Monday, January 16, 2017

वाईकॉम का महादेव मंदि‍र और दीपमाला




मुन्‍नार से नि‍कलकर कोवलम जाने के लि‍ए हमें कोच्‍चि‍ वापस आना पड़ा। वापसी का रास्‍ता काफी ऊब भरा लग रहा था। एक तो ड्राइवर की गाड़ी चलाने की रफ़़्तार काफी धीमी, दूसरी ओर आठ घंटे का सफ़र सोचकर ही हमें थकान होने लगी। ऊपर से चक्‍कर खाने वाले रास्‍ते से मुझे ही सबसे ज्‍यादा तकलीफ होती है।

मगर रास्‍ते के दृश्‍य बहुत लुभावने थे। कोच्‍चि‍ पार कर हमलोग एक जगह रूके चाय के लि‍ए। भूख लग गई थी। बच्‍चों ने केले खाए। स्‍वादि‍ष्‍ट केले थे। फि‍र हम अपने सफ़र को नि‍कले ऊंघते हुए। पता नहीं कि‍तनी दूर गए होंगे। रास्‍ते में एक बड़ा मंदि‍र दि‍खा। ड्राइवर से पूछते-पूछते कि‍ कौन सा मंदि‍र है, गाड़ी आगे नि‍कल गई। मुश्‍कि‍ल यह थी कि‍ उसे न हि‍ंदी आती थी न ठीक से इंग्‍लि‍श। बड़ी मुश्‍कि‍ल से समझा तो उसने रोकी गाड़ी।  उस जगह का नाम वाइकॉम था।




हम सभी गाड़ी के बाहर ऐसे भागे जैसे कैद से छूटे हों। बहुत बड़ा मंदि‍र परि‍सर था। बाहरी दीवार लकड़ी की थी और उस पर दि‍ये जलाने का जगह बनाया हुआ थाा। देखकर ही पता लगता था कि‍ वहां पर दि‍ये जलते होंगे शाम को। कुछ लोग काले कपड़े पहन कर घूम रहे थे। ऐसे काले कपड़े वालों को हमलोगों ने कोच्‍चि‍ एयरपोर्ट पर भी देखा था। पीतल के गुम्‍बद बने हुए थे। बाहर एक जगह नंदी की प्रति‍मा थी। हमें समझ आ गया कि‍ यह शि‍व मंदि‍र है। मुख्‍य द्वार से अंदर जाने के समय बाहर नृृत्‍यमुद्रा में दो पीतल की मूर्तियां लगी थी। पता चला कि‍ सभी पुरूषों को ऊपर के वस्‍त्र उतारकर अंंदर जाना होगा। सबने अपने शर्ट उतारकर हाथ में ले लि‍ए। बच्‍चों को मज़ा आने लगा क्‍योंकि‍ गर्मी थी।



जब हम अंदर जा रहे थे, कुछेक लोग दि‍खे। मगर अचानक से खूब भीड़ अंदर आने लगी। बहुत मुश्‍कि‍ल से मुख्‍य मंदि‍र के बाहर पहुंचे। गहन अंधकार। कोई बि‍जली का बल्‍ब नहीं। हां, जगह-जगह दि‍ये जल रहे थे मगर वो अर्पायाप्‍त थे। अंदर से आरती के लि‍ए बज रही घंटी की आवाज आ रही थी। महि‍ला-पुरूष सभी हाथ जोड़े खड़े थे। हमने अंदर देखने की कोशि‍श की, मगर कुछ दि‍खाई ही नहीं पड़ रहा था। घोर अंधकार। तभी दो पुजारी के हाथ में दि‍याा दि‍खे और धीरे-धीरे काले शि‍वलिंग की आकृति‍ हमें दि‍खने लगी। घोर अंधेरे के बीच में दि‍ये की रोश्‍ाानी में आरती होने लगी।
हम अभि‍भूत थे। रहस्‍यमय सा लग रहा था सब। एक बड़ा सा शि‍वलि‍ंंग और उसके इर्द-गि‍र्द घूमती दि‍ये की लौ। बहुत मन हुआ चुपके से फोटो ले लूंं। मगर मनाही थी सो मंत्रमुग्‍ध हो देखते रहे। मगर पूरी आरती नहीं देख सके क्‍योंकि‍ हम आधे रास्‍ते तक भी नहीं पहुंचे थे। मन मसोसकर बाहर आना पड़ा।

पता लगा यह वाईकाॅम शि‍व मंदि‍र का नि‍र्माण त्रेता युग में हुआ था। तब से आज तक लगातार इसमें बि‍ना वि‍ध्‍न पूजा हो रही है। यह केरल के सबसे पुराने और ऐतिहासिक मंदिरों में से एक है। यह अद्वितीय मंदिर है क्‍योंकि‍ यहां शैव और वैष्‍णव समान रूप से पूजा करते हैं। 


