Monday, March 20, 2017

साथी थी गौरैया...


कभी आँगन में फ़ुदकती
कभी
खाट के पायों पर आकर
बैठती थी गौरैया

धान के बोरे में चोंच घुसाने को
दरवाजे की फांक से अन्दर
फ़ुदक कर
अक्सर आ जाती थी गौरैया

नहीं डरती थी वो ज़रा भी
बिल्कुल पास चली आती थी
इधऱ-उधर बिखरे दानों को चुग
चीं-चीं कर उड़ जाती थी गौरैया

छत पर सूखने को माँ रखती थी
भर- भर सूप चावल
छतरी की तरह ढांप कर
ढेरों चावल खा जाती थी गौरैया

जब कभी बरखा में भीग
आती थी, देखकर भी मुझको
बड़े आराम से फ़ड़फ़ड़ा कर पंख
ख़ुद को सूखती थी गौरैया

हाँ, मेरे बचपन की
साथी थी गौरैया
कभी मेरे घर आँगन में
खूब आती थी गौरैया

Saturday, March 18, 2017

दौड़ती-भागती जि‍ंदगी


पढ़ी हुई क़ि‍ताब का
तुम वो सफ़ा हो
जो बेहद पसंद है मुझे
मगर मैं बार-बार पढ़ना नहीं चाहती
इसलि‍ए बंद रखती हूं
यादों की वो कि‍ताब
जि‍ससे तुम्‍हारी रुपहली मुस्‍कान
झांका करती है गाहे-बगाहे
और तुम
अरसे बाद बीच-बीच में
बाहें पसारे चले आते हो
जैसे मेरी खाति‍र
वक्‍त को थाम रखा है
जि‍ंदगी दौड़ती-भागती फि‍र रही है
कुछ लम्‍हों को
ऐसी शाख पर रख छोड़ा है
जो पतझड़ में भी मुरझाती नहीं....। 

Friday, March 17, 2017

शांत खामोश शाम...


मन खाली है
उदास नहीं
मेरे आसपास पसरी है
कॉफी की गंध
इसके सहारे दूर करना चाहती हूं नीरसता
न खोया है कुछ न पाया है
बस एक शांत खामोश शाम है यह
कॉफी की खुश्‍बू और कोयल की अनवरत
कूहु के अलावा
कुछ भी नहीं पास है
और सबसे अजीब बात
कि‍ कि‍सी चीज की चाह नहीं.....। 

Sunday, March 12, 2017

लालसा की होलिका में....


प्रह्रलाद की तरह
आज
हर इंसान जल रहा है
माया-मोह-लालसा
की होलिका में...
इन्‍हें कि‍सी
हि‍रणकश्‍यप ने
अपने अंहकार के वशीभूत हो
आग में
जलने को वि‍वश
नहीं कि‍या है....
आज के इंसान को
मुक्‍ति‍ नहीं
भोग की 
है कामना 
इसलि‍ए तो लोग
अपने हाथों
लालच की होलि‍का
बनाते हैं
और खुशी-खुशी
जल जाते हैं.....। 

फगुआये गई होरी .....


रक्ताभ कपोल पर
लाल गुलाल
लजाय गई गोरी ।
भीगी चुनरिया
दहका अंचरा
बौराये गई होरी ।

चंदन सा महका
तन भीग भीग बहका
छेड़ती हवाओं से
फगुआये गई होरी ।

रंगों के बहाने है
अंग सब भिगाने हैं
कवन रंगरेज से
रंगाये गई होरी ।

बेसुध बोली बोल के
आगे पीछे डोल के
पिचकारी भर उबै श्याम
ललचाये गई होरी ।

बंसुरिया की तान जी
छेड़ दिए कान जी
बरसाने से निकसी राधे
बुलाये गई होरी ।

बृज की छोरियन को
वृन्दावन की गोरियन को
भँग की ठण्डाई दे
नचाये गई होरी ।

Wednesday, March 8, 2017

''अंतरराष्‍ट्रीय महि‍ला दि‍वस की शुभकामनाएं''

"नारी अग्नि है, तू अवनि है , तू ही आकाश है
ऊष्मा तुझमें, ऊर्जा तुझमें, तू बड़ी ही ख़ास है"


Friday, March 3, 2017

सूनी सी है दोपहर


शांत..सूनी सी है दोपहर 
उजली-चमकती धूप बैठी है पीपल के पत्‍तों पर...न ढलती है शाम
न बीतता है वक्‍त...
लगातार बज रही एक धुन है.... उदासी का राग जाने कौन अलाप रहा है.....

मन भागना चाहता है अतीत की ओर.....और मैं गुजरे वक्‍त की रस्‍सी को जल्‍दी से समेट कर आगे देखना चाहती हूं....
कि जिंदगी इतनी भी बुरी नहीं....ऐसा नहीं कि तुम नहीं तो दुनि‍या नहीं...

