Tuesday, July 17, 2018

मृत्युगंध.....



नहीं, बिल्कुल नहीं भीगी थी 
बारिश की फुहारों में 
मगर 
पसलियों में अकड़न है 
ऐंठ रही पिंडलियां
ताप बढ़ता ही जाता है
फूलदान में सजे रजनीगंधा से
कोई ख़ुशबू नहीं आती
बेस्वाद है सब
बड़बड़ाहट तेज़ हुई जा रही
हाँ, नहीं जी सकती तुम्हारे बिना
भूलना असम्भव है
पास आओ, रख दो माथे पर हाथ
कहीं धुनिया धुनक रहा रुई
आसमान से बर्फ़ के फ़ाहे गिर रहे
देखो
तुम हो ना, तुम जानते हो न
कितना कुछ बदल जाएगा
तुम्हारे न होने से
आदत, ज़रूरत, सपने और
गहरी नींद सोने के लिए चाहिए
तुम्हारे बदन से उठती पहचानी ख़ुशबू
सुला दो अब, मान भी जाओ
तुम्हारी क़सम, जब से मना किया
नहीं भीगी हूँ बौछारों में
बस ज़रा सी हरारत है, परेशान ना हो
सो जाऊँ , रख दूँ सीने पर सर
ओह, ये वो गंध नहीं
तुम्हारी देहगंध नहीं
जाने दो अब, कोई बुलाता है
आँखें झपकी जा रही
पहचान पा रही हूँ अच्छे से
चिरप्रतिक्षित, यह तो मृत्युगंध है।

Saturday, July 14, 2018

हवा सा आता-जाता रहा ....


दुःख उलीचती रही 
प्रतिदिन
अँजुरी भर-भर 
सागर उफनता रहा 
दुःख बढ़ता गया 
संबंध
टूटने और जुड़ने के बीच
उभरती, सिहरती पीड़ा
सघन होती गई
दर्द हैं, अपेक्षाएँ हैं
फिर
निपट सूनी ज़िंदगी
गरम दिन में
छांव तलाशती सी
कि कोई हवा सा
आता-जाता रहा
आया समझ
दुःख सागर है
निस्पृह होना ज़रूरी
कँवल पत्ते पर
ठहरी बूँद की तरह
कि रिश्ते मोह के
कच्चे धागे हैं...।

Tuesday, July 10, 2018

मीठी छुवन....


“ मेरी मुट्ठियों में बंद है
एक मीठी छुवन
जिस दिन खुलेंगी हथेलियाँ
मैं अकेली हो जाऊँगी
जीवन भर के लिए...”

Saturday, July 7, 2018

दर्द सहलाता है


झकझोरा तुमने 
लौटी हूँ मानो नींद के गाँव से 
खिंचता सन्नाटा 
जैसे बस टूटना ही चाहता हो 
अब दर्द सहलाता है 
आवाज़ की दुनियाँ में
रंगों की सतरंगी चमक बरक़रार है।

Friday, July 6, 2018

आषाढ़ का दिन


रात की छाती पर
नहीं है चाँद
काली घटाएँ घिर-घिर
खोल रही स्मृति के पिंजरे
मेघ देख हृदय का माटी 
फिर दूब सा हरा हुआ
है बारिश की झड़ी
पत्तों-पत्तों में छुपा संदेश
मेघों से पर्वतों के लिपटने का
आया दिन
हाँ है ये आषाढ़ का दिन

Thursday, July 5, 2018

रुको भी......


चीख़ रही तन्हाइयाँ
पिछली कई रातों से 
मत जाओ, रुको भी 
देखो एक बार 
कितनी अकेली पड़ गई तुम 
और मैं..
जलते-बुझते जुगनू देख
ललिमा भी देखती हूँ रोज़
कुछ बातें सुनकर
अनसुना करना आ गया मुझे भी।

Tuesday, July 3, 2018

इंसान पेड़ नहीं बन सकता


पेड़ अपने बदन से 
गिरा देता है 
एक-एक कर सारी पत्तियाँ
फिर खड़ा रहता है 
निस्संग
सब छोड़ देने का अपना सुख है
जैसे
इंसान छोड़ता जाता है
पुराने रिश्ते-नाते
तोड़ कर निकल आता है
उन तन्तुओं को
जिनके उगने, फलने, फूलने
तक
जीवन के कई-कई वर्ष ख़र्च
किए थे
पर आना पड़ता है बाहर
कई बार ठूँठ की तरह भी
जीना होता है
मोह के धागे खोलना
बड़ा कठिन है
उससे भी अधिक मुश्किल है
एक एक कर
सभी उम्मीदों और आदतों को
त्यागना
समय के साथ
उग आती है नन्हीं कोंपलें
पेड़ हरा-भरा हो जाता है
पर आदमी का मन

उर्वर नहीं ऐसा
भीतर की खरोंचे
ताज़ा लगती है हमेशा
इंसान पेड़ नहीं बन सकता कभी।

Monday, July 2, 2018

कौन हैं ये लोग ....


