Monday, March 2, 2020

शिव को प्रिय है चम्पा...




शिव को प्रिय है चम्पा...मगर नारद के श्राप के कारण उन्हें अर्पित नहीं किया जाता ...


किवंदती है कि एक बार नारद को पता चला कि एक ब्राह्मण ने अपनी बुरी इच्छाओं की पूर्ति के लिए चम्पा के फूल तोड़े हैं। उन्होंने जब चम्पा के वृक्ष से पूछा कि क्या किसी ने उसके पुष्पों को तोड़ा है, तो चम्पा के वृक्ष ने इनकार कर दिया।

इसके पश्चात् नारद मुनि ने पास के शिव मंदिर में पाया कि शिवलिंग चम्पा के फूलों से ढका है।

वह ब्राह्मण शिव पूजा करके शक्तिशाली राजा बनकर अत्याचार करने लगा। नारद को क्रोध आया कि भगवान ने ऐसे पापी की इच्छा क्यूँ पूर्ण की।

शिव जी से पूछने पर उन्होंने कहा कि जो भी व्यक्ति चम्पा के फूलों से मेरी पूजा करता है, मैं उसकी मनोकामना पूर्ण करता हूँ।तब नारद जी ने चम्पा के वृक्ष को श्राप दिया कि अब कभी भी भगवान शिव अपने पूजन में चम्पा के फूल स्वीकार नहीं करेंगे क्योंकि वृक्ष ने उन्हें झूठ बोलकर गुमराह किया है।
तब से चम्पा का फूल शिव को अर्पित नाहीं किया जाता।

Friday, February 28, 2020

मन चुनता है....


धूप सुहाती है तन को
सन्नाटे में कोई गुनगुन करता है
बिखरी पड़ी स्मृतियों को
झरे पत्तों की तरह मन चुनता है

Tuesday, February 11, 2020

बुझ रही है शाम ...


बेहद सर्द और उदास है शाम आज
दूर तक है नहीं कोई पास आज
किसका रास्ता देखूँ, कौन आएगा
यादों में उसकी बुझ रही है शाम आज

Sunday, February 9, 2020

चला गया होगा ....

क्यों उदास रहते हो सर्दियों की शामों में
जाने वाला दूर, बहुत दूर चला गया होगा ....




Monday, January 27, 2020

स्त्री नदी होती है ......


वो अलगनी से सूखे कपड़े उतार कर ढेर लगाती जा रही थी...अपनी ही सोच में गुम। वो चुपचाप कपड़ों की तह लगा रहा था। जाने कौन सी व्यथा मथ रही थी अंदर-अंदर कि निढाल सी वहीं बैठ गयी। कुछ देर में पाया कि लड़के ने उसकी हथेली के ऊपरी पोरों को अपने हाथों से पकड़ रखा है। ऊँगलियाँ-ऊँगलियों को थामे है ठीक वैसे, जैसे कोई अजनबी आत्मीयता तो दिखाता है मगर इतनी दूरी बरतता है कि हथेलियों का दबाव बस इतना हो कि अपनापन तो लगे मगर अधिकार का अहसास न कराए।

उस स्पर्श में कुछ ऐसा था कि लगा ढहती दीवार को सहारा देकर गिरने से बचाने की कोशिश है।लड़की देखना चाहती थी कि उसके चेहरे पर क्या लिखा है, मगर आँख उठाने की हिम्मत नहीं हुई। कुछ देर बाद मुड़कर देखा, पीछे तहाये गए रंग-बिरंगे कपड़ों का जैसे बाज़ार लगा हो।

दोनों साथ निकलने को क़दम बढ़ाते हैं। लड़की भावना से भरी ज़रा सा क़रीब जाकर सट जाती है, जैसे यह बोध कराना हो कि तुम्हारे होने का अहसास है मुझको। तभी नज़र पड़ती है लड़के के चेहरे पर....ये तो वो नहीं है।कब बदल गया सब कुछ?
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कोई अचानक चला जाता है और उस रिक्त स्थान को हम ख़ाली नहीं मानते। यादों में जीते-मरते हैं रोज़....मगर कोई बहुत आहिस्ते से उस जगह को भर देता है ...और इसका पता बहुत देर में चलता है।
प्रेम फ़ीनिक्स है...
***
स्त्री नदी होती है ......

