म रूप से उगाए मशरूम का नहीं। इसलि‍ए बरसात में खासकर सावन में इसकी जबरदस्‍त मांग होती है।

Tuesday, July 26, 2016

मन के कपाट ( कहानी )



और दि‍नों के अपेक्षा सुबह जल्‍दी नींद खुली। बदन भारी सा लगा। हमारे बीच देर रात तक बहस चली थी, मगर सोते-सोते तक हम समझौते तक पहुंच चुके थे। फि‍र भी मन -तन में भारीपन पसरा रह गया, जागने तक भी।

आंखें घुमाकर देखा, कुणाल बि‍स्‍तर पर नहीं थे। बाथरूम की बत्‍ती जली हुई थी। यानी मुझसे पहले उठ गए आज। मैंने भी एक लंबी अंगडा़ई ली और बि‍स्‍तर छोड़ दि‍या। सुबह भागा-दौड़ी की होती है। मैं सीधे उठकर कि‍चन में चाय के लि‍ए पानी चढ़ा आई। तब तक ये बाथरूम से नि‍कलकर अखबार पढ़ रहे थे।

मैंने चुपके से एक नजर देखा, कुणाल के चेहरे पर रात की बातों की कोई उद्धि‍ग्‍नता नहीं थी। शांत से अखबार में सर घुसाए बैठे थे। तसल्‍ली हुई कि‍ रात वाली बात कम से कम अभी तो नहीं खि‍ंचेगी। मैं फ्रेश होकर वापस कि‍चन गई और दो कप चाय ले आई। उन्‍होंने मुझे देख कर एक स्‍माइल दी और वापस पेपर में। मैंने भी दूसरा अखबार उठाया और हेडलाइन्‍स पर सरसरी नि‍गाह डालने लगी। अभी उतना वक्‍त नहीं होता कि‍ सारी खबरें आराम से पढ़ी जाएं।। अंश के स्‍कूल का समय हो जाता है। उसे उठाने में ही काफी देर लगती है। बार-बार जागकर फि‍र से सो जाता है। उसकी नींद पूरी तरह खोलने का एक ही तरीका है। आधी नींद में ही उसे लेकर छत पर जाना जहां रोज कबूतर उसके इंतजार में बैठे रहते हैं। कुछ देर कबूतरों के साथ खेलकर वापस आता है तो फि‍र फटाफट स्‍कूल जाने को तैयार हो जाता है।

मैंने चाय खत्‍म की और उसे जगाया। वह कुनमुनाता सा उठा और सीधे सीढ़ि‍यां चढ़ने लगा। हम छत पर सुबह जाते हैं तो गमले में बहुत फूल खि‍ले होते हैं। उन्‍हें देखकर सच में बहुत अच्‍छी अनुभूति‍ होती है। सच है.. जो चीज आंखों को भाए और उसकी खुश्‍बू भी प्‍यारी हो तो मन में उतर जाती है। इन दि‍नों टच मी नॉट का पौधा नि‍कल आया है गमले में। हम मां-बेटे दोनों सारे पत्‍तों को जब तक छू न ले, उन्‍हें शरमाकर मुरझाया देख न लें, नीचे नहीं उतरते। बहुत मजा आता है। बचपन की यादें ताजा हो जाती हैं। सच है कि‍ अपने बच्‍चों के जरि‍ए हम फि‍र से अपना बचपन जीते हैं।

मैं इस सोच में डूबी ताजा खि‍ले उड़हुल के लाल फूलों को नि‍हार ही रही थी कि‍ पंख फड़फडाते हुए सैकड़ों कबूतर छत पर उतर आए। अंश बड़े प्‍यार से आ-आ करता उन्‍हें दाना दे रहा था। अब वो दोस्‍त बन गए हैं। अंश को छत पर घूमता देख ही कई कबूतर आ जाते हैं..फि‍र तो एक के बाद एक सि‍लसि‍ला। कई बार कुछ कौअे भी उतर आते हैं साथ-साथ। अंश कहता है..भगाओ इन्‍हें, ये बहुत जल्‍दी-जल्‍दी दाने चुग जाते हैं। मैं समझाती हूं, थोड़े से ज्‍यादा दाने डाल दो। इन्‍हें भी भूख लगती है। वो मेरी बात मान जाता है। पर उसे सफ़ेद कबूतर ज्‍यादा पसंद आते हैं।