वाईकॉम महादेव मंदिर का नाम केरल इति‍हास में सुनहरे अक्षरों में लि‍खा है क्‍योंकि‍ वाईकॉम सत्याग्रह (अस्पृश्यता के खिलाफ एक संघर्ष) की उल्लेखनीय घटना 1924 में यहाँ हुई थी। मंदिर के इष्टदेव भगवान शिव हैं और मंदिर परिसर आठ एकड़ में फैला है। वर्ष 1924 के इस सत्याग्रह का नेतृत्व टी.के. माधवन ने किया था । सत्याग्रह ने वाईकॉम के मंदिर सड़क पर निचली जातियों को चलने का अधिकार दिया था मंदिर प्रवेश कानून के लिए भी मार्ग प्रशस्त किया ।




ऐसा माना जाता है कि मंदिर के पवित्र स्थान में भगवान शिव की मूर्ति खारासुर (खारा दानव) द्वारा स्थापित की गयी थी। पौराणि‍क कथाओं के अनुसार दानव खारा के हाथ में दो शि‍वलि‍ंग और एक गले मेंं था। खारा के बाएं हाथ का शि‍वलि‍ंग एट्टुमान्नूर, गले वाला कडुतुरुति और दाहि‍ने हाथ के शि‍वलि‍ंग को वाईकॉम में स्‍थापि‍त कि‍या गया था। यह माना जाता है कि‍ एक ही दि‍न में तीनों जगह शि‍वलि‍ंग के दर्शन करने से मनोअभि‍लाषा पूर्ण होती है।    

मंदिर में मनाया जाने वाला मुख्य त्योहार वाईकॉम अष्टमी है जो नवंबर – दिसम्बर के महीने में आयोजित होता है। यह त्‍योहार 12 दि‍नों तक मनाया जाता है। भगवान गणेश की पत्थर की मूर्ति और नंदी की एक मूर्ति मंदिर परिसर में स्थित है। वाईकॉम महादेव मंदिर, कुमारकोम से लगभग 22 किमी और कोट्टयम शहर से 32 किमी की दूरी पर स्थित, तक सड़क मार्ग से आसानी से पहुँचा जा सकता है।  इस दि‍न जि‍तने दीपस्‍तंभ है, वो प्रकाशि‍त कि‍ए जाते हैं।  भव्‍य वातावरण होता है उस दि‍न।  



 चूंकि‍ हमें इन बातों की जानकारी नहीं थी, हम ऐसे ही पता नहीं कि‍स आकर्षण से वशीभूत होकर चले गए थे, हमें बहुत अच्‍छा लगा। बाहर नि‍कलने की जरा भी इच्‍छा नहीं थी मगर समय का ख्‍याल भी रखना था। हम वहां से नि‍कले। रास्‍ते में यह बातें करते ही जा रहे थे कि‍ जब शाम होगी तो इस जगह पर सारे दीपस्‍तंभ जल उठेंगे तो कि‍तना भव्‍य लगेगा देखना। अंधेरा घि‍रने लगा था। हम कुछ दूर नि‍कले होंगे कि‍ सड़क के दाहि‍नी ओर एक खूबसूरत मंदि‍र दि‍खा, जहां लोग दि‍ये जला रहे थे। हमने तुरंत गाड़ी रोकी और भागे मंदि‍र की ओर। कि‍सी देवी का मंदि‍र था वो। अभी कपाट बंद था और मंदि‍र के चारों तरफ दि‍ये जलाए जा रहे थे। 




 हम मंदि‍र के अंदर वाले भाग में घुसे। वहां दोनों तरफ गणेश और कृष्‍ण्‍ा के छोटे-छोटे मंदि‍र थे। मंदि‍र के चारों ओर लोहे की कड़ी में लटकने वाले दि‍ए लगे थे, जो प्रज्‍जवलि‍त थे। बस, अद्भुत.... एक परि‍क्रमा कर हम बाहर आए तब ते मुख्‍य द्वार पर भक्‍तों की भीड़ लग चुकी थी। पट खुल चुके थे। ताजे फूलों का श्रृंगार कि‍ए माता की मूर्ति दि‍खी। मां नींबूू  की माला भी पहने हुई थी। हम श्रद्धा से सर झुुकाकर मां को प्रणाम कर नि‍कल गए। ऐसा लग रहा था जैसे दीपपर्व मनाया जा रहा हो। 



