Sunday, September 20, 2020

''ल्‍हासा नहीं... लवासा''


यात्राओं में रूचि‍ है...घूमने के साथ-साथ प्रकृति‍ और वातावरण को जीना है, समझना है और खुद को परि‍पूर्ण करना है तो सचि‍न देव शर्मा की कि‍ताब ''ल्‍हासा नहीं... लवासा'' हाथ में उठाइये, और पढ़ जाइये। यकीन मानि‍ए, ऐसा तादाम्‍य बि‍ठा लेंगे आप, कि‍ लगेगा लेखक नहीं...आप ही उन स्‍थानों में घूम रहे हैं। 

आपकी दि‍लचस्‍पी बढ़ाने के लि‍ए पेश है ''ल्‍हासा नहीं...लवासा'' के पहले चैप्‍‍‍‍टर का कुछ अंश जि‍समें जमटा, हि‍माचल प्रदेश का यात्रा वर्णन है....

पुस्तक अंश

  'जमटा में सुकून के पल'  से

कुछ फ़ोटोग्राफ़ी करने की चाहत में मैं विनय के साथ अपना डीएसएलआर कैमरा लिए छह-सात फ़ुट चौड़ी कुछ आठ-दस सीढ़ियाँ उतरकर एक बड़ी समतल सीढ़ी तक पहुँचा ही था कि सीढ़ियों से लगी सीढ़ीनुमा चारदीवारी पर रखे गमलों के बीच से झाँकती सर्पीली, कुछ कच्ची, कुछ पक्की सड़क मानो न जाने किसी अंजान मंज़िल की ओर जा रही थी। मानो ऐसा लगा कि सड़क मेरे कैमरे के निवेदन पर थोड़ी देर के लिए रुकी हुई थी। उस घने पहाड़ी जंगलों के बीच से जाती उस सकरी सुनसान सड़क को कैमरे में क़ैद कर हम थोड़ा और नीचे उतरे तो गुड़हल के ताज़ा फूल अपने सौंदर्य को हमारे सामने परोसने के लिए हमारे इंतज़ार में ऐसे झूमते दिखें जैसे कोई किसी के इंतज़ार में चहलक़दमी करता है।

उस गुड़हल की रंगत कुछ अलग ही थी। शोख़ लाल रंग, काइया हरे रंग से भी गहरे रंग में गहराते पत्ते बारिश के बाद वहाँ पर मेहमानों की खेप को देखकर ख़ुश थे। उनकी सुंदरता का, खिलने और इठलाने का फ़ायदा ही क्या अगर कोई क़द्रदान ही-न-होतो, इसलिए ही आज बने-सँवरे से इतना इतरा रहे थे। उस गुड़हल की तस्वीर मेरे इस यात्रा की दो बेहतरीन तस्वीरों में एक थी।

नीचे की ओर रिसेप्शन के पीछे की तरफ़ लगे बड़े झूले वाले छोटे से लॉन में एक और बेहतरीन तस्वीर हमारा इंतज़ार कर रही रही थी। उस झूले पर बैठा मैं उस छोटे से लॉन के बीच लगे उस पौधे को निहार रहा था। वह पौधा कुछ अलग था। अचानक उड़कर उस पौधे पर आ बैठी तितली मानो कैमरे के साथ बैठे एक आदमी को फ़ोटोग्राफ़र समझ अपना पोर्टफ़ोलियोशूट कराने के इंतज़ार में बेचैन है। कभी इस पत्ते पर बैठती है तो कभी उस पत्ते पर। इतने में ही विनय ने बटरफ़्लाईचैलेंज दे मारा, “बहुत फ़ोटोग्राफ़र बना फिरता है ना, इस तितली की फ़ोटो खींचकर दिखा तो मानूँ तुझे मैं।यूँ तो मैं कोई फ़ोटोग्राफ़र नहीं लेकिन चैलेंज मिला था तो कुछ तो करना ही था। ज्यों ही मैं कैमरा रेडी करता हूँ वह तितली एक पत्ते पर शांत बैठ जाती है जैसे कि वह भी रेडी हो शूट के लिए। और फिर कभी पंख फैलाती है तो कभी सिमेटती, मानो पोज़ बना रही हो। कहीं तितली उड़ ना जाए इसलिए पहले ऑटोमोड पर फ़ोटो लेना सेफ़ऑप्शन लगा इसलिए पहले ऑटोमोड पर खचाखच तीन चार फ़ोटोज़ खींच डाले। फ़ोटोज़ आए भी ठीक। विनय को दिखाया। वह बोला, “अच्छे हैं,और खींच।फिर अपर्चरमोडट्राइ किया वह भी ठीक आया। लेकिन और पास से फ़ोटो लेने की तमन्ना के चलते ज्यों ही कैमरा तितली के थोड़ा और पास ले गया त्यों ही फुर्र से नदारद हो गई। लेकिन संतोष था कि विनय का चैलेंजआख़िरमीट कर ही लिया।

