Sunday, May 21, 2017

आए हैं तुझसे मि‍लने की हसरत लि‍ए....



मि‍लन की पहली कि‍स्‍त
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सारा दि‍न दि‍ल धकधक करता रहा, जैसे सीने पर ही ट्रेन चल रही हो कोई। 24 घंटे का सफ़र 24 बरस का हो गया हो जैसे।कई ख्‍याल, कई कल्‍पनाएं और ढेर सारा डर....

आाखि‍र पहली बार तो मि‍ल रही थी उससे। बस मंजि‍ल पर पहुंचने को थी। बेसब्री मेरे चेहरे से झलक रही थी जैसे। आसपास के लोग बड़े गौर से चेहरा देख रहे थे मेरा। मैं बेचैनी में बार-बार दरवाजे तक जाती और लौट आती। बंद दरवाजे के शीशे के बाहर पेड़ रफ्तार पकड़ के दौड़ रहे थे। जैसे उन्‍हें मुझसे भी ज्‍यादा जल्‍दी है कहीं पहुंचने की।

अमलतास पूरे शबाब में था। झूमते, गर्मी के अहसास को दरकि‍नार करते। हां, वो अमलतास वाला शहर ही था, जहां मुझे मि‍लता वो। जब पहली बार दि‍ल में दस्‍तक हुई थी तब यही अमलतास साक्षी था। तब बहुत उदास लगा था मुझे, पर आज नहीं। मि‍लन के रंग से खि‍ला-खि‍ला था और भी।

ट्रेन की रफ़्तार कम हुई मगर दि‍ल की धड़कन बढ़ गई। ट्रेन रूकने से पहले ही गेट पर खड़ी हो गई। कि‍सी की नजर मुझे ढूंढ तो नहीं रही......कोई चेहरा जो जाना-पहचाना सा हो। पहली बार मि‍लूंगी उससे। देखूंगी उसको। जो तस्‍वीर देखी थी जाने उससे मि‍लती है शक्‍ल या नहीं।

नि‍:संदेह ये परीक्षा की घड़ी थी। आंखों में 'सि‍र्फ तुम' फि‍ल्‍म का मंजर याद आ गया। एक दूसरे के करीब से वो लोग जैसे नि‍कल गए वैसे कहीं हम भी.......पता नहीं पहचान पाऊंगी या नहीं।

ट्रेन रूकते न रूकते अपना एयरबैग थाम धप्‍प से जमीन पर। अब इंतजार नहीं होता। मुझे उसे देखना है जि‍सके लि‍ए मैं पागल हूं। जि‍सकी खाति‍र सब भूलकर मैं मि‍लने चली आई हूं।

तभी वो दि‍खा.....पीठ पर लैपटाॅप बैग लटकाए..मेरी फेवरेट सफ़ेद शर्ट और ब्‍लू जींस में। वो खड़ा था बुक स्‍टॉल के ठीक बगल में, पीलर के पीछे। मैेने देखा..उसके गालों में कंपन थी। जाने तेजी से दौड़कर आने के कारण या मि‍लने की घबराहट से......

वही था...बि‍ल्‍कुल वही....

क्रमश: 

Tuesday, May 16, 2017

अज़ब सा है जादू


अज़ब सा है जादू,जो मुझपे है छाया
तुम्हे सोच के दिल मेरा मुस्कराया
मेरे अश्क कहते हैं मेरी कहानी
के संगदिल सनम को निभाना न आया
खिलौना समझके मेरे दिल से खेला
भरा जी जो उसका मुझे छोड़ आया
के फ़ितरत में उसकी वफ़ा ही नही थी
तभी साथ उसने न मेरा निभाया
फिरा हर गली में,वो बनके दीवाना
हुआ क्या है रश्मि,समझ में न आया

Monday, May 15, 2017

शराबबंदी : दूरगामी परि‍णामों की उम्‍मीद


अप्रैल 2017 देश में अत्‍यधि‍क गर्मी के कारण चर्चित रहा, मगर इससे कहीं ज्‍यादा चर्चा रही सुप्रीम कोर्ट के आदेश की, कि‍ राष्‍ट्रीय राजमार्ग और स्‍टेट हाईवे से 500 मीटर दूर तक नहीं होगी शराब की दुकान। जाहि‍र है इस आदेश से देश में हडकंप है। कुछ लोग वि‍रोध में हैं तो कुछ समर्थन में। अनुमान है कि‍ इससे करीब 50 हजार करोड़ का नुकसान होगा राज्‍यों को। होटल इंडस्‍ट्री को दस-पंद्रह हजार करोड़ का झटका लगेगा तो उधर करीब दस लाख लोगों की नौकरी खतरे में पड़ सकती है।

अभी फायदे और नुकसान का आकलन कि‍या जा रहा है। मगर इन सबसे परे हम अपना ध्‍यान थोड़ी देर के लि‍ए केंद्रि‍त करते हैं बि‍हार की तरफ जहां पि‍छले वर्ष 2016 में नीतीश सरकार ने राज्‍य में पूर्ण शराबबंदी की घोषणा और तमाम वि‍रोध के बाद भी यह बंदी लागू है और नीतीश सरकार के इस कदम की सर्वत्र प्रशंसा हो रही है। इससे पहले केरल को शराबबंदी में सफलता मि‍ली। वहां केवल पांचसि‍तारा होटलों में शराब परोसी जाती है। कई राज्‍यों ने ऐसा करना चाहा मगर सफल नहीं हुए।

यहां एक बात यह भी उल्‍लेखनीय है कि‍ बि‍हार में शराबबंदी के पीछे मुख्‍य रूप से महि‍लाओं की मांग थी। 9 जुलाई 2015 को पटना की एक सभा में जीवि‍का से जुड़ी महि‍लाओं ने मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार से सार्वजनि‍क रूप से यह मांग की थी कि‍ राज्‍य में शराबबंदी लागू की जाए। मुख्‍यमंत्री ने उसी मंच से महि‍लाओं को आश्‍वासन दि‍या था कि‍ अगले चुनाव में जनादेश मि‍ला तो अवश्‍य शराबबंदी लागू करेंगे। नीतीश चुनाव जीते और अपना वादा पूरा कि‍या। एक अप्रैल 2016 से इसे लागू करने का फैसला लि‍या और कड़ा रूख अपनाते हुए राज्‍य में शराबबंदी कर दी। इधर 1 अप्रैल 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने बंदि‍श लगाने का आदेश दि‍या है, जि‍ससे सब तरफ अफरातफरी का माहौल है। 

सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला इस आधार पर लि‍या कि‍ शराब पीकर वाहन चलाने से अत्‍यधि‍क सड़क हादसे होते हैं। दरअसल भारत में सड़क हादसे के कारण सबसे ज्‍यादा जानें जाती है पूरी दुनि‍या में। सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि‍ राजर्माग के कि‍नारे शराब नहीं बि‍केगा तो हादसों में कमी आएगी। 

