Sunday, April 23, 2017

मृग्‍ाया......


मैं मृग्‍ाया
कस्‍तूरी सी
देहगंध तुम्‍हारी
ढूंढती फि‍रती
दसों दि‍शाएं

मि‍लते हो
जब ख्‍वाबों में
होते अलि‍ंगनबद्ध
फूटती है सुगंध
अपने ही
तन से

वि‍चरती हूं
भावनाओं के वन मेंं
अब तुम
मोहि‍त से हो भंवरे

कलि‍यां चटखती हैं
दि‍वस जैसे मधुमास
मैं मृगनयनी
तुम कस्‍तूरी
जीवन में तुमसे ही
है सारा सुवास 

तस्‍वीर....इस जंगली फूल की खुश्‍बू बहुत ही मादक होती है। 

Monday, April 17, 2017

दिन बैसाख के



मन पलाश का बहके
तन दहके अमलतास का ।
कर्णफूल के गाछ तले
ताल भरा मधुमास का ।
अधरों के स्पन्दन से
खुली आँख के स्वप्न से
किसलय कई खिले आलि
ठूंठ पड़े इस जीवन में
छाया प्रणय आभास का ।
बदरा फूटा मेह से
भीगा अँचरा नेह से
हर आखर में प्यार लिख
रच पतरा प्रीतालेख का
कसाव जैसे दृढ बाहुपाश का ।
धूपीली दोपहरिया में
आँखे लगी देहरिया में
खबर आज भी कोई नहीं
दग्ध तप्त बैसाख में
मन सूना है आकाश का ।

Wednesday, April 12, 2017

मां तारापीठ के दर्शन


तारापीठ जाने का संयोग अकस्‍मात हो गया। देवघर जाना था तो एक दि‍न पहले नि‍कल गए कि‍ इस दि‍न तारापीठ के दर्शन कर ही आए। 31 मार्च की दोपहर रांची से नि‍कले और शाम के 8 बजे तक देवघर में। रात वहीं रूककर सुबह तारापीठ जाना था मगर नि‍कलते-नि‍कलते 11 बज ही गए। 20-25 कि‍लोमीटर दूर गए तो रास्‍ते में वसुकीनाथ मंदि‍र मि‍ला। सोचा इतनी दूर आए है तो दर्शन कर ही लें। हालांकि‍ मान्‍यता यह है कि‍ पहले देवघर में पूजा अर्चना हो जाए तभी वासुकीनाथ दर्शन करें।


अब रास्‍ते से गुजरे तो दर्शन भी कि‍या। अच्‍छा मंदि‍र है। भीड़-भाड़ भी खूब थी। शि‍वलि‍ंग दर्शन कर आगे बढ़े। पहले दुमका, फि‍र तारापीठ। उपराजधानी दुमका पहुंचत-पहुंचते यह जरूर महसूस हुआ कि‍ इन दि‍नों झारखंड की सड़के शानदार बन गई है। हमें रांची से यहां तक गि‍रीडीह के बाद के 20 कि‍लोमीटर के अलावा कहीं सड़क को लेकर कोई परेशानी नहीे हुई।


दुमका बाईपास से नि‍कले तो मलूटी देख वहां कुछ घंटे बि‍ता लि‍ए। यहां जाना हमारे प्‍लान का हि‍स्‍सा नहीं था। हमें शाम तक वापस देवघर लौट आना था। बासुकीनाथ भी अचानक गए और मलूटी भी। मलूटी पर वाकई दि‍ल आ गया। घंटों रूकने की इच्‍छा थी मगर मां के दर्शन को जाना था आगे। जब रामपुरहाट पार कर तारापीठ पहुंचे तो बड़ा सा गेट सफेद रंग का मि‍ला। शीर्ष पर मां तारा का  मस्‍तक स्‍थापि‍त है। गेट से अंदर जाने पर हम तारापीठ पहुंच गए। गाड़ी पार्क करने के बाद पैदल अंदर। रास्‍ते के दोनों तरफ दुकानें थी। जैसा कि‍ हर धार्मिक स्‍थल पर होता है। मि‍ठाईयों की पंक्‍ति‍ से कई दुकानें। कालाजामुन, गुलाब जामुन के बड़े-बड़े हांडे सामने लगे थे। उस पर खूब सारी मक्‍खि‍यां थीं। मुझे पसंद है मि‍ठाई पर सोचा यहां तो नहीं  खाऊंगी। फूलों के दुकान भी थे। जवा के फूल, नीले फूल और मालाएं।



तारापीठ पश्‍चि‍म बंगाल में पड़ता है। वीरभूम जि‍ले में स्‍थि‍त यह शक्‍ति‍पीठ है। यहां की भाषा में तारा का अर्थ होता है आंख और पीठ का अर्थ है स्‍थल। तारा शब्‍द का एक और अर्थ है ..भव सांगर से तारने वाली अर्थात जन्‍म तथा मृत्‍यु के बंधन के बंधन से मुक्‍त पर मोक्ष दि‍लाने वाली।। सो यह तारापीठ कहलाया। पुराणों के अनुसार मां सती के नयन यानी तारा इसी जगह गि‍रे थे इसलि‍ए यह तारापीठ कहलाया। यहां भव्‍य मंदि‍र है और बगल में महा शमशान भी है। मां तारा शमशनवासि‍नी और तथा घोर उग्र स्‍वरूप वाली हैं।