Tuesday, January 21, 2020

बाँहें ....


ये डालियाँ नहीं
बाँहें हैं,
जिन्होंने थाम रखा है सूरज को
कि, ना जाओ
अभी उजाले की और ज़रूरत है हमें...

Thursday, January 16, 2020

शाम आज ...



बेहद सर्द और उदास है शाम आज 
दूर तक नहीं है कोई पास आज
कि‍सका रस्‍ता देखूं, कौन आएगा 
यादों में उसकी बुझ रही है शाम आज 

Sunday, December 29, 2019

पानी और पत्‍थरों की जुगलबंदी का नाम है हुंडरू.....


झरनों की बात जब होती है, तो हम गर्व से कहते हैं कि‍ झारखंड झरनों का प्रदेश है। यहां छोटे-बड़े इतने झरने हैं, और इतने खूबसूरत, कि‍ बेहद नामचीन फॉल भी इसके आगे पानी भरते नजर आएंगे। हां, यह जरूर है कि‍ पर्यटन के हि‍साब से जि‍तनी सुवि‍धाएं होनी चाहि‍ए, वह उपलब्‍ध नहीं। मगर आप वाकई प्रकृति‍ प्रेमी हैं और सौंदर्य को उसके प्राकृति‍क रूप में देखना चाहते हैं तो यहां के सभी फॉल घूमने का आनंद लें, खासकर, हुन्‍ड्रू, जोन्‍हा, दशम, लोधा, हि‍रनी, पंचाघाघ, सीता फॉल आदि‍......।

फि‍लहाल आज हुंडरू जलप्रपात के बारे में। इस दि‍संबर की कड़कड़ाती ठंड में हम नि‍कल पड़े हुंडरू फॉल के लि‍ए। बता दूं, कि‍ कई बार जा चुकी हूं मगर हर बार उतना ही आनंद आता है। रांची से हुंडरू फाॅल की दूरी करीबन 35 कि‍लाेमीटर की है। इस बार हमलोग सुबह गेतलसूद के रास्‍ते होते हुए हुंडरू पहुंचे। रांची से ओरमांझी चौक पहुंच कर दाहि‍नी ओर के रास्‍ते सीधे चले जाना है। जब हम हुंडरू पहुंचने को थे तो करीब एक कि‍लोमीटर के पहले से ही अंदाज होने लगा कि‍ कि‍तनी भीड़ होगी। कई-कई बस और गाड़ि‍यां खड़ी थी। पि‍कनि‍क मनाने वालों की खूब भीड़।


गाड़ी जहां जाकर रूकी, वहां आसपास कई दुकानें थी और अंदर जाने के लि‍ए टैक्‍स भी जमा कि‍या जा रहा था। अच्‍छा लगा कि‍ सफाई दि‍ख रही थी चारों तरफ और खाने-पीने के सारे सामान उपलब्‍ध थे। सरकारी रेस्‍टूरेंट भी सामने ही था और बांयी तरफ बच्‍चों के लि‍ए झूले लगे हुए थे। वहीं से जलप्रपात के उस पार जाने के लि‍ए 'जीप लाइन रोप' है, जि‍से राेमांच पसंद करने वाले युवा पार कर रहे थे। हमारी तो हि‍म्‍मत नहीं हुई। पता चला कि‍ हुंडरू पर्यटन स्‍थल में इसी वर्ष यानी 15 अगस्‍त 2019 को झारखंड टूरि‍ज्‍म डेवलपमेंट कारपोरेशन की तरफ से एडवेंचर टूरि‍ज्‍म की शुरूआत की गई है और एडवेंचर पार्क, लोरो कोर्स जि‍प लाइन बनाया गया है। हुंडरू जि‍पलाइन की लंबाई लगभग 200 मीटर है। पर्यटक जलप्रपात के ऊपरी भाग से स्‍वर्णरेखा नदी के उस पार जाकर फॉल की खूबसूरती को करीब से देखते हैं।