अब हम आते हैं महि‍लाओं की मांग के बारे में। आप सभी को याद होगा कि‍ गाहे-ब-गाहे यह खबर आती थी कि‍ अमुक गांव की महि‍लाओं ने मि‍लकर शराब की भट्ठी तोड़ डाली। देसी शराब के ठेके उजाड़ दि‍ए और लाठी-डंडे से वि‍रोध करने वालों को पीटा। यह कोई नई खबर नहीं। बहुत सालों से वि‍रोध होता आया है। इस सब वि‍रोध के पीछे महि‍लाओं का अपना दर्द है। ज्‍यादतर महि‍लाओं का यह मानना है कि‍ उनके पति‍ या बेटा शराब पीकर घर में मार-मीट करते हैं। कमाई के सारे पैसे खर्च कर देते हैं और कई बार लत के कारण कच्‍ची या जहरीली शराब के कारण असमय मौत के शि‍कार हो जाते हैं। 

जाहि‍र है इन सब घटनाओं के पीछे कारण केवल शराब है और उससे उपजी पीड़ा है जो प्रत्‍यक्ष रूप से महि‍लाओं को झेलनी पड़ती है।  ऐसी पीड़ा देश के हर राज्‍य में रहने वाली महि‍लाओं की है। आप बि‍हार की खबर देखें या झारखंड की, राजस्‍थान की बात करें या छत्‍तीसगढ़ की, यूपी के शहर-गांव को देखे या हरि‍याणा को। तात्‍पर्य यह है कि‍ शराबबंदी के पक्ष में सारे देश की महि‍लाएं हैं। वो भी गरीब, दलि‍त वंचि‍त, मुस्‍लि‍म और आदि‍वासी महि‍लाएं है। संभ्रात घरों की महि‍लाओं को इससे कोई वि‍शेष परेशानी नहीं है। परेशानी तो उन औरतों को है जि‍नके पि‍ता, पति‍ या पुत्र इस  नशे का शि‍कार हैं। सबसे बड़ा दुख है कि‍ घर के मर्द जो कमाते हैं, वह शराब के ऊपर खर्च कर देते हैं। अपने पारि‍वारि‍क जि‍म्‍मेदारि‍यों का कोई नि‍र्वाह नहीं करता। उस पर हर शाम लड़ाई और गाली-गलौज। छोटी-छोटी बात पर पि‍टाई। खाना पसंद का न हो तो मार खाए औरत या गर्म खाना न मि‍ले तो भी गाली वही सुने। शराब के नशे में धुत्‍त होकर आदमी घर पर पड़ा रहता है। नौकरी करने वालों की नौकरी चली जाती है। गांव की औरतें अपनी जवान बहु-बेटि‍यों की सुरक्षा को लेकर चि‍ंति‍त रहती हैं कि‍ कहीं नशे के कारण कोई अपना या पराया उसकी अस्‍मत को दागदार न कर दे। इस नशे के कारण छोटी-छोटी बात पर हथि‍यार उठा लेना और गुस्‍से में हत्‍या हो जाता बहुत आम बात है।

अगर हम बात करें आदि‍वासी संस्‍कृति‍ की तो शराब और हड़ि‍या सेवन इनकी संस्‍कृति‍ का हि‍स्‍सा है। मगर अब गांव-गांव में वि‍रोध शुरू हो गया है और इसका नेतृत्‍व कर रही हैं महि‍लाएं। रांची के आसपास के दो सौ से ज्‍यादा गांवों में  शराब के खि‍लाफ़ मुहि‍म चलाई जा रही है। कई जगह महि‍लाओं के इस अभि‍यान में मुखि‍या, पंचायत प्रति‍नि‍धि‍ और पुरुष भी शामि‍ल हो रहे हैं। गांव में महि‍लाएं सुबह-सुबह लाठी-डंडा से लैस होकर नि‍कलती हैं और घरों और अवैध भट्ठि‍यों से जब्‍त शराब की हांडी , बर्तन, कनस्‍तर तोड़ दि‍ए जाते हैं और महुआ की बनी देशी शराब जि‍से 'चुलैइया' बोलते हैं, सड़कों पर बहा दी जाती है। जहां इस अभि‍यान का वि‍रोध होता है, वहां महि‍लाएं लाठी चलाने से नहीं चूकतीं। 

जाहि‍र है यह आक्रोश एक दि‍न का परि‍णाम नहीं। पीढ़ी गुजर गई, देखते, समझते झेलते। सबसे ज्‍यादा शि‍कार महि‍लाएं ही होती हैं। सि‍सई, गुमला की छोटी मुंडा अभी केवल 16 साल की है और काम के तलाश में रांची आ गई है। उसने अपना घर छोड़ दि‍या। कहती है, मैं छोटी थी तभी देखती थी कि‍ शाम को आज़ा दारू पीकर झूमते  हुए घर लौटते और लड़ाई -झगड़ा करते। कई बार तो बना हुआ तक खाना फेंक देते। कुछ दि‍नों के बाद पि‍ताजी भी यही करने लगे। दिन भर काम करते और जि‍तने पैसे सारे दि‍न काम कर कमाते, उसे दारू में खर्च कर लौटते। मां मना करती तो उसे मारते-पीटते।  यह रोज का तमाशा हो गया था। घर में कि‍सी-कि‍सी दि‍न खाने को नहीं होता और पि‍ताजी को पीने के अलावा कुछ और नहीं सूझता। बाद में मां बीमार पड़ी तो उनके इलाज के लि‍ए पैसे नहीं थे। वो मर गई। मगर पि‍ता का शराब पीना नि‍यमि‍त रहा। अब तो वह कमाने भी नहीं जाते। दि‍न भर पड़े रहते हैं घर में। इसलि‍ए मैं छोड़ आई उनको। बीच-बीच में घर जाकर पैसे दे आती हूं। मेरे मना करने पर नहीं मानते। मेरा घर बर्बाद हो गया और मैं पि‍ता के रहते भी अनाथ जैसी हूं। इसका कारण केवल शराब है। 

एक दूसरा कारण यह भी है महि‍लाओं के वि‍रोध का कि‍  शराब के अड्डे पर लोगों का जमावड़ा होता है जि‍ससे महि‍लाओं के ऊपर छींटाकशी की घटनाएं  होती रहती हैं। शराब का अड्डा तो चना-चबेना वहीं बि‍कता है। लड़कों की भीड़ जमा होती है वहां। यही सब वजह है कि‍ महि‍लाओं ने वि‍रोध शुरू कि‍या। रांची में गुलाबी गैंग भी जागरूकता अभि‍यान चलाकर शराबबंदी कर रही है। खुशी की बात यह है कि‍ यह अभि‍यान  पूरे देश में चल रहा है। बि‍हार की स्‍थि‍ति‍ तो बदल रही है।