कहते हैं बहुत पहले सत्‍य युग में मर्हि‍ष वश्‍िाष्‍‍‍ठ ने मां की  पूजा कर अनेक सि‍द्धि‍यां प्राप्‍त की थी और उन्‍होंने ही इस मंदि‍र का नि‍र्माण करवाया था। मगर वो पुराना मंदि‍र धरती की गोद में समा गया। कथा है कि‍ सत्‍य युग में ब्रह्रा जी ने अपने पुत्र वशि‍ष्‍ठ को तारा मंत्र की दीक्षा दी तथा मंत्र सि‍द्ध कर मां तारा की कृपा प्राप्‍त करने का आदेश दि‍या।  पि‍ता की आज्ञा मानकर सर्वप्रथम नीलांचल पर्वत पर गए और वैदि‍क रीति‍ से चि‍रकाल तक अराधना की परंतु उन्‍हें सफलता नहीं मि‍ली। बार-बार असफलता मि‍लने के कारण उन्‍होंने तारा-मंत्र को शापि‍त कर दि‍या। फि‍र आकाशवाणी हुई कि‍ '' वशि‍ष्‍ठ तुम मेरे साधना के स्‍वरूप को नहीं जानते हो। चीन देश जाने पर वहां बुद्ध मुनि‍ होंगे उनसे साधना का सही और उपयुक्‍त क्रम जानकर मेरी अराधना करो।'' उस समय केवल भगवान बुद्ध ही इस वि‍द्या के आर्चाय माने जाते थे।


वशि‍ष्‍ठ मुनि‍ जब चीन पहुंचे तो देखा कि‍ बुद्ध मदि‍रा, मांस, मत्‍स्‍य और नृत्‍य करती नर्तकि‍यों में आसक्‍त हैं तो वह खि‍न्‍न मन से वापस लौटने लगे। तब पीछे से बुद्ध ने आवाज दी । मुड़कर देखने पर वशि‍ष्‍ठ चकि‍त रह गए कि‍ बुद्ध मुनि‍ आसन लगाकर ध्‍यान मग्‍न हैं , नर्तकि‍यां भी ध्‍यान मग्‍न है आैर वहां पूजन के लि‍ए फूल-पत्‍ति‍यां रखी हुई है।

बुद्ध मुनि‍ ने वशि‍ष्‍ठ मुनि‍ को उपदेश दि‍या कि‍ उत्‍तरवाहि‍नी द्वारि‍का नदी  के पूर्व में सती के उर्ध नयन है, उस स्‍थान पर पंचमुंडी आसन बनाकर तारा मंत्र की तीन लाख बार जाप करे। उसके पश्‍चात मां के दर्शन होंगे। मुनि‍ वशि‍ष्‍ठ ने ऐसा ही कि‍या और उन्‍हें सर्वप्रथम एक उज्‍जवल ज्‍याेति‍ बि‍ंदु के रूप में दर्शन दि‍या और पूछा कि‍, तुम कि‍स रूप में मेरा दर्शन करना चाहते हो। तब वशि‍ष्‍ठ ने कहा कि‍ आप जगत जननी हैं तो मैं आपके जगत-जननी के रूप का ही दर्शन चाहता हूं।  तब मां ने भगवान शि‍व को बालक रूप में अपना स्‍तनपान कराते हुए देवी तारा ने दर्शन दि‍ए। समुद्र मंथन के बाद जब शि‍व ने हलाहल वि‍ष पि‍या था तो इन्‍हीं तारा देवी ने अपना अमृतमय दुग्‍धपान कराया था शि‍व को, जि‍ससे उनके शरीर की जलन पीड़ा शांत हुई थी। असली मां तारा की मूर्ति यही है। अभी जो लोग दर्शन करते हैं वो  एक आवरण है। जि‍से राज भेष कहा जाता है। असली मूर्ति के दर्शन रात और एकदम सुबह कि‍सी कि‍सी को ही होते हैं।

हमलोग दर्शन करने को आतुर थे। बहुत भीड़ थी प्रांगण में। पूजन सामग्री लेकर पहुंचे तो वहां पुजारी से भेंट हुई। उन्‍होंने कहा-सीधी कतार से आना हो तो आइए, मगर बहुत देर लगेगी। और स्‍पेशल दर्शन करना है तो प्रति‍व्‍यक्‍ति‍ 300 लगेंगे। हमारे पास वक्‍त कम था। हमलोग मलूटी के कारण पहले ही देर से पहुंचे थे। सो पैसे देकर ही दर्शन को तैयार हो गए। वैसे भी मां-पापा साथ थे और घंटों कतार में खड़े रहना उनसे संभव नहीं था।