हमने कुछ देर वहीं ठहरकर नजारा लि‍या। नीचे पत्‍थरों के बीच-बीच में पानी जमा हुआ था। आसपास लोग कहीं खाना बना रहे थे तो कुछ गप्‍पे लड़ा रहा थे। इतनी भीड़ थी कि‍ वहीं ठि‍ठके रह गए हमलोग। वहीं पास में शि‍वमंदि‍र है। कहा जाता है कि‍ यहां मन्‍नतें पूरी होती हैं। इसलि‍ए गांव वाले शुभ कार्य में यहां जरूर आते हैं। हर वर्ष 15 जनवरी को मकर संक्राति‍ का मेला लगता है और उस दि‍न पशु-बलि‍ भी होती है।

वहां से नीचे जाने के लि‍ए दाहि‍नी तरफ करीब 748 सीढ़ि‍यां है। हम जहां थे, वहीं से स्‍वर्णरेखा नदी का पानी नीचे 320 फीट गि‍रता है और ठहर जाता है तालाब की तरह। इतनी सीढ़ि‍या उतरना और चढना आसान नहीं, इसके लि‍ए वहां लाठी की बि‍क्री भी खूब होती है। यह जलप्रपात हुंडरू नामक गांव में है इसलि‍ए इसका नाम भी हुंडरू फॉल है। कि‍वंदती है कि‍ हुंडरू नाम का एक अंग्रेज नागमणि‍ की तलाश में इस जगह आया था। इस घने जंगल में कई वर्षों तक तलाशने की बाद भी सफलता हाथ नहीं लगी और अल्‍पायु में ही उनकी मौत हो गई। उसकी याद में इस जगह का नाम अंग्रेजों ने हुंडरू रख दि‍या।

जाने इस बात में कि‍तनी सच्‍चाई है मगर यह प्रमाणि‍त है कि‍ स्‍वर्णरेखा, जो झारखंड की प्रमुख नदी है, यह नदी नगड़ी गांव में रानी चुआं से नि‍कलती है जो उत्‍तर-पूर्व की ओर बढ़ती हुई मुख्‍य पठार छोड़कर प्रपात के रूप में हुंडरू में गि‍रती है। रांची रेलवे स्टेशन से 45 किलोमीटर दूर अनगड़ा प्रखंड के उत्तर की ओर हुंडरु जलप्रपात स्थित है । हुंडरू जलप्रपात डेढ़ सौ एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है।



हां तक तो हमने सब देख लि‍या, मगर इतनी भीड़ देखकर यहां रूकने के बजाय नीचे जाना चुना, ताकि‍ जहां पानी के और पास जाया जा सके। हालांकि‍ हमने सुना था कि‍ यहां प्राचीन बाघ की गुफा है, जहां एक वक्‍त में दस हजार से ज्‍यादा लोग अंदर जा सकते हैं। 


मगर अभी हमें पत्‍थर और पानी का संगीत सुनना था। वहां से नि‍कलकर बायीं तरफ से एक रास्‍ता जाता है, यह वहां घूम रहे पर्यटक मि‍त्रों ने बताया। हम साल पेड़ से घि‍रे सर्पीले रास्‍ते से होते हुए नीचे चल पड़े। रास्‍ते में बि‍ल्‍कुल भीड़ नहीं थी। एक बार तो लगा कि‍ कहीं रास्‍ता तो नहीं भटक गए। मगर नहीं...हम सही राह पर थे। सड़क संकरी थी, संभवत: इसलि‍ए यह पर्यटकों की भीड़ से बची हुई है। 


हम सि‍कि‍दि‍री प्रोजेक्‍ट के बि‍ल्‍कुल पास थे। पि‍छले 50 वर्षों से झारखंड राज्‍य को पनबि‍जली मि‍लता आ रहा है यहां से। पि‍छली बार हमने प्रोजेक्‍ट के अंदर जाकर सारी प्रकि‍या से अवगत हुए थे। मगर इस बार बस पानी तक पहुंचना था। 




बामुश्‍कि‍ल बीस सीढ़ि‍यांं चढ़कर हम दूसरी ओर उतर गये। दूर से पता नहीं चल रहा था मगर पि‍कनि‍क मनाने वाले लोगों की भीड़ यहां भी थी। दूर दुग्‍ध झरना और चारों ओर फैलता पानी। जगह-जगह पत्‍थर और उस पर बैठे लोग। हरी-भरी वादि‍यां और धूप के बावजूद ठंड। 