बात वापस इस पर आती है कि‍ क्‍या महि‍लाओं के इस शराबवि‍रोधी अभि‍यान के दूरगामी परि‍णाम होंगे। नीतीश सरकार ने इसी मुद्दे के आधार पर चुनाव जीता और अगले लोकसभा चुनाव में शराबबंदी एक चुनावी मुद्दा बन सकता है नीतीश सरकार के लि‍ए। उत्‍तर भारत के कई राज्‍यों में महि‍लाएं शराब के ठेके खोलने का वि‍रोध कर रही है। यूपी में योगीनाथ के मुख्‍यमंत्री बनने के बाद महि‍लाआें को लग रहा है कि‍ वी यूपी में भी शराबबंदी करवा देंगे। देखा गया कि‍ कुछ राज्‍यों के दर्जन दो दर्जन जि‍ले में महि‍लाओं ने कुछ घंटे से लेकर कुछ दि‍नों दि‍नों तक शराब की दुकान के आगे धरना दि‍या। इसका प्रचार-प्रसार टीवी आैर अखबारों के माध्‍यम से हुआ। इसका त्‍वरि‍त परि‍णाम यह नि‍कला कि‍ देश के अनेक जि‍लों से महि‍लाओं के वि‍रोध की खबर आने लगी। औरतें गुट बना रही है। शराब के ठेके को नष्‍ट कर रही हैं। यह औरतों की शक्‍ति‍ और एकजुटता का प्रतीक है। साझा दुख सब महसूस करती हैं। इस बात को तमाम राजनीति‍क पार्टियां समझ रही हैं और आगे बढ़कर कदम उठाने का तैयार है। मध्‍यप्रदेश और यूपी में भाजपा सरकार शराबबंदी की बातें कर रही है तो इधर मध्‍य प्रदेश के मुख्‍यमंत्री भी कई चरण में स्‍थान नि‍र्धारि‍त कर शराब वि‍क्रय पर पाबंदी लगाने की बात कही है। महाराष्‍ट सरकार भी पूरी तरह से शराबबंदी की बात कर रही है। झारखंड सरकार ने शराब खुद बेचने की बात कही है तब से पुरजोर वि‍राेध हो रहा है यहां पर। वैसे भी पास के गांवाें में महि‍लाओं का अभि‍यान जारी है शराब के खि‍लाफ।

अब एक मुख्‍य बात कि‍ क्‍या वाकई महि‍लाओं में इतनी शक्‍ति‍ है कि‍ वह शराबबंदी पर अभि‍यान चलाकर राजनीि‍तक पार्टियों की नींदे उड़ा सकती है और देश की राजनीति‍ को हि‍ला सकती है। जवाब बेशक हां में है क्‍योंकि‍ हमें नहीं भूलना चाहि‍ए कि‍ अगर कि‍सी मुद्दे पर महि‍लाएं एकजुट हो गईं तो वह चुनाव में कि‍सी को भी हरा या जीता सकती हैं। तामि‍लनाडु में जयललि‍ता के कड़े टक्‍कर वाले चुनाव में जीत के पीछे महि‍ला वोट बैंक का हाथ था। और नीतीश के शराबबंदी के वादे का परि‍णाम तो सामने ही है। अभी शराबबंदी के मुद्दे पर महि‍लाएं एकजुट है। शराब के ठेकेदारों से उलझ रही है, पुलि‍स के डंडे भी खा रही। अपने पति‍ की आदत छुड़ाने के लि‍ए उससे मार खा कर भी  उसका वि‍रोध कर रही है। अगर नारि‍यां ऐसे ही एकजुट और सशक्‍त हो जाएं तो शराब क्‍या, देश की सत्‍ता पलटने का ताकत रखती है।

पारि‍वारि‍क जीवन पर असर
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शराब के तमाम दुष्‍परि‍णाम है। अत्‍यधि‍क शराबखोरी से न केवल सामाजि‍क और पारि‍वारि‍क जीवन बर्बाद हो रहा है बल्‍ि‍क लोगों के स्‍वास्‍थ्‍य पर भी इसका बुरा असर पड़ रहा है। सड़क दुर्घटनाओं में बढ़ोत्‍तरी हुई है और कार्यक्षमता घटती है इससे। मगर आज तक कि‍सी भी सरकार ने इस पर पर्याप्‍त बंदि‍श लगाने की कोशि‍श नहीं की थी। 1977 में मोरारजी देसाई की सरकार ने शराबबंदी कीर प्रक्रि‍या शुरू की थी। पहले चरण में एक चौथाई दुकानें बंद करवाई गई। मगर यह सुधार का कार्यक्रम ज्‍यादा नहीं चल पाया। 

बाद में शराब पीने-पि‍लाने की प्रवृति‍ बढ़ती ही चली गई। जहां आसानी से उपलब्‍ध नहीं होता शराब वहां तस्‍करी कर लाया जाने लगा। गरीब इस लत के कारण कच्‍ची शराब पीते और मौत के मुंह में चले जाते। युवा पीढ़ी भी बर्बाद होने लगी। शराब पीकर गाड़ी चलाने के कारण मौत के दर में भी बढ़ोत्‍तरी हुई। 

एनसीआरबी आंकड़ों के मुताबिक साल 2015 में शराब पीकर गाड़ी चलाने से 7061 हादसे हुए है जो सालाना बीते सालों की तुलना में 1.5 फीसदी ज्यादा थे। बिहार में एक साल में 5,14,639 लीटर देशी शराब जब्त किए गए। अंग्रेजी शराब 3,10,292 लीटर और बियर 11,371 लीटर  जब्त किए गए है। वहीं बिहार में पिछले 1 साल से शराब बंदी के चलते 44,557 जेल भेजे गए जबकि 40,078 लोगों पर मामला दर्ज किया गया है।

बिहार और केरल जैसे राज्‍यों में शराब पर पाबंदी की वजह से भारत में 2015 के दौरान शराब इंडस्‍ट्री की ग्रोथ भी 0.2 फीसदी रही है। यह पिछले 10 सालों में सबसे धीमी ग्रोथ है। यूरोमोनिटर की रिपोर्ट के मुताबिक कीमत बढ़ने, प्रतिबंध और कुछ राज्‍यों में वितरण में बदलाव की वजह से ग्रोथ घटी है। 2014 और 2013 में ग्रोथ दर 6-6 फीसदी थी, जबकि 2012 में 9 फीसदी और 2011 में 11 फीसदी थी।

अभी सुप्रीम कोर्ट के आदेश के परि‍णास्‍वरूप राजस्थान में 2,800 शराब की दुकानें बंद हुईं हैं। हरियाणा में तकरीबन 200 बार बंद हो गए। महाराष्ट्र में 15,699 शराब की दुकानें और बार बंद हो गए। तो वहीं राजधानी दिल्ली में 100 शराब की दुकानें बंद हो गईं। तमिलनाडु में 3,320 दुकानें बंद कर दी गईं। यह संख्या सरकार के स्वामित्व वाले अकेले रिटेलर टी.ए.एस.एम.ए.सी. द्वारा संचालित कुल दुकानों के आधे से ज्यादा है।


अनुमान है कि‍ महि‍लाओं के वि‍रोध और सरकार के शराबंदी के फैसले के कारण सामजि‍क बदलाव बहुत तेजी से होगा। इधर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का असर भी होने लगा है। राजमार्ग पर  शराब के दुकान नहीं खुलेंगे तो लोग रि‍हायशी इलाकों में दुकान खोलेंगे। इसका पुरजोर वि‍रोध महि‍लाओं द्वारा होगा क्‍योंकि‍ घर के आसपास ठेका होगा तो उन्‍हें उसी समस्‍याओं से दो-चार होना होगा जि‍नके वि‍रोध में वो उठ खड़ी हुई हैं। बस अभि‍यान को जारी रखने के जरूरत है, सामाजि‍क बदलाव ऐसे ही आएंगे।



Sunday, May 14, 2017

माँ....