अब हम अंदर के रास्‍ते पहुंचे। मुख्‍य द्वार के ठीक सामने मां के चरण युगल थे। वहीं पुजारी ने संकल्‍प करवाया हमसे। बहुत भीड़ थी। मां के पांव पर महि‍लाएं आलता डाल रही थीं। वहां आलता की मात्रा इतनी ज्‍यादा थी कि‍ हम सबे कपड़े रंग गए।



हम मुख्‍य द्वार के सामने थे। लाल पत्‍थरों की नक्‍काशीदार दीवार थी। प्रवेशद्वार के ऊपर शि‍व की मुखाकृति‍ थी जो संभवत: चांदी से बनी थी। हम अंदर प्रवेश कि‍ए। मां की मूर्ति में तीन आंखे और सि‍ंदुर से सना मुंह है। यहां मां तारा का प्रसाद मि‍लता है, जि‍समें उनको स्‍नान कराए जाने वाला पानी, सि‍ंदुर और शराब मि‍ली होती है। भगवान शि‍व का प्रसाद मानकर तांत्रि‍क और साधु शराब पीते हैं। यहां प्रसाद चढ़ाया भी जाता है।



मां की प्रति‍मा को सामने से घेरा हुआ है। हमलोगों ने दर्शन कि‍या और जरा उचककर मां के चरण छुए फि‍र बाहर आ गए। आर्शीवाद स्‍वरूप हमारे माथे पर ति‍लक लगाया पुजारी ने। बाहर आकर देखा, मंदि‍र में संगमरमर और मार्बल का काम है। छत ढलानदार है, जि‍से ढोलाचा कहते हैं। मैंने ऐसे घर भी देख मलूटी में। हालांकि‍ वो मि‍ट्टी के बने थे और मंदि‍र संगमरमर का है।

 हमने पुजारी से कहा कि‍ आपने बताया नहीं कि‍ मां को आलता अर्पित करना होता है तो हम भी लेकर आते। तो उन्‍होंने बोला कि‍ यहां तो ऐसे ही लोग कर लेते है। असली चरण तो महाश्‍मशान में हैं, जहां जाकर आप मां को आलता और सि‍ंदुर अर्पित करें। हमें श्‍मशान तो जाना ही था। महाशमशान में वि‍द्यमान देवी मां के चरण चि‍न्‍ह, जि‍से पाद पद्म कहा जाता है।

मां के चरण वंदना के पीछे की कहानी कुछ ऐसी है। वशि‍ष्‍ठ मुनि‍ के आराधना के समय देवी मां अक्‍सर अदृश्‍य होकर नृत्‍य करती थीं, जि‍ससे वशि‍ष्‍ठ मुनि‍ साधना के वक्‍त भ्रमि‍त हो जाते थे। एक बार उन्‍होंने संदेह हटाने के लि‍ए  सोचा कि‍ इस स्‍थान में कोई शक्‍ति‍ है और वो मेरी परीक्षा के लि‍ए यह नृत्‍य करती है तो वो पैर शि‍ला के रूप में परि‍णत हो जाए। नृत्‍य करती देवी मां के पैर शि‍ला में बदल गए जो आज भी इस महाशमशान पर बामाखेपा समाधि‍ मंदि‍र के दाहि‍नी ओर वि‍राजमान है।



अब हम बाहर घूमने लगे। मंदि‍र के ठीक सामने एक सरोवर था। पता चला कि‍ यह पुरातन पोखर है जो 'जीवंतो पुखुर' अर्थात जीवंत पोखर कहलाता है। दंत कथा है कि‍  लगभग 400 वर्ष पूर्व देवी तारा के इस पीठ स्‍थल की पहचान जयदत्‍त नामक एक वणि‍क ने की थी। वह अपने पुत्र और साथि‍यों के साथ द्वारि‍का नदी के रास्‍ते लौट रहा था और उन्‍होंने वहीं पड़ाव डाला, जहां मां तारा नि‍वास करती थीं। वहां कि‍सी कारण्‍ावश उसके बेटे की मौत हो गई। वणि‍क के सहयोगी जब खाना बनाने के लि‍ए मछली मारी और उसे धोने के लि‍ए इस पोखर में डाला तो वो मछली जीवि‍त हो गई। तब उस व्‍यपारी ने अपने बेटे को उसी पोखर के पानी में स्‍नान कराया और वह जीवि‍त हो गया। इसलि‍ए इस पोखर का जल बहुत पवि‍त्र मान जाता है और कई भक्‍त पूजा से पहले यहां स्‍नान करते हैं।


आगे की कथा ऐसी है कि‍ उस रात वणि‍क और उसके साथी सब सो गए। जयदत्‍त को रात स्‍वप्‍न  में मां का आदेश प्राप्‍त हुआ और सुबह सेमल वृक्ष के नीचे जयदत्‍त ने शक्‍ति‍ साधना की। अंतत: तारा देवी ने दर्शन दि‍या और मि‍ट्टी में दबे हुए शि‍ला प्रति‍मा से अवगत कराया। तब जय दत्‍त ने ऐ छोटे से मंदि‍र का नि‍र्माण कर मूर्ति स्‍थापि‍त करवाई और पूजन के लि‍ए ब्राह्मण नि‍युक्‍त कर दिए।  उस वक्‍त बाढ़ का पानी मंदि‍र में आ जाता था। धीरे-धीरे कालांतर में वहां भक्‍तों का आना कम हो गया और सुनसान रहने लगा। वहां तंत्र साधक या श्‍मशान सन्‍यासी ही जाने लगे।

