Monday, January 21, 2019

यादों की जागीर .....


आज फि‍र पूर्णिमा है....जाने इन दि‍नों चांद का मुझसे कैसा नाता हो गया है...मैं समुद्र तो नहीं....मगर चांद रातों में ज्‍वार उठता है मेरे अंदर...सब उथल-पुथल।

पौष पूर्णिमा को सूर्य और चंद्रमा के संगम का दि‍न माना जाता है न...मगर मन का संगम न हो तो कुछ भी नहीं....। कल से महीना बदल जाएगा और साथ ही जीवन भी। मैंने अपने हाथों सब कि‍वाड़ बंद कर दि‍ए। अब न कोई आएगा....और न ही जाएगा। कोई झरोखा खुला रहे तो कि‍सी को देखने...कि‍सी को जानने की ललक बाकी रहती है। 

जो जा चुका..उसे वापस लाना संभव नहीं....लाना भी नहीं चाहती। मेरे आसपास अब खूब बातें ही बातेंं होगी..यादेंं ही यादें। तुम न रहो...यादों की जागीर है मेरे पास। 

मेरा कल्‍पवास शुरू होगा अब...संगम के तट पर नहीं...जहां हूं..वहीं से संकल्‍प लि‍या है कल्‍पवास का.....धैर्य, अहि‍ंसा और भक्‍ति‍...यही है न मूलमंत्र। धैर्य....तुम्‍हारे बि‍ना जीने का....अहि‍ंसा....तुम्‍हारी कि‍सी भी बात पर कोई नाराजगी नहीं...और भक्‍ति‍.....

ईश चरणों में सौंप दि‍या है खुद को....अगले जन्‍म की चाह तो नहीं बाकी अब...पर हां..मोक्ष जरूर पाना है....चांद...मत ज्‍वार उठाओ......नदी में अपनी छाया देखो...

तुम मुक्‍त हो....मैं भी अब मुक्‍त हूं...माया का त्रास नहीं....जि‍तेन्‍द्रि‍य बनना है अब.... 

Thursday, January 10, 2019

फिर से उसे प्यार करना है ..


ज़िंदगी में ग़म
शुमार करना है
एक बार फिर से
उसे प्यार करना है
वक़्त के ख़ाली लिफ़ाफ़े से 
अब जी नहीं बहलता
फूलों की गमक से
अपनी शाम भरना है

नहीं भाता सर्दियों के
उदास मौसम में
धड़कनों का इस क़दर
सर्द हो जाना
किसी की याद में फिर से
दिल बेक़रार करना है
सुन ए दिल एक बार
फिर से उसे प्यार करना है ....।

Wednesday, January 9, 2019

यादों से रि‍श्‍ता ....


बिछड़ने की बात पर 
दो बूँद आँखों से 
बेआवाज़ गिर जाना 
अब न चुभता है 
ना पूछना चाहता है दिल कि 
अबकी बरस
बिछड़ जाओगे तो
कैसे जी पाएँगे ...?
उलझा लोगे ख़ुद को
तमाम उलझनों में
कि सुबह से रात तक
दम न लेने पाओ
मगर किसी शब के सन्नाटे में
चाँद के रूबरू होगे
तो देखना
याद में कैसे तड़प जाओगे !
हर मौसम की तासीर को
भुलाना भी चाहो,
सर्दियों की शाम
जनवरी की किसी उदास दिन में
हवा सिहरा जाएगी बदन
तुम्हारी हथेलियाँ
तलाशेगी उँगलियों की गिरफ़्त
तब ख़ुद को
किस क़दर तनहा पाओगे!
याद रखो
बिछड़ तो जाओगे हमसे
मेरी यादों से कैसे रिश्ता तोड़ पाओगे?

Thursday, October 25, 2018

हवाओं की दस्‍तक ....



अहा....फि‍र करवट लि‍या मौसम ने....सुन रही हूं सर्द हवाओं की दस्‍तक ...शाम गुलाबी है, सि‍हरन जगाती। 

अब पगडंडि‍यों पर वो दौड़ती नजर आएगी...हथेलि‍यों में पारि‍जात के फूल भरे....उधर मंदि‍र के आंगन में गले में ऊनी मफलर डाले बेसब्री से कर रहा होगा वो उसका इंतजार....सर्दियां रूमानि‍यत लि‍ए आती हैं न...प्‍यारा मौसम..प्‍यार का मौसम...गुलाबी-गुलाबी

आ जाओ सर्दी....हमारे पास यादों के गर्म लि‍हाफ़ पड़े है बरसों से...अब धूप दि‍खाने का वक्‍त आ गया...

Wednesday, October 24, 2018

शरद पूर्णिमा.....



शरद पूर्णिमा की रात है। धवल..उज्जवल चाँद खिला है आकाश में । लड़की एकटक देखे जा रही चाँद की तरफ़....ख़ुश है। उसका चेहरा भी चमक रहा चाँद की तरह...

लड़का पास आता है।दोनों हाथ थामे चाँद देखते है...लगातार..।”हमारा जीवन ऐसा ही हो. ये कामना है। सब कुछ उजला...कोई दाग़ न कहीं....।” लड़की स्वप्निल सी आवाज़ में कहती है। प्यार से डूब कर लड़के की तरफ़ देखती है...