बरतन-बासन मलती माँ
चूल्‍हा-चौका- करती माँ
सांझ ढले फूंक-फूंक कर
लकड़ी के चूल्‍हे सुलगाती माँ

सुबह बि‍स्‍तर से उठाती माँ
चाय-रोटी खि‍लाती माँ
तेल चुपड़कर बालों मेें
लाल रि‍बन से दो चोटी बनाती माँ

दोपहर पंख्‍ाा झल-झलकर
पेट भर-भर खाना खि‍लाती माँ
दि‍न में जबरदस्‍‍‍‍‍‍‍ती सुलाकर
शाम को बाहर खेलने भगाती माँ

खेल-खि‍लौने जब कम पाती
कपड़े के सुंदर गुडि‍या बनाती माँ
संग-संग हमारे बैठ कर
गुडि‍‍‍‍याें का ब्‍याह रचाती माँ

कभी राख से बरतन मांजती
कभी चि‍मनी से राख छुटाती माँ
सब दि‍खाती, सब समझाती
पर हमें केवल पढ़ने बि‍ठाती माँ

कुएं से पानी भर-भर कर
हमें और पौधों को नहलाती माँ
पेड़ से अमरूद तोड़ने को
हम सी बच्‍ची बन जाती माँ

बड़ी, मुरमुरे और आम के अचार
अपने हाथों से खूब बनाती माँ
रोज बनाती स्‍वादि‍ष्‍ट खाना
घर भर को तृप्‍त कराती माँ

चट्टान सी खड़ी रहती है पीछे
मेरे सब सपनों को सहलाती माँ
दे ममता की छांव, लगा नजर का टीका
हर बुरी बला से मुझको बचाती माँ

जब भी रूठी मैं कि‍सी भी बात से
सब आगा-पीछा समझाती माँ
खाना परसकर थाली में
कौर- कौर हाथ्‍ाों से खि‍लाती माँ

स्‍वेटर बुनती, मेजपोश काढ़ती
कभी-कभ्‍ाी कहीं गुम हो जाती माँ
जब पढ़ती  गुलशन नंदा की कि‍ताबें
कुछ देर को हमें भूल सी जाती माँ

आंख खुलने से रात सोने तक
चक्‍करघि‍न्‍नी सी नाचती माँ
रोटी पकाती आग के सामने
पीतल के लोटे सी चमकती माँ

कि‍तना कुछ है कहने को
कुछ नहींं कह पाती तुमसे माँ
वि‍दा कर दिया अपने ही घर से मुझको
पर बचपन अपना कभ्‍ाी नहींं भूल पाती माँ ।

Friday, May 12, 2017

सरकारी कक्ष के बाहर


“डॉ.रागिनी नागपाल , प्रखंड अधिकारी गिरडीह” बरसात के इस मौसम में  लाल  पत्थर से बने  सरकारी कक्ष के बाहर पीतल की यह नाम पट्टिका मानो उसके भीतर बैठी अधिकारी के रुआब को रेखांकित कर रही हो,  परन्तु भीतर बैठी रागिनी अनेकों अनचाहे कामों से उद्ग्विन सी अपना सर हाथों से थामे , किसी फाइल के बेहद उबाऊ सफों और बरसों पुरानी टाइप की अस्पष्ट सी तहरीर में दुबकी हुई थी। 

रागिनी , हिंदी साहित्य की मेधावी विधार्थी रही है पोस्ट–डॉक्टरल फेलो भी और अपने पिता की इच्छा को देखते हुए कॉलेज लेक्चरर का जॉब छोड़कर नौकरशाही की इस बोरियत भरी कतार में लगी है।  पति रितेश काम के सिलसिले में अक्सर दुबई रहता है सो दफ्तर , घरपरिवार  और समाज के काँटों से चलने वाली वक़्त की घडी में झूल रही है।  ऐसे में लिखने –पढने की सोचना भी सपना सा लगता है उसे, ऊपर से पोस्ट उस की ऐसी,  कि जिले का कोई भी काम उसे दिया जा सकता है राजस्व से लेकर चुनाव और राशन कार्ड से लेकर आधार कार्ड तक। हर बार सरकार बदलने पर नई योजनाओं को पढने समझने में ही इतना वक़्त निकला जाता है कि कई योजनाओं का क्रियान्वन होने के पहले ही सरकार बदल जाती है, साथ ही बढ़ जाती है रागिनी की मुसीबतें। ऐसे में रामबरन काका , जो यहाँ दफ्तरी हैं और लम्बे वक़्त से इन सबसे दो-चार होते रहें हैं,  रागिनी की मुश्किलों को आसान बनाने में सहायक होते हैंं।  पूरे प्रखंड में एक वही कार्मिक है जो रागिनी से अनौपचारिक है और अकेले में उसे बिटिया साहेब बुलाता है। 

“चाय लेंगी बिटिया साहेब” रामबरन काका की आत्मीय आवाज़ ने  उसकी तन्द्रा भंग की, “आज जी ठीक नहीं आपका, न हो तो क्वार्टर जा कर आराम कर लीजिये”
“हाँ काका ,सोचती हूँ चली ही जाऊं कोई जरुरी फाइल हो तो आप ले आइयेगा’ ऑफिस के पीछे ही सरकारी निवास है उसका। 
“आपके पोते के एडमिशन का क्या हुआ काका’ ? आपने बताया नहीं...
चाय पीते हुए उसे अचानक ध्यान आया,  पिछले दिनों रामबरन काका ने पोते के एडमिशन के लिए कहा था उसे और उसने फोन भी कर दिया था।  यहाँ के सबसे माने हुए स्कूल लॉर्ड्स इंटरनेशनल को, इकोनोमिकल वीकर सेक्शन के कोटा में उसके एडमिशन को लेकर ,पर काका ने कुछ बताया नहीं बाद में।
“जी , नहीं हुआ.. मैं कई बार गया,  बेटे को भेजा पर हर बार कोई न कोई बहाना कर के टाल देते हैं स्कूल  वाले, मना भी नहीं करते’ आप पिछले दिनों बहुत व्यस्त रही सो आपसे नहीं कहा” काका की आँखों में नैराश्य भर आया बोलते हुए।
रागिनी के  भीतर बैठे ब्यूरोक्रैट को जैसे सीधी चुनौती थी ये“सक्सेना जी को बुलाइए” काका को कहा उसनेे। सक्सेना जी यानी पी.एस. आते ही अभिवादन कर के सामने कुर्सी पर बैठ गये।
“सक्सेना जी,  लॉर्ड्स स्कूल को एक नोटिस इशू कीजिये इ.डब्ल्यू.एस. कोटा के एडमिशन की सभी फाइल्स लेकर कल 11 बजे मुझसे मिलें । आज की आज ये नोटिस तामील करवाइए,  फोन भी कीजिये उनको”.