सीढ़ि‍यां खत्‍म होते ही पानी के दोनों ओर लोग नजर आए, खाना बनाते हुए। जलप्रपात तक जाने के लि‍ए हमें हाथ की बनाई लकड़ि‍यों की पुल पार करनी थी। साथ के लोगों के बीच थोड़ी झि‍झक भी थी अपनी सुरक्षा को लेकर। मगर स्‍थानीय लोग जो वहां थे, शायद पर्यटक मि‍त्र भी, उन्‍होंने वि‍श्‍वास दि‍लाया कि‍ आराम से पार कर जाइए, कुछ नहीं होगा। नीचे कलकल बहता पानी और ऊपर लकड़ी का हि‍लता पुल। संभलने के लि‍ए बांस की बल्‍ली भी बांधी गई थी ताकि‍ लड़खड़ाने पर थामा जा सके। हममें रोमांच भी था और खुशी भी।




ऊंचे-नीचे चट्टानों के बीच जहां समतल स्‍थान मि‍ल रहा था, लोग दरी-चटाई बि‍छाकर बैठ रहे थे। हमें भी कुछ दूर जाने पर एक साफ जगह मि‍ली। लकड़ी से बांध कर ऊपर पत्‍ते लगाकर छप्‍पर जैसा बना दि‍या गया था, ताकि‍ तीखी धूप से बचाव हो सके। जमीन बि‍ल्‍कुल साफ-सुथरी। 

अब क्‍या था...हमने चटाई बि‍छाई और खाने-पीने का सामान नि‍काला। दोपहर हो गई थी और हम सबको भूख लग आई थी।  हम खा ही रहे थे कि‍ एक आदमी आया और कहने लगा - 


'' ये हमारी जमीन है। आप यहां दो घंटे बैठो  या दो मि‍नट, आपको दो सौ देने होंगे।''


हमारी दोस्‍त अंजली का पारा इतने में चढ़ गया। '' यह आपकी जमीन कैसे हो गई? आपने नदी खरीद ली या यह जमीन कि‍ इसका भाड़ा वसूल रहे हैं ?'' 


अब वो आदमी मि‍मयाया...'' हम सफाई करते हैं यहां रोज। आपलोग तो सब गंदा कर के चले जाते हैं। यहां पत्‍तल, वहां गि‍लास'' 


बात सच ही कह रहा था वो। हमारे जैसे लोग वहां जाकर जलप्रपात का आनंद तो लेते हैं, मगर गंदा भी करके चले आते हैं। ऊपर तो सफाई की कुछ व्‍यवस्‍था और सरकारी सुवि‍धा कुछ दि‍खी तो थी, मगर यहां ऐसा कुछ भी नजर नहीं आया। बेशक सफाई और लकड़ि‍यों के पुल की व्‍यवस्‍था और यदि‍ कोई दुर्घटना हुई तो सुरक्षा की जि‍म्‍मेदारी भी इन्‍हीं स्‍थानीय नि‍वासि‍यों की है। अखबारों में पर्यटक मि‍त्र बहाल करने की खबर तो आती है मगर दैनि‍क मजूदरी 246 रूपये ही है, ऐसा मुझे जानकारी है। इसके अलावा इनके लि‍ए न कोई चि‍कि‍त्‍सा सुवि‍धा है न बीमा। अब अगर थोड़ा-बहुत यह पर्यटकों से नहीं लेंगे तो जीवि‍का कैसे चलेगी।


हमने उसे आश्‍वास्‍त कि‍या कि‍ उसे सफाई के पैसे दि‍ए बि‍ना हम नहीं जाएंगे, मगर यही बात वो अच्‍छे से कहते तो भी काम चलता। 


