Thursday, October 25, 2018

हवाओं की दस्‍तक ....



अहा....फि‍र करवट लि‍या मौसम ने....सुन रही हूं सर्द हवाओं की दस्‍तक ...शाम गुलाबी है, सि‍हरन जगाती। 

अब पगडंडि‍यों पर वो दौड़ती नजर आएगी...हथेलि‍यों में पारि‍जात के फूल भरे....उधर मंदि‍र के आंगन में गले में ऊनी मफलर डाले बेसब्री से कर रहा होगा वो उसका इंतजार....सर्दियां रूमानि‍यत लि‍ए आती हैं न...प्‍यारा मौसम..प्‍यार का मौसम...गुलाबी-गुलाबी

आ जाओ सर्दी....हमारे पास यादों के गर्म लि‍हाफ़ पड़े है बरसों से...अब धूप दि‍खाने का वक्‍त आ गया...

Wednesday, October 24, 2018

शरद पूर्णिमा.....



शरद पूर्णिमा की रात है। धवल..उज्जवल चाँद खिला है आकाश में । लड़की एकटक देखे जा रही चाँद की तरफ़....ख़ुश है। उसका चेहरा भी चमक रहा चाँद की तरह...

लड़का पास आता है।दोनों हाथ थामे चाँद देखते है...लगातार..।”हमारा जीवन ऐसा ही हो. ये कामना है। सब कुछ उजला...कोई दाग़ न कहीं....।” लड़की स्वप्निल सी आवाज़ में कहती है। प्यार से डूब कर लड़के की तरफ़ देखती है...

लड़के के चेहरे पर असमंजस का भाव है। कहता है ...
“कुछ है जो गोपन है अब तक “

“कह दो सब ...आज जितना कुछ है...सब सुन कर भूल जाऊँगी। हमारा रिश्ता बेदाग़ होना चाहिए।”

“आज नहीं...फिर कभी”

“आज ही...आज क्यों नहीं ...”लड़की हठ करती है...”हमारे बीच सब पारदर्शी होना चाहिए....”

लड़का फिर कहता है....”आज चाँद के साथ रहो..मेरे साथ रहो..”

लड़की की ज़िद शिखर पर....”जो नहीं कहो आज तो मेरा मरा मुँह देखो”

पीड़ा भरी आँखें..छलकी आँखें ...चाँद पर टिकी हैं। मान से भरी लड़की को लगता है ...इससे बड़ी बात कोई हो ही नहीं सकती।जानती है , बहुत प्यार करता है वो ..इसे सुनकर वो कुछ भी नहीं छुपा पाएगा....

कुछ देर सन्नाटा खिंचा रहता है ...मुड़कर देखती है वो ...नहीं है उसके पास कोई ...उसका साथी....
झर-झर आँसू बहने लगे ....चाँद को साक्षी रख कहा ...”जब मरूँ तो ही उससे सामना हो अब”

चाँद रोने लगा ..शीत झरने लगी...कुहासे की परत ने चाँद को ढक दिया...जैसे उदासी छा गयी सब ओर ..।

आज फिर शरद का पूरा चाँद खिला है आकाश में ....चौदह कलाओं वाला चाँद आसमान की तश्तरी पर टिका है ...हरसिंगार भी गमक रहे ..

लड़की हर शरद पूर्णिमा की रात मौत की दुआ माँगती है .....बेबस पूनो का चाँद अपनी पूरी चाँदनी फैला कर ढूँढता है धरती में उनको....

जो प्रेम में तो होते हैं मगर एक क़सम तक नहीं निभा पाते। 

Monday, October 22, 2018

आने के लिए नहीं जाता कोई ....


आने के लिए नहीं जाता कोई
शाम ढलती है
रात चुपचाप चली जाती है
सुबह नहीं लौटता वो ही
जो गुज़र चुका होता है

आज कली, कल फूल है
फूल कल फिर नहीं खिलता
जो चला जाता है कहकर
कि लौट आऊँगा
वह पहले सा कभी नहीं मिलता

जो इंतज़ार में टकटकी लगाए
बैठा रहता है बरसों
वो अपनी हँसी हँसता
और अपने दुःख से ही रोता है
लौटने पर उससे कब सब कहता है

कि जाने और आने के बीच
पहाड़ से दिन और समुन्दर सी रातों ने
कैसे उसे जीना सिखाया
कब थाम लिया अनजाने ही
सहारे के लिए कोई हाथ

सब साबुत होने का दावा
नहीं कर सकता लौटने वाला
एक स्पर्श, एक निगाह या
छोटी सी किसी की याद
छुपा लाता है मन की परतों में

फिर क्यूँ जाता है कोई
आने का वादा करके
कोई गुंजाइश बाक़ी क्यूँ रहे
जाना है जिसे वो चला जाए
देह से आत्मा की तरह।

Tuesday, October 16, 2018

ओह अक्तूबर !


कितनी यादें लेकर आते हो साथ...मन तोला-माशा होता है। वो बिस्तर पर चाँदनी का सोना...
हरसिंगार का ...खिलना-महकना-गिरना
समेटना हथेलियों में तुम्हारी याद की तरह हरसिंगार और ....
पांच सुरों का राग कोई गाता है दूर..मालकौंस
मन को अतीत में खींच ले ही जाता है, कितना भी रोके कोई..
ओह अक्तूबर ....तुम आए फिर....आओ

Saturday, October 6, 2018

पूछ लो ...



