Tuesday, September 27, 2016

वि‍श्‍व पर्यटन दि‍वस की बधाई मि‍त्रों...




बादल.. उतर आओ नीचे
मेरी सीमाएं पहचानो
एक बार गले लगो, चले जाओ
मुझको ढांप लो अपने आगोश में
मैं पर्वत हूं
बस तुम्‍हें है अख्‍ति‍यार
उतर आओ, छू जाओ
कोई नहीं आता इस शि‍खर में
अकेला खड़ा हूं
थोड़ा अपनापन तो मुझकाे दे जाओ....










धरती ने ओढ ली हरी चादर
मन भी देखो
हरा-हरा सा है 

Monday, September 26, 2016

पटरि‍यों सी जिंदगी



वहां
दूर पहाड़ के नीचे
ठीक
बादलों के पीछे
एक हरि‍याला गांव है
जहां
मिट्टी के घर के
आंगन में
तुलसी का एक बि‍रवा
लगाना चाहती हूं
संग तुम्‍हारे
घर बसाना चाहती हूं
और तुम
जैसे
युगों से
मेरा हाथ पकड़
चल रहे हो
समानांतर
रेल की पटरी की तरह
क्‍या
हरे पेड़ और
मिट्टी की खुश्‍बू
से ज्‍यादा
रेलगाड़ी की पटरि‍यों सी
जिंदगी
अच्‍छी होती हैं......।

Friday, September 23, 2016

लौट आओ .....


सब को रूलाकर चला गया
कुछ दिन भरमा कर चला गया
नहीं बीतते थे दिन जिस बिन ,वो 
लत अपनी लगा कर चला गया


बच्चों सी निश्छल वो आँखें
घर के हर कोने में झांके
बच्‍चाें का था हमसाया वो
सब मोह तोड़ कर चला गया

घर भर का वो प्यारा 'ड्यूकी'
कोई कैसे भूले शरारतें उसकी
हम सबकी जैसे जान था तू
क्यूँ बना दो दिन का मेहमान तू
कैसे असमय छोड़ कर चला गया

वो आया था दि‍ल बहलाने
मुस्‍कान होंठों पे सबके सजाने
आंसू आंखों में भर गया
दि‍ल लूट के हमेशा को वो चला गया


खुश्‍बू उसकीयादें उसकी
घर-आंगन भर बातें उसकी
आहट है हर सू उसी की
आंखों में बस तस्‍वीर उसी की


मन की माला फेर गया वो 
दर्द सीने में उकेर गया वो 
सुबह-ओ-शाम का सूरज सा वो
क्योँ अन्धकार बि‍खेर गया


गया ऐसा कि‍ अब न आएगा
गोद में कि‍सी के मुंह न छि‍पाएगा
हर दि‍न सबको रूलाएगा
याद अपनी उम्र भर दि‍लाएगा


सब को रूलाकर चला गया
कुछ दिन भरमाकर चला गया।

Wednesday, September 21, 2016

उलझी सी है जिंदगी


बड़ी उलझी सी है जिंदगी करती हूं बार-बार बेतरतीब सी इस जिंदगी की तह लगाने की कोशि‍श
जानते हुए भी कि पल्‍लू में पानी नहीं बंधते इंसान और उनकी फि‍तरत कभी नहीं बदलती

Friday, September 16, 2016

कास का जंगल


कास का घना जंगल उगता है इन दि‍नों
उसकी छाती पर
उम्र की सीढ़ि‍यों पर रूका आदमी
अचानक दौड़ने लगा है
थककर गि‍रता है, गि‍नता है इन दि‍नों
बाकी बची सीढ़ि‍यां
वक्‍त को बांधी हुई मुट्ठि‍यां खुल गई हैं
अब गि‍रती-चढ़ती सांसों का हि‍साब
रखने लगी हैं ऊंगलि‍यां
मेरे हाथ
टटोलते हैं घने जंगल में धड़कन
अब सीने पर सुकून नहीं
कलाई पर परखती हूं नब्‍ज की चाल
बचाने लगी हूं
खाने से थोड़ा नमक थोड़ा चीनी
घबराती हूं, आदत हो गई है
साथ-साथ रहे हैं बरसों सोचकर
समझती हूं
कास के जंगल से डरने लगे हो तुम
और अब जब वक्‍त
झुर्रियों के रूप में तुम्‍हारे चेहरे पर
उतरने लगेगा
भूलने लगोगे दर्पण देखना
छोड़ दोगे इन आंखों में अपनी छवि‍ ढूंढना
पर तुम्‍हें पता होना चाहि‍ए
उम्र के इस पड़ाव पर आकर
जब सारे रंग जी चुकी मैं
सफ़ेद रंग भाता है बहुत मुझको
खोने दो मुझको कास के इन जंगलों में
जाने कि‍तनी बरसातें गुजारी
हृदय की कालि‍मा धुल गई जब
तब ये धवल रंग मि‍ला है तुमको ।

तम अंधियारे का हर ले...