यार, आज अच्छी फोटॉग्राफी हो गई यहाँ आने पर वरना तो इस कैमरे को भी पड़े-पड़े जंग लग जाता। घर पर तो छुट्टी के दिन का भी एक रूटीनसेट हो चुका है। उसके बाहर कुछ भी कर पाना मुश्किल होता है।मैंने कहा।

विनय तुरंत अपने चिर-परिचित अंदाज़ में बोल उठा, “दोस्त, यही तो फ़ायदा है जमटा जैसी सुकून भरी जगह आने का।

अब हम वापस रिसॉर्ट में ऊपर की ओर चले जा रहे थे। शाम होने को थी। रेस्टोरेंट के बाहर खुले आसमान के नीचे डीजेनाइट की तैयारियाँ शरू हो चुकी थीं। हम अभी तक टीशर्ट और बरमूडा में ही घूम रहे थे। कविता और सौम्याडिनर के लिए तैयार होने के लिए अपने-अपने कमरों में जा चुकी थीं। बच्चे अभी तक झूला झूलने और हाईडएनसीक के चक्कर में धमा चौकड़ी मचाए हुए थे। चैम्प थोड़ा इर्रिटेटेड था। हमेशा की तरह उसकी यह शिकायत थी कि सावी और मनस्वी उसे अपने साथ खिलाने से मना कर रही थीं

बच्चे बार की एंट्रेंस पर बने पूलटेबल को देखकर पूल खेलने की ज़िद कर बैठे थे और ख़ास तौर से चैम्प तो कुछ ज़्यादा ही पगला गया था। ये सब बाद में, पहले जाओ फ़्रेश होकर चेंज करके आओ।विनय ने प्यार भरी डाँट मारते हुए उन्हें टॉपफ़्लोर पर हमारे कमरों की और दौड़ा दिया और हम भी धीरे-धीरे घूमते हुए लोहे की सीढ़ियों पर चढ़ते अपने-अपने कमरे के बाहर तक पहुँच गए। ठीक है तैयार होकर पंद्रह बीस मिनट बाद मिलते हैं।यह कहकर मैं अपने कमरे में आ गया और वह अपने कमरे में।

फ़्रेश होकर मैंने कविता से पूछा, “अरे मेरा कुर्ता-पजामा कहाँ है?” उसने उत्सुकता के साथ पूछा बाहर डीजेनाइट है, वहाँ पर कुर्ता-पजामा पहनोगे!उस समय मुझे उसके चेहरे पर बड़ा-सा प्रश्नवाचक चिह्न साफ़ दिख रहा था। मेरी मर्ज़ी, कुछ भी पहनूँ। वैसे भी मुझे कौन सा डांस करना है।मैंने नाराज़गी के साथ सफ़ाई देते हुए बोला। ठीक है, जो मर्ज़ी पहनो, हम कौन हैं रोकने वाले।कविता ने भी झूठ-मूठ ग़ुस्सा दिखाते हुए बोला। अरे मेरा वह मतलब नहीं था।हो सकने वाली लड़ाई की आशंका के मद्देनज़र मैंने रिट्रीट करने में ही भलाई समझी और धीरे से कुर्तापजामा पहनकर तैयार हो गया। कविता तैयार हो चुकी थी और मनस्वी को तैयार कर हम नीचे रेस्टोरेंट के बाहर ओपन टेरेस की और चल दिए।

सौम्या और बच्चे वहाँ पहले से बैठे स्टार्टर्सऑर्डर कर चुके थे। हम पहुँचे ही थे कि ठंडे पड़ते पहाड़ और सर्द होती हवाओं को अपनी गर्म भाप से टक्कर देते हनी चिल्ली पोटैटो हाज़िर थे। डीजे का मद्धिम संगीत भी पूरे वातावरण में ऊष्मा पैदा करने लगा था। जैसे-जैसे हनी चिल्ली पोटैटो का स्वाद जीभ पर चढ़ रहा था वैसे-वैसे वहाँ मौजूद युवक-युवतियाँ डीजे की धुन पर थिरकना शुरू कर रहे थे। महफ़िल अपने शबाब पर आने लगी थी। विनय भी आ पहुँचा था। मौसम ख़ुशगवार था। वैली में बने घरों की लाइटें सितारों की तरह टिमटिमा रही थीं। ऊपर से दिख रहा वह शहर शायद नाहन ही था लेकिन आसमाँ के सितारे, वह तो कहीं नज़र नहीं आ रहे। मैं परेशान था कि हिमाचल के उस छोटे से गाँव के बड़े से रिसॉर्ट में हमारी उस शाम की कौन गवाही देगा, उन तारों के सिवा। मैं सोचता जा रहा था और साथ-ही-साथ विनय के साथ बातों में मशग़ूल था। सहसा रिसॉर्ट की लाइटें गुल हो गईं, डीजे का संगीत शांत हो गया और संगीत पर थिरकते पैर ठिठक गए। सब अचानक से रुक गया। एक क्षण के लिए शून्य पैदा हो गया। इस शून्य के पैदा होते ही न जाने क्यों ख़ुद ही मेरी निगाह आकाश की ओर गई। आसमान में टिमटिमाते सितारें नज़र आने लगे थे। प्रकृति अपने पूर्ण रूप में दिखने लगी थी। लेकिन वह आनंद क्षणिक था। जनरेटर के स्टार्ट होते ही फिर से वही संगीत, संगीत पर नाचते लोग और वही धूम धड़ाका।

मैं और विनय प्रकृति के आंचल में बैठकर बतियाना चाहते थे। हम उठकर नीचे की ओर चल दिए और उस जगह आ पहुँचे जिस जगह कमरों का ब्लॉक था। उधर संगीत का शोर बहुत कम हो चला था। हम नीचे की ओर जाती उन्हीं चौड़ी-चौड़ी सीढ़ियों पर बैठ गए। कोई पाँच मिनट यूँ ही बैठे रहे। प्रकृति को अपने अंतर्मन में सहेज कर प्रकृति जैसा ही बन जाना चाहते थे, ईमानदारी से दिल से दिल की बात करने के लिए प्रकृति की तरह ईमानदार होना भी तो ज़रूरी है। यूँ तो डीजे की आवाज़ कुछ-कुछ उधर तक आ रही थी लेकिन हमें सर्द हवाओं की सर्र-सर्र करती आवाज़ों के अलावा कुछ सुनाई नहीं पड़ रहा था। घाटी में दिखती सितारों की तरह टिमटिमाती लाइटें किसी लालटेन की तरह मुझे दिखाई दे रही थीं। कुछ देर के सन्नाटे के बाद आख़िर विनय ने शुरुआत की, “यार, एक बात बता, अच्छे लोगों को भगवान जल्दी क्यों बुला लेता है?” मैंने जवाब देते हुए कहा, “अच्छे लोगों की ज़रूरत तो इस लोक में भी है और परलोक में भी, शायद इसलिए ही।


Wednesday, September 9, 2020

खि‍ड़की से बारि‍श....


 खिड़की के पार से आती है बारिश की आवाज़

एक ख़्वाहिश करवट लेती है, दम तोड़ देती है ..

Tuesday, August 18, 2020

सूना है माँ का चेहरा ....


घाट उठाने 
सभी रिश्तेदार और करीबी
जमा थे तालाब किनारे

पिंडदान 
फिर मुंडन कार्य में 
सब व्यस्त से हो गए 

वहीं थोड़ी दूर
एक पत्थर पर बैठी माँ
धीमे-धीमे सुबक रही थी

तालाब के पीछे पहाड़
और आसमान में घिरा बादल
हमेशा की तरह सुंदर था

मगर हमारी आँखें
कान की जगह ले चुकी थी
जिसने नाइन को कहते सुना 

उतराय दे अब 
बिछुआ, चूड़ी और बिंदी
कि सुहाग छुड़ाना है 

माँ की रुलाई, रुदन में बदल गई
सब बिलख पड़े
कैसा असहनीय दुःख है यह

डुबकी लगाकर
बाहर आती औरत 
कहीं से भी मेरी माँ नहीं लगी

घर लौटकर 
सब कुछ पहना दिया वापस
मगर बिना सिंदूर के 
कितना सूना लगने लगा है माँ का चेहरा ....।

( तस्‍वीर गूगल से )

Saturday, August 15, 2020

उनके नाम का अंति‍म भोजन....



सखुआ के पत्तल में  
निकाला गया भोजन
सब उन्हीं की पसंद का था 

बैंगन-बड़ी की सब्ज़ी 
कोहड़ा, भिंडी, पालक समेत
कई तरह के व्यंजन परोसे गए 

सज गया पत्तल तो माँ ने कहा
आम का अचार तो दिया ही नहीं
कितना पसंद है उन्हें !

कट गया कलेजा
जब कहा पीछे से किसी ने 
तस्वीर के आगे अर्पित करो
उनके नाम का अंतिम भोजन...

जीवन भर हमें 
मनचाहा खिलाने और
जीने देने वाले पिता के लिए
अब थाली में खाना नहीं परसेगा कोई...।

Saturday, August 8, 2020

कहीं नहीं गए पि‍ता....



आँगन में सबके लिए
कुर्सी लगाते समय
एक कुर्सी बग़ल में खींचकर कहा
यहाँ पापा बैठेंगे...

सब हतप्रभ होकर देखने लगे मुँह
ओह...!
अब पापा कहाँ बैठेंगे
हमारे बीच...

अब नहीं कहेंगे कभी
एक कप कड़क चाय बना दो
सोने जाने से पहले
मेरी मच्छरदानी लगा दो ..

ख़ाली बिस्तर
देखकर लगता है
शाम को लौटकर
रोज़ की तरह देंगे आवाज़
एक गिलास पानी तो लाओ!

यहीं तो है
उनकी टोपी, उनका लोटा
चश्मा-घड़ी, हैंगर में टंगे शर्ट
और हिसाब वाला
बरसों पुराना टीन का संदूक भी....

हर जगह बाक़ी है
उनकी ऊँगलियों का स्पर्श
छत, सीढ़ियाँ और कमरे से
आती है आवाज़...
उनकी गंध फैली है समूचे घर में
वो कहीं नहीं गए
पापा यहीं हैं, हमारे पास ।

Friday, August 7, 2020

पिता.....


कल ही तो पूछा था
पानी पिलाते हुए
कैसा लग रहा आज ?

हमेशा की तरह
मुस्कुराकर
फुसफुसाती सी
आवाज़ में बोले
अच्छा ....!

आँखें मूँदे देख
बदहवासी में थामा हाथ
जो ठीक
कल की तरह ही गर्म था
झिंझोड़ दिया
इतना क्यों सोते हैं आप
उठिए, कि सब रोते हैं ...!

हवा से हिलते थे कपड़े
बार-बार हाथ लगाती सीने पर
कोई स्पंदन, कोई धड़कन
हाथों में थामा हाथ
धीरे-धीरे बर्फ़ की तरह
ठंडा होता गया ..

इन दिनों ऐसे ही सोते थे वो
लगातार,
माँ कहती दवाओं के असर से
उनींदे रहने लगे हैं
तुम्हारी आवाज़ सुन उठेंगे
ज़रा ज़ोर से आवाज़ दो ...

कितने ज़ोर से
लगा रही हूँ आवाज़
पापा...पापा !
रोती जाती हूँ बेतहाशा
पापा ....आज आप उठते क्यों नहीं?

Saturday, July 18, 2020

घघारी धाम : तीन खंड के शि‍व का होता था प्राकृति‍क जलाभि‍षेक....


बारि‍श में हमारा झारखंड इतना खूबसूरत दि‍खता है, कि‍ जि‍तनी भी तारीफ की जाए, कम ही है। इन दि‍नों देश-दुनि‍या का यह हाल है कि‍ तीन महीने से अधि‍क वक्‍त हो गया। जो जहां है, वहीं थम सा गया है। इस कोरोना संक्रमण के दौर में घूमने जाने की बात कहने मात्र से इस कदर भयभीत नि‍गाहों से घूरते हैं लोग, कि‍ लगता है बाहर जाने पर बि‍ना संक्रमि‍त हुए कोई लौटेगा ही नहीं, और बहुत हद तक यह डर सही भी है। 

मगर यायावर मन को चैन कहां। घूम ही आती हूं, जहां भी मौका लगता है। मेरे मि‍जाज के कुछ साथी मि‍ल ही जाते हैं जि‍न्‍हें यायावरी पसंद हो न हो, कहीं कोई प्रति‍बद्धता होती है, जि‍से निभाना चाहते हैं। इस बार साईं मंदि‍र जाने की वजह बनी बच्‍चे का रि‍जल्‍ट। मैंने शर्त रखी कि‍ तभी जाऊंगी जब घघारी धाम के प्राचीन शि‍वमंदि‍र के दर्शन को भी जाएंगे। 


वैसे साईं मंदि‍र कई बार गई हूं। यह मंदि‍र रांची से करीब 45 कि‍लोमीटर की दूरी पर है। रांची - गुमला मुख्‍य पथ पर स्‍थि‍त बेड़ो प्रखंड मुख्‍यालय से करीब 12 कि‍लोमीटर अंदर जाने पर मंदि‍र है, जि‍समें भक्‍तों की भीड़ हमेशा ही लगी रहती है। अब यहां खूंंटी वाले रास्‍ते से भी पहुंचा जा सकता है। बढ़ि‍या सड़क और मनोरम दृश्‍य ...बस देखते ही जाइए। बेड़ो से होकर जाने पर पहले प्राचीन शि‍व मंदि‍र मि‍लता है,  सड़क पर ही दाहि‍नी ओर द्वार बना हुआ है। करीब दो कि‍लोमीटर अंदर जाने पर मंदि‍र है। दाहि‍नी ओर न मुड़कर थोड़ा आगे जाकर बांयी ओर जो रास्‍ता नि‍कलता है, वह साईं मंदि‍र ले जाएगा।