बेटियों ने बेटियों को बचाना चाहा
अपने जैसी मासूमों को
बताना चाहा, कि समझो
तुम कोई सामान नहीं
कि तस्करी की जाए तुम्हारी
और एक दिन
लुट-पिट कर, आबरू और
बरसों की कमाई गवाँ
ख़ाली हाथ लौट आओ
उसी गाँव में
जहाँ कोई भैया, दादा या दीदी
फिर फुसलाकर बेच दे
पाँच बोरी अनाज की क़ीमत में
एक जीवित लड़की

ऐसी अच्छी बातें समझाने वाली
लड़कियों को
बहुत अच्छे से समझा दिया गया
कि मुँह खोलने की सज़ा
बलात्कार से बेहतर कुछ नहीं
कि
औरत होना जुर्म है
और जागरूकता उससे भी बड़ा दोष
विरोध का है इनके पास
बस एक ही एक तरीक़ा
कि जिस्म ऐसे नोंचो
कि पशुओं को भी शर्म आ जाए

फिर सभ्यता रोयी है
मूल्यों पर सवाल खड़े हो गए
इस बार
कोई अकेली बेचारी नहीं है
जो रात सिनेमा देखती और छोटे कपड़े पहन
उकसाती थी बेचारे मर्दों को
ना थे लूटने वाले हाथ
अजनबी किसी के
भीड़ थी, साक्षी भी थे अपने ही
पास-पड़ोसी
जिन्होंने ना कुकृत्यों को
होने से रोका ना बाद में टोका

कोई बता सकता है क्या
कि कौन हैं ये लोग
जो समानांतर सत्ता बनाना चाहते हैं
कौन है ये अपने
जो बहिन-बेटी की इज्जत तार-तार करते हैं
कौन है जो
बेटी बेचने से रोकने वाली बेटियों को ही
रौंदते हैं
कौन है जो धर्म की आड़ में
बर्बरता की सभी हदें पार कर भी चैन से जीते हैं?

Friday, June 29, 2018

पास बैठो तुम....


आओ न
पास बैठो तुम
तुम्‍हारे मौन में
मैं वो शब्‍द सुनूंगी
जो जुबां कहती नहीं
दि‍ल कहता है तुम्‍हारा....


आओ न
फि‍र कभी मेरे इंतजार में
तुम तन्‍हा उदास बैठो
और दूर खड़ी होकर
मैं तुम्‍हारी बेचैनी देखूंगी...

आओ न...
मि‍ल जाओ कभी
राहों में बाहें फैलाए
मैं नि‍कल जाऊँगी कतराकर मगर
खुद को उनमें समाया देखूंगी......

आओ न...
फि‍र से अजनबी बनकर
मेरा रास्‍ता रोको..मुझसे बात करो
मुझे लेकर दूर कहीं नि‍कल जाओ
वादा है मेरा, झपकने न दूंगी पलकें
बस, तुममें ही डूबकर जिंदगी बसर करूंगी......।

Friday, June 22, 2018

दौर चटकने का


ये वक़्त है
सूखने, चटकने, टूटने और मरने का
धरती सूखी है
सूरज के प्रचंड ताप से पड़ गईं है दरारें
त्राहि मची है चारों ओर 
कई रिश्ते भी टूटे इन्हीं दिनों
टूटती पत्तियों की तरह नहीं
हरी-भरी डाली गिर गई
ज़रा सी हवा ने सबकी औक़ात
उजागर कर दी
कई आइने चटके पड़े हैं
आदमी बँटा नज़र आ रहे उसमें
बड़ा शोर उठ रहा कुछ-कुछ दूरी पर
आदमियों का मेला भी है
रेला भी
पूछते हैं लोग इन दिनों अपने शहर में
चल रहा ये क्या नया खेला है
गाँवों में फिर मीनाबाज़ार लगने लगा
रिक्शे के पीछे कुत्ते दौड़ लगा रहे
तड़प-तड़प कर अपने आप मर रही हैं
ग़ेतलसूत डैम की मछलियाँ
घाटी में अमन के पैरोकार और सिपाही
मारे जा रहे हैं
हरवे-हथियार से लैस हैं लोग
मुस्तैद खड़ी है पुलिस
सरकार दे रही रुपये किलो चावल
मगर भूख से मरने की ख़बर रोज़ आ रही है
दरअसल ये दौर है
सूखने, चटकने, टूटने और मरने का
पतंग उड़ाने से ज़्यादा
काट गिराने की ताक में हैं लोग
बाबा के आँगन का अमरूद पेड़
‘बान’ मारने से सूख गया
गुलाबी कमल से भरा तालाब
अबकी बरसात में मर गया
और
जीवन के सबसे सघन-सुंदर सम्बन्धों में
लोहे की तरह जंग लग गया।