अब हम अति‍ उत्‍साह मेंं थे। जो सोचा नहीं था, वो भी देख लि‍या। थोड़ी दूर आगे बढ़े तो फि‍र देखा कि‍ रास्‍ते में दीप जल रहे हैं। मंदि‍र के बाहर, घरोंं के बाहर। रास्‍ते में। ठीक दीपावली की तरह।  हमारे मन में ख्‍याल आया कि‍ क्‍या केरल के हर घर में शाम को देहरी पर दीप जलाने का रि‍वाज है। थोड़ी देर में एक जगह जाम मि‍ला। देखा कुछ लोग पीले वस्‍त्र पहकर जा रहे थे। पता लगा ये लोग दक्षि‍ण भारत के संत श्री नारायण गुरू के अनुयायि‍यों का काफि‍ला है। तिरुवंतपुरम से 51 किलोमीटर पहले वर्कला शिवगिरी है। शिवगिरी में नारायण गुरू की समाधि है। गुरु की समाधि के दर्शन के लिए हर साल शिवगिरी तीर्थयात्रा के मौसम में लाखों श्रद्धालु यहां आते हैं। शायद इनके स्‍वागत के लि‍ए ही राहों में दीप जलाए गए थे। जो भी हो, हम एक अभूतपूर्व अनुभव से दोचार हो रहे थे। हमारा रास्‍ता उत्‍साह और उमंग के साथ कट रहा था। 
     

अब हमें जल्‍दी थी कोवलम पहुंचने की। अभी आठ से कुछ ज्‍यादा वक्‍त हुआ होगा कि‍ हमें दि‍खाई पड़ा कि‍ कोवलम 70 कि‍लोमीटर दूर। हम बेहद खुश हुए कि‍ बहुत जल्‍दी पहुंच जाएंंगे। घंटे भर बाद माइलस्‍टोन पर नजर पड़ी तो दूरी और ही कुछ बता रही थी। पता चला कि‍ हमने कोल्‍लम देख लि‍या है कोवलम के बजाय।
कोचीन से त्रिवेंद्रम तीन से चार घंटे का रास्ता है। दरअसल कोचीन से त्रिवेंद्रम जाने के दो रास्ते हैं एक कोट्टयम होकर और दूसरा अलेप्पी होकर। अलेप्पी होकर जाने वाला रास्ता समुद्र तट के साथ का ट्रैक है जबकि कोट्टयम का रास्ता थोड़ा अंदर से और लंबा भी है। हमारे वाहन चालक ने यही रास्‍ता चुना था जि‍स कारण हमें मंदि‍र के दर्शन हुए और हम देर से पहुंचे। कहीं फायदा तो कहीं नुकसान भी।



चूंकि‍ रात में अब बाहर का नजारा नहीं दि‍ख रहा था सो सब सोने लगे। तब रास्‍ते में एक जगह अच्‍छा होटल देखकर गाड़ी रूकवाई। वहां जब पानी मि‍ला तो वो गर्म और लाल रंग का। ये गर्म पानी आयुर्वेदिक जड़ी बूटियां डाले होने के कारण लाल रंग का होता है। मगर हम सबने पीने से इंकार कर दि‍या और मिनरल वाटर लि‍या। खाना खाने के बाद फि‍र चल पड़े आगे सफ़र को। 

अनाड़ी ड्राइवर होने का नुकसान यह हुआ कि‍ हमें जगह-जगह रूककर पूछना पड़ रहा था आगे का रास्‍ता। अब हम केरल की राजधानी ति‍रुवननतपुरम (त्रिवेन्द्रम) में थे। शहर सोया पड़ा था। कुछ पुलि‍सवालों से कोवलम का रास्‍ता पूछ हम आगे बढ़े। आखि‍रकार रात के 12 बजे के आसपास हम होटल पहुंचे। होटल समुन्‍दर से सटा हुआ था। बच्‍चे तुरंत तट की ओर भागे, मगर हमारी डांट खाकर वापस आए। हम कमरे में गए। बाल्‍कनी से दि‍ख रहा था समुन्‍द्र और लाइट हाउस की रौशनी।

अब सुबह का इंतजार था बस....



Friday, January 13, 2017

मुन्‍नार : केरल की शान





रांची से बैंगलोर, फि‍र कोच्‍चि‍। हमने इस बार छोटा ट्रि‍प प्‍लान कि‍या था। 24 दि‍संबर हम वायु यात्रा कर शाम बैंगलोर पहुंचे। वहां से चार घंटे बाद की फ्लाइट थी कोच्‍चि‍ के लि‍ए। कोच्‍चि‍ पहुंचे तो रात के नौ से ज्‍यादा हो गए।उस दि‍न कुछ मुमि‍कन था नहीं। हमलोग सीधे होटