Wednesday, July 8, 2020

कुछ भी तो नहीं...



इन दिनों बार-बार महसूस होता है कि केवल फ़ोटो खींचने और अपनी फ़ोटो खिंचवाने के सिवाय और क्या कर रही हूँ?

कुछ भी तो नहीं...

मन में विचार ऐसे ही बादलों की तरह चले आते हैं और देखते ही देखते तिरोहित हो जाते हैं। ना बादलों के हिसाब से सावन बरस रहा है न मन में कुछ ठहर रहा है।कविता तो जाने जब से रूठी है मुझसे। निपट सूनापन है ...दिल तक कोई बात पहुँचती ही नहीं इन दिनों....।

Saturday, July 4, 2020

कृष्ण कमल फूल.....



कृष्ण कमल फूल देखा है आपने?

राखी फूल या कौरव-पांडव फूल तो देखा ही होगा। इस बेल पर ढेर सारे फूल झुमकों की तरह यहां-वहां लटके रहते हैं। इसीलिए इसका एक नाम झुमका लता भी है। राखी फूल इसलिए क्योंकि पहले जमाने में ऐसी ही बड़ी-बड़ी राखियाँ मिलती थीं।

इस फूल के लिए कहा जाता है कि इसमें महाभारत काल के सम्पूर्ण महत्वपूर्ण पात्र समाहित हैं। कौरव, पांडव, ब्रह्मा, विष्णु, महेश एवं साक्षात भगवान कृष्ण और कहीं- कहीं इसे द्रौपदी माना जाता है। यह पुष्प तीन वर्षों में एक ही बार खिलता है।

फूल मध्य में पांच पंखुडियाँ पीली या हरी होती है जिन्हें पांच पांडवों का प्रतीक माना जाता है, बीच में तीन पराग , वे ब्रह्मा-विष्णु-महेश के प्रतीक हैं और जो केंद्र में विराजमान हैं, वे साक्षात सुदर्शन चक्र स्वरूप हैं। फूल के आसपास की बैंगनी पत्तियों की संख्या पूरी 100 हैं, जिसे कौरव कहा जाता है।

महाभारत से जुड़ा होने के कारण लोग यह कहते हैं कि इस फूल को घर में नहीं लगाना चाहिए। मगर महाभारत मे इस फूल का वर्णन नहीं मिलता है और न ही हमारे प्राचीन ग्रंथ इसके विषय में कुछ कहते हैं। मगर माना जाता है कि यह भगवन श्री कृष्ण को अतिप्रिय भी है और उन्हें चढाए जाने की मान्यता भी है।

इस वनस्पति को बहुत उपयोगी माना जाता है। इसका वानस्पतिक नाम पैशन फ्लावर या पैसीफ्लोरा इनकार्नेटा है। इसके भी दो प्रकार होते हैं। जंगली कृष्ण कमल हरापन लिए श्वेत, गुलाबी, गहरे रक्त वर्ण या बैंगनी वर्ण के होते हैं।कृष्ण कमल के पुष्प श्वेत तथा बैंगनी वर्ण के होते हैं।

जो भी नाम हो... बेल पर खिले फूल मुझे बेहद मोहित करते हैं।



Thursday, July 2, 2020

दाम्‍पत्‍य जीवन में प्रतीक चि‍ह्र धारण करना कि‍तना आवश्‍यक है ?


जब से गुवाहाटी हाईकोर्ट का तलाक के मामले में यह फैसला आया है कि‍ अगर पत्‍नी शाखा चूड़ि‍यां पहनने और सि‍ंदूर लगाने से इनकार करे तो इसका मतलब है कि‍ उसे शादी स्‍वीकार नहीं, फि‍र एक बार पति‍-पत्‍नी के संबंध और वैवाहि‍क चि‍ह्रों को लेकर चर्चा जोर पकड़ने लगी है। 

क्‍या वाकई दाम्‍पत्‍य जीवन इन प्रतीकों को धारण करने के बाद ही सफल माना जा सकता है। अगर पत्‍नी सि‍ंदूर न लगाये या बि‍छि‍या न पहने तो वह पति‍ को प्‍यार नहीं करती या उसके साथ जीवन नहीं गुजरना चाहती ? अगर आपने गौर कि‍या हो तो पता लगेगा कि‍ यह सब चि‍न्‍ह्र भी अब पर्व-त्‍योहरों तक सीमि‍त होते जा रहे हैं। खासकर कामकाजी महि‍लाएं इन परंपराओं को हौले-हौले छोड़ती जा रही हैं और यह उचि‍त भी है। शादीशुदा जिंदगी की असल सार्थकता इसी में है कि‍ सहजीवन में दो साथी, सहचर का प्रतिज्ञा बद्ध होकर आगे बढऩा। यही दाम्पत्य या वैवाहिक जीवन का मकसद होता है। 

