Wednesday, February 14, 2018

वेलेंटाइन डे: सीमाओं में बांधना ठीक नहीं


युवा दिलों की धड़कनों के लिए किसी महापर्व से कम नहीं है 'वेलेंटाइन डे' अर्थात 'प्रेम दिवस'। प्रत्येक वर्ष 14 फरवरी को यह मनाया जाता है। लेकिन इसे सिर्फ स्त्री-पुरुष की सीमा में बांधेंगे तो यह अपना असली मकसद खो देगा। यह पर्व हर उस रिश्ते के लिए है  जो प्रेम की डोर से बंधे हैं। हालांकि इस सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि वर्तमान में एक बड़ा वर्ग सिर्फ प्रेमी युगल के बीच पनपे प्रेम को ही इससे जोड़ कर देखता है। समाज में एक और वर्ग है जो हर वर्ष  इसका बेसब्री से इंतजार करता है। वह हैं कथित धर्मरक्षक सरीखे लोग जिनका मानना है कि यदि इसे रोका नहीं गया तो समाज का पतन हो जाएगा। इसके लिए वह सब कुछ करते हैं जो किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं है। परंतु इससे 'वेलेंटाइन डे' पर कोई फर्क नहीं पड़ा। हर साल यह मजबूती से अपनी जड़ें गहरी करता जा रहा है और अब तो भारतीय संस्कृति में यह दिवस इस तरह घुल-मिल गया है कि बच्चे से वृद्घ तक हर किसी को पता होता है कि 14 फ़रवरी अर्थात 'वेलेंटाइन डे'। आप इसके पीछे बाजार की अवधारणा को भी जोड़ सकते हैं। 

अब यह बात अलग है कि इसे कौन कैसे और कहां मनाता है। भारत में 'वेलेंटाइन डे' की शुरुआत 1992 के आसपास उस समय हुई जब खुले बाजार की अवधारणा के साथ देश ने पींगे बढ़ानी शुरू कीं। उस समय 'वेलेंटाइन डे' का इतना ही महत्व था कि इस दिन प्रेमी अपनी प्रिय को कार्ड और गुलाब देते थे। तब कॉलेज की लड़कियाँ एक दूसरे को चेतावनी भी देती थीं कि आज के दिन कोई लड़का लाल गुलाब दे तो मत स्वीकारना, वरना उसकी प्रेमिका बनना पड़ेगा। तब गिफ़्ट का इतना चलन नहीं था। बाजार से इसका जुड़ाव के गवाह आंकडे़ बताते हैं कि पूरे विश्व में इस अवसर जितने ग्रीटिंग कार्ड बिकते थे बस उससे ज्‍यादा नव वर्ष पर बिकते थे। हालांकि वर्तमान दौर में इसका एक बड़ा हिस्सा वाट्सएप व फेसबुक के हिस्से में भी चला गया है। परंतु गिफ्ट फिर भी बड़ा बाजार बना हुआ है।

बहरहाल, अब सात दिनों का 'वेलेंटाइन वीक' मनाया जाने लगा है, जिसकी समाप्ति 14 फ़रवरी की होती है जब प्रेमी अपने प्यार का इजहार फ़ूल और तोहफे देकर करते हैं। 
हालांकि कथित रूप से सोशल पुलिसिंग ने प्रेमी युगलों के लिए थोड़ी मुश्किल पैदा की है। आपको टीवी चैनलों पर अखबारों में यह पढ़ने को मिल ही जाता है कि प्रेमी युगलों को पार्क, प्राकृतिक स्थल, सिनेमा हाल के बाहर और कई बार तो रेस्टोरेंट तक से खदेड़ कर बाहर निकला जाता है। हालांकि सभ्य समाज में किसी को इस बात का हक नहीं है कि वह दो वयस्क लोगों के मिलने-जुलने पर पाबंदी लगाए। 
इस तरह की अराजक गतिविधियां हमारे समाज की खूबसूरती को संकीर्णता में कैद कर नष्ट कर रही हैं। इन कथित पहरेदारों को प्रेम और अश्लीलता के फर्क को समझना होगा। 

 हम समाजशास्त्र का हवाला दें या फिर इतिहास में झाँके या ज़रा मानव विज्ञान को समझें, प्रेम कहाँ नहीं है। हम अपने सम्बन्धियों और मित्रों से भी तो प्रेम करते हैं।और जहाँ तक स्त्री-पुरूष के बीच के प्रेम की बात है,तो शायद ही कोई ऐसा इंसान होगा दुनियाँ में जिसके मन में कभी प्रेम के बीज का प्रस्फुटन नहीं हुआ होगा। यह तो एक सहज मानवीय घटना है। 

हम बहुत चाव से पढ़ते हैं हीर-रांझा, सोहिनी-महिवाल, नल-दमयंती, रुपमती-बाज़बहादुर के किस्सेे तो पूरी श्रद्धा के साथ कृष्ण-राधा का प्रेम और शिव के लिए पार्वती की तपस्या का वर्णन सुनते हैं। मीरा के गीत डूबकर गाते हैं हम आज तक। हमारे आराध्य राधा- किशन भी तो उपवनों और कुंजों में मिलते थे। हमारे मन में इन नामों के लिए आदर है। फिर भी विरोध करते हैं वेलेंटाइन डे का। यह सही है कि कुछ युवा सार्वजनिक स्थलों पर आपत्तिजनक व्यवहार करते हैं, उनका विरोध स्वभाविक है परंतु कुछ लोगों के लिए वेलेंटाइन डे के नाम पर सबको प्रताड़ित करना अनुचित है।

ग़ौरतलब है कि 'वेलेंटाइन डे' को केवल प्रेम का दिन मान लेंगे तो इस दिन का गहरा अर्थ समझ में नहीं आएगा। संत वेलेंटाइन,जिनकी याद में इस दिन की शुरुआत हुई थी, उनका जीवन प्रेम की परिभाषा को विस्तृत अर्थ प्रदान करता है। संत वेलेंटाइन का प्रेम ईश्वर के प्रति था तो अजनबी लोगों के प्रति दया और करुणा से भरे थे वो। जेलर की नेत्रहीन बेटी के लिए उनकी प्रार्थना प्रेम के कई आयाम का प्रदर्शन करती है।

प्रेम बहुमुखी होता है। यह ऐसी शक्ति है जो किसी के जीवन में परिवर्तन लाने की क्षमता रखती है। प्रेम हमारे मन में प्रकाश का सृजन करता है और जीवन में आनंद का संचार होता है। प्रेम में किसी के जीवन शांति और सामंजस्य ला सकता है। 

तात्पर्य यह है कि संत वेलेंटाइन को देखें तो हमें इस दिन को प्रेम दिवस के रूप में मनाना चाहिए मगर यह केवल स्त्री-पुरूष के प्रेम का प्रतीक बनकर न रह जाए। सम्पूर्ण मानवता और तमाम रिश्ते-नाते के बीच प्रेम का संचार हम करें तो हमारे भीतर और आसपास भी बहुत कुछ बदल जाएगा। हमें सम्पूर्ण मानवता से प्रेम करना चाहिए। इस दिन के महत्व को सीमित न करते हुए, सम्पूर्ण सम्बन्धों में ऊष्मा लाने का कार्य किया जाए। 


दैनि‍क ' इंडि‍यन पंच' में आज 14 फरवरी को प्रकाशि‍त टि‍प्‍पणी 




Friday, February 9, 2018

पतझड़ की आहट...