तम अंधियारे का हर ले तू जोत जला नई कोई ।।
सतरंगी चुनरी ओढ़ प्रकृति अब वसुधा पर सोई ।।

नीलगगन से गागर छलकी बूंदों से अमृत बरसा ।
उजियारी  पावन बेला में मन जले दीप सा हरसा ।
कालनिशा सी देख निराशा जाके दूर कहीं खोई ।
सतरंगी चुनरी ओढ़ प्रकृति अब वसुधा पर सोई ।।

शुभ्रदीप की नवल ज्योत्स्ना आशा भर भर लाई ।
नई फसल ने घूंघट खोल भरे खेत में ली अंगड़ाई ।
स्वर्ण भास्कर की किरणों से दैन्य रहा ना कोई ।
सतरंगी चुनरी ओढ़ प्रकृति अब वसुधा पर सोई ।।

दिव्य देव  सब प्रकट हुए है इस पावन रुत में ।
उपवन में जा कर रम जा पूरब  की मारुत में ।
इंद्रधनुष ने बादलों में मद केसर  क्यारियां बोई ।
सतरंगी चुनरी ओढ़ प्रकृति अब वसुधा पर सोई ।।

सुमन अनगिनत खिले चतुर्दिश मनमलिन हरने ।
परबतों के  पत्थर सीने पिघल बन गए झरने ।
सुवर्णजुही बोने को देख आया माली नवल कोई ।
सतरंगी चुनरी ओढ़ प्रकृति अब वसुधा पर सोई ।।

तम अंधियारे का हर ले तू जोत जला नई कोई ।।
सतरंगी चुनरी ओढ़ प्रकृति अब वसुधा पर सोई ।

Monday, September 5, 2016

पहले वाली मोहब्‍बत....


तेरी यादों से कर भी लूं
तुझसे कैसे करूं
वो पहले वाली मोहब्‍बत

तू चला गया था जि‍स रोज
मुझको मेरे हवाले करके
तौबा कि‍या था चांदनी रातों
और
उस सुहानी शाम से भी
जो ढलते हुए रोज़,
बेक़़रार करती थी मुझको

महबूब के कदमों में है
जन्‍नत
पुरानी कहानी कहती है
यादों के सूत पि‍रो हरदम
न जा, रूक जा

मैंने कर दि‍या सबको सलाम
कर ली है
दहकते सूरज से अब मोहब्‍बत
बोलो जरा

तेरी यादों से कर भी लूं
तुझसे कैसे करूं
वो पहले वाली मोहब्‍बत ?

तस्‍वीर- ढलती शाम की

Tuesday, August 23, 2016

कपास सी छुअन


सहलाया
अंतस के खुरदुरेपन को
पांवों पर धर दी अपनी गर्म हथेली
कि‍ सि‍हरन
पूछने लगी अपनी ही प्रज्ञा से
तन सि‍हराऊं कि‍ मन
दोनाें ही रहि‍त है
कपास सी कोमल छुअन से

एक घूंट भरी थी
बची हुई केसर की तली से
धड़का था हृदय
स्‍वाद चखने से  ही नहीं आता
संवेदनाएं
सम्‍मोहि‍त भी करती हैं
कि‍सी की चोट का दर्द दूजा सह लेता है

हथेलि‍यों की कि‍स्‍मत में
जुड़ना न भी लि‍खा हो
दि‍शाएं तय कर देती है
एक सी राह के ध्‍ूाल में लि‍पटना
कांधाें पर ही बोझ उठाया नहीं जाता हरदम
कोई मुस्‍कान देकर जग जीत लेता है
साथ रहता है जैसे एकात्‍मा। 

Friday, August 19, 2016

'' वि‍श्‍व फोटोग्राफी डे ''

मेरी पसंद की, कुछ मेरी खींची हुई तस्‍वीरें 

ओस में भीगा गुलाब

पि‍छोला झील पर उड़ान भरती जलडुब्‍बि‍यां 

फतेहसागर झील 
सम में एक खूबसूरत सुबह 
चंबा का चमेरा बांध 

पठानकोट के रास्‍ते का सौंदर्य 
डलहौजी की एक शाम 
डायनकुंड की बेहि‍साब खूबसूरती 
झारखंड की हरि‍याली 
झारखंड की सड़क पर घूमती बच्‍चि‍ि‍यां 
रांची के पास पलाश का जंगल 
बारि‍श में पत्‍ति‍यों की नोंक पर अटकी बूंदे 
कौसानी की एक सुबह 

रांची शहर की शाम

Tuesday, August 16, 2016

अवि‍स्‍मरणीय गीत....


सबने कहा
अब जाकर मैंने गाया
अपने जीवन का सबसे सुंदर गीत
दरअसल वो
मेरा मौन रूदन था
छलनी दि‍ल से नि‍कलती धुन
जो कहलाया दुनि‍या का सुंदरतम गीत

यह उपजा था
प्‍यार के सात रंगों के आने और
दर्द के समंदर के ठाठें मारने से

कैसी त्रासदी है
शरीर, मन और आत्‍मा की
अलग-अलग ख्‍वाहि‍शें होती हैं
एक दूसरे की इच्‍छा को दरकि‍नार करते

कोई रसायन
हृदय में उद्दीप्‍त करता है प्रेम
लगता है प्‍यार चरम पर पहुंचा
ठीक उसी क्षण
मस्‍ति‍ष्‍क देता है चेतावनी
यह अंति‍म क्षण है, बाद पल के सब समाप्‍त

जि‍ओ, समेटे हर संवेदना
फि‍र बि‍ंध जाओ शूलों में
नि‍यति‍ यही है, परि‍णति‍ भी यही
जीवन का
एक गीत तो खूबसूरत धुनों से सजा रहे
सबसे यादगार पलों की नि‍शानी

सब तजने से पहले
एक कटार सीने में अपने ही हाथों चुभोना
आत्‍मा को बदन से अलग करने के ठीक पहले
एक चीख उभरेेगी,  प्रेम और दर्द में लि‍पटी
जो बन जाएगी
दुनि‍या के लि‍ए अवि‍स्‍मरणीय गीत।

रावणहत्‍था बजाती मैं....