बहुत दि‍नों से इच्‍छा थी कि‍ घघारी धाम हो आऊं। हालांकि‍ कई वर्ष पहले भी एक बार गई थी, मगर स्‍वयंभू शि‍व के अलावा जलप्रपात और वहां का जंगल खींचता है मुझे। कहा जाता है कि‍ भगवान राम इसी रास्‍ते से लंका गये थे और सबसे अद्भुत है तीन खंड का शि‍वलि‍ंग, जि‍सके बारे में कहते है कि‍ पहले यह सात खंडों में था और अब मात्र तीन ही दि‍खता है, जि‍से ब्रहमा,वि‍ष्‍णु और महेश माना गया है। 

कोरोना और मानसून के बीच हमलोग सुबह दस बजे के करीब घर से नि‍कले। दो दि‍न से बारि‍श हो रही थी, और हमें पता था कि‍ अभी धनरोपनी हो रहा होगी। यह दृश्‍य देखना वाकई अद्भुत अनुभव है। ग्रामीण महि‍लाएं और लड़कि‍यां धान के बि‍चड़े लगाने में जुटी रहती हैं और खेतों में रंग-बि‍रंगा संसार उतर आता है। उनकी चुहल से रीझकर बादल भी धरती पर उतर आते हैं।


सड़क अपेक्षाकृत खाली मि‍ला, इसलि‍ए समय पर साईं मंदि‍र पहुंचे। वहां दर्शन और भोग ग्रहण करने के बाद नि‍कले घघारी मंदि‍र की ओर। सड़क पर ही द्वार बना है, इसलि‍ए परेशानी नहीं हुई। जैसे-जैसे रास्‍ते में बढ़ते चले गये, जंगल घना होता गया। रास्‍ते में रोपा करती औरतें, बकरी चराते कुछ बच्‍चे और तालाब में मछली पकड़ता हुआ लड़का दि‍खा। कुछ बच्‍चे नहा भी रहे थे। स्‍वच्‍छ नीला आकाश पर तैरते बादल और पतली सड़क....   

जंगल की अपनी खुशबू होती है। आप जब कि‍सी घने जंगल से गुजरते हैं तो उसी गंध का अनुभव करते हैं, जो पहले कभी कि‍सी जंगल के करीब या भीतर जाने पर कि‍या होगा। मगर इसे शब्‍दों में बता पाना कठि‍न है। हम उसी गंध के वशीभूत आगे बढ़ते गये और जहां रूके, वहां से पानी के कलकल की ध्‍वनि‍ आ रही थी। 

अब मंदि‍र के अलावा झरना हमें खींचने लगा। पि‍छली बार गई थी तो इतना पानी नहीं था। शायद बरसात की वजह से घघारी नदी, जि‍से जमुनी नदी भी कहा जाता है, पानी से लबालब भरा था। इस लाॅकडाउन में भी प्रसाद की दुकानें सजी हुई थी। हमने भी डलि‍या में फूल-नारि‍यल लि‍ए और अभि‍षेक लि‍ए लोटा लेकर उतरने लगे। 

यह अत्‍यंत मनोरम स्‍थल है। ढलान पर नीचे उतरते ही हरहराता हुआ जलप्रपात गि‍रने के बाद दूर तक फैलता दि‍खाई दे रहा था। अभी पानी का रंग बरसात के कारण मटमैेला हो गया था। पत्‍थरों से टकराकर पानी की धार देखने नीचे की ओर झांके तो वहां कई लोग नहाते दि‍खे। सामने रामपुर का घना जंगल फैला हुआ था। चारों तरफ चट्टान जि‍स पर घंटों बैठकर यह नजारा देखा जा सकता है।


नजर उठाकर देखा तो लाल रंग के तीन-चार मंदि‍र नजर आए। वहां तक पहुंचने के लि‍ए बांस की खप्‍पचि‍यों को बांधकर एक पुल बनाया गया है, जि‍सके नि‍चले सतह को पानी की धार कभी भी छूकर खुद में वि‍लीन कर सकती थी। मगर अभी तेज बहाव का अंदेशा नहींं था क्‍योंकि‍ बहुत बारि‍श नहीं हो रही इन दि‍नोंं। इसलि‍ए उसी पुल से पार होकर मंदि‍र की ओर चले। बेशक यह रोमांचकारी अनुभव था और थोड़ा भय का कारण भी। अगर बांस के बीच में पैर अटका तो सीधे नीचे...मगर सावधानी से पार कर गये वाे पुल।