हम खाने और कुछ देर सुस्‍ताने के बाद पानी में जाने तो तैयार थे। ऊपर से गि‍रता पानी नदी का रूप लेकर चट्टानों के बीच से बह रहा था। ऊंचे चट्टान पर चढ़ना और उतरना रोमांचक होता है। जलप्रपात के करीब काफी गहरा है, मगर लोग नौके या कहि‍ए डोंगे की सवारी कर नजदीक जाते हैं। वहां पानी के छींटे पड़ने का राेमांच अलग ही होता है। मैं पि‍छली बार गई थी तो नौके से जलप्रपात तक जाकर खूब मजा कि‍या था और तस्‍वीरें भी ली थी। हम जलप्रपात के बि‍ल्‍कुल करीब के पत्‍थरों पर जाकर बैठ गये। हुंडरू जलप्रपात उतना खतरनाक नहीं, इसलि‍ए पर्यटक अक्‍सर नहाते हैं यहां आकर। बरसात में इन फॉल्‍स का सौंदर्य बहुत अधि‍क बढ़ जाता है। पास में गर्मागर्म चाय भी उपलब्‍ध है और प्रोफेशनल फोटोग्राफर भी जो आपकी इस यात्रा को अवि‍स्‍मरणीय बनाने के लि‍ए मौजूद रहते हैं। 

सामने ऊंचाई से कई धाराओं में गि‍रता पानी...कलकल का स्‍वर। पत्‍थर और पानी की जुगलबंदी कानों से होते हुए हृदय तक उतरती है। अनायास पड़ने वाले पानी के छींटे तन के साथ-साथ आत्‍मा को भी वि‍भोर कर देती है। देर तक हमलोग वहीं बैठे रहे। संगीत सुनते, हवाओं से बात करते। 


शाम ढलने से पहले लौटना भी है। इतनी खूबसूरत जगह में भी न रहने की व्‍यवस्‍था है न पीने के पानी की और न ही आवश्‍यक जरूरतों की। क्‍या अच्‍छा होता कि‍ कुछ सुवि‍धाएं सरकार मयस्‍सर करा देती तो पर्यटन के क्षेत्र में झारखंड का बहुत नाम होता। मगर....





फि‍लहाल वापस.....वही लकड़ि‍यों के पुल से होकर। स्‍थानीय कारीगर बांस और लकड़ी को तराशकर फुल, तलवार, चाकू और सुंदर से दि‍ल बनाकर बेचते हैं। कुछ पर्यटक खरीदते हैं तो कुछ देखकर आगे बढ़ जाते हैं। ऊपर चढ़ने के रास्‍ते एक छोटी सी झोपड़ीनुमा दुकान है जहां चि‍प्‍स आदि‍ उपलब्‍ध हैं। कुछ लकड़ी के गट्ठर भी रखे हैं और चारपाई भी। संभवत: यह उनके अपने उपयोग के लि‍ए है क्‍योंकि‍ दाम बताने के लि‍ए कोई मौजूद नहीं।  कुछ बच्‍चि‍यां बोतल में पानी भरकर ला रही थी। जाने खुद के लि‍ए या बेचने के लि‍ए, पूछने की इच्‍छा नहीं हुई।  






सूरज का पीला अक्‍स पानी पर पड़ रहा था। आज बादल भी ऐसे छि‍तराये से थे जैसे खुशी से नाच रहे हों। हमने हुंडरू को अलवि‍दा कहा और वापस रांची की ओर चल पड़े। 

Tuesday, December 24, 2019

बुला रहा गेतलसूद.....


जाते हुए साल को अलवि‍दा कहने का इससे बेहतर तरीका कोई और नहीं हो सकता कि‍ हम उन जगहों पर एक बार फि‍र जाएं, जहां इसलि‍ए नहीं जा पाते क्‍योंकि‍ हर छुट्टि‍यों में कोई नई जगह घूमने का प्‍लान बन जाता है।

हम देश-वि‍देश तो घूम आते हैं मगर अपने शहर और गांवों के रमणीय दृश्‍यों को देखने से टालते रहते हैं। मेरा तो बचपन ही बीता है ओरमांझी गांव में, जहां से कर्क रेखा गुजरती है और एक जू भी है जहां सालों भर पर्यटकों की भीड़ लगी रहती है। वहीं अब जू के दूसरी ओर साल वन के जंगल के बीच ही मछली घर भी खुल गया है, जहां रंग-बि‍रंगी और कई प्रजाति‍ की मछलि‍यां मन मोहती हैं।