बहुत शोर है हवाओं का 
सरसरा रहे हैं पत्ते
झूम रहे हैं पेड़ सभी
धूलों का बवंडर
उठ-उठ कर 
खिड़कियों के रास्ते
बिछ रहा कमरे की फ़र्श पर
मन भी ज़रा अनमना सा है
बताए कोई
यह बसंत है या
है पतझड़ की आहट....

Wednesday, January 31, 2018

माघी पूर्णिमा का चंद्रग्रहण.....






देखा मैंने 
चाँद को बढ़ते, घटते
फिर बढ़ते
तिल-तिल कर 
आधा चाँद जब छुपा था 
धरती के साये में
तब भी लगा था ख़ूबसूरत
और जब लाल होते हुए
ग़ायब हुआ
नहीं लगा एक बार भी
लगा है कोई ग्रहण
छुपते-छुपते निकल ही आया
माघी पूर्णिमा का
दूधिया चाँद

जाने कहाँ गयी वो


जाने कहाँ गयी
वो
जो मेरे साथ रहती थी
नहीं देखा
बहुत दिनों से 
नाज़ुक कोंपलों पर
ऊँगलियाँ फिराते
कबूतरों के झुंड को
धप्प से कूदकर डराते
रात को
तारों भरे आकाश में
नक्षत्रों को झूठ-मूठ दौड़ाते
जाने कहाँ गयी
वो
जो मेरे साथ रहती थी
हर मौसम, हर सुबह
हर शाम से प्यार था उसको
कभी बारिश को तरसती
कभी गरमियों से
क़दमताल करती
और यह ठंड !
इसे तो बाहों में जकड़ती थी
हर बरस कहती
कुहासे भरी सुबह में
मुँह से भाप निकालते
ओ जाड़े के मौसम
तुम मुझे बहुत पसंद हो
अब तो सब मौसम
एक सा लगता है
जाने कहाँ गयी
जो यह सब कहती थी
और मेरे साथ रहती थी ।

Tuesday, January 23, 2018

स्वागत है बसंत तुम्हारा


प्रकृति का उत्सव है बसंत।मौसम का यौवन है बसंत। फूलों के खिलने और धरती के पीले वसन में रंगने का समय है बसंत।


यौवन का प्रतिनिधित्व करता है बसंत। इस संत धरती की ख़ूबसूरती इतनी अधिक बढ़ जाती है कि सब कुछ जवाँ लगता है। पेड़ पुराने पत्तों को छोड़ देता है, झाड़ देता है अपने तन से और युवा बन जाता है। बसंत का प्रेमी कभी वृद्घ नहीं होता। अपनी तमाम दुश्चिंताओं को परे हटाकर, सारे दुखों को सूखे पत्तों सा झाड़कर, निराशाओं के काले बादलों को चीरकर उम्मीद के कोमल धूप में विहार करने वाले इंसान के जीवन से बसंत कभी नहीं जाता।

वैसे भी सृष्टि का यौवन बसंत है, तो मानव जीवन का बसंत यौवन है।इसलिए कहा भी गया है कि मानव का सबसे ऊर्जावान समय यौवनावस्था ही होता है। यह समय स्वास्थ्य के दृष्टि से तो अतुल्य होता ही है, प्रकृति के साथ-साथ मन के आँगन में इतने तरह के फूल खिले होते हैं कि सम्पूर्ण धरती सतरंगी नज़र आती है।

भगवान कृष्ण ने गीता में 'ऋतुनां कुसुमाकर:' कहकर बसंत को अपनी सृष्टि माना है तो सारे कविगण बसंत ऋतु के गुण गाते नहीं थकते। मनुष्य को प्रकृति का साथ भाता है और उसे प्रकृति का सानिध्य भी बहुत ज़रूरी है। ऐसा अनुपम सौंदर्य और शांति केवल प्रकृति के पास है जो इंसानी जीवन से सभी अवसाद और परेशानियों को समाप्त करने की क्षमता रखता है।

मगर दुःख की बात है कि आज के युवा अपनी इस अमूल्य थाती से दूर जा रहे हैं। बसंत को अपने तन-मन में उतरने और प्रकृति की मादकता को महसूस करने के बजाय नक़ली चकाचौंध में खोते नीरस होते जा रहे है। बसंत को कामदेव का मित्र माना गया है। जब कामदेव अपनी फूलों वाले धनुष की प्रत्यंचा तानते हैं तो प्रकृति की ख़ूबसूरती देख आनंदित होता है मनुष्य। यही वक़्त है जब विदेशों में वेलेंटाइन दिवस मनाया जाता है और अब तो अपने ही देश में ख़ूब प्रचलित है। इस दौर में हम यह बात क्यूँ भूलते हैं कि प्रेम का उत्सव मनाने की परम्परा तो हज़ारों वर्ष पूर्व से चली आयी है। जब धरती पर सरसों की पीली चादर बिछती है तो मन में उमंग ऐसे ही हिलोरें मारती हैं।


बसंत की आहट है, भले इस बरस शीत का प्रकोप कुछ ज़्यादा रहा मगर सरसों के पीले फूल खिले हैं चारों ओर। अनंग का आधिपत्य होगा धरती पर। तो स्वागत है बसंत तुम्हारा।



दैनि‍क ' इंडि‍यन पंच' में आज 22 जनवरी को प्रकाशि‍त टि‍प्‍पणी 


Thursday, January 18, 2018

"जोगिया मन का आत्मानुलाप पलाशपुष्प से"


 "मन हुआ पलाश" काव्य संग्रह_ रश्मि शर्मा" :
 एक पाठकीय समीक्षा - कण्डवाल मोहन मदन 
" तन का वनफूल खिला - खिला सा / बिछुड़ा कोई मीत कल मिला - मिला सा / अलसाई प्रीत का / रतनार अक्स झिलमिला सा / किस का गुंजलक याद कर विहँस पडी हो अँगारमणिका ?.." (अंगार मणिका से ही )....
एक कच्चे जुलाहे का कविता चादर के ताने बाने को प्रकृति परिवेशीय बहुरँगीय लच्छियों से बुनने का प्रयास है या कँहे कि बरसों बाद लौटकर गाँव के सूने पडे़ रहवासे मे अतठस्थ हो उगी दूर्वा को निकालने की जद्दोजहद से उपजे श्रमस्वेदबिँदु । यह ढा़ई अक्षरजनित अनहद नाद की साधना को यथाशक्य साधने का प्रयास भी हो सकता है और फीनिक्स पक्षी सी सुँदरवनीय कल्पवृक्ष की अवसादालिप्तता सँग रक्तिमाभा सँपन्न बुराँशी पहाडों से अलग पलाश-पुष्पाच्छादित अर्धमैदानी ढ़लानों की गँधहीनता के उल्लास-सँत्रास के लयिक कहन भी। यह एक नदी के सोचने के बाद उपजे अशेष रहे उपालम्भी और उलेहनाओं के आत्मानुलापों का उपाख्यान भी सँभव।
वैशाख, शुक्ल पक्ष की अक्षय तृतीया, अमित्युशाभिरुपी अकुलाहट सँग उर्वर भूपाल अयन, और प्रियदर्शी-चेतन जी की शिल्पकथ्य सहकारिता से उपजी काव्य सँवेदनायें मनों के रिक्त कोनों मे प्रविष्टि जरुर लेँगी।शेष तो पाठक ही तय करेँगे।
पुरावाक में कह दिया गया है , कि कविता प्रेमिल साँसों की आवाजाही की आश्वस्तता है। मन मे दबी कस्तूरी सुवास के प्रस्फुटन की सौम्य परिणति है। यँहा पल-पल छवियों की दृश्यता-अदृश्यता भी है तो रेचनकर्म की अपारम्परिकता सँग भाविक हूक भी। मँचीय मधुशालीयता नही इनमे, बल्कि कनुप्रियता है, पाठक हेतु अश्रमपरकता भरी आनँदमग्नता है।, विरल प्रतीकों और बिम्बों की कुशल चितेरी रश्मियाँ अर्थबोधों की सँश्लिषता से सँपन्न कवयित्री सच मे मनप्राँगण मे उग आये कुश उखाड़ने मे सिद्धहस्त है।
'जोगिया पलाश' (जिसकी कवयित्री द्वारा गाहे-बगाहे वर्णन खण्डकाव्य या गद्यगीत बनने मे मुझे शक नही कुश के और यायावरी रेखाँकनों के अलावा) के इतर बहत्तर कविताओं मे सत्ताईस बार प्रकृति प्रेमी मन पलाशपुष्पाच्छादित हुआ कवयित्री का, सत्ताईस कविताओं मे। जहाँ चार कवितायें बिल्कुल विलग रँगो की है, उनमे दो-दो प्रेरणा और तँज भरी। बाकी इकतालीस कविताओं मे प्रेमपराग की छुअन, मिलन-बिछुड़न, अनबन, उलाहनों की भरमार, उलेहनाओं की अचूक मार, नदियाँ, निर्झर, स्मृतियों के वात-निर्वात, कलरव सँग चहचहाहाटें और सुगबुगाहट भी है।
पहले विलग सी चार कविताओं का जिक्र जरुरी है। पहली है उनमे,"टूटने को है"; चीँटियों की सतत सँघर्ष गाथा से प्रेरित मन की उम्मीद ,सपने की ख्वाहिश की नाउम्मीदी मे बदलने की व्यथा का मौन क्रँदन अबूझ है मुझे, पाँव अडा़ये भाग्य समक्ष। "सवाल".मे उकेरित सवाल, आधी आबादी की अस्मिताओं के बुनियादी सवालो की पड़ताल है। उदर तृप्ति से सुँदरता और सजने की चाहना से बहुत बडा़ सवाल जातिहीनता और स्व के अस्तित्व की आनँदमग्नता का जो ठहरा। जँहा "कश्कोल" (विरोधाभासों के सँगमन की ) सुखक्षणभँगुरता और चिरसँगिनीवेदना की बात करती है। वहीं "औ गौरैया" पहाडी़ घिण्डुली के कण्क्रीट शहरी वनों मे बेघर होने.का दारुण गीत। पर आशातीत दूर्वा पल्लवित होने की कामना अभी भी।
तँज भी पसरा है "हम डरते हैं" मे जिँदगी की गलाकाट अँधी असँवेदी भागमभाग मे चयनित चुप्पियाँ, आक्रामक्ता, स्वप्रियजनों को भी मात्र एक प्रतिद्वंद्वी करार देने को प्रतिबद्ध हैं। हर शाम मै "करती हूँ (उसका) इँतजार" ....................जो..../विदाई वाले चुँबन के साथ/ अपनी जुबान पर उगाये/ तेज नाखूनों को/ मेरी पीठ पर गडा़/ कोई ऐँसी बात कह जाता है/ जिसका दँश...../ जो चुभन और कड़वाहट के/ मकडज़ाल मे.उलझाकर / ......खारे आँसुओं या पसीने से उदासीन देर रात तक अथाह मशीनी प्यार दर्शा सो जाता। और यह बदले, इस सुबह की आश लिये वह हर शाम उसी व्यवहार चाक पर पिसने को अभिशप्त।
"ग्रहण" मे भी चँद्रसूर्य ग्रहणों के नैपथ्य मे शहरों की दौड़ती भागती मासूमो, कामगारों और जनता की बेबसी पर व्यवस्था और अमानवीय व्यक्तित्व जनित सँत्रास पर बखूबी तँज है। अब.मेरे सामने.दो.तरह की कवितायें है जो कुछ प्रकृति मे प्रेम रचती उन सँग मन पलाशी होने की बात करती है। और दूसरी तरफ है स्वयँ से, प्रिय से, पेँसिल, घर , नदी , वृक्ष, घास, पुष्प से आत्मानुलापी हर रँग की कवितायें, उलाहनों भरी, सहमति -असहमति वातायनो से झाँकती, तरेरती, सोचने को मजबूर और विस्तार सँग पाठकीय अनुभूतियों को सटीक कविताँश उद्धरण सँग युग्मित करने को भी उकसाती अभिव्यक्तियाँ।
बनारस के मणिकर्णिका घाट के शाश्वत अन्तसत्य के सौँदर्य सँग श्वेत कासफूल पर लिखा आख्यान बरबस याद आता मुक्ताकाशी अँगारमणिका से। छायावाद जैँसे लौट आया हो "अँगारमणिका" मे। अलसाई लाज.मे.गडी़ अँगारमणिका, जोगिया पलाश तले उफ्फ , तन का.बनफूल, अलसाई प्रीत, रतनार अक्स, गुँजलक स्मृति से विहँसना, पलाश मकरँद भरी माँग, और पुरवाई को आँचल मे समेटने वाली अँगारमणिका तुम बेहद खूबसूरत कल्पनाकर्म हो इस सँग्रह की। उधर जोगिया पलाश फागुनी दोपहर मे सिँदूरी अबरीली, शाम को टहनी और फुनगी पर चाँद टिकाये रँगरेज विरह मे टेसू रँग से ज्यादा प्रेमरँग । यह दूसरी सुँदर रचना इस सँग्रह की।
"मगर कल शाम देखा / 'जोगिया पलाश' की / टहनी पर / टिका था चाँद/ मैंने पूछा उससे / क्या इस बरस भी / बिन साजन / बीतेगी होली /......मेरे रंगरेज़ को तूने / क्यों भेजा परदेश / तेरे इन चटक रंगों से / अब मुझे क्या काम / .....ऐ चाँद / सारी दुनिया रंगी होगी /आज टेसू रंग से / पर मुझ विरहन को नहीं / किसी रंग का भान /... हो सके तो / उस निर्मोही को / भेज देना मेरा ये पैगाम/ रंगी हूं उसके प्रेम रंग में / जब आओ तब रंगना इस तन को/ हरे, पीले , गुलाबी और लाल रंगों से " (जोगिया पलाश से ही)........
जागेश्वर भ्रमण मे चीड़ पर भी कवयित्री हरी दूर्वा सी आरोपित हो उर्ध्वगामी होने का सपना सँजोती है तो, भरत के ननिहाल से लौटते अयोध्या मार्ग मे पडे़ शालवन और चीडों पर बहती शीतल हवा से लगभग निर्वसनी पँचपत्रों.वाले इठलाते सेमल का दृष्टिचित्र मनमोहक है। हवा का गमन ऊँचाइयों. से पठारी और मैदानी भागो की ओर का भान भी स्वत: होता है। ताड़ से छिटकी चाँदनी , अमलतास की पीतस्वर्णाभ कलियों सँग बीथोवन धुन और अमलताश पुष्पों का झरते रहना अश्रु मानिँद अजब-गजब कल्पनायें।
स्याही से लिखे हर्फ कविता मे पार्क.की बेँच, कनेरपुष्प हथेलियों की लकीरों सँग कौआ उड़, मैना उड़, तोता उड़ के खेल- खेल मे कई बार तोते सँग पेड़ उडाने की आतुरता देखते ही बनती। अमलतास वाले शहर की एक बानगी,............ "जाना/पहली बार/कि इँसान ही नही / शहर भी करते हैं/ कारोबार/ समूचा वक्त/मिलन.का /बिसरा दिया जहन से/............. शैफाली, हरसिंगार, रजनीगँधा के फूलोँ के नैपथ्य मे उसके दिल के मौसम के पड़ताल की है नायिका ने "गुजरे मौसम की महक" मे। हरी घास की चटाई पर जैकरैण्डा का नीलाभ कँचन वैभव और नीलाँका.गगन की साक्ष्यता सँग त्राटक, सम्मोहन, मारण मोहन उच्चाटन की व्यर्थता के
अभिनव प्रयोग।
'कुछ.शेष.नही' रहता जब.......................हरी.धरा के सीने से/ जब हरापन सोखता है कोई/ रिश्ते को.नीँबू सा/ निचोड़ता है कोई/ तो क्या बचता है फिर/ कसैलापन, सूखापन। भूरेपन से न बच पाता तब कोई। 'धरा पर बसँत', अमराई मे मकरँदशोधी आलिँदों का गुञ्जार है, सरसो, नाना वल्लरियों, सेमल, महुआ,टेसू सँग चिरैया के स्मृति केसर का महारास है ऋतुराज आगमन पर। घने दरख्त मे पसरा जँगल.का एकाँत,उँगलियों की जुम्बिश, आवाज की लरजिश, मौन प्रेम और मन की रौशनी से दूर भागता जीवनतम बाँधता एकटक।
पोखर किनारे के दहकते डैफोडिल्स, रक्ताभ गुलमोहर, नरगिस का आभास देते अतीत स्मृतिदृश्यों को, मोतियाबिँद उतर आयी आँखों.को। बसँत.कै.इस मौसम मे सब बासँती भी नही, मसलन छलनाओं के जाल सतरँगी है। रँगाकर्षणों से उपजा समर्पण एक सच के परदे के हट जाने के बाद जीवन बसँतपथ अब, बदरँग हरैलापन और वादो के सब्ज रास्तों से भटकने को अभिशप्त सा हुआ जा रहा है। सबसे छोटा दिन और लँबी रात का उदासी भरा पर जादुई शब्द तिलिस्म वाकई बिना खुद पढे़ समझना कठिन। नीम आसमान का नीलापन अपनी टहनियों मे बाँधता तो.पोखर.के पानी.मे.देर शाम टिमटिमाते तारों की डुबकी और मुँह छुपा आसमान से बेदखल चाँद कँही रोता दिखता नायिका को। झीँगुरगान पर प्रतिबँध लगा सा। पाबलो नेरूदा सा कविमन उफ्फ, कितनी निस्सीम कल्पनाये रचता। एक और बेहतरीन छायावादी सी कविता।
धूप मे छुप गये वक्त की परछाई को अँधे सा टटोलना,काकक्रँदन से चिहुक उठना, आँगन मे टोटी नल से सतत पानी टपकना और फेरी वाले की आवाज से निस्तब्धता का ह्रास डराती है।सच मे हम डरने लगे है; एक और चिँतनशील कविता। सपने बुनती लडकी की तरह जिँदगी प्यारी लगने लगती एक पल। तो दूसरे पल प्रेमवश झुकने को ताड़ की तरह ऐँठन भरकर गुलामी समझने की भूल सब जागीरों से बेदखल करने की हिमाकत भी करने मे समर्थ यह नायिका।
'जाने कैँसी सुबह है', मे प्रलयकारी शब्दचित्र उपस्थिति झकझोरती है तो 'न सीँचो' मे सीँचकर तरूवर बनने की तमन्ना का गला घोँट कपूर बन मुठ्ठी मे बँद रखने की आत्मघाती गुजारिश है, जो दुखद सी। 'उड़ चुका प्रेम का पाखी' एक.लँबी कविता प्रगाढ़ गुँजलकीय बँधनो को तोड़ती है तो शाम का साँवला अक्स किसी के पतझड़ को जमाने का बसँत बनाने को उतारु। टूट.गया नाता की आशावादिता, चैत्र के बादलों की शस्यश्यामलता रँग मे भँग डालती उमड़-घुमड़ पर उलाहनों का दौर और सूखे सब्ज रिश्तों के पीले पड़ रिसने की प्रक्रियाओं का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण भी तो।
अब बचती है आत्मानुलापी इकतालीस या बयालीस कवितायें, जिनमे.........................ठहरो जरा/बेरँग लगती जिँदगी मे एक बार/साक्षी बनकर देख लो/कोई भी गया वक्त बुरा नही होता।.....(ठहरे लम्हों मे).........
एक और आत्मालापी और यथार्थतः सही कविता है, "उदास होना.लग्जरी है".....उदास होना
लक्‍़जरी है मेरे लि‍ए.......
"जबकि‍
कपड़ेे धो-सुखाने के बाद
अभी भी
बच्‍चों के जूते पर पालि‍श बाकी है ।
उदास होना
लक्‍़जरी है मेरे लि‍ए
जबकि‍
दि‍न-रात की चक्‍की में
उम्‍मीदें पि‍सती रहती हैं
भावनाओं की खि‍ल्‍ली
उड़ाता पाया जाता है
वो हर इंसान
जि‍स पर भी भरोसा कर
अपने सपने सौंपे
और चंद झूठे वादों को
खजाना समझ
छाती से लगाए फि‍रते रहे।
उदास होना
लक्‍़जरी है मेरे लि‍ए
जबकि‍
भूखी है एक्‍यूरि‍यम की
सुनहली मछलि‍यां
छत पर इंतजार में बैठे हैं
सैकड़ों कबूतर
कुछ दानों की आस में
झपट पड़ते हैं आहट पा
और मैं
गहराती उदासी में डूबती
जबरन रोकती हूं
आंसूओं को छलकने से।
उदास होना
लक्‍़जरी है मेरे लि‍ए
जबकि‍
कुकर में सीटी आनी बाकी है
लौटते ही होंगें बच्‍चे स्‍कूल से
गेट से ही चि‍ल्‍लाते
मां, कहां हो, भूख लगी है
अब तो
उदासी खुद कहेगी मुझसे
मुस्‍कान तेरी राह तकती है
जा, कि‍
उदास होना वाकई लक्‍़जरी है मेरे लि‍ए"।............................
मै तीखी गहरी लकीर /खीँचना चाहती हूँ/उसके वजूद मे /इस कोशिश मे /लगातार टूटती जाती हूँ /छिलती जाती हूँ/........ हैरत है तो इस बात पर /कि बेशुमार. दर्द पर /एक शब्द प्यार अब भी भारी है।.............'परिधि वाला.प्यार में ', जँहा सहभागिता, समस्वतँत्रता और समसजा की बातें हैं , वहीँ 'मैँग्रोव' और मै एक.और खूबसूरत रचना है रेचनशिल्प कथ्यसँश्लेषण के भाव से।..................
मुठ्ठियों के बँद और खुले होने.का.अँतर कितना विशाल है , यह 'मुठ्ठियाँ खुली है' का कथ्य है जहाँ, तो "तिलिस्म बुनती रात" रचनाकर्म की परिपक्वता दर्शाती।..........तुम्हें पता है /एक तुम्हारा होना/ सब होने पर भारी है। (तुम नही हो,तो क्या हो?)..............
'आज ये साँझ ढ़लती क्यों नही', 'पहली बूँद.के.इँतजार मे', 'कोई.नही बोलना',' देखना इन उदास आँखौं की तरफ',' होता है धुँआ',' घर', 'सोने-जागने की रस्म', 'सर्द रिश्ते', 'एक खुशी है छिटकी', 'सीने मे झेला है,मेरी आँखों मे', 'एक.उफान', 'तुम याद आओगे', 'मेरा.नाम', 'बदल गये हो तुम', 'खर्च हुई उम्र तक', 'चोरी हो गयी धूप',' दूर जाते तुम','रब तू मेहर रखना', 'मिलन के इँतजार मे', 'जी नही लगता', 'मिलते है बिछड़ने कुछ लिये', 'मरे रिश्ते', 'इश्क की नदी, 'दस्तक' , 'अनसुनी करें',' सरहद पार चली आई हूँ', 'जो मै तोड़ दूँ', 'याद करें', 'अजनबी', 'भरोषे की आँच', 'बहुत अजनबी लगते हो तुम', अन्य आत्मालापी कवितायें है।
...................जिम्मेदारियां बडी़ होती है/ किसी की मौत से/मन से मरे रिश्तों की अर्थी/काँधे पर धर शमशान पँहुचाना/बहुत आसान होता है.......(मरे रिश्ते से)......
...............अब हम /घडी़ के काँटे हैं/मिलते ही हैं पल को/बिछड़ने के लिये.....(मिलते हैं बिछड़ने के.लिए).............
"बहुत अजनबी लगते हो तुम" एक समग्ररूपेण उपालँभी कविता है। जो अशब्दजनित हैं रिश्तों मे।............
चीड़ के अलावा कवयित्री की निगाह पहाडी़ नदी पर भी पडी़ है। उसकी पाटों को अतिक्रमणकारियों ने लील लिया है और बाँधों.ने नीला.जहर घोल दिया है उसमे ठहरे पानी का।जमी आसँमा के दो पाटों मध्य कसमसाती पहाडी़.नदी जो इश्क.की पहचान थी, छटपटाहट मे है।
72 मे से 27 दफा जोगिया मन का आत्मानुलाप पलाशपुष्प से : "मन हुआ पलाश" में रश्मि शर्मा की उपजी काव्य सँवेदनायें सुधी पाठको के मनों के रिक्त कोनों मे प्रविष्टि जरुर लेँगी। शेष तो वे ही तय करेँगे। विरल प्रतीकों और बिम्बों की कुशल चितेरी रश्मियाँ अर्थबोधों की सँश्लिषता से सँपन्न कवयित्री सच मे मनप्राँगण मे उग आये कुश उन्मूलन में निष्णात है। इन कविताओं मे प्रेमपराग की छुअन, मिलन-बिछुड़न, अनबन, उलाहनों की भरमार, उलेहनाओं की अचूक मार, नदियाँ, निर्झर, स्मृतियों के वात-निर्वात, कलरव सँग चहचहाहाटें है। तो शहरों की दौड़ती भागती मासूमो, कामगारों और जनता की बेबसी पर व्यवस्था और अमानवीय व्यक्तित्व जनित सँत्रास पर बखूबी तँज है। स्वयँ से, प्रिय से, पेँसिल, घर , नदी , वृक्ष, घास, पुष्प से आत्मानुलापी हर रँग की कवितायें, उलाहनों भरी, सहमति -असहमति वातायनो से झाँकती, तरेरती, सोचने को मजबूर और विस्तार सँग पाठकीय अनुभूतियों को सटीक कविताँश उद्धरण सँग युग्मित करने को भी उकसाती अभिव्यक्तियाँ है रश्मि शर्मा (Rashmi Sharma) की पूरे काव्य संग्रह में। छायावाद जैँसे सच में लौट आया होे।
उन्ही के शब्द पुनश्च ........
"उदास होना
लक्‍़जरी है मेरे लि‍ए
कि‍ एक ही इंसान
बार-बार क्षमा मांग
वही छल दुहराता रहे
तो क्षमता खुद ब खुद
पैदा हो जाती है
बर्दाश्‍त करने की
तब अपनी ही उदासी का
मजाक उड़ाता है मन
कहता है
हजारों काम अभी बाकी है
धोखेबाज दुनि‍या के बीच
अब भी
तेरे बच्‍चे की मुस्‍कान बाकी है।
उदास होना
लक्‍़जरी है मेरे लि‍ए
कि‍ जि‍न्‍हें
रि‍श्‍ते संभालना नहीं आता
ऐसा साथ होने से
ऐसों के लि‍ए रोने से
कहीं बेहतर है
चि‍डि‍यां, मछलि‍यों और
फूलों से दोस्‍ती करना
और
नन्‍हें से बच्‍चे की ऊंगली थाम
फि‍र से बच्‍चा बन
उनकी नजरों से दुनि‍यां देखना"।
शुभकामनाएं कवयित्री को भविष्य की रचना-कर्मता हेतु ...