हालांकि‍ तलाक का फैसला इसी आधार पर नहीं कि‍या गया है और पक्ष-वि‍पक्ष के तर्क वि‍वाह वि‍धि‍यों के नि‍यम को ध्‍यान में रखकर वादी द्वारा दाखि‍ल कि‍सी खास बि‍ंदू के उत्‍तर के रूप में यहआदेश दि‍या गया है, फि‍र भी यह सवाल तो उठाया ही जा सकता है, और उठाया भी जा रहा है कि‍ शादीशुदा जीवन के लि‍ए प्रतीक धारण करना आवश्‍यक है और वह भी केवल स्‍त्रि‍यों द्वारा। 

अगर इति‍हास के पन्‍नों में झाकंगे तो पता चलेगा कि‍ कि‍सी समय असुर या राक्षस वि‍जेता जीती हुई महि‍ला के होंठ-कान छेदकर या हाथों में बेड़ी डालकर उसे ले जाते थे, जि‍से बाद में गहना का नाम दि‍या गया।  नथ अरबों की नकेल है, जि‍ससे वह जानवरों को नि‍यंत्रि‍त करता था। आज औरत इन सब आभूषणों को सुहाग, सम्‍मान और गर्व के साथ पहनती हैं, जो उनकी गुलामी का प्रतीक है। 

मुझे याद है कुछ वर्ष पहले हि‍ंदी साहि‍त्‍य की प्रसि‍द्ध लेखि‍का मैत्रेयी पुष्‍पा ने छठ पूजा की परंपरा में नाक से सि‍ंदूर लगाने को लेकर सवाल उठाया था और बुरी तरह ट्रोल होने के बाद अपनी पोस्‍ट हटा दी थी उन्‍होंने। तब बात धर्म और आस्‍था पर आकर रूक गई थी, मगर यह सवाल तो तमाम स्‍त्रि‍यों के मन में कभी न कभी उठती  ही होगी कि‍ सारे प्रतीक उनके ही हि‍स्‍से क्‍यों हैं। सिंदूर, बि‍छि‍या और चूड़ी स्‍त्री ही धारण करे, मंंगलसूत्र भी वही पहने और तीज-करवाचौथ जैसा पति‍ की लंबी आयु के लि‍ए व्रत वो ही करेंं। कौन पति‍ अपनी पत्नी की लंबी आयु के लि‍ए व्रत और पूजा-पाठ करता है या शादी का कोई प्रतीक चि‍न्‍ह धारण करता है कि‍ लोगों को यह पता चले कि‍ वह वि‍वाहि‍त है। 

जहां तक सि‍ंदूर लगाने की शुरूआत की बात है तो, उसे स्‍त्री शौर्य का प्रतीक मानकर पहली बार लगाया गया था, मगर धीरे-धीरे यह परंपरा का हि‍स्‍सा और वि‍वाहि‍त स्‍त्री का अनि‍वार्य चि‍न्‍ह्र बन गया।  हमारी कंडीशनि‍ंग इस तरह से की गई कि‍ यह सहज ग्राह्य और अनि‍वार्य रूप बनता गया और धर्मभीरू मन अनि‍ष्‍ट की आशंका से डरा इन्‍हें धारण करता आया है।  मगर सि‍ंदूर की डि‍बि‍या सहेजकर ही पति‍ का साथ चि‍रंतर प्राप्‍त होता रहे, यह संभव नहीं। उसके लि‍ए आपसी सामंजस्‍य और प्‍यार बहुत जरूरी है। और मेरा मानना है कि‍ कोई भी पति‍ अपनी पत्‍नी को प्रेम करता है तो उसे जबरन इन चि‍न्‍हाेंं को धारण करने के लि‍ए नहीं कहेगा। अगर स्‍त्री शौक और खूबसूरत दि‍खने के कारण चूड़ि‍यां पहनती और सि‍ंदूर लगाती हो, तो बात अलग है। 