इस सबसे अलग, बस गांव से सटा ही है रूक्‍का डैम, जहां पि‍कनि‍क मनाने बचपन में कई बार गई हूं। इसी बांध के दूसरे सि‍रे पर है गेतलसूद बांध । नीले पानी का वि‍स्‍तार और साल के पेड़ की छायाओं से घि‍रा डैम अपने वि‍स्‍तार के कारण समुद्र सा वि‍शाल लगता है। रूक्‍का के इस छोर से नीला पानी और दूसरी तरफ केवल साल के जंगल दि‍खते हैं।


तो इस बार सूरज के लुकाछि‍पी के बीच साल के सबसे छोटे दि‍न, यानी 22 दि‍संबर को हम कुछ दोस्‍त नि‍कल पड़े गेतलसूद डैम का नजारा लेने के लि‍ए। रांची से गेतलसूद डैम की दूरी मुश्‍कि‍ल से 30-35 कि‍लोमीटर की है। दोपहर भी नि‍कले तो शाम लौट सकते हैं।  गेतलसूद बचपन में भी गई हूं कई बार। यह बांध के दूसरे छोर पर है, जो अनगड़ा प्रखंड में आता है।अक्‍सर बारि‍श के दि‍नों में जब पानी खोला जाता है, तो लगता है बाढ़ आ जाएगी। छुटपन में जब इतना हरहराता पानी देखा था, तो डर गई थी।


हमलोग रांची से रि‍ंग रोड होते हुए इरबा के पास नि‍कले और ओरमांझी ब्‍लॉक चौक से सीधे सि‍कि‍दि‍री रोड पर नि‍कल गए। ब्‍लॉक के कुछ आगे ही एक रास्‍ता रूक्‍का के एक छोर की ओर जाता है।अक्‍सर ताजी मछली के ग्राहक इसी रास्‍ते से जाते हैं सुबह और मछुआरों से तुरंत पकड़ी मछलि‍यां लेकर आते हैं। वैसे रूक्‍का जाने वाले घुमक्‍कड़ों के लि‍ए और भी रास्‍ते हैं। चाहें तो इरबा बाजार टांड के बगल से जाइए या फि‍र रांची-हजारीबाग रोड से आने वाले वि‍कास के पास दाहि‍नी ओर सीधे नि‍कल जाएं।

मगर हमें तो आज उस रास्‍ते पर जाना था जो आजकल बाइकर्स गैंग का प्रि‍य और प्री वेडि‍ंग शूट के लि‍ए सबसे मुफीद जगह है। सि‍कि‍दि‍री के पहले ही एक रास्‍ता दाहि‍नी ओर नि‍कलता है, जो गेतलसूद की ओर ओर जाता है। लगभग पांच कि‍लोमीटर लंबी-सीधी सड़क और दोनों तरफ साल के सीधे-ऊंचे पेडों से घि‍रा जंगल।


हम सुबह के ग्‍यारह बजे के आसपास वहां पहुंचे। ऊपर सूरज चमक रहा था मगर धरती पर धूप-छांव थी क्‍योंकेि‍ पेड़ों ने सूर्य की कि‍रनों का रास्‍ता रोक लि‍या था। सूखे पत्‍ते थे और हवाओं का शोर। सड़क पर भीड़ भी नहीं थी। जंगल के बीच हमने ढेर सारे फोटो खि‍ंचवाएं।

सड़क की दूसरी ओर जब हम पहुंचे तो अचानक ढेरों ति‍तलि‍यां उड़ने लगी। हमें लगा कि‍ वर्जित क्षेत्र में हमने पांव धर दि‍या। जाने इनका आरामगाह था या ति‍तलि‍यां धूप सेंकने आई थी। यह जरूर था कि‍ इस तरफ हरे-भरे घास थे और पहले जि‍धर हम सड़क की बांयी ओर उतरे थे, उधर सूखे पत्‍ते थे। एक बांबी भी नजर आया। जाने कि‍सका था, बस तस्‍वीर उतार ली।