लड़के के चेहरे पर असमंजस का भाव है। कहता है ...
“कुछ है जो गोपन है अब तक “

“कह दो सब ...आज जितना कुछ है...सब सुन कर भूल जाऊँगी। हमारा रिश्ता बेदाग़ होना चाहिए।”

“आज नहीं...फिर कभी”

“आज ही...आज क्यों नहीं ...”लड़की हठ करती है...”हमारे बीच सब पारदर्शी होना चाहिए....”

लड़का फिर कहता है....”आज चाँद के साथ रहो..मेरे साथ रहो..”

लड़की की ज़िद शिखर पर....”जो नहीं कहो आज तो मेरा मरा मुँह देखो”

पीड़ा भरी आँखें..छलकी आँखें ...चाँद पर टिकी हैं। मान से भरी लड़की को लगता है ...इससे बड़ी बात कोई हो ही नहीं सकती।जानती है , बहुत प्यार करता है वो ..इसे सुनकर वो कुछ भी नहीं छुपा पाएगा....

कुछ देर सन्नाटा खिंचा रहता है ...मुड़कर देखती है वो ...नहीं है उसके पास कोई ...उसका साथी....
झर-झर आँसू बहने लगे ....चाँद को साक्षी रख कहा ...”जब मरूँ तो ही उससे सामना हो अब”

चाँद रोने लगा ..शीत झरने लगी...कुहासे की परत ने चाँद को ढक दिया...जैसे उदासी छा गयी सब ओर ..।

आज फिर शरद का पूरा चाँद खिला है आकाश में ....चौदह कलाओं वाला चाँद आसमान की तश्तरी पर टिका है ...हरसिंगार भी गमक रहे ..

लड़की हर शरद पूर्णिमा की रात मौत की दुआ माँगती है .....बेबस पूनो का चाँद अपनी पूरी चाँदनी फैला कर ढूँढता है धरती में उनको....

जो प्रेम में तो होते हैं मगर एक क़सम तक नहीं निभा पाते। 

Monday, October 22, 2018

आने के लिए नहीं जाता कोई ....


आने के लिए नहीं जाता कोई
शाम ढलती है
रात चुपचाप चली जाती है
सुबह नहीं लौटता वो ही
जो गुज़र चुका होता है

आज कली, कल फूल है
फूल कल फिर नहीं खिलता
जो चला जाता है कहकर
कि लौट आऊँगा
वह पहले सा कभी नहीं मिलता

जो इंतज़ार में टकटकी लगाए
बैठा रहता है बरसों
वो अपनी हँसी हँसता
और अपने दुःख से ही रोता है
लौटने पर उससे कब सब कहता है

कि जाने और आने के बीच
पहाड़ से दिन और समुन्दर सी रातों ने
कैसे उसे जीना सिखाया
कब थाम लिया अनजाने ही
सहारे के लिए कोई हाथ

सब साबुत होने का दावा
नहीं कर सकता लौटने वाला
एक स्पर्श, एक निगाह या
छोटी सी किसी की याद
छुपा लाता है मन की परतों में

फिर क्यूँ जाता है कोई
आने का वादा करके
कोई गुंजाइश बाक़ी क्यूँ रहे
जाना है जिसे वो चला जाए
देह से आत्मा की तरह।

Tuesday, October 16, 2018

ओह अक्तूबर !


कितनी यादें लेकर आते हो साथ...मन तोला-माशा होता है। वो बिस्तर पर चाँदनी का सोना...
हरसिंगार का ...खिलना-महकना-गिरना
समेटना हथेलियों में तुम्हारी याद की तरह हरसिंगार और ....
पांच सुरों का राग कोई गाता है दूर..मालकौंस
मन को अतीत में खींच ले ही जाता है, कितना भी रोके कोई..
ओह अक्तूबर ....तुम आए फिर....आओ

Saturday, October 6, 2018

पूछ लो ...



तुम्हें रहना है 
तो रहो 
अपने दिल से 
पूछ लो 
मेरी ज़िद से रुके 
तो क्या रुके ?

Friday, September 28, 2018

तुम सा कोई नहीं ....


तुम सा कोई नहीं 
होगा भी तो, किसी की तलाश क्यूँ हो 
जी लिया 
जितना एक जीवन के लिए ज़रूरी होता है 
महसूस किया
प्यार, शिद्दत और बेहिसाब दर्द भी
अब कुछ बचा नहीं
जिसे सोचने, परखने या फिर जी लेने की
इच्छा बाक़ी रहे
अनुभवों से समृद्ध है जीवन
बैठ जाऊँ यदि कभी जीवन में
थक कर कहीं
यादों की गठरी खोल
जी लूँगी बीते पल और
आगे बढ़ती जाऊँगी
बात बस मोहब्बत की ही तो है
तुम्हारे अलावा कोई नहीं
तुम से है, तुम से ही रहेगा..सदा ।

Monday, September 3, 2018

गरम हथेली ....

                   

ज़रूरत होती है
हथेलियों को भी
एक ऐसी गरम हथेली की
जो टूटन के पलों में
आकर कस ले 
और अहसास दिला दे
कि कोई है
जिसे हम अपने
सारे दुःख सौंप सकते हैं।