Wednesday, January 17, 2018

वक्‍त...


वक्‍त हि‍रण की तरह कुलांचे मार रहा है। कल बेहद बेहद ठंड थी। पि‍छले कई सप्‍ताह से बेतरह ठंढ़ है। आज धूप खि‍ली है...कल.....फि‍र कल......कि‍सी के रोके से कब रूका है वक्‍त.....फि‍तरत है.....ये जा..............वो जा।
अालमीरे की गर्द झाड़ी तो लगा वक्‍त का आईना साफ हो गया.....कई कि‍ताबें, अनखुली...बेपढ़ी..
मुस्‍कराती कथाओं ने मुंह चि‍ढ़ाया.....कहा उलझी रहो.....बतरस के मजे में मेरा सुख तो गवांयां न, खुली आंखों का ख्‍वाब..पूरा कौन करेगा ? 
कि सनद रहे.......एक दि‍न के घंटे 24 ही होते हैं....दो जि‍से देना है!
अब मुंह बनाए सोच रही हूं...क्‍या करूं......क्‍या न करूं...तुम भी जरूरी.....वो भी जरूरी और बाकी...दुनियादारी

तस्‍वीर- एक दुकान में सजी नकली मोति‍यों की माला..

रूक गई प्राची ...

चंद्रभागा के तट पर, जहाँ समुद्र से समाहि‍त होती है नदी, आज वहीँ ,आखों में असीम आनंद लि‍ए प्राची वि‍शाल समुद्र में नदियों का मि‍लन देख रही थी, कि सहसा बालुई तट पर खड़ी प्राची के पैर सागर ने पखार लि‍ए। आह.....आनंद की अनुभूति, एक  गजब का आकर्षण होता है समुद्र का। प्राची का जी चाह रहा था ,छोड़कर कि‍नारा उतरती जाऊं, समाती जाऊं, ठीक समुद्र के बीचों-बीच जहां नीला सागर शांत स्‍थि‍र है | 
शायद उस के अपने मन की तरह। मन ही मन सोचती है प्राची, क्‍यों आई सब छोड़कर, सबको छोड़कर। या फि‍र भागकर, सागर देखने की उत्‍कंठा तो थी कब से। वह पुरी पहुंचने से पहले सूर्य मंदि‍र कोर्णाक में कुछ देर के लि‍ए गई थी, पर उसका मन तो सागर में बसा था। उसे पुरी पहुँचने की जल्‍दी थी।