ऊपर मंदि‍र तक जाने के लि‍ए  चट्टानों पर पैर रखकर जाना पड़ा जि‍सके नीचे-नीचे पानी बह रहा था। यह नदी का उद्गगम स्‍थल माना जाता है। कुछ ही दूरी पर मंदि‍र था, जि‍सके द्वार पर ताला लगा था। वहां कोई नहीं था। एक बार तो लगा कि‍ इतनी दूर आकर दर्शन संभव नहीं होगा, मगर वहां पड़े चप्‍पलों की जोड़ी ने आश्‍वास्‍त कि‍या कि‍ पुजारी कहीं आसपास ही होंगे। अनुमान सही साबि‍त करते हुए पुजारी आए और हमारे आग्रह पर मंदि‍र का ताला खोल दि‍या। वैसे भी पूजा करने को हमारे अलावा कोई और नहीं था आसपास। भले ही घूमने आए कुछ जोड़े दि‍खे, जो फोटो खि‍ंचवाने में व्‍यस्‍त थे। 

अंदर तीन खंड के शि‍वलि‍ंग के दर्शन-पूजन के बाद हम बाहर आकर पुजारी से बात करने लगे। उन्‍होंने बताया कि‍ हमारे पूर्वज इस मंदि‍र की पूजा करते थे। यहां शि‍व स्‍वयं प्रकट हुए हैं और उन दि‍नों नदी से झरना नि‍कलता था जि‍ससे प्राकृति‍क रूप से जलाभि‍षेक होता था। इस शि‍व की पूजा द्वापर में श्रीकृष्‍ण ने की थी। यहां एक दही कुंड है, जि‍सके बारे में कहा जाता है कि‍ एक पत्‍थर पर श्री कृष्‍ण के घुटनों के नि‍शान आज भी है और दही मथने और रखने के लि‍ए दो गोलाकार गड्ढे बने हुए हैं।


ऐसा माना जाता है कि‍ त्रेता युग में भगवान राम आए थे इसलि‍ए घघारी के ऊपरी इलाके का नाम रामपुर पड़ा। नि‍चले भाग में एक गुफा है, जहां भगवान राम नि‍वास कि‍ये थे। यहां से फि‍र वो पालकोट होते हुए ' रामरेखा धाम' गये जहां सीता का अपहरण हुआ। यहां पास में ही मां पार्वती और हनुमान जी का एक मंदि‍र है। पास ही एक गुफा है जहां भक्‍त दर्शन करते हैं।


इन सब मान्‍यताओं से परे यह इलाका पहले जसपुर राजाओं के अधीन था जो बंंटवारे के बाद इटकी के लाल साहेब के हि‍स्‍से में आया। पुजारी ने बताया था कि‍ पहले यहां तीन मुनि‍ तपस्‍या करते थे। अभी इस स्‍थल पर जनवरी में संक्रात का मेला लगता है। 

जो भी हो, अपने तरह का अनोखा शि‍वलि‍ंग है यहां और जंगल के बीच पत्‍थर के मंदि‍र का होना हमारे अंदर जि‍ज्ञासा पैदा करता है कि‍ आखि‍र क्‍या प्रमाणि‍क इति‍हास है यहां का।  वैसे भी कई जगह हैं हमारे झारखंड में जि‍स पर शोध कि‍या जाना बाकी है।

कुछ देर तक झरने की कलकल सुनकर हम लौटे तो साल के जंगल की हरि‍याली ने रोक लि‍या। मखमखी चादर बि‍छी थी हरे घास की और पेड़ों पर चि‍ड़ि‍यों की चहचहाहट। दि‍ल ने कहा रूक जाओ यहीं...दि‍माग ने सलाह दी..फि‍र आ जाना। बस इस घास पर बैठकर चाय-सैंडवि‍च का लुत्‍फ उठाया और नि‍कल पड़े। अब देखें दुबारा कब जाना होता है इस मनमोहक स्‍थान में।


Wednesday, July 8, 2020

कुछ भी तो नहीं...



इन दिनों बार-बार महसूस होता है कि केवल फ़ोटो खींचने और अपनी फ़ोटो खिंचवाने के सिवाय और क्या कर रही हूँ?

कुछ भी तो नहीं...

मन में विचार ऐसे ही बादलों की तरह चले आते हैं और देखते ही देखते तिरोहित हो जाते हैं। ना बादलों के हिसाब से सावन बरस रहा है न मन में कुछ ठहर रहा है।कविता तो जाने जब से रूठी है मुझसे। निपट सूनापन है ...दिल तक कोई बात पहुँचती ही नहीं इन दिनों....।

Saturday, July 4, 2020

कृष्ण कमल फूल.....