फागुन फि‍र से आया है .......रंग अब भी चमकीले हैं पहले की तरह 

तस्‍वीर- रामगढ़ घाटी में थी थी एक दि‍न 

Wednesday, March 1, 2017

सि‍जलि‍ंग ट्री


फि‍र तुमने याद दि‍ला दि‍या वो वक्‍त। पहाड़ से साए में बसा घर जहां धूप और बारि‍श के मेले में चटखती थी बंद कलि‍यां। हवा का हमसे याराना देख पत्‍ति‍यां कसमसा उठती थी दामन को छूकर फना होने को ।

पहाड़ों की अाग को आंखों में भरा था ....बादलों के आगोश में आस्‍मां तक सीढ़ी लगाने की ख्‍वाहि‍श को पीपल के पत्‍ते ने हवा दी थी।

पीछे पहाड़ पर खि‍ला करते थे शि‍रीष के सफ़ेद-पीले फूल और पुटूस के रंगों से फूलों की घाटी सी लगती थी वो वादि‍यां। शाम उतरती थी नारंगी रंग लि‍ए और दोपहर का एकांत पीपल-शि‍रीष के तले सरसराहट से भर उठता था। पीपल के बीजों की 'चकरी' और मंदि‍र का एकांत।

तुम्‍हें बहुत पसंद है न मेरा गांव। उस नीरव एकांत में एकटक तकते रहना कि‍तना पसंदीदा काम का तुम्‍हारा। पहाड़...पेड़ और एक चेहरा।
 उस दि‍न जेठ की दुपहरी सी ही तो थी दोपहर जब नीले गुलमोहर को मेरी ही गली से समेटकर हाथों में भरे अचानक से चौंका गए थे मेरे ऊपर फेंककर।

डर से कांपना मेरा और  शि‍रीष की सूखी फलि‍यों की खड़खड़ाहट एक सी लगी तुमको..... ''सि‍जलि‍ंग ट्री''...बोलो कौन.....

मैं...ना..ना....वो लाल फूलों वाला शि‍रीष। मेरी फ्रॉक भी तो लाल ही थी।

अच्‍छा लगा कि‍ तुम्‍हें याद है अब भी सब.... पीपल की चकरी नहीं चुनती अब मैं...दोपहर बोलती है कानों में आकर.....सि‍जलि‍ंग ट्री.....सि‍जलि‍ंग ट्री।

Tuesday, February 28, 2017

पलाश


सारे जंगल में खि‍ला है पलाश
ये स्‍मरण है तुम्‍हारा ही
बैंजनी आकाश, और
सूखे पत्‍तों में गि‍रा, दहकता पलाश 

Wednesday, February 22, 2017

मोहब्‍बत के अशआर



1. न कहेंगे कभी कि‍ कि‍तनी मोहब्‍बत है आपसे
आपकी बेरूखी ने दि‍खा दि‍या आईना हमें ।।

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2. चूमकर पेशानी एक रात कहा था उसने
जैसी जिंदगी वैसी तू भी अजीज है मुझको
दस्‍तूर-ए-दुनि‍या से नावाकि‍फ़ ए दि‍ल
खाकर हजार ठोकरें अब भी सच समझता है इसे।।

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3.मत पूछ कि‍ तुम बि‍न जीना कि‍तना दुश्‍वार था मेरा
जो साथ जि‍या तो भी क्‍या हासि‍ल हो गया यहां ।।

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4.तेरे कदमों तले रख दि‍या दि‍ल उसने
सोचकर कि‍ कभी तो रहम आएगा 
भूल गया ये बात कि
जमीं पर गि‍रे फूलों को माथे नहीं लगाता कोई।।

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5. सूखी नदी पर कश्‍ति‍यां उतारने वाले
एक बार तो सोचा होता
डूब ही जाते कि‍सी के प्‍यार में तो
कम से कम ज़माना याद करता ।।

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6.उम्र गुजर गई न आया शऊर जीने का
हम खुद को बड़ा ज़हीन समझा करते थे।।

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7. नोच कर फेंक दो फूलों की सारी पंखुडि‍यां
कि‍ अब फूल भी नकली खि‍ला करते हैं
खूबसूरती पर रीझ के न आना भवंरे
कि फूल भी अब खुश्‍बू उधार लि‍या करते हैं।।

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8. कह दो कि खुशि‍यों से कि‍ न आए दर मेरे
मैंने अपने घर का नाम वीराना रखा है।।

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9. समेट कर खुशि‍यां सारी अपने दामन में
चले जाओ अब दूर..बहुत दूर
कि‍ अब दुआओं में नि‍कले लफ्ज सारे
मुझे झूठ की इबा़रत लगते हैं ।।
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10. एक फ़रेब पर टि‍की थी जिंदगी, तोड़ दि‍या उसने
सि‍तम ये है कि‍ आहों पर भी है अब बंदि‍शें तमाम।।
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11. दि‍ल की ज़मीन पर लि‍ख लि‍या है
तेरे इनकार के हरेक लफ्ज को
कि‍ प्रेम के सागर में
एक बूंद नहीं लि‍खी मेरे नाम की।।
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12.न रोना अब न जुंबा खोलना कभी
खुद को खुदा समझने वाले पत्‍थर दि‍ल ही होते हैं ।।
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13. एक भ्रम था, एक आस थी, एक ख्‍वाब था
कभी न कोई मेरे पास था
चले जाओ ऐ दि‍ल अब तुम कि‍सी और जहां में
नाकामि‍यों के सि‍वा कुछ नहीं तेरे पास था ।। 
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14.न देखा पलटकर एक बार भी प्‍यार से उसने
हम जि‍नकी राहों में पलकें बि‍छाया करते थे।।
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15. सहरा में ला पटका दि‍ल की ढि‍ठाई ने हमें
कभी हम भी गुलशन का हि‍स्‍सा हुआ करते थे।।