थोड़ी देर बाद मैं उसे लेकर नीचे आई। वो फ्रेश होने गया और मैं नाश्‍ते और अंश के टि‍फि‍न की तैयारी में लग गई। अंश अभी प्रेप में ही था, इसलि‍ए ऑफि‍स नि‍कलते वक्‍त कुणाल उसे स्‍कूल छोड़ने जाते हैं। इस वक्‍त बहुत हड़बड़ी मची रहती है। जब तक मैं कि‍चन से सब समेटती कुणाल ने आवाज लगा ही दी....सोनाली, जल्‍दी करो।

भागकर पहुंची तो देखा कुणाल के साथ अंश भी नहा चुका है। कुणाल तैयार हो रहे हैं।  मैंने जल्‍दी से अंश को यूनि‍फार्म पहनाया और दोनों के लि‍ए नाश्‍ता लगा दि‍या डाइनिंग टेबल पर। मैं इनलोगों के जाने के बाद आराम से ब्रेकफास्‍ट लेती हूं, गाना सुनते या टीवी देखते हुए। पहले मैं अकेली बि‍ल्‍कुल नहीं खाती थी। पर जब से अंश हुआ है, सारी दि‍नचर्या ही गड़बड़ा गई है।

उन्‍हें डाइनिंग टेबल पर छोड़कर मैं गीले तौलि‍ए धूप में देने के लि‍ए बाथरूम घुसी। कुणाल कभी टावल बाहर नहीं नि‍कालते धूप में। कभी बाथरूम के स्‍लैब पर तो कभी बि‍स्‍तर पर गीला तौलि‍या पड़ा रहता है।  जैसे मैं अंदर गई...वो ही जानी-पहचानी खुश्‍बू तैर रही थी। मैं थम गई। ये कुणाल की देहगंध थी। ऐसी चीजें  कई बार ऐसे अचानक आपके सामने आती है कि‍ आप कल्‍पना भी नहीं कर सकते। मुझे बहुत पसंद है कुणाल की देहगंध। ये मुझे खींचती है उनकी ओर। उन दि‍नों जब अंश नहीं हुआ था, मैं कुणाल के ऑफि‍स से लौटने पर अक्‍सर लि‍पट जाती थी। वो हटाते मुझे। कहते..पसीने से भीगा हूं...शॉवर तो लेने दो पहले।

मैं कहती..उं..हूं...रहने दो...मुझे अच्‍छी लगती है तुम्‍हारे बदन से नि‍कलती ये गंध। तुम्‍हारे होने का अहसास दि‍लाती है।  कुणाल हंसते। बि‍ल्‍कल पागल हो तुम..ये कहकर माथे पर एक चुंबन देते और अगले पल बाथरूम में। वो आफि‍स से लौटने के बाद बि‍ल्‍कुल आराम से रहना चाहते। अपनी पसंदीदा सफेद कुर्ते-पायजामे में तो कभी बारमूडा-टी शर्ट में। फि‍र हम साथ चाय पीते। दि‍न भर की बातें शेयर करते और कई बार चांदनी रात में सैर को नि‍कल जाते।

मैं इन प्‍यारी यादों में खोई थी कि‍ कुणाल की तेज आवाज आई...कहां हो, मैं जल्‍दी से दौड़ी। कल रात की तल्‍खी के बाद सुबह से हमारे बीच कोई बात नहीं हुई थी।  मैं चाहती थी कुछ कहना। पता तो चले कि‍ जनाब का मूड कैसा है।  यूं भी उस खुश्‍बू ने मुझे अतीत में ले जाकर छोड़ दि‍या था, जो जीवन के सबसे हसीन लम्‍हें थे। वक्‍त के साथ सब छूटता जाता है। हम वही रहते हैं और सब कुछ बदलने लगता है।

मैं इस वक्‍त कुणाल को अपनी फीलींग्‍स बताना चाहती थी। कहा- पता है कुणाल अभी न......उसने तुरंत मुझसे कहा....आई हेव रश टू गो...प्‍लीज वी टॉक टू लैटर........

मैं चुप हो गई। दोनों को बाय कि‍या और आकर सोफे में धंस गई। यही तो होता है। हम अपने जीवन में इतने बि‍जी हो गए हैं कि‍ एक-दूसरे की भावनाओं को समझने का वक्‍त नहीं। पहले बि‍ना बोले भी हम जान जाते थे, कि‍ क्‍या कहना चाहता है वो। और अब ये आलम हैं कि‍ शब्‍द होठों पर अटके  रह जाते हैं और हमसे मुंह मोड़कर कोई चला जाता है।
रात भी तो यही हुआ। बेवजह की बात पर हम उलझ पड़े। माना शादी के 7 साल नि‍कल गए हैं, इसका ये मतलब नहीं कि‍ अब हममें पहले वाली बात ही न रहे। पहले हम एक-दूजे से कोई भी बात नहीं छुपाते थे। बातें अच्‍छी हो या बुरी, सब शेयर करते। अब कई बातें तो मुझे बहुत बाद में पता चलती हैं। मैं पूछती तो बड़े आराम से कह देते हैं कुणाल, अरे बताया तो था। तुम भूल गई। बस इसी बात पर लड़ाई।
अभी उस दि‍न नीता आई थी। हम कॉलेज में साथ थे। कुणाल से भी अच्‍छी दोस्‍ती है उसकी। और अब आॅफि‍स में भी साथ है।  उसने कहा मुझसे, यार तुम कुणाल को समझाती क्‍यों नहीं। वह जब देखो सबसे उलझ पड़ता है। जब से नई बॉस आई है, कुणाल के अंदाज ही बदले हुए हैं। काफी कांशस हो गया है। पहले की तरह खुश भी नहीं रहता। बॉस को भी मुंह पर जवाब दे देता है। कहीं इसका कोई गलत परि‍णाम न हो। 

मैं हैरान थी क्‍योंकि‍ मुझे जरा भी जानकारी नहीं थी इन बातों की। कुणाल ने ये भी नहीं कहा था कि‍ उसकी नई बाॅस आई है। हां, कुछ दि‍नों पहले ये जरूर कहा था कि‍ हो सकता है उसका प्रमोशन हो। लगता है उनका प्रमोशन रूक गया और नई बॉस की ज्‍वायनिंग आई है,  इस करण वो कर्म्‍फट नहीं है। घर में भी चि‍ड़चि‍ड़ाते रहते हैं।

रात यही पूछ दि‍या तो बि‍ल्‍कुल उखड़ गये। कहने लगे क्‍या जरूरी है कि‍ आफि‍स की सारी बातें घर लेकर आऊं, तुमसे डि‍स्‍कस करूं। वहां क्‍या कम परेशानी है जो अब घर में भी शुरू कर दूं। मैंने कहा- तुम बताओ या न बताओ, परेशानी तो घर लेकर आते ही हो। घर पर भी खुश नहीं रहते। तो क्‍यों नहीं कहते सारी बात। बस...इसी बात पर लंबी बहस छि‍ड़ी। मैंने भी कहा...ठीक है.;अब से न तुम बताना कोई बात न ही मैं बताऊंगी। हम अपने हि‍साब से चीजे तय करेंगे, और कोई सवाल नहीं पूछेंगे।तुम अपने हि‍साब से जिंदगी जि‍ओ और मैं अपनी तरह से। कोई सवाल-जवाब नहीं। सुनकर नरम पड़े कुणाल। कहा ठीक है...अब से बता दूंगा, अब सो जाओ, देर हुई।

मैं जानती थी कि‍ ये एक समझौता था। बात खत्‍म नहीं हुई। पर अगर कुणाल ऐसे दि‍ल में बात रखते रहेंगे तो उनके सेहत के लि‍ए भी ठीक नहीं। फि‍र सारा कुछ तो मन पर है। जब मूड अच्‍छा नहीं रहेगा तो मेरे और अंश के साथ भी खुश नहीं रहेंगे। इससे हमारे बीच भी तनाव बढ़ेगा। इसी उधेड़बुन में कब नींद आ गई, पता भी नहीं चला। सुबह भी कोई बात नहीं हुई।