"जी मैडम , नोटिस की एक कॉपी जिला  शिक्षा अधिकारी को भी मेल कर  देता हूँ" सक्सेना जी कहते हुए उठ गए कुर्सी से । रागि‍नी ने अपना मोबाइल निकाल कर उसने स्थानीय परिवहन अधिकारी  विजयवीर को फोन किया , जो रागिनी का बैचमेट था। 
“हलो रागिनी कहाँ हो भई,  बहुत दिनों से बस अखबार में ही दिख रही हो प्रत्यक्ष नहीं’ अपने फोन में रागिनी की कॉल देखते ही विजय बोल उठा। 
“बस ऐसे ही , मिल के बात करेंगे। तुम सुनाओ”
“ अच्छा बोलो कैसे फोन किया किसकी आफत आई आज “ हंस रहा था विजय।
‘सुनो , लॉर्ड्स स्कूल की ऐसी बसें जो बाल वाहिनी के नाम से परमिटेड हैं और दूसरे कामों  में लगी हैं इन में से दो तीन को जब्त कर लो आज ही’.  
ओके बॉस, जो हुक्म। ये सुनकर रख दिया फोन रागिनी ने। काका  ये सब  देख सुन रहे थे।
‘मैं चलती हूँ , परसों स्कूल जा कर फीस जमा करवा देना बच्चे की.” हाथ जोड़ कर खड़े कृतज्ञ काका के मुंंह से कोई बोल नहीं फूटा। 
रागिनी अपने निवास जा कर थोडा सो लेने की तैयारी करने लगी।  मगर आधा घंटा भी नहीं हुआ कि उसका लैंडलाइन फोन बजने लगा जिस पर मात्र ऑफिस के ही फोन आते है.
“बिटिया साहेब, कोई औरत आई है आपसे मिलना चाहती है असहाय पेंशन योजना के तहत उसका फॉर्म रिजेक्ट हुआ है।  मैंने कल आने को बोला तो कहती है कि बहुत चक्कर लगा चुकी हूँ अब हिम्मत नहीं। कहती है कि आपको जानती भी है।  बोल रही है कि मैडम से पूछो, ना हो तो क्वार्टर पर  चली जाऊं उनके” एक सांस में बोल उठे काका।
“नहीं बिठा लो उनको पानी वानी  पूछ लो मैं आती हूँ , उस की फाइल और आवेदन मेरी टेबल पर रख दीजिये “ चल पड़ी वो ऑफिस। जाने कौन परिचित है , सोचती सी। 
     
रागिनी ने दूर से देखा उसको...चेहरे मोहरे से आयु अधिक नहीं लग रही थी मगर जैसे बरसों की भुखमरी , मुफलिसी और बीमारी से बेहद कृशकाय नज़र आ रही थीं , दोनों जुड़े हुए हाथों के पीछे का चेहरा दयनीय भी दिखाई दे रहा था। .रागिनी  की नजरें काका  को ढूंढ रही थीकि‍ वापस उस चेहरे पर अटक गई।
तकरीबन बीस -पच्चीस बरसों  बाद उन्‍हें देखा था  आंखे मि‍लींपहचान के चि‍न्ह उभरे और फीकी सी मुस्‍कराहटों का आदान-प्रदान हुआ। उनको अपने सामने वाली कुर्सी पर बैठने का इशारा किया रागिनी ने और सामने रखी फाइल को देखते हुए कई वर्षों पीछे चली गई थी.रागिनी ....अपने बचपन में।

सावन-भादों का महीना था। घटाएं घूम-घूम कर छा जाती और खूब बारि‍श होती....लगातार। चारों तरफ कीचड़...पानी।
इसी मौसम में एक फल होता था पेड़ पर....पीलापन लि‍ए हरा-हरा...खूब खट्टा। आंंवले की प्रजाति‍ का ही फलगुच्‍छे में फलता,जि‍से  'हरफरौरीया “चिल्लीमिल्ली” कहते थे। उस केे स्कूल के बच्‍चों को खूब पसंद था। पर मुश्‍कि‍ल ये थी कि‍ पूरे गांव में एक ही घर में इसका पेड़ था। उस घर की दो लड़कि‍यां रागिनी के स्‍कूल में पढ़ती थीं। एक दीदी थी,  छ कक्षा आगे और छोटी वाली उसी के साथ की। सारी सहेलि‍यां चि‍रौरी करती..हमारे लि‍ए तोड़कर ला देना। वो लाकर भी देती। पर कच्‍चे वाले फल औरों को  बांटतीजो जरा कसैले होते थे और पके एवं रस वाले फल खुद खातीं।

छोटी सी रागिनी का बड़ा मन करता कि‍ काश..वह  भी बड़े-बड़े रसदार हरफरौरी खा पाती । क्‍लास के कुछ लड़के थे जो उस  की इस कमजोरी को जानते थे। रागिनी और उसकी सहेलियाँ घर से नमक-मि‍र्ची लेकर छुपाकर ले जाती स्‍कूल के बस्‍ते में। लड़के जब बारि‍श होती तो लंच ब्रेक में साईकिल उठाकर उसके घर चले जाते और दोपहर के सन्‍नाटे का फायदा उठाकर तोड़ लाते। फि‍र सब मि‍लकर खाते।

ऐसे ही एक दि‍न की बात है। हरफरौरी के पेड़ पर गदराए फल गुच्‍छों में लदे थेखट्टे फल खाने को सभी बच्चे खूब  ललचते। एक दि‍न खूब बारि‍श हुई...रूकने का नाम न ले। स्‍कूल छुट्टी के बाद भी घर जाना मुमकि‍न नहीं। जो बच्‍चे छतरी या रेनकोट नहीं नहीं लेकर आए थे वो मुश्‍कि‍ल में थे कि‍ कैसे जाएं। तभी , आज सामने बैठी इसी महिला ने जिसे रागिनी तब  दीदी कहा करती थी और जो नवींं कक्षा में पढ़ती थी, उसे  इशारे से बुलाया,  बुलाकर कहा..."मैंंने आज हरफरौरी सुबह ही तोड़कर रखा है। बड़े साईज वाले। तुम खाओगी "
अब ना कौन कहता सो तुरंत हामी भर दी थी अबोध रागिनी ने ।

दीदी ने कहा..."जाओ..घर से छाता लेकर आओ। मेरे साथ चलो...मैं दूंगी"।  घर पास ही था। वो  भीगते हुए गई और उनके लि‍ए घर से छतरी लेकर आई। दोनों  साथ चल पड़े। रागिनी ने  खुद को जरा भीगने दि‍या पर उन्‍हें कुछ नहीं कहा। वो बच-बच के चल रही थी क्‍योंकि‍ लंबी होने के कारण छतरी उनके ही हाथ में थी।  घर में भी उस ने कि‍सी को नहीं बतायाक्‍योंकि‍ उनका घर दूर थाऔर उसे  सड़क पार कर अकेले जाने की इजाजत नहीं थी। फि‍र भी  फल के लालच में उनका ऑफर  स्‍वीकार कि‍या था रागिनी ने ।

रागि‍नी और दीदी  घर के पास पहुंचे। वो दरवाजे के पास जाकर रूकी। अजीब तरह से हंसीपेड़ की तरफ इशारा कर उस से कहा.... "जाओ..जमीन में गि‍रे पड़े हैं फल....चुन लो जि‍तना चुनना है तुम्हारी यही जगह है  , मांग मांग कर फल खाने वालों की" ।
 
दर्ज़ा तीन में पढने वाली , जरा सी रागिनी  हतप्रभ...ठगी सी उनका मुंह देखती रही। प्रति‍वाद में एक शब्‍द नहीं नि‍कला मुंह से।