इसके बाद लगभग 150 साल पहले मल्‍लारपुर के जमींदार जगन्‍नाथ राॅय स्‍पप्‍न में मां का आदेश पाकर मंदि‍र का नि‍र्माण करवाया। कि‍वंदि‍ती है कि‍ इस मंदि‍र के लि‍ए जगन्‍नाथ राॅय को 9 स्‍वर्ण मुद्राओं से भरे कलश मि‍ले थे, शमशान के बेल पेड़ के नीचे, जहां मां ने बताया था। जि‍ससे नए मंदि‍र का  नि‍र्माण 1812 में शुरू कि‍या गया जो 1896 में संपूर्ण हुआ। वर्तमान में स्‍थापि‍त तारापीठ मंदि‍र वही है जि‍से मल्‍लारपुर के जमींदार ने बनवाया था।

अब हम पूरे मंदि‍र की परि‍क्रमा के पश्‍चात श्‍मशान के रास्‍ते में थे। वहां भी पूरी भीड़ थी। जगह-जगह लोग बैठे थे और साधु संत नजर आ रहे थे। दाहि‍नी ओर दो छोटे-छोटे मंदि‍र बने थे। एक में मां के पाद पद्म  है जहां हमलोगों ने आलता व सि‍ंदुर अर्पित कि‍या। वहां वध-स्‍थल भी है और वामखेपा का मंदि‍र भी। एक पीपल का पेड़ है जहां मौली धागा बांधे हुए हैं। शायद मनाैती मानकर ये धागा बांधा गया था।


मां तारा के परम भक्‍त के उल्‍लेख के बि‍ना मां की बात पूरी नहीं कही जा सकती। अपनी साधना से वामदेव ने परम सि‍द्धि‍ प्राप्‍त की थी। कहते हैं कि‍ मां तारा की साधना में वामदेव इतने वि‍ह्रवल हो जाते थे कि‍ अपनी सुध-बुध खो बैठते थे। जि‍स कारण लोग इन्‍हें 'खेपा' अर्थात पागल कहकर संबोधि‍त करते थे। कहते हैं मां तारा उन्‍हें दर्शन दि‍या करती थी।


 हम दर्शन के बाद  श्‍मशान के और अंदर की तरफ गए। लोग कहते हैं यहां महाश्‍मशान की चि‍ता कभी नहीं बुझती। यह द्वारका नदी से घि‍रा हुआ है और भारत की एकमात्र नदी है जो दक्षि‍ण से उत्‍तर दि‍शा की ओर बहती है। पूरे रास्‍ते तांत्रि‍क और साधुओं का जमावड़ा दि‍खा। वो अपने-अपने आसन पर वि‍राजमान थे। अागे एक चि‍ता जल रही थी। मैंने पहली बार कोई चि‍ता जलती देखी। अभि‍रूप भी मेरे साथ खड़ा होकर देखता रहा। मगर चि‍ता ऐसी सजाई गई थी कि‍ लाश का आधा शरीर बाहर ही था।


बहुत कथाएं सुनी हैंं तंत्र-मंत्र की। ऐसा माना जाता है कि‍ तारापीठ महाश्‍मशान में पंचमूंडी के आसन पर एकाग्र मन से मां तारा का 3 लाख बार जाप करने से कि‍सी भी साधक को सि‍द्धि‍ प्राप्‍त हो सकती है। खैर... शाम ढल चुकी थी। हम दर्शन को आए थे। मां के दर्शन कि‍ए और फि‍र आने की कामना के साथ लौट चले देवघर।


Friday, April 7, 2017

मलूटी के मंदि‍र : झारखंड का आलौकि‍क गांव




देवघर से तारापीठ जा रही थी। जब दुमका से आगे गई तो रास्‍ते में माईलस्‍टोन पर लि‍खा मि‍ला कि‍ मलूटी 55 कि‍लोमीटर। अब ये कैसे हो सकता था कि‍ उस रास्‍ते से गुजरूं और उस गांव में न जाऊं जि‍सके बारे में इतना सुन रखा है कि‍ मंदि‍रों का गांव है यह। मेरी उत्‍सुकता चरम पर और नजरें सड़क के दि‍शा-नि‍र्देश पर।