कृष्ण कमल फूल देखा है आपने?

राखी फूल या कौरव-पांडव फूल तो देखा ही होगा। इस बेल पर ढेर सारे फूल झुमकों की तरह यहां-वहां लटके रहते हैं। इसीलिए इसका एक नाम झुमका लता भी है। राखी फूल इसलिए क्योंकि पहले जमाने में ऐसी ही बड़ी-बड़ी राखियाँ मिलती थीं।

इस फूल के लिए कहा जाता है कि इसमें महाभारत काल के सम्पूर्ण महत्वपूर्ण पात्र समाहित हैं। कौरव, पांडव, ब्रह्मा, विष्णु, महेश एवं साक्षात भगवान कृष्ण और कहीं- कहीं इसे द्रौपदी माना जाता है। यह पुष्प तीन वर्षों में एक ही बार खिलता है।

फूल मध्य में पांच पंखुडियाँ पीली या हरी होती है जिन्हें पांच पांडवों का प्रतीक माना जाता है, बीच में तीन पराग , वे ब्रह्मा-विष्णु-महेश के प्रतीक हैं और जो केंद्र में विराजमान हैं, वे साक्षात सुदर्शन चक्र स्वरूप हैं। फूल के आसपास की बैंगनी पत्तियों की संख्या पूरी 100 हैं, जिसे कौरव कहा जाता है।

महाभारत से जुड़ा होने के कारण लोग यह कहते हैं कि इस फूल को घर में नहीं लगाना चाहिए। मगर महाभारत मे इस फूल का वर्णन नहीं मिलता है और न ही हमारे प्राचीन ग्रंथ इसके विषय में कुछ कहते हैं। मगर माना जाता है कि यह भगवन श्री कृष्ण को अतिप्रिय भी है और उन्हें चढाए जाने की मान्यता भी है।

इस वनस्पति को बहुत उपयोगी माना जाता है। इसका वानस्पतिक नाम पैशन फ्लावर या पैसीफ्लोरा इनकार्नेटा है। इसके भी दो प्रकार होते हैं। जंगली कृष्ण कमल हरापन लिए श्वेत, गुलाबी, गहरे रक्त वर्ण या बैंगनी वर्ण के होते हैं।कृष्ण कमल के पुष्प श्वेत तथा बैंगनी वर्ण के होते हैं।

जो भी नाम हो... बेल पर खिले फूल मुझे बेहद मोहित करते हैं।



Thursday, July 2, 2020

दाम्‍पत्‍य जीवन में प्रतीक चि‍ह्र धारण करना कि‍तना आवश्‍यक है ?


जब से गुवाहाटी हाईकोर्ट का तलाक के मामले में यह फैसला आया है कि‍ अगर पत्‍नी शाखा चूड़ि‍यां पहनने और सि‍ंदूर लगाने से इनकार करे तो इसका मतलब है कि‍ उसे शादी स्‍वीकार नहीं, फि‍र एक बार पति‍-पत्‍नी के संबंध और वैवाहि‍क चि‍ह्रों को लेकर चर्चा जोर पकड़ने लगी है। 

क्‍या वाकई दाम्‍पत्‍य जीवन इन प्रतीकों को धारण करने के बाद ही सफल माना जा सकता है। अगर पत्‍नी सि‍ंदूर न लगाये या बि‍छि‍या न पहने तो वह पति‍ को प्‍यार नहीं करती या उसके साथ जीवन नहीं गुजरना चाहती ? अगर आपने गौर कि‍या हो तो पता लगेगा कि‍ यह सब चि‍न्‍ह्र भी अब पर्व-त्‍योहरों तक सीमि‍त होते जा रहे हैं। खासकर कामकाजी महि‍लाएं इन परंपराओं को हौले-हौले छोड़ती जा रही हैं और यह उचि‍त भी है। शादीशुदा जिंदगी की असल सार्थकता इसी में है कि‍ सहजीवन में दो साथी, सहचर का प्रतिज्ञा बद्ध होकर आगे बढऩा। यही दाम्पत्य या वैवाहिक जीवन का मकसद होता है। 

हालांकि‍ तलाक का फैसला इसी आधार पर नहीं कि‍या गया है और पक्ष-वि‍पक्ष के तर्क वि‍वाह वि‍धि‍यों के नि‍यम को ध्‍यान में रखकर वादी द्वारा दाखि‍ल कि‍सी खास बि‍ंदू के उत्‍तर के रूप में यहआदेश दि‍या गया है, फि‍र भी यह सवाल तो उठाया ही जा सकता है, और उठाया भी जा रहा है कि‍ शादीशुदा जीवन के लि‍ए प्रतीक धारण करना आवश्‍यक है और वह भी केवल स्‍त्रि‍यों द्वारा। 