मैं सोचने लगी कि‍ क्‍या करूं। अगर अभी जो फीलिंग आई है, उसे नहीं कहती हूं तो शाम उसके लौटने तक न ये मूड बाकी रहेगा न ही वो शब्‍द..जो मन को भि‍गो रहे हैं।
मैंने तुरंत मोबाईल उठाया और टाइप कि‍या- तुम घर से अभी चले गए, बि‍ना कुछ कहे, बि‍ना सुने। मगर सारे घर में तुम्‍हारी वही पहचानी सी खुश्‍बू तैर रही है। यूं लग रहा जैसे तुम मुझे आगोश में भर कर पूरे घर में गोद में उठाए घूम रहे हो। मैं डूबी हूं तुम्‍हारी यादों में, तुम्‍हारे प्‍यार में। तुम मुझे इस नींद से न जगाना। आज मैं वही सोनाली हूं, जि‍से प्‍यार से तुम सोनू-सोनू कहते थे। आई लव यू। जल्‍दी आना, मैं पुराने पलों को फि‍र जीना चाहती हूं। सि‍र्फ तुम्‍हारी....सोनू।
 अब चलूं कुणाल के पसंदीदा पनीर की सब्‍जी और बूंदी रायता बना लूं। आज वो जल्‍दी लौटेंगे, मैं जानती हूं। शादी के गुजरते सालों में प्‍यार कम हो न हो, कहीं दबता चला जाता है। हम अपनी-अपनी उम्‍मीद पूरी नहीं होने का रोना तो रोते हैं मगर कोई पहल नहीं करते। आज मैं शुरूआत कर ही दूं। कुणाल जो अपने मन के कपाट बंद करने लगे हैं वो, अब मैं उसे खोलकर रहूंगी, झगड़े से नहीं, प्‍यार से। 

तस्‍वीर...उदयपुर की 

24 जुलाई 2016 को प्रभात खबर के 'सुरभि‍' में प्रकाशि‍त कहानी


Sunday, July 24, 2016

वि‍मलमि‍त्र और चक्रधरपुर

लेखक वि‍मलमि‍त्र जी की 1975 की तस्‍वीर जब वो आचार्य शशि‍कर जी के घर आए थे
थोड़ी ही देर में हम चक्रधरपुर में थे। मि‍त्र का आवास हवेलीनुमा है। बाहर से भी और अंदर से भी। यह मकान 1930 में बनकर पूूरा हुआ था, यह बाहरी गेट पर अंकि‍त है। अंदर ऊंचे छत और बड़ा आंगन अपने दौर की गवाही दे रहा था। एक कमरे की दीवार में तस्‍वीर दि‍खी, जि‍समें उसके दादाजी के साथ लेखक वि‍मलमि‍त्र खड़े थे। मुझे सुखद आश्‍चर्य हुआ। पता चला कि‍ लेखक वि‍मल मि‍त्र का यहां आना-जाना था। मि‍त्र के दादाजी आचार्य शशि‍कर ने उनको अपने पुत्र के ब्‍याह का नि‍मंत्रण भेजा था और वो सबसे मि‍लने चक्रधरपुर आए थे। मुझे बहुत अच्‍छा लगा जानकर। दादाजी के आलमीरा में वि‍मलमि‍त्र की लि‍खी लगभग सारी कि‍ताबें भरी हुई थी।

दरअसल वि‍मल मि‍त्र जी रेलवे में काम करते थे और कुछ दि‍नों तक चक्रधरपुर डि‍वीजन में भी उन्‍होंने काम कि‍या था। यह लगभग 1940 के आसपास की बात है। उनके उपन्‍यास 'चार आंखों का खेल' चक्रधरपुर में रह रहे एंग्‍लो-इंडि‍यन के ऊपर आधारि‍त है। बाद में उन्‍होनें नौकरी छोड़ दी थी,और यहां से चले गए। मगर तस्‍वीरें गवाह है कि‍ उन्‍होंने उस वक्‍त के बने संबधों को नि‍भाया। दूसरे कमरे की दीवार पर डा. राजेन्‍द्र प्रसाद की भी तस्‍वीर लगी थी।


चक्रधरपुर में मि‍त्र का आवास
चक्रधरपुर  पश्‍चि‍मी सि‍ंहभूम में पहाड़ि‍यों से घि‍रा छोटा सा शहर है। आसपास जंगल होने के कारण यहां पहले बीड़ी का व्‍यापार खूब फलता-फूलता था। दूसरा रेलवे डि‍वीजन होने के कारण यहां रेलवे कर्मचारी अधि‍क हैं और यह शहर अपने रेलवे स्‍टेशन कोड के नाम पर रखा सी के पी के नाम से जाना जाता है।  पोड़ाहाट (चक्रधरपुर) अखंड सि‍ंहभूम की राजधानी रही है। 


हवेली की छत पर
हमलोगों ने काफी वक्‍त वहां गुजारा। पहली बार बीड़ी का कारखाना भी देखा। चूंकि‍ पोड़ाहाट के जंगलों में तेंदू के खूब पेड़ हैं इसलि‍ए वहां कि‍सी वक्‍त बीड़ी का खूब अच्‍छा व्‍यापार होता था। अब वो दि‍न नहीं, फि‍र भीी पुराना कहीं कुछ बचा रह जाता है। पुरानी हवेली, पुराना व्‍यापर या पुरानी याद। दि‍न के भोजन के बाद वहां से चल पड़े। चूंकि‍ रास्‍ता लगभग सुनसान है और घाटी भी है, सो रात घि‍रने से पहले हमें लौटना ही था। बातचीत करते, नजारे देखते हम लौटने लगे। 