तारापीठ जाने से पहले ही है मलूटी गांव। इसे गुप्‍तकाशी मलूटी भी कहा जाता है। झारखंड की उपराजधानी दुमका से इसकी दूरी 60-70 कि‍लोमीटर है। शि‍कारीपाड़ा के पास है यह गांव। रास्‍ता बहुत अच्‍छा है। आप आराम से सड़क मार्ग से जा सकते हैं। मुख्‍य सड़क से  दाहि‍नी ओर एक रास्‍ता नि‍कलता है। करीब छह कि‍लाेमीटर की दूरी पर है गांव। हम जैसे गांव पहुंचे, कुछ स्‍कूली लड़कि‍यां साइकि‍ल से नि‍कलती मि‍लीं। हमने मंदि‍र के बारे में पूछा तो उन्‍होंने बांयी तरफ गांव के अंदर जाने का इशारा कि‍या। मैंने जरा असमंजस से देखा क्‍योंकि‍ सड़क से पता नहीं लग रहा था कुछ भी। यह गांव झारखंड बंगाल की सीमा पर है, यहां की भाषा भी बंगाली मि‍श्रि‍त हि‍ंदी है। उधर दाहि‍नी तरफ भी एक मंदि‍र दि‍ख रहा था। हमने सोचा कि‍ पहले वह मंदि‍र ही देख लि‍या जाए।



मां मौलीक्षा देवी का मंदि‍र था वो। दोपहर का दूसरा पहर था, इसलि‍ए सब तरफ शांति‍ थी। सामने दो-तीन दुकान थे पूजन सामग्री के। सोचा जब आए हैं तो दर्शन कर लि‍या जाए। परि‍सर में पांव रखते ही अद्भुत शांति‍ का अनुभव हुआ। सफ़र की थकान जैसे मंद हवा में उतर गई। पुजारी बैठे थे अंदर। दरवाजे का आधा पट खुला था। हमे आया देख पुजारी ने पूरा पट खोला। लाल चेहरे, वि‍शाल नेत्र वाली मां का भव्‍य चेहरा। हम नतमस्‍तक हुए।
जब बाहर आए तो पता लगा कि‍ मौलीक्षा देवी को मां तारा की बड़ी बहन कहा जाता है। यह सि‍द्धपीठ है।यह मंदि‍र बंगाल शैली के स्‍थापत्‍य कला का श्रेष्‍ठ नमूना है। मां की पूजा देवी दुर्गा की सि‍ंहवाहि‍नी के रूप में की जाती है।



ब हम सड़क से दूसरी ओर गांव की ओर गए। पहला मोड़ मुडते ही देख कर जैसे पागल हो गए। मंदि‍रों की एक के बाद एक कतार हो जैसे। सड़क के दोनों तरफ मंदि‍र। मलूटीगांव स्थित मंदिर प्राचीन स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है। मंदिरों में टेराकोटा (पकाई गयी मिट्टी से बनाई गयी कलाकृति) इसकी खूबसूरती में चार चांद लगाता है।  चाला रीति से तैयार किया गया है।

मलूटी के मंदि‍रों में कि‍सी स्‍थापत्‍य शैली का अनुकरण नहीं कि‍या गया है। पूर्वोतर भारत में प्रचलि‍त लगभग सभी प्रकार की शैलि‍यों का नमूना दि‍खा हमें। मलूटी में लगातार सौ वर्षें तक मंदि‍र बनाए गए। शुरू में यहां सब मि‍लाकर 108 मंदि‍र थे जो अब घटकर 65 रह गए हैं। इनकी ऊंचाई कम से कम 15 फुट तथा अधि‍कतम 60 फुट है। मलूटी के अधिकांश मंदिरों के सामने के भाग के ऊपरी हिस्से में संस्कृत या प्राकृत भाषा में प्रतिष्ठाता का नाम व स्थापना तिथि अंकित है। इससे पता चलता है कि इन मंदिरों की निर्माण अवधि वर्ष 1720 से 1845 के भीतर रही है। हर जगह करीब 20-20 मंदिरों का समूह है। हर समूह के मंदिरों की अपनी ही शैली और सजावट है




शि‍खर मंदि‍र, समतल छतदार मंदि‍र, रेखा मंदि‍र यानी उड़ीसा शैली और रास मंच या मंच शैली के मंदि‍र दि‍खे हमें। ज्‍यादातर मंदि‍रों में शि‍वलि‍ंग स्‍थापि‍त थे। मंदि‍र में प्रवेश करने के लि‍ए छोटे-छोटे दरवाजे बने हुए हैं। सभी मंदि‍रों के सामने के भाग में नक्‍काशी की गई है। वि‍भि‍न्‍न देवी-देवता के चि‍त्र और रामायण के दृश्‍य बने हुए थे। 







मलूटी में पहला मंदिर 1720 ई में वहां के जमीनदार राखड़चंद्र राय के द्वारा बनाया गया था। राजा बाज बसंत के परम भक्‍त राजा  राखड़चंद्र राय तंत्र साधना में वि‍श्‍वास रखते थे। वह मां तारा की पूजा के लि‍ए नि‍यमि‍त रूप से तारापीठ जाते थे। मलूटी से तारापीठ की दूरी महज 15 कि‍लोमीटर है। बाद में मलूटी ननकर राज्‍य के राजा बाज बसंत के वंशजों ने इन मंदि‍रों का नि‍र्माण करवाया। ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार, गौड़ राज्य के बादशाह अलाउद्दीन हुसैन शाह (1493-1519) द्वारा दी गई जमीन पर मलूटी 'कर मुक्त राज्य' की स्थापना हुई थी। 