शायद अभि‍मानवश एक फल नहीं उठाया और आंख में आंसू भरे घर आ गई। 

अपमान की यह  बात उस ने  आज  तक कि‍सी को नहीं बताई। चालाकीछल ये सब बातें बचपन में समझ नहीं आती। पर घोर आश्‍चर्य , आज जैसे ही रागिनी ने  उन्‍हें देखाउसकी आंखों के आगे सारा दृश्‍य तैर उठा।  हां..कि‍सी फि‍ल्‍म की तरह फ्लैश-बैक चलता रहा...उस पांच मि‍नट के दरमि‍यां अजीब से विद्रूप से भर  उठा मन। उस का  जी कर रहा था कि अपरिचय जताओ और आवेदन रखकर उन्हें जाने को बोल दिया जाए। 
बचपन की कोई बात इतना लम्बा समय गुजरने के बाद भी आज इतनी भी चुभ सकती है दि‍ल को...पहली  बार रागिनी ने ये जाना ये। 

विचारों के इसी क्रम के दौरान  रागिनी की तेज़ निगाहें उनकी फाइल के पन्नों को भी जैसे साथ के साथ स्कैन करती जा रही थीं , जिसमें उनके शादी के तुरंत बाद विधवा होने का प्रकरण , घर वालों द्वारा परित्याग और वृन्दावन जाकर विधवाश्रम में वास के साथ चिकित्सक द्वारा जारी लम्बी बीमारी का प्रमाण -पत्र , आर्थिक मदद का प्रार्थना पत्र और असहाय-वृदावस्था पेंशन योजना में नामित नहीं किये जाने संबंधी सरकारी आपत्ति , जैसे एक निगाह में सब समझ गयी वो।    
फाइल से सर उठा कर नम आँखों से ,अनमयस्क सी रागिनी ने सामने देखा ..दीदी की वृद्ध  धुंधली सी आँखों से टप-टप आंसू झर रहे है और  खिड़की के बाहर भी लगातार बारिश की बूँदें पड रही हैं, उसी दि‍न की तरह। 

तस्‍वीर-साभार गूगल 

Friday, May 5, 2017

मन का परि‍ंदा



जो तुम्‍हारे गम में 
शामि‍ल नहीं
उसे खुशि‍यों से भी 
बेदख़ल कर दि‍या करो
जी लि‍या बहुत
सबका एहतराम करके
मन के परि‍ंदे को
खुले आस्‍मां में छोड़ दि‍या करो

Wednesday, May 3, 2017

फिर खिला है अमलतास


घर के बाहर
फिर खिला है
अमलतास
सूनी दोपहर
घर है उदास
पीले गजरे
झूम रहे कंचन वृक्ष में

सूनी देहरी को
किसी के आने की है
आस
घर के बाहर
फिर खिला है
अमलतास


Sunday, April 23, 2017

मृग्‍ाी......


मैं मृग्‍ाी
कस्‍तूरी सी
देहगंध तुम्‍हारी
ढूंढती फि‍रती
दसों दि‍शाएं

मि‍लते हो
जब ख्‍वाबों में
होते अलि‍ंगनबद्ध
फूटती है सुगंध
अपने ही
तन से

वि‍चरती हूं
भावनाओं के वन मेंं
अब तुम
मोहि‍त से हो भंवरे
कलि‍यां चटखती हैं
दि‍वस जैसे मधुमास
मैं मृगनयनी
तुम कस्‍तूरी
जीवन में तुमसे ही
है सारा सुवास 

तस्‍वीर....इस जंगली फूल की खुश्‍बू बहुत ही मादक होती है। 

Monday, April 17, 2017

दिन बैसाख के



मन पलाश का बहके
तन दहके अमलतास का ।
कर्णफूल के गाछ तले
ताल भरा मधुमास का ।
अधरों के स्पन्दन से
खुली आँख के स्वप्न से
किसलय कई खिले आलि
ठूंठ पड़े इस जीवन में
छाया प्रणय आभास का ।
बदरा फूटा मेह से
भीगा अँचरा नेह से
हर आखर में प्यार लिख
रच पतरा प्रीतालेख का
कसाव जैसे दृढ बाहुपाश का ।
धूपीली दोपहरिया में
आँखे लगी देहरिया में
खबर आज भी कोई नहीं
दग्ध तप्त बैसाख में
मन सूना है आकाश का ।

Wednesday, April 12, 2017

मां तारापीठ के दर्शन


तारापीठ जाने का संयोग अकस्‍मात हो गया। देवघर जाना था तो एक दि‍न पहले नि‍कल गए कि‍ इस दि‍न तारापीठ के दर्शन कर ही आए। 31 मार्च की दोपहर रांची से नि‍कले और शाम के 8 बजे तक देवघर में। रात वहीं रूककर सुबह तारापीठ जाना था मगर नि‍कलते-नि‍कलते 11 बज ही गए। 20-25 कि‍लोमीटर दूर गए तो रास्‍ते में वसुकीनाथ मंदि‍र मि‍ला। सोचा इतनी दूर आए है तो दर्शन कर ही लें। हालांकि‍ मान्‍यता यह है कि‍ पहले देवघर में पूजा अर्चना हो जाए तभी वासुकीनाथ दर्शन करें।


अब रास्‍ते से गुजरे तो दर्शन भी कि‍या। अच्‍छा मंदि‍र है। भीड़-भाड़ भी खूब थी। शि‍वलि‍ंग दर्शन कर आगे बढ़े। पहले दुमका, फि‍र तारापीठ। उपराजधानी दुमका पहुंचत-पहुंचते यह जरूर महसूस हुआ कि‍ इन दि‍नों झारखंड की सड़के शानदार बन गई है। हमें रांची से यहां तक गि‍रीडीह के बाद के 20 कि‍लोमीटर के अलावा कहीं सड़क को लेकर कोई परेशानी नहीे हुई।


दुमका बाईपास से नि‍कले तो मलूटी देख वहां कुछ घंटे बि‍ता लि‍ए। यहां जाना हमारे प्‍लान का हि‍स्‍सा नहीं था। हमें शाम तक वापस देवघर लौट आना था। बासुकीनाथ भी अचानक गए और मलूटी भी। मलूटी पर वाकई दि‍ल आ गया। घंटों रूकने की इच्‍छा थी मगर मां के दर्शन को जाना था आगे। जब रामपुरहाट पार कर तारापीठ पहुंचे तो बड़ा सा गेट सफेद रंग का मि‍ला। शीर्ष पर मां तारा का  मस्‍तक स्‍थापि‍त है। गेट से अंदर जाने पर हम तारापीठ पहुंच गए। गाड़ी पार्क करने के बाद पैदल अंदर। रास्‍ते के दोनों तरफ दुकानें थी। जैसा कि‍ हर धार्मिक स्‍थल पर होता है। मि‍ठाईयों की पंक्‍ति‍ से कई दुकानें। कालाजामुन, गुलाब जामुन के बड़े-बड़े हांडे सामने लगे थे। उस पर खूब सारी मक्‍खि‍यां थीं। मुझे पसंद है मि‍ठाई पर सोचा यहां तो नहीं  खाऊंगी। फूलों के दुकान भी थे। जवा के फूल, नीले फूल और मालाएं।