अगर इति‍हास के पन्‍नों में झाकंगे तो पता चलेगा कि‍ कि‍सी समय असुर या राक्षस वि‍जेता जीती हुई महि‍ला के होंठ-कान छेदकर या हाथों में बेड़ी डालकर उसे ले जाते थे, जि‍से बाद में गहना का नाम दि‍या गया।  नथ अरबों की नकेल है, जि‍ससे वह जानवरों को नि‍यंत्रि‍त करता था। आज औरत इन सब आभूषणों को सुहाग, सम्‍मान और गर्व के साथ पहनती हैं, जो उनकी गुलामी का प्रतीक है। 

मुझे याद है कुछ वर्ष पहले हि‍ंदी साहि‍त्‍य की प्रसि‍द्ध लेखि‍का मैत्रेयी पुष्‍पा ने छठ पूजा की परंपरा में नाक से सि‍ंदूर लगाने को लेकर सवाल उठाया था और बुरी तरह ट्रोल होने के बाद अपनी पोस्‍ट हटा दी थी उन्‍होंने। तब बात धर्म और आस्‍था पर आकर रूक गई थी, मगर यह सवाल तो तमाम स्‍त्रि‍यों के मन में कभी न कभी उठती  ही होगी कि‍ सारे प्रतीक उनके ही हि‍स्‍से क्‍यों हैं। सिंदूर, बि‍छि‍या और चूड़ी स्‍त्री ही धारण करे, मंंगलसूत्र भी वही पहने और तीज-करवाचौथ जैसा पति‍ की लंबी आयु के लि‍ए व्रत वो ही करेंं। कौन पति‍ अपनी पत्नी की लंबी आयु के लि‍ए व्रत और पूजा-पाठ करता है या शादी का कोई प्रतीक चि‍न्‍ह धारण करता है कि‍ लोगों को यह पता चले कि‍ वह वि‍वाहि‍त है। 

जहां तक सि‍ंदूर लगाने की शुरूआत की बात है तो, उसे स्‍त्री शौर्य का प्रतीक मानकर पहली बार लगाया गया था, मगर धीरे-धीरे यह परंपरा का हि‍स्‍सा और वि‍वाहि‍त स्‍त्री का अनि‍वार्य चि‍न्‍ह्र बन गया।  हमारी कंडीशनि‍ंग इस तरह से की गई कि‍ यह सहज ग्राह्य और अनि‍वार्य रूप बनता गया और धर्मभीरू मन अनि‍ष्‍ट की आशंका से डरा इन्‍हें धारण करता आया है।  मगर सि‍ंदूर की डि‍बि‍या सहेजकर ही पति‍ का साथ चि‍रंतर प्राप्‍त होता रहे, यह संभव नहीं। उसके लि‍ए आपसी सामंजस्‍य और प्‍यार बहुत जरूरी है। और मेरा मानना है कि‍ कोई भी पति‍ अपनी पत्‍नी को प्रेम करता है तो उसे जबरन इन चि‍न्‍हाेंं को धारण करने के लि‍ए नहीं कहेगा। अगर स्‍त्री शौक और खूबसूरत दि‍खने के कारण चूड़ि‍यां पहनती और सि‍ंदूर लगाती हो, तो बात अलग है। 

मगर एक प्रतीक का उदाहरण यह भी है कि‍ अगर स्‍त्री चूड़ि‍यां पहने तो वह सुंदरता और सुहाग की नि‍शानी है, मगर पुरूष खुद को मर्द साबि‍त करने के लि‍ए कि‍सी भी झगड़े के दौरान गर्व से घोषि‍त करता है कि‍- '' मैंने हाथों में चूड़ि‍यां नहीं पहन रखी हैं।'' अर्थात चूडि‍यां कमजाेरी का प्रतीक है, और स्‍त्री को कमजोर बनाये रखने के लि‍ए साजि‍श के तहत उन्‍हें चूड़ी, सि‍ंदूर, और गहनों में उलझाकर रख दि‍या गया है। 

सच तो यह है कि‍ स्‍त्री-पुरुष दोनों का स्‍वतंत्र अस्‍ति‍त्‍व है। स्‍त्री-पुरूष परस्‍पर पूरक होकर भी स्‍वतंत्र इकाइयां हैं, इसलि‍ए कि‍सी पर कोई चीज थोपनी नहीं चाहि‍ए, परंपरा के नाम पर भी, क्‍योंकि‍ परंपरा प्रवाह का नाम है, कि‍सी रूढ़ का नहीं। सि‍ंदूर या शाखा पहनने से रि‍श्‍ते में वो गर्माहट नहीं आएगी, जो परस्‍पर सम्‍मान और प्‍यार देने से होगी।