बरसात से और नि‍खरा धरती का सौंदर्य  
अब बारि‍श तेज होने लगी थी। घाटी की खूबसूरती और बढ़ गई इससे। तभी एक मोड़ पर एक औरत रूगड़ा बेचती दि‍खी। आखि‍रकार हमने गाड़ी रोक ही दी। उसने दो बरतनों में रूगड़ा और दो में अमरूद रखे थे बेचने को। देखने से अमरूद काफी ताजा लग रहा था, जैसे अभी तोड़ा हो। उसके पास एक काला कुत्‍ता बैठा था, साथ ही एक काली छतरी भी रखी थी बगल में। 


जाने कि‍स ओर ले जाए ये सड़क 
अपना सामान समेटती ग्रामीण महि‍ला 
हमने दाम पूछा। वो हि‍ंदी बोल नहीं पा रही थी। कहा पुटका 90 टाका, और टमरस 20 टका का।  पुटका यानी रूगड़ा और टमरस मतलब अमरूद। तोलमोल का कोई हि‍साब नहीं था। सो जि‍तना कहा हमने उसे पैसे देकर सब खरीद लि‍या क्‍योंकि‍ हम जानते थे कि‍ सामान खराब नहीं होगा और सब बि‍क जाने पर वह घर जा सकेगी। उसने बरतन समेटा अपना। मैंने पूछा ये कौन सी जगह है- टेबो घाटी बोलकर वह चल पड़ी, हम भी। हमने वहीं अमरूद खाए, लाल अमरूद यानी टमरस का स्‍वाद बहुत दि‍न बाद लि‍या।

अपनी छोटी बहन को साईकि‍ल की सैर कराती बच्‍ची

भीगी सड़क पर दो बच्‍चों का याराना

शाम होने वाली थी। गांव वालों की चहल-पहल से अच्‍छा लग रहा था। कुछ महि‍लाएं भीगते हुए कुएं पर कपड़े धो रही थी तो कुछ नहा रही थी। बच्‍चे छतरी ताने कहीं जा रहे थे, तो कुछ मुर्गियां दाना चुन रही थी घर के बाहर। खेतों में पानी जमा था। धान के नए पौधें का रंग खूब हरा , खूब सुंदर । पेड़ गहरे हरे रंग के थे। बारि‍श से दूर के सारे पेड़ धुंध में घि‍रे नजर आ रहे थे। भेड़, बकरी और गाय एक साथ चर रही थीं। उनका बूढ़ा चरवाहा छाता लि‍ए आराम से बैठा हुआ जानवरों को घास चरते देख रहा था। धान रोपती महि‍लाएं। ये श्रम का कार्य है। कई-कई दि‍न लग जाते हैं। ण्‍क छोटी बच्‍ची अपने से भी छोटी बहन को साईकि‍ल पर घुमा रही थी। एक औरत माथे पर झुरी (छोटी-छोटी सूखी लकड़ि‍यां)  लेकर एक हाथ से अपने बच्‍चे का हाथ थाम कर चली जा रही थी।


माथे पर सूखी पतली लकड़ि‍यों का गट्ठर लेकर जाती महि‍ला
अब शाम ढलने लगी। बारि‍श भी तेज हो गई थी। हमें एक बात अखरी कि‍ सड़क चौड़ीकरण के नाम पर दोनों तरफ पेड़ों को काट दि‍या जा रहा है। अगर संतुलि‍त तरीके से कार्य नहीं हुआ तो इस राह की खूबसूरती जाती रहेगी। यहां इको टूरि‍ज्‍म को बढ़ावा दि‍या जा सकता है। खैर, हम सफर का पूरा आनंद ले रहे थे। रास्‍ते में कई ऐसे जगह मि‍ले, जहां उतरकर कुछ देर वक्‍त गुजारने का मन हो आया। मगर हमें लौटना था सो लौट आए चक्रधरपुर से वापस घर। 
मवेशी चराता वृद्ध
हरे-भरे पेड़ का अवशेष देख बहुत दुख हुआ।
मानसून का सौंदर्य

सड़क पर टहलता बच्‍चा।