तुम्हें रहना है 
तो रहो 
अपने दिल से 
पूछ लो 
मेरी ज़िद से रुके 
तो क्या रुके ?

Friday, September 28, 2018

तुम सा कोई नहीं ....


तुम सा कोई नहीं 
होगा भी तो, किसी की तलाश क्यूँ हो 
जी लिया 
जितना एक जीवन के लिए ज़रूरी होता है 
महसूस किया
प्यार, शिद्दत और बेहिसाब दर्द भी
अब कुछ बचा नहीं
जिसे सोचने, परखने या फिर जी लेने की
इच्छा बाक़ी रहे
अनुभवों से समृद्ध है जीवन
बैठ जाऊँ यदि कभी जीवन में
थक कर कहीं
यादों की गठरी खोल
जी लूँगी बीते पल और
आगे बढ़ती जाऊँगी
बात बस मोहब्बत की ही तो है
तुम्हारे अलावा कोई नहीं
तुम से है, तुम से ही रहेगा..सदा ।

Monday, September 3, 2018

गरम हथेली ....

                   

ज़रूरत होती है
हथेलियों को भी
एक ऐसी गरम हथेली की
जो टूटन के पलों में
आकर कस ले 
और अहसास दिला दे
कि कोई है
जिसे हम अपने
सारे दुःख सौंप सकते हैं।

Friday, August 31, 2018

बीती बात की तरह......



डरती हूँ
तुमसे नहीं
न उस प्यार से, जो
फूलों की तरह बरसा रहे तुम
और मैं भीग रही 
सुबह की ओस में गुलाब की तरह


डरती हूँ
इस साथ से
दिन-रात की बात से
जो हो नहीं पाई उस मुलाक़ात से
कि आदतें जीने नहीं देती पहले की तरह

डरती हूँ
अंतहीन इंतज़ार के ख़्याल से
कि एक दिन कहकर भी
जो नहीं आओगे
मैं राह तकती, जागती रहूँगी रात की तरह
और तुम भूलकर मुझे
बढ़ जाओगे आगे, बीती बात की तरह। 

Tuesday, August 28, 2018

आँखों में वो है बाक़ी...


भोर की तलछट में झाँका एक चेहरा।बहुत दिनों बाद शगुन की भीड़ में शामिल हुआ। नज़रें मिलीं, टिकीं फिर मुड़ गयी भीड़ की ओर।
ढोलक की थाप गूँजती रही। बुलाहट हुई ...जाओ कर लो चुमावन...पीछे से आवाज़ लगाई ..लो, ये लेकर जाओ। पॉकेट की तरफ़ हाथ बढ़ा....
क्यों जी...आपसे क्यूँ.....नहीं देखा मुड़कर, मगर टिकी निगाहों के ताप से मन में बताशे घुल रहे थे।आते-जाते कई बार देखना अच्छा लगता है। कोई ख़ास हो तो फिर ख़्याल रखना ही पड़ता है।

सारे रस्म चल रहे...लौट-लौट पूछना, देखना सबने देखा। ध्रुव तारे के उगने से सब तेज़ी में आए।बैठा रहा वो वहीं, निहारता सा। अधखुली आँखों में समेट ले जो एक सपना।
सारी हिदायतें फिर एक बार और फ़िक्र भी पुरानी सी। सब जाने को हैं। कोई कहता है उसे उठाओ, किसे...अरे वही जो तेरा ......
कोई सिर्फ़ देखने के लिए ही कभी सैकड़ों मील चलकर आ जाता था। उठो...जाओ...देख लो एक बार फिर। ढूँढ लो उन आँखों में वो है बाक़ी, जो मंदिर के पीछे आकर झाँक कर देखा करते थे...


Friday, July 27, 2018

दिल भी दफ़्तरी हो गया


ये तुम्हारे चले जाने के बाद की बात है
लोग लेते हैं जैसे
बारिश का मौसम बीतने के बाद
बरसात का जायज़ा
लगाते हैं हिसाब कि किस जिले में 
पड़ा है सुखाड़
कहाँ उतरा है नादियों का पानी खेत में
कहाँ कैसी है दरकार
जोड़-तोड़ कर करते हैं सरकार से
मुआवज़े की माँग

ऐसे ही तुम्हारे जाने के बाद
बड़ी कड़ाई से लेती हूँ
अपने दिल का हिसाब
किन बातों पर यह पिघलता है
और किन बातों से प्यार मरता है बार-बार
कब मजबूर होकर देती हूँ
तुमको आवाज़
कब चाहती हूँ लौटा लाना अपने पास
और बीते दिनों के खोए एहसासों का
मुआवजा भरना चाहती हूँ

पर लगता है अब
ये दिल भी दफ़्तरी हो गया है
भावनाएँ सरकारी माल की तरह
आधा देना चाहता है
और चाहता है
आधा दबा लेना ख़ुद के पास
फिर एहसान भी जताना चाहता है इसका
कि उम्मीद से अधिक दिया जा चुका तुमको
जो है, जितना है लो और दस्तखत करो बस
कि मौसम और मन का ठिकाना नहीं कब बदल जाए।