कुछ देर जंगल का संगीत सुनकर हम पहुंचे डैम के पास। पुल के ठीक पहले बायीं ओर हरे-भरे खेतों में पीले सरसों खि‍ले थे। कुछ कि‍सान धान की मि‍साई में लगे थे। दूर पानी में मछुआरे अपने नाव खेते खजर आएं। पुल के ठीक ऊपर पहुंचने पर देखा बांयी तरफ कुछ दूरी पर स्‍वर्णरेखा नदी बह रही है। नदी के ऊपर नि‍कले पत्‍थरों पर कुछ चि‍ड़ि‍यां बैठी हैं और दूर एक-दो गाड़ी और बहुत सारे लोग दि‍खे। समझ आ गया कि‍ इतनी सुबह लोग यहां पि‍कनि‍क मनाने वाले ही हो सकते हैं।


स्‍वर्णरेखा नदी पर स्‍थि‍त इस डैम को 1971 में बनाया गया है। यहां मछली पालन भी कि‍या जाता है। अक्‍सर छोटी डोंगी और नाव लेकर आपको मछुआरे दि‍ख जाएंगे पानी में। कई बार इतने बड़े आकार की मछली पकड़ में आती है कि‍ अखबारों में खबर भी छपती है कि‍ 35 कि‍लो की मछली पकड़ाई है। इस डैम को शहर का लाइफ लाइन भी कहा जाता है क्‍योंकि‍ शहर में पानी की सप्‍लाई पहुंचाने में इस बांध की बड़ी भागेदारी है।



पि‍छली बार जब मैं गई थी तो नीचे पानी में पैर डालकर बहुत देर बैठी रही थी। मगर इस बार हमलोगों को आगे हुंडरू फॉल की ओर नि‍कलना था, इसलि‍ए लौटते हुए रूकने की बात कर हम आगे नि‍कल गए। सूरज सर पर चढ़ आया था।  पानी में कि‍रणों का जादू देखना हो तो सुबह के वक्‍त देखि‍ए या ढलती शाम को।

हमलोग हुंडरू फॉल से लौटते हुए फि‍र ठहरे बांध पर। सूरज ने आंख-मि‍चौली शुरू कर दी थी। मछुआरे अब भी नाव में थे। दूर कुहासे में लि‍पटे पहाड़ नजर आ रहे थे। पानी के बीच एक टापू जैसी जगह पर अभी-अभी एक नाव जाकर रूकी है। शायद वहां उन्‍होंने दि‍न भर की पकड़ी मछलि‍यां जमा की होंगी, जि‍से लेने के लि‍ए गए हैं। 
अथाह पानी का वि‍स्‍तार...अचानक सूरज बादलों की ओट से नि‍कल आया। चमचम करने लगी पानी में कि‍रनें...जल्‍दी के कुछ क्‍लि‍क कि‍ए मैंने और दूर आकाश में उड़ते पंछि‍यों में अपने कैमरे के लेंस में लाने की एक नि‍रर्थक कोशि‍श की....। 

ढलते सूरज की लालि‍मा के बीच एक और शाम बि‍ताने का नि‍मंत्रण दि‍या गेतलसूद डैम ने......मैंने स्‍वीकर कि‍या।

गेतलसूद : साल के जंगल में

गेतलसूद : डैम के कि‍नारे 

गेतलसूद : शाम का इंतजार और लापता सूरज 

गेतलसूद : पानी का अथाह वि‍स्‍तार 

गेतलसूद : क्षण भर को दि‍खा सूरज 

Tuesday, December 17, 2019

अदाएँ तुम्हारी.....


बड़ी खूबसूरत अदाएँ तुम्हारी
बदन पर चमकती शुआएँ तुम्हारी!


मेरे तन पे लिपटा दुपट्टा हरा ये
दुपट्टे में उलझी ,दुआएँ तुम्हारी!

मैं तन्हा खड़ी हूँ, किसी ने पुकारा
यूँ हौले से आती सदाएँ तुम्हारी!

हवा आई तेरा ही पैगाम लेकर
मैं आई हूँ लेने बलाएँ तुम्हारी!

रोशन है तन-मन,मेरे संग संग हैं
तुम्हारी मुहब्बत,वफ़ाएँ तुम्हारी!