हम मंदि‍र देखते गांव घूमने लगे। झारखंड के अन्‍य गांवों की तरह ही लगा गांव। मुझे मि‍ट्टी के दोमंजि‍ले मकान ने बड़ा आकर्षित कि‍या। कच्‍ची दीवारें, फूस की छत। पतली गलि‍यां। गोबर का गोईठां बनाकर दोनों तरफ की दीवारों पर सूखने डाला हुआ था। लोग नजर नहीं आ रहे थे। शायद गर्मी हो चली थी इसलि‍ए।  




आगे हमें कई और मंदि‍र मि‍ले। एक मंदि‍र के अंदर खूब बड़ा शि‍वलि‍ंग था जि‍स पर फूल चढ़ाया हुआ था। इससे पता लगता है कि‍ वहां रोज पूजा होती है। और भी कई मंदि‍र थे जि‍न पर पूजन के चि‍न्ह मि‍ले। कई मंदि‍र खाली भी थे। हम देखते हुए चले जा रहे थे। तभी कई मंदि‍र दि‍खे जि‍नका जीर्णोधार का कार्य चल रहा था। अच्‍छा लगा जानकर कि‍ ऐति‍हासक वि‍रासत की साज-संभाल हो रही है। मजदूर काम कर रहे थे। कुछ ऐसे मंदि‍र दि‍खे जो नए बने लगे। वहां हमें एक सज्‍जन मि‍ले सुकृतो चटर्जी। हमने उनसे बात की । उन्‍होंने बताया कि‍  राज्‍य सरकार ने इस स्‍थल को पर्यटन स्‍थल के रूप में वि‍कसि‍त करने के लि‍ए साढ़े तेरह करोड़ दि‍ए हैं।  2015 के गणतंत्र दिवस समारोह में राज्य सरकार द्वारा दिल्ली में इसकी झांकी प्रस्तुत की गयी थी। झांकी को पुरस्कृत किए जाने के बाद यह गांव पर्यटन मानचित्र पर आया।






मगर मंदि‍रों का रूप-रंग बि‍ल्‍कुल बदला हुआ लगा। जो पुरानी पहचान है, जो मौलि‍कता है वो खो गई। टेराकोटा कला का अस्‍ति‍त्‍व मि‍टा हुआ था।  बि‍ल्‍कुल नया सा लगा और आर्कषणहीन। मैंने कहा कि‍ इस तरह मौलि‍कता समाप्‍त कर संरक्षण करने का क्‍या फायदा। बि‍ल्‍कुल नए मंदि‍रों सा दि‍ख रहा। तो उन्‍होंने कहा कि‍ नहीं, ये मंदि‍र ऐसा ही था। सत्‍यता मुझे नहीं पता और बहुत वक्‍त भी नहीं था, कि‍ और पता करती। 



मैं और आगे की ओर गई। चटर्जी महाशय ने ही बताया कि‍ आगे तालाब के पास महायोगी बामाखेपा का घर है। जि‍स घर में वामाखेपा रहते थे उस मकान के आंगन के ऐ छोटे से मंदि‍र के भीतर उनका अपना त्रि‍शुल एवं शंख सुरक्षि‍त रखा है। कहते हैं  मां आनंदमयी को भी मां तारा की ओर से स्‍वपन में मलूटी आने का नि‍र्देश मि‍ला था। 

मगर वामाखेपा के अावास तक नहीं जा पाए। हमें देर हो रही थी। तारापीठ दर्शन कर लौटना भी था उसी दि‍न। मगर इतना जरूर कहूंगी कि‍ यह अद्भुत स्‍थान है। इसे पर्यटन क्षेत्र के रूप में वि‍कसि‍त हो जाए तो यह झारखंड को अलग पहचान देगी। यह पूरा गांव है अभी। यहां रहने की कोई व्‍यवस्‍था नहीं। रूकना हो तो आगे तारापीठ में कई होटल हैं या आप दुमका या रामपुर में रूक सकते हैं। वैसे देवघर से यहां तक सड़क मार्ग बहुत बढ़ि‍या है।  'रामपुर हाट' मलूटी गाँव का निकटतम रेलवे स्टेशन है। यहाँ तक दुमका-रामपुर सड़क पर 'सूरी चुआ' नामक स्थान पर बस से उतर कर उत्तर की ओर 6  किलोमीटर की दूरी तय कर पहुंचा जा सकता है।





Thursday, March 30, 2017

''सरहुल'' की बधाई






'' एला रे सारजम बा
एला रे हाड़ा गुन में
एला रे खुडा़ सांगि‍न 
एला रे नसो रेन में ''
..................................
'' आओ सखुआ के फूल
आओ उतर आओ
आाओ नई-नई कोंपले
आओ उतर आओ ''

