रात गुजरी नहीं
हमने आंखों में गुजारी है
आस्मां रो चुका है
अब हमारी बारी है
क्या करना है हमें
दिखाकर अपने अश्क
दर्द देने वाले
जब यही मर्जी तुम्हारी है
रूप का तिलिस्म जब अरूप का सामना करे, तो बेचैनियां बढ़ जाती हैं...
लाऊंगी कहां मैं जुदाई का हौसला
क्यों इस कदर मेरे करीब आ रहे हो तुम?
मेरी हर धड़कन, हर सांस में शामिल हो मगर
मेरे हाथों की इन लकीरों में कहां हो तुम?
तेरा बनना तो नामुमिकन है इस जिंदगी में
क्यों मुझसे ऐसे वफा निभा रहे हो तुम?
उल्फत में तेरी हो जाऊंगी बरबाद
क्यों इश्क के जज्बे को भड़का रहे हो तुम?