तारापीठ पश्‍चि‍म बंगाल में पड़ता है। वीरभूम जि‍ले में स्‍थि‍त यह शक्‍ति‍पीठ है। यहां की भाषा में तारा का अर्थ होता है आंख और पीठ का अर्थ है स्‍थल। तारा शब्‍द का एक और अर्थ है ..भव सांगर से तारने वाली अर्थात जन्‍म तथा मृत्‍यु के बंधन के बंधन से मुक्‍त पर मोक्ष दि‍लाने वाली।। सो यह तारापीठ कहलाया। पुराणों के अनुसार मां सती के नयन यानी तारा इसी जगह गि‍रे थे इसलि‍ए यह तारापीठ कहलाया। यहां भव्‍य मंदि‍र है और बगल में महा शमशान भी है। मां तारा शमशनवासि‍नी और तथा घोर उग्र स्‍वरूप वाली हैं।


कहते हैं बहुत पहले सत्‍य युग में मर्हि‍ष वश्‍िाष्‍‍‍ठ ने मां की  पूजा कर अनेक सि‍द्धि‍यां प्राप्‍त की थी और उन्‍होंने ही इस मंदि‍र का नि‍र्माण करवाया था। मगर वो पुराना मंदि‍र धरती की गोद में समा गया। कथा है कि‍ सत्‍य युग में ब्रह्रा जी ने अपने पुत्र वशि‍ष्‍ठ को तारा मंत्र की दीक्षा दी तथा मंत्र सि‍द्ध कर मां तारा की कृपा प्राप्‍त करने का आदेश दि‍या।  पि‍ता की आज्ञा मानकर सर्वप्रथम नीलांचल पर्वत पर गए और वैदि‍क रीति‍ से चि‍रकाल तक अराधना की परंतु उन्‍हें सफलता नहीं मि‍ली। बार-बार असफलता मि‍लने के कारण उन्‍होंने तारा-मंत्र को शापि‍त कर दि‍या। फि‍र आकाशवाणी हुई कि‍ '' वशि‍ष्‍ठ तुम मेरे साधना के स्‍वरूप को नहीं जानते हो। चीन देश जाने पर वहां बुद्ध मुनि‍ होंगे उनसे साधना का सही और उपयुक्‍त क्रम जानकर मेरी अराधना करो।'' उस समय केवल भगवान बुद्ध ही इस वि‍द्या के आर्चाय माने जाते थे।


वशि‍ष्‍ठ मुनि‍ जब चीन पहुंचे तो देखा कि‍ बुद्ध मदि‍रा, मांस, मत्‍स्‍य और नृत्‍य करती नर्तकि‍यों में आसक्‍त हैं तो वह खि‍न्‍न मन से वापस लौटने लगे। तब पीछे से बुद्ध ने आवाज दी । मुड़कर देखने पर वशि‍ष्‍ठ चकि‍त रह गए कि‍ बुद्ध मुनि‍ आसन लगाकर ध्‍यान मग्‍न हैं , नर्तकि‍यां भी ध्‍यान मग्‍न है आैर वहां पूजन के लि‍ए फूल-पत्‍ति‍यां रखी हुई है।

बुद्ध मुनि‍ ने वशि‍ष्‍ठ मुनि‍ को उपदेश दि‍या कि‍ उत्‍तरवाहि‍नी द्वारि‍का नदी  के पूर्व में सती के उर्ध नयन है, उस स्‍थान पर पंचमुंडी आसन बनाकर तारा मंत्र की तीन लाख बार जाप करे। उसके पश्‍चात मां के दर्शन होंगे। मुनि‍ वशि‍ष्‍ठ ने ऐसा ही कि‍या और उन्‍हें सर्वप्रथम एक उज्‍जवल ज्‍याेति‍ बि‍ंदु के रूप में दर्शन दि‍या और पूछा कि‍, तुम कि‍स रूप में मेरा दर्शन करना चाहते हो। तब वशि‍ष्‍ठ ने कहा कि‍ आप जगत जननी हैं तो मैं आपके जगत-जननी के रूप का ही दर्शन चाहता हूं।  तब मां ने भगवान शि‍व को बालक रूप में अपना स्‍तनपान कराते हुए देवी तारा ने दर्शन दि‍ए। समुद्र मंथन के बाद जब शि‍व ने हलाहल वि‍ष पि‍या था तो इन्‍हीं तारा देवी ने अपना अमृतमय दुग्‍धपान कराया था शि‍व को, जि‍ससे उनके शरीर की जलन पीड़ा शांत हुई थी। असली मां तारा की मूर्ति यही है। अभी जो लोग दर्शन करते हैं वो  एक आवरण है। जि‍से राज भेष कहा जाता है। असली मूर्ति के दर्शन रात और एकदम सुबह कि‍सी कि‍सी को ही होते हैं।

हमलोग दर्शन करने को आतुर थे। बहुत भीड़ थी प्रांगण में। पूजन सामग्री लेकर पहुंचे तो वहां पुजारी से भेंट हुई। उन्‍होंने कहा-सीधी कतार से आना हो तो आइए, मगर बहुत देर लगेगी। और स्‍पेशल दर्शन करना है तो प्रति‍व्‍यक्‍ति‍ 300 लगेंगे। हमारे पास वक्‍त कम था। हमलोग मलूटी के कारण पहले ही देर से पहुंचे थे। सो पैसे देकर ही दर्शन को तैयार हो गए। वैसे भी मां-पापा साथ थे और घंटों कतार में खड़े रहना उनसे संभव नहीं था।


अब हम अंदर के रास्‍ते पहुंचे। मुख्‍य द्वार के ठीक सामने मां के चरण युगल थे। वहीं पुजारी ने संकल्‍प करवाया हमसे। बहुत भीड़ थी। मां के पांव पर महि‍लाएं आलता डाल रही थीं। वहां आलता की मात्रा इतनी ज्‍यादा थी कि‍ हम सबे कपड़े रंग गए।



हम मुख्‍य द्वार के सामने थे। लाल पत्‍थरों की नक्‍काशीदार दीवार थी। प्रवेशद्वार के ऊपर शि‍व की मुखाकृति‍ थी जो संभवत: चांदी से बनी थी। हम अंदर प्रवेश कि‍ए। मां की मूर्ति में तीन आंखे और सि‍ंदुर से सना मुंह है। यहां मां तारा का प्रसाद मि‍लता है, जि‍समें उनको स्‍नान कराए जाने वाला पानी, सि‍ंदुर और शराब मि‍ली होती है। भगवान शि‍व का प्रसाद मानकर तांत्रि‍क और साधु शराब पीते हैं। यहां प्रसाद चढ़ाया भी जाता है।



मां की प्रति‍मा को सामने से घेरा हुआ है। हमलोगों ने दर्शन कि‍या और जरा उचककर मां के चरण छुए फि‍र बाहर आ गए। आर्शीवाद स्‍वरूप हमारे माथे पर ति‍लक लगाया पुजारी ने। बाहर आकर देखा, मंदि‍र में संगमरमर और मार्बल का काम है। छत ढलानदार है, जि‍से ढोलाचा कहते हैं। मैंने ऐसे घर भी देख मलूटी में। हालांकि‍ वो मि‍ट्टी के बने थे और मंदि‍र संगमरमर का है।