प्रकृति‍ पर्व ''सरहुल'' की बधाई सभी को । दो पंक्‍ति‍यां पहले मुंडारी में, फि‍र उसका हि‍ंदी अनुवाद पढ़ें।

Wednesday, March 29, 2017

बहती पुरवाई सी चैताली




राह भूले तो नहीं न ....ये दि‍न वही हैं चैत के ।  कुसुम के लाल-लाल नाजुक पत्‍तों और पलाश से दग्‍ध जंगल सा दग्‍ध हृदय लि‍ए मैं बैठी थी हल्‍की फुहार की आस में।  

आज बार-बार याद आ रहे तुम। ऐसा नहीं कि सिर्फ़ आज की बात हो। तुम रोज याद आते हो....मगर इस चैत माह में कुछ ज्यादा। इसलिए कि ये ही वो दिन था जब मेरी तलाश खत्म हुई थी...तुम मिले थे मुझे, इस अनकहे वायदे के साथ कि साथ कभी न छोड़ोगे। डगर चाहे जो भी हो...रास्ता लंबा हो चाहे जितना, धूप कड़ी हो या कि हो बारिश।
इसलिए इस दिन को बहुत खास मानती हूँ मैं....इस लंबे रास्ते को देखकर दुःख नहीं होता, खुश होती हूँ.... कि तुम साथ हो....पलाश से दग्ध जंगल और जीवन में भी। 

यूं भी तुम मुझे चैताली ही कहते हो....बहती पुरवाई सी चैताली .....और तुम .....मेरे पसंद के वो जंगली फूल हो जि‍सका नाम नहीं पता मुझको .....बस सुवासि‍त हूं ....

Tuesday, March 28, 2017

पलामू कि‍ले का भग्‍नावशेष


रांची से हमलोग 24 मार्च को मेदि‍नीनगर गए थे एक कार्यक्रम में भाग लेने के लि‍ए। सुबह जब वापसी होने लगी  25 को तो दस बज गए थे। धूप तेज थी मगर सोचा कि‍ राजा मेदि‍नी का कि‍ला देख ही लि‍या जाए। पूरे रास्‍ते पलाश के जंगल की खूबसूरती देख मंत्रमुग्‍ध होते आए थे। जंगल दहक रहा हो जैसे।  सुना था पलामू के कि‍ले के लि‍ए कि‍ अब खंडहर ही बच गया है। तय हुआ मीनारें न सही दीवारें तो कुछ बयां करेंगी।

बेतला जाने के रास्‍ते में है पलामू कि‍ला। मेदि‍नीनगर से दस कि‍लोमीटर की दूरी पर बेतला जाने के रास्‍ते में । यानी डाल्‍टनगंज से 20 मील दक्षि‍ण-पूर्व पर स्‍थि‍त है। कच्‍चे रास्‍ते पर हि‍चकोले खाते हम चल दि‍ए। रास्‍ता बन रहा है अभी। शायद कुछ दि‍नों बाद काेलतार की सड़क मि‍ले हमें वहां।



बता दें कि‍ पलामू के राजा मेदि‍नी राय जनता के प्रि‍य राजा थे। उन्‍हीं के नाम पर जनता की पुरजोर मांग के बाद डाल्‍टेनगंज का नाम बदलकर मेदि‍नीनगर कि‍या गया है। कर्नल डाल्‍टन जो ब्रि‍टि‍श राज्‍य में छोटानागपुर के पहले कमि‍श्‍नर थे, उन्‍हीं के नाम पर यहां का नाम डाल्‍टनगंज पड़ा। उस वक्‍त डाल्‍टेनगंज 'बि‍जरा' बाग के नाम से प्रसि‍द्ध् थ्‍ाा। ऊंची पहाड़ि‍यों के बीच पलामू कि‍ला औरंगा नदी के कि‍नारे बसा है। मगर अफसोस कि‍ हमें औरंगा नदी मार्च के महीने में भी सूखा मि‍ला। अनुमान लग गया कि‍ गर्मी में कि‍तनी त्राहि‍ मचती होगी यहां।


रास्‍ते में हमें दूर ऊंची पहाड़ी पर एक कि‍ला नजर आया। रास्‍ता समझ नहीं आ रहा था। थोड़ी दूर आगे बढ़ने पर एक वि‍शाल कि‍ले का बाहरी हि‍स्‍सा दि‍खा । सब तरफ झाड-झंखाड़ उग आए हैं। बहुत हद तक दीवारें ढकी हुई हैं इनसे। मगर खंडहर देख कर भी कभी कि‍तना जीवंत रहा होगा इसका अहसास होता है। 400 वर्ष पुरानी वि‍रासत है पलामू की। उपेक्षि‍त मगर दर्शनीय। अगर अन्‍य राज्‍यों की तरह इस वि‍रासत की साज-संभाल हो तो हम अपने अतीत को संजो पाएंगे। पलामू के प्रसि‍द्ध चेरो राजा मेदि‍नी राय ने इस कि‍ले का नि‍र्माण कराया था। अंदर की तरफ एक कुआं हुआ करता था, ये सुना था मगर अब वो भर गया है। कि‍ले की बनावट भव्‍य और नक्‍काशीदार है। नि‍र्माण कला मुगलकालीन लगती है। जगह-जगह गुंबद भी बनाए गए हैं। दूर कई कमरे नजर आ रहे थे। अनुमान है कि‍ यह सैनि‍कों का नि‍वास स्‍थान होगा। मगर यह कि‍ला अधूरा बना हुआ है।