मगर कल ऐसा क्‍या हुआ कि बॉस के सामने छ़ुट्टी का आवेदन दि‍या कि कल ही जाना जरूरी है। भगवान जगन्‍नाथ के दर्शन के लि‍ए। मां की मन्‍नत पूरी हुई है। कल ही से छ़ुट्टी चाहि‍ए वो भी कम से कम पांच दि‍नों की।

बॉस के चेहरे से लग रहा था कि उन्‍हें प्राची की बात पर यकीन नहीं हुआ ,मगर प्राची का चेहरा कह रहा था कि अगर छुट्टी नहीं मि‍ली तो भी चली जाएगी, वि‍दआउट पे लीव पर या  नौकरी से इस्‍तीफा देना पड़े, तब भी।

बॉस ने सेंक्‍शन कर दी छुट्टी। प्राची के चेहरे पर सुकून आया। मगर उसने ये बात सिर्फ  अपनी सहेली नि‍कि‍ता से शेयर की। इस ताकीद के साथ कि ऑफिस के कि‍सी भी सहयोगी को  पता न चले कि वह कहां जा रही है। प्राची घर चल दी। शहर कोलकाता नि‍योन लाइट में जगमगा रहा था। प्राची की आंख में भी आंसू झि‍लमि‍ला गए अचानक, नि‍योन लाइट से होड़ लगी हो जैसे !

 

कई सारे सवाल उमड़ रहे थे प्राची के मन में। वो जानती थी, इसका जवाब उसे खुद ही देना है। पूछना चाहती थी खुद से,क्‍या हो रहा है,क्‍यों हो रहा है? उसे पता था नि‍खि‍ल के सामने होते से संभव नहीं। वह सब भूल जाती है सही-गलत । बस लगता है, नि‍खि‍ल सामने रहे उसके बाद उसे दुनि‍या में कि‍सी भी चीज की जरूरत नहीं। 

और नि‍खि‍ल को...?

सुबह के चार बजे ही बि‍स्‍तर छोड़ दि‍या प्राची ने। एक एयर बैग में कुछ कपड़े ठूँसे, मेकअप का जरूरी सामान लि‍या और जरूरत भर के पैसे, एक एटीएम कार्ड पर्स में डालकर वह बस स्‍टैंड की तरफ चल पड़ी। वो चाहती थी कि रात होने से पहले जगन्‍नाथपुरी पहुंच जाए। इसके पीछे दो वजहें थी। एक तो वह अंधेरा होने से पहले पहुंचना चाहती थी ताकि उसे होटल में कमरा मि‍लने में कोई परेशानी नहीं हो। दूसरा,अगर उसे कमरा नहीं मि‍ला तो उसके अंकल रेलवे में काम करते थे,वहां रेलवेज का गेस्‍ट हाउस भी था। वहां कुछ इंतजाम हो जाता।

 

दूसरी अहम् बात,उसने सुन रखा था कि पूनम की रात समुद्र की लहरों काफी तेज उछलती हैं.जैसे चांद को छूना चाहती हों। उसे देखना था ये शानदार दृश्‍य और संयोग से उस दि‍न ‘चांद रात’ भी थी।

जब वो समुद्र के तट पर पहुंची, शाम ढल रही थी। समुद्र के दूसरी छोर से चांद नि‍कल रहा ....सफ़ेद, चमकीला। थम से गए कदम प्राची के। एक तरफ रेत के कि‍नारे से बुलाता सागर, दूसरी तरफ होटलों की कतार, जहां उसे रहना था कुछ दि‍न। सोचने लगी प्राची, पहले होटल लूं या समुद्र को छू लूं। अगले ही पल अपने ऐयर बैग को धम से रेत पर पटका उसने और दौड़ गई समुद्र कि‍नारे। 


सूरज के ढलते ही अंधेरा हो गया।  रात में समुद्र की आवाज एक भय पैदा कर रही थी। सि‍हरन सी होने लगी। अपने दोनों हाथों को सीने में बांध वो जाने लगी....पास,और पास, हाहाकार करते समुद्र के। उसे लगा जैसे ये उसके ही दि‍ल की आवाज हो।  दूर समन्दर के दूसरे छोर पर चांद रौशन था। गहन समुद्र.,दूर तक पानी ही पानी.,बस लहर उठने के शोर से पता चलता था कि समय सरक रहा है। जी चाहा कि दूर समुंदर में उतरती जाए वो। चलती ही जाए जब तक पानी उसके सांसों की डोर न थामने लगे ।
मगर इस ख्‍याल को परे झटका प्राची ने। सोचा ये तो आत्‍महत्‍या करने वाली बात होगी। उसने ऐसा तो कभी नहीं चाहा। बहुत जीवट है उसमें। जमाने से लड़कर अपना मुकाम बना सकती है।
प्राची लौट चली। पुकारते समुद्र की आवाज को अनसुना करके बैग को एक झटके से कांधे पर चढ़ाया और चल पड़ी। उसे होटल का कमरा भी लेना था। देर हो रही थी। अब सोच-वि‍चार का वक्‍त नहीं था। अन्धकार अपनी पूरी शिद्दत से पसर चुका था । वह चलते-चलते भीड़भाड़ वाले इलाके से दूर आ चुकी थी। सामने जो होटल आया, उस के रिसेप्शन पर जा कर सीधा पूछा - कोई रूम खाली है कि‍ नहीं। हां में जवाब मि‍लने पर वो कमरा देखने चली गई । सोचा, जैसा भी हो आज रात रूक जाएगी। पसंद नहीं आएगा तो कल बदल लेगी। मगर कमरा खूबसूरत था। सबसे अच्‍छी बात कि उसकी फेसिंग समुद्र की तरफ थी। वह अब पास जाए बि‍ना भी समुद्र देख सकती है, जि‍सके लि‍ए आई है वो। खुश होकर प्राची ने कमरा ले लि‍या और खाने का आर्डर देकर फ्रेश होने चली गई। उसके आते तक डि‍नर भी आ गया। अब वो खाना खाकर बाहर बाल्‍कनी में बैठ गई। हाथ में कॉफी का मग थामे।
अब उसके पास तन्‍हाई थी, समुद्र था और थी नि‍खि‍ल की यादें। वह इसी के लि‍ए तो आई थी। खुद से बात करने। जीवन की दि‍शा तय करने। वहां उसके आगे वो मंत्रबिद्ध  सी होती है। जैसे कुछ सोच पाना उसके अख्‍ति‍यार में नहीं। 

हां,वो प्‍यार करती है नि‍खि‍ल को.. बेहद। उसके बि‍ना जीने की कल्‍पना भी उसे पागल बना देती है। मगर नि‍खिल का कुछ पता नहीं चलता। उसकी आंखें तो कहती है,वो भी आकर्षि‍त है। मगर जुबां कुछ कहना नहीं चाहती। वो चाहती है नि‍खि‍ल एक बार कहे। बहुत असमंजस में है प्राची। उसके सामने कैरि‍यर है,प्‍यार है, वह क्‍या करे। डरती है, आगे बढ़कर ये बात नि‍खि‍ल को बताई तो कहीं इंकार से दि‍ल न टूट जाए ।
उसके बाद उसके साथ एक ऑफिस  में काम करना संभव नहीं होगा। प्‍यार मि‍ला,तो खजाना मि‍लेगा जैसे,न हुआ तो सब छूट जाएगा ,दि‍ल टूटेगा,कैरि‍यर भी समाप्‍त । 


फि‍र क्‍या करेगी वो इस बड़े से शहर में। वापस घर जाकर सब लोगों को,दोस्तों को गाँव के परिचितों को  क्‍या बताएगी। बड़े दंभ के साथ वह घर छोड़कर आई गाँव से यहाँ तक। फिर एक ही साल में अपने माँ बाबूजी को भी शहर ले आई अपने साथ रखने के लिए गोया जता रही हो वो कि आज के दौर में वो किसी बेटे से कम नहीं उन के लिए । फिर  उसे अपने पैरों पर खड़ा होना है, मुकाम हासिल करना है। प्‍यार करने तो नहीं आई इस कोलकाता जैसे शहर में। तो फि‍र नि‍खि‍ल उसका रहनुमां कैसे बन बैठा ? क्‍यों वह चकोर की तरह बि‍हेव करती है? क्‍यों तकती है उसका रास्‍ता? इन्हीं सवालों के जवाब खोजने हैं आज उसे यहाँ ।
अब उसे फैसला लेना होगा। खुद को मजबूत बनाने ही तो यहां आई है। कल सुबह भगवान जगन्‍नाथ के दर्शन कर अपने मन की दुवि‍धा को दूर करने का आर्शीवाद मांगेगी। उसे सही रास्‍ता दि‍खाए कोई।

प्राची जानती है कि नि‍खि‍ल को उसकी केयर है। वो परेशान होगा। मगर भी उसे बता के नहीं आई कि‍ वो कहां जा रही है। उसने अपना मोबाइल भी स्विच -ऑफ कर दि‍या ताकि कोई उसे डि‍र्स्‍टब न कर सके। उसे फैसला लेना है जीवन का,प्‍यार का,कैरि‍यर का। 
अब रात ढल रही है। एकांत कमरे में प्राची सोने की कोशि‍श में है। समुंदर की लहरें और पूरे चांद को देख उनका उछाल बार-बार आंखों के सामने आ रहा है प्राची के ,काश वो नि‍खि‍ल के साथ यहां आ पाती।  उसके साथ जिंदगी बि‍ताना कि‍तना सुखद होता, यह सोचकर उसे रामांच हो आया।

प्राची रात को दस बजे अपनी डेस्क का काम खत्म कर के घर आती है । उस के एडिटोरियल हेड उस के कार्य-व्यवहार से बहुत संतुष्ट हैं। रात अपनी न्यूज़ स्टोरी की आखिरी कॉपी उनके सुपुर्द कर वो कैब से घर चली जाती है ..जहाँ रोज की तरह छत वाले कमरे का अकेलापन उस का इंतजार कर रहा होता है .माँ पहले अक्सर उस के लिए गरम खाना बनाती थी उस के आने के बाद ..मगर बाद में उसने जिद करके माँ को मना कर दिया जिसके दो कारण थे । एक तो माँ की बढती उम्र की वज़ह से उनके घुटनों का दर्द और दूसरा वो खुद इतनी थकी होती है कि खाने की हिम्मत नही होती। चाहती, बस कुछ ऐसा मिल जाए जिसे सीधे गटक लिया जाए हलक में। दलिए की तरह। सो अब उसे खाना भी वहीं कमरे में रखा मिल जाता है जिसे नहाने  के बाद प्राची जैसे-तैसे निगलती है और फिर कुछ देर टी वी के बाद सीधे बिस्तर में। वो कभी रात को किसी से भी फोन पर बात नहीं करती। मगर आज ,क्यों बार बार उसे लग रहा है कि बस एक बार निखिल की भारी आवाज़ सुन लूँ । बस एक बार फोन के उस पार से आती उस की साँसे महसूस करूँ । बस एक बार। 

 

इसी असमंजस में उस ने हाथ बढा कर पर्स में पड़ा अपना मोबाइल निकालने का उपक्रम किया, बस इतने में ही उस का दिल जोरों से धड़क उठा। जैसे-तैसे उसने उसे ऑन किया साथ ही उस के मन में हजारों ख्याल एक साथ जुगनुओं की तरह दिपदिपा उठे।  निखिल का उस के साथ ‘एक्स्ट्रा-अटेंटिव’ बर्ताव करना, उस की बातों में प्राची ने हमेशा एक सम्मान मिश्रित प्रेम अनुभव किया प्राची ने कभी कोई हलकी बात उस के मुँह से नहीं सुनी।  किसी के लिए भी।  ऑफिस में सब लोग उसके वाक्-शैली के कायल थे इस के अलावा किसी भी विषय पर गहराई से डिस्कस करने की उसकी क्षमता उसकी योग्यता को रेखांकित करती थी। प्राची निकिता से अक्सर कहती ’गूगल बाबा है ये’ .निकिता हंस कर छेडती उसे ”तेरा क्रश है उस पर” ,और बात यही खत्म हो जाती । 

अपने कॉलेज के दिनों से ही प्राची अपने व्यक्तित्व के चलते हर जगह छायी रहती थी । पढाई , संगीत ,वाद –विवाद प्रतियोगिता हो या फिर फैशन डिजाइनिंग या कॉलेज की छमाही पत्रिका में लेखन, सम्पादन हर जगह प्राची एक हंसमुख विनम्र अभिमान रहित लड़की। कॉलेज के लड़कों की ही नहीं लड़कियों की भी जैसे स्टार रही है वो। उसे याद है कितने ने ही लड़के उस के आते-जाते ,रास्ते में खड़े उसकी राह ताकते रहते । कुछ करीब आ कर बातें करने की कोशिश करते। कई बार उसे अब सोच कर हंसी आती है कि, कैसे किसी भी साल रोज –डे के दिन उसके कॉलेज पहुँचने से पहले ही उसकी डेस्क गुलाबों से भरी होती। लाल ,पीले ,मैरून , पिंक । सबको पता था उसे गुलाबों से बेइंतहा लगाव है। हर बुके के साथ उसके लिए विश लिखी  होती, साथ ही लिखा होता उस लड़के का नाम ,और एक दबा सा अस्पष्ट प्रीत –निवेदन।
 

प्राची उन सब कागज की पुर्जियों को फाड़ कर फेंक देती और गुलाब रख लेती। उसका इतना प्रभावी व्यक्तित्व था कि लड़के उस के साथ रहते, मगर जो किला उसने अपने चारों ओर बना रखा था उसे भेद कर भीतर आने की हिमाकत कोई नहीं कर पाया। और आज  जैसे लग रहा है , उन दिनों में मजबूत रही प्राची खुद ही अपने बनाये बनाए किले की प्राचीरें तोड़ने को मजबूर हो। 

ऑफिस में भी एक निखिल को छोड़ कर उसने लगभग सभी की आँखों में अपने लिए एक सवाल देखा। कभी वो ‘हम भी खड़े हैं राहों में’ वाली स्टाइल में होता । कभी केवल टाइम –पास जैसा, कहीं किसी सौदेबाज़ी की तरह , कभी निरी लम्पटता से भरा। मगर वो कभी नहीं डगमगाई। नहीं झुकी किसी प्रलोभन के आगे।  उस का काम बोलता था, उसकी खबरों की रिपोर्टिंग में उसका नाम बोलता था।

मगर आज इस आधी रात को क्यों टूट रही है वो ,एक ऐसे सहकर्मी के लिए जिसने सामने से कभी कुछ कहा नहीं उसे,कोई इशारा भर भी नहीं किया। बस वो रोज उसका लंच टाइम में वेट करता। साथ चाय पीती उस के साथ रोज। वहीं बहुत सी बातें होती । प्राची अब सोचती है बातें भी क्या,  वो बस उसे सुनती मन्त्र मुग्ध सी खो जाती उसकी आवाज़ में। कुछ ही पलों में लगता, जैसे समन्दर तट  पर खड़ी है वो । अंधकार में स्वर की  लहरों पर सवार है । बहा लिए जा रहा कोई उस के अनछुए मन को।  सिहरन सी भर रहा है कोई ,उस अनछुए तन में।

अचानक तन्द्रा सी भंग हुई उसकी।  उस ने देखा मोबाइल में पता नहीं कब उसकी उंगलियाँ निखिल का नंबर ढूँढ़  लायी जिसे उस ने ‘ऐ बेबी’ के नाम से सेव किया था।  शायद निखिल की बच्चों जैसी निर्दोष आँखों की वज़ह से या सबसे उपर हो ये नाम,  इस कारण या शायद दोनों ही वज़ह रही होंगी ।

सर्दी की ये रात तेज़ी से ढल रही थी। फोन हाथ में लिए प्राची उठी। दिल जोरों से धडक रहा था। खिड़की से समन्दर की ओर झाँका जो इस वक़्त हिलोरें ले रहा था । लहरें किनारों की चट्टानों से टकरा रहीं थी। लग रहा था जैसे हज़ारों लहरों पर निखिल का नाम लिखा है , और वो नाम उसके मन की कठोर चट्टानों को भिगो रहा हो ,तोड़ने की, भेदने की कोशिश कर रहा हो। अचानक उसे ख्याल आया निखिल सोते हुए कैसा लगता होगा और ये सोचती सी प्राची एक षोडसी सी लजा उठी।


 मगर इस ख्याल वो एक बेतरह ख़ुशी से भर उठी। उसने फोन वापस ऑफ कर दिया। सोचा अगली सुबह भगवन जगान्नाथ के दर्शन करने से पहले वो निखिल से जरुर बात करेगी। अभी नहीं। इस नि‍र्णय के बाद  उसे लगा कि‍ अब सो पायेगी वो।  हालाँकि सुबह होने को है मगर कुछ घंटे चैन की नींद फ्रेश कर देती है उसे, वो जानती है ये ।

उस ने अब तय किया कि सुबह उठ कर समन्दर के किनारे जब लहरें हौले से उसके पांवों को भिगो रही होंगी ,नम हवाएं उस के बालों को हटा कर उस के चेहरे को चूम रही होंगी और समन्दर के ऊपर आसमान में,निखिल को ले कर उस की कल्पनाओं की तरह  असंख्य पंछी उड़ रहे होंगें, तब ऐसे में वो निखिल को फोन से अपने मन की बात बता देगी। प्राची को ये सब सोचते हुए बेहद सुकून मिला और पता ही नहीं चला वो कब अपने होठों पर एक मुस्कान लिए नींद के आगोश में चली गयी। 

लगभग दो घंटे की गहरी नींद के बाद वो जागी । खिड़की से बाहर झाँका । देखा भुवन भास्कर सूर्य अभी एक नारंगी रंग के गोले की तरह निकलने के उपक्रम में हैं।  शांत समन्दर में बहुत हलकी सी ,चमकीली लहरें जैसे बुला रही थीं उसे। 

प्राची जल्दी से अपना कैमरा उठा कर दौड़ पड़ी समंदर की ओर। ये ही पल थे ,हैं ,जो कैद  करने हैं उसे । अपने ज़हन में भी, अपने जीवन में भी । इन्हीं को जीते हुए , उसे इन्हीं की साक्षी में बताना है निखिल को अपना फैसला । 

नंगे पाँवों को लहरें चूम रही थीं।  प्राची ने वक़्त के इस बेहद ख़ास लम्हे को पहले अपने कैमरे में कैद किया। फिर कांपते हाथों से पर्स से मोबाइल निकाल कर निखिल का नंबर मिलाया ,धडकते दिल से उस की रिंगटोन सुनती रही ”सुनो ना, संगे -मरमर ”।.सुनते हुए उसे लग रहा था जैसे दिल की धडकनें कानो से कनपटियों के निचले हिस्से तक जमा हो रहीं। वो खोयी थी लहरों में गीत में ..उस बेहद रूमानी आलम में अचानक फोन कनेक्ट हुआ ’हलो ,निखिल ...वो जोर से लगभग चिल्लाते हुए बोली ... वहां  से कोई रिप्लाई नहीं आई। 

‘निखिल.... वो फिर से बोली , इस बार धीमे से ।

“हेल्लो ,वो सोये हैं अभी,  आप कौन’ आवाज़ निश्चित ही किसी लड़की की थी।

“जी, मैं उन के ऑफिस से बोल रही हूँ’ किसी तरह रुक रुक कर प्राची ने बताया।

दूसरी तरफ चुप्पी छाई रही ।

“आप कौन," अटकते हुए प्राची ने पूछ लिया किसी तरह .

“मैं मिसेज निखिल और आप ?

फोन हाथ से छूट कर गीले बालू में गिर पड़ा .स्तब्ध खड़ी थी वो।

लहरें अब भी प्राची के पैरों को, फोन को भिगो रहीं थी .... समुंदर की आवाज गूंज रही थी ..लहरें आ रही थी..जा रही थी। 

Saturday, January 13, 2018

सर्दियों की धूप....


इन दिनों ज़बरदस्त इच्छा हो रही है ख़ुद के साथ रहने की । ठंड इतनी ज़्यादा है कि धूप अपने पास बुलाती लगती है। एक वक़्त था जब सर्दियों की दोपहर माँ और आस-पास की चाची, बुआ सब एक साथ छत या आँगन में एकसाथ बैठतीं। सिलाई-बुनाई या फिर गपशप। मैं सोचती और कहती भी कई बार....ये धूप में क्यों बैठती हो इतना। स्वेटर- शॉल किसलिए बने हैं।
तब मुझे धूप में बैठना एकदम पसंद नहीं था। सिर्फ़ उतनी देर छत पर होती अगर कुछ पढ़ना हो और घर के शोर में मुश्किल हो रही हो। मुझे याद है तब भी, आधा घंटा से ज़्यादा धूप बर्दाश्त नहीं कर पाती थी।
मगर इस बार कुछ अलग सा लग रहा। लग रहा मैं माँ की तरह होती जा रही हूँ। धूप पसंद आने लगा है। एकांत में जब हवाएँ चलती हैं तो सुकून मिलता है। मन करता है घंटों किसी ऐसे कोने में रहा जाए या सुदूर गाँव में बस जाया जाए जहाँ मेरी मर्ज़ी के बिना कोई डिस्टर्ब नहीं करे। सारे संचार के साधन ख़त्म कर दिया जाए।
धूप का स्पर्श कुछ अलग होता है ...बेचैनियों को धीरे-धीरे सोखता हुआ.....अपनी जड़ों से जोड़ता हुआ....

Monday, January 8, 2018

प्यार तो करता है....


हमसे था कोई रिश्ता,इकरार तो करता है
छुप छुप के मुझे देखे,वो प्यार तो करता है
थम जाए मेरी सिसकी,मिल जाए सुकूँ थोड़ा
काँधे पे रखे सर वो ,इज़हार तो करता है
शिकवा करे दिल मेरा,मशरूफ मुहब्बत का
हर रोज मुझे मिलकर तकरार तो करता है
वो दूर खड़ा मुझसे,पास आना भी गर चाहे
दिल उसका है दीवाना ,दीदार तो करता है
कहती है यही रश्मि,दुनिया की रवायत है
वो मेरा दीवाना है और प्यार तो करता है