 हमने पुजारी से कहा कि‍ आपने बताया नहीं कि‍ मां को आलता अर्पित करना होता है तो हम भी लेकर आते। तो उन्‍होंने बोला कि‍ यहां तो ऐसे ही लोग कर लेते है। असली चरण तो महाश्‍मशान में हैं, जहां जाकर आप मां को आलता और सि‍ंदुर अर्पित करें। हमें श्‍मशान तो जाना ही था। महाशमशान में वि‍द्यमान देवी मां के चरण चि‍न्‍ह, जि‍से पाद पद्म कहा जाता है।

मां के चरण वंदना के पीछे की कहानी कुछ ऐसी है। वशि‍ष्‍ठ मुनि‍ के आराधना के समय देवी मां अक्‍सर अदृश्‍य होकर नृत्‍य करती थीं, जि‍ससे वशि‍ष्‍ठ मुनि‍ साधना के वक्‍त भ्रमि‍त हो जाते थे। एक बार उन्‍होंने संदेह हटाने के लि‍ए  सोचा कि‍ इस स्‍थान में कोई शक्‍ति‍ है और वो मेरी परीक्षा के लि‍ए यह नृत्‍य करती है तो वो पैर शि‍ला के रूप में परि‍णत हो जाए। नृत्‍य करती देवी मां के पैर शि‍ला में बदल गए जो आज भी इस महाशमशान पर बामाखेपा समाधि‍ मंदि‍र के दाहि‍नी ओर वि‍राजमान है।



अब हम बाहर घूमने लगे। मंदि‍र के ठीक सामने एक सरोवर था। पता चला कि‍ यह पुरातन पोखर है जो 'जीवंतो पुखुर' अर्थात जीवंत पोखर कहलाता है। दंत कथा है कि‍  लगभग 400 वर्ष पूर्व देवी तारा के इस पीठ स्‍थल की पहचान जयदत्‍त नामक एक वणि‍क ने की थी। वह अपने पुत्र और साथि‍यों के साथ द्वारि‍का नदी के रास्‍ते लौट रहा था और उन्‍होंने वहीं पड़ाव डाला, जहां मां तारा नि‍वास करती थीं। वहां कि‍सी कारण्‍ावश उसके बेटे की मौत हो गई। वणि‍क के सहयोगी जब खाना बनाने के लि‍ए मछली मारी और उसे धोने के लि‍ए इस पोखर में डाला तो वो मछली जीवि‍त हो गई। तब उस व्‍यपारी ने अपने बेटे को उसी पोखर के पानी में स्‍नान कराया और वह जीवि‍त हो गया। इसलि‍ए इस पोखर का जल बहुत पवि‍त्र मान जाता है और कई भक्‍त पूजा से पहले यहां स्‍नान करते हैं।


आगे की कथा ऐसी है कि‍ उस रात वणि‍क और उसके साथी सब सो गए। जयदत्‍त को रात स्‍वप्‍न  में मां का आदेश प्राप्‍त हुआ और सुबह सेमल वृक्ष के नीचे जयदत्‍त ने शक्‍ति‍ साधना की। अंतत: तारा देवी ने दर्शन दि‍या और मि‍ट्टी में दबे हुए शि‍ला प्रति‍मा से अवगत कराया। तब जय दत्‍त ने ऐ छोटे से मंदि‍र का नि‍र्माण कर मूर्ति स्‍थापि‍त करवाई और पूजन के लि‍ए ब्राह्मण नि‍युक्‍त कर दिए।  उस वक्‍त बाढ़ का पानी मंदि‍र में आ जाता था। धीरे-धीरे कालांतर में वहां भक्‍तों का आना कम हो गया और सुनसान रहने लगा। वहां तंत्र साधक या श्‍मशान सन्‍यासी ही जाने लगे।

इसके बाद लगभग 150 साल पहले मल्‍लारपुर के जमींदार जगन्‍नाथ राॅय स्‍पप्‍न में मां का आदेश पाकर मंदि‍र का नि‍र्माण करवाया। कि‍वंदि‍ती है कि‍ इस मंदि‍र के लि‍ए जगन्‍नाथ राॅय को 9 स्‍वर्ण मुद्राओं से भरे कलश मि‍ले थे, शमशान के बेल पेड़ के नीचे, जहां मां ने बताया था। जि‍ससे नए मंदि‍र का  नि‍र्माण 1812 में शुरू कि‍या गया जो 1896 में संपूर्ण हुआ। वर्तमान में स्‍थापि‍त तारापीठ मंदि‍र वही है जि‍से मल्‍लारपुर के जमींदार ने बनवाया था।

अब हम पूरे मंदि‍र की परि‍क्रमा के पश्‍चात श्‍मशान के रास्‍ते में थे। वहां भी पूरी भीड़ थी। जगह-जगह लोग बैठे थे और साधु संत नजर आ रहे थे। दाहि‍नी ओर दो छोटे-छोटे मंदि‍र बने थे। एक में मां के पाद पद्म  है जहां हमलोगों ने आलता व सि‍ंदुर अर्पित कि‍या। वहां वध-स्‍थल भी है और वामखेपा का मंदि‍र भी। एक पीपल का पेड़ है जहां मौली धागा बांधे हुए हैं। शायद मनाैती मानकर ये धागा बांधा गया था।


मां तारा के परम भक्‍त के उल्‍लेख के बि‍ना मां की बात पूरी नहीं कही जा सकती। अपनी साधना से वामदेव ने परम सि‍द्धि‍ प्राप्‍त की थी। कहते हैं कि‍ मां तारा की साधना में वामदेव इतने वि‍ह्रवल हो जाते थे कि‍ अपनी सुध-बुध खो बैठते थे। जि‍स कारण लोग इन्‍हें 'खेपा' अर्थात पागल कहकर संबोधि‍त करते थे। कहते हैं मां तारा उन्‍हें दर्शन दि‍या करती थी।


 हम दर्शन के बाद  श्‍मशान के और अंदर की तरफ गए। लोग कहते हैं यहां महाश्‍मशान की चि‍ता कभी नहीं बुझती। यह द्वारका नदी से घि‍रा हुआ है और भारत की एकमात्र नदी है जो दक्षि‍ण से उत्‍तर दि‍शा की ओर बहती है। पूरे रास्‍ते तांत्रि‍क और साधुओं का जमावड़ा दि‍खा। वो अपने-अपने आसन पर वि‍राजमान थे। अागे एक चि‍ता जल रही थी। मैंने पहली बार कोई चि‍ता जलती देखी। अभि‍रूप भी मेरे साथ खड़ा होकर देखता रहा। मगर चि‍ता ऐसी सजाई गई थी कि‍ लाश का आधा शरीर बाहर ही था।


बहुत कथाएं सुनी हैंं तंत्र-मंत्र की। ऐसा माना जाता है कि‍ तारापीठ महाश्‍मशान में पंचमूंडी के आसन पर एकाग्र मन से मां तारा का 3 लाख बार जाप करने से कि‍सी भी साधक को सि‍द्धि‍ प्राप्‍त हो सकती है। खैर... शाम ढल चुकी थी। हम दर्शन को आए थे। मां के दर्शन कि‍ए और फि‍र आने की कामना के साथ लौट चले देवघर।