कि‍ले के मुख्‍य द्वार के सामने कुछ अवशेष थे जो हमें आभास देते थे कि‍ यह सुरंग रहा होगा। भग्‍न ऊंची दीवारें और ऊपर मीनारें। जरा अंदर जाने पर वि‍शाल दरवाजा जो अपनी भव्‍यता आ आभास दे रहा था हमें। प्रधान फाटक नागपुरी फाटक के नाम से जाना जाता है। अंदर उग आए झाड़ और पेड़ों के बीच वाच टावर जैसी मीनार मि‍ली।पूरा कि‍ला पत्‍थर और कंक्रीट से बना लगा।  टूट-फूट के बावजूद देखने लायक जगह लगी हमें। हम जि‍स कि‍ले में थे वो नया कि‍ला था। पुराना कि‍ला पहाड़ी पर था, वहां जाना संभव नहीं था हमारे लि‍ए। कुछ वक्‍त की कमी और कोई बताने के लि‍ए भी नहीं था। बहुत सुनसान क्षेत्र । लगा कि‍सी जानकार को लेकर आना चाहि‍ए था।





हमें और अंदर तक जाने का मन था। दूर कि‍ला दि‍ख रहा था मगर रास्‍ता नहीं समझ आया। पता लगा कि‍ ऊपर से ऊपर औरंगा नदी तक जाने के लि‍ए एक अधूरा पुल है वहां। इति‍हास से पता चलता है कि‍ले के नि‍र्माण के समय ही राजा मेदि‍नी की मृत्‍यु हो गई, इसलि‍ए यह अधूरा ही रहा। अगर अधूरा कि‍ला का अवषेश इतना भव्‍य है तो पूरा बनने के बाद क्‍या होता।  हम मन में इस कचोट को साथ लि‍ए बाहर आए कि‍ काश, इसका जीर्णोधार हो पाता। हम पुराने कि‍ले तक जा पाते तो कि‍तना अच्‍छा होता। पलामू कि‍ला एेति‍हासि‍क है और इससे पहले कि‍ पूरी तरह ढह जाए, इस वि‍रासत की साज संभाल कर लेनी चाहि‍ए।


Monday, March 20, 2017

साथी थी गौरैया...


कभी आँगन में फ़ुदकती
कभी
खाट के पायों पर आकर
बैठती थी गौरैया

धान के बोरे में चोंच घुसाने को
दरवाजे की फांक से अन्दर
फ़ुदक कर
अक्सर आ जाती थी गौरैया

नहीं डरती थी वो ज़रा भी
बिल्कुल पास चली आती थी
इधऱ-उधर बिखरे दानों को चुग
चीं-चीं कर उड़ जाती थी गौरैया

छत पर सूखने को माँ रखती थी
भर- भर सूप चावल
छतरी की तरह ढांप कर
ढेरों चावल खा जाती थी गौरैया

जब कभी बरखा में भीग
आती थी, देखकर भी मुझको
बड़े आराम से फ़ड़फ़ड़ा कर पंख
ख़ुद को सूखती थी गौरैया

हाँ, मेरे बचपन की
साथी थी गौरैया
कभी मेरे घर आँगन में
खूब आती थी गौरैया

Saturday, March 18, 2017

दौड़ती-भागती जि‍ंदगी


पढ़ी हुई क़ि‍ताब का
तुम वो सफ़ा हो
जो बेहद पसंद है मुझे
मगर मैं बार-बार पढ़ना नहीं चाहती
इसलि‍ए बंद रखती हूं
यादों की वो कि‍ताब
जि‍ससे तुम्‍हारी रुपहली मुस्‍कान
झांका करती है गाहे-बगाहे
और तुम
अरसे बाद बीच-बीच में
बाहें पसारे चले आते हो
जैसे मेरी खाति‍र
वक्‍त को थाम रखा है
जि‍ंदगी दौड़ती-भागती फि‍र रही है
कुछ लम्‍हों को
ऐसी शाख पर रख छोड़ा है
जो पतझड़ में भी मुरझाती नहीं....। 

Friday, March 17, 2017

शांत खामोश शाम...


मन खाली है
उदास नहीं
मेरे आसपास पसरी है
कॉफी की गंध
इसके सहारे दूर करना चाहती हूं नीरसता
न खोया है कुछ न पाया है
बस एक शांत खामोश शाम है यह
कॉफी की खुश्‍बू और कोयल की अनवरत
कूहु के अलावा
कुछ भी नहीं पास है
और सबसे अजीब बात
कि‍ कि‍सी चीज की चाह नहीं.....।