मगर एक प्रतीक का उदाहरण यह भी है कि‍ अगर स्‍त्री चूड़ि‍यां पहने तो वह सुंदरता और सुहाग की नि‍शानी है, मगर पुरूष खुद को मर्द साबि‍त करने के लि‍ए कि‍सी भी झगड़े के दौरान गर्व से घोषि‍त करता है कि‍- '' मैंने हाथों में चूड़ि‍यां नहीं पहन रखी हैं।'' अर्थात चूडि‍यां कमजाेरी का प्रतीक है, और स्‍त्री को कमजोर बनाये रखने के लि‍ए साजि‍श के तहत उन्‍हें चूड़ी, सि‍ंदूर, और गहनों में उलझाकर रख दि‍या गया है। 

सच तो यह है कि‍ स्‍त्री-पुरुष दोनों का स्‍वतंत्र अस्‍ति‍त्‍व है। स्‍त्री-पुरूष परस्‍पर पूरक होकर भी स्‍वतंत्र इकाइयां हैं, इसलि‍ए कि‍सी पर कोई चीज थोपनी नहीं चाहि‍ए, परंपरा के नाम पर भी, क्‍योंकि‍ परंपरा प्रवाह का नाम है, कि‍सी रूढ़ का नहीं। सि‍ंदूर या शाखा पहनने से रि‍श्‍ते में वो गर्माहट नहीं आएगी, जो परस्‍पर सम्‍मान और प्‍यार देने से होगी।

Saturday, May 2, 2020

कोई रंग....



स्मृतियों में बसी होती है 
कोई सुगंध, कोई रंग
गुज़र कर भी कहाँ
गु
जरता है सब कुछ जीवन से.....

Friday, May 1, 2020

रात....

एक चाँद, एक सितारा और बस खिड़की भर रौशनी

 कैसी अद्भुत रात आयी है...



Wednesday, April 29, 2020

गोधूली बेला.....


1.
आकाश धुँधलाया
गौ के खुरों से उड़ रही धूल
टिटकारी सुन
सीध में आ गई बकरियाँ
चट-चट कर लहकने लगा
सब घरों का चूल्हा
2.
स्मृतियों में बसी होती है
गोधूली बेला
और
गोधूली बेला में
स्मृतियों के सिवा कुछ नहीं बचता....।

Tuesday, April 28, 2020

समय ...


समय यह
कठिन है भी तो क्या
फिर बैठूँगी
शिरीष, एक दिन
तुम्हारी छाँव तले

Monday, March 2, 2020

शिव को प्रिय है चम्पा...




शिव को प्रिय है चम्पा...मगर नारद के श्राप के कारण उन्हें अर्पित नहीं किया जाता ...


किवंदती है कि एक बार नारद को पता चला कि एक ब्राह्मण ने अपनी बुरी इच्छाओं की पूर्ति के लिए चम्पा के फूल तोड़े हैं। उन्होंने जब चम्पा के वृक्ष से पूछा कि क्या किसी ने उसके पुष्पों को तोड़ा है, तो चम्पा के वृक्ष ने इनकार कर दिया।

इसके पश्चात् नारद मुनि ने पास के शिव मंदिर में पाया कि शिवलिंग चम्पा के फूलों से ढका है।

वह ब्राह्मण शिव पूजा करके शक्तिशाली राजा बनकर अत्याचार करने लगा। नारद को क्रोध आया कि भगवान ने ऐसे पापी की इच्छा क्यूँ पूर्ण की।

शिव जी से पूछने पर उन्होंने कहा कि जो भी व्यक्ति चम्पा के फूलों से मेरी पूजा करता है, मैं उसकी मनोकामना पूर्ण करता हूँ।तब नारद जी ने चम्पा के वृक्ष को श्राप दिया कि अब कभी भी भगवान शिव अपने पूजन में चम्पा के फूल स्वीकार नहीं करेंगे क्योंकि वृक्ष ने उन्हें झूठ बोलकर गुमराह किया है।
तब से चम्पा का फूल शिव को अर्पित नाहीं किया जाता।

Friday, February 28, 2020

मन चुनता है....


धूप सुहाती है तन को
सन्नाटे में कोई गुनगुन करता है
बिखरी पड़ी स्मृतियों को
झरे पत्तों की तरह मन चुनता है

Tuesday, February 11, 2020

बुझ रही है शाम ...


बेहद सर्द और उदास है शाम आज
दूर तक है नहीं कोई पास आज
किसका रास्ता देखूँ, कौन आएगा
यादों में उसकी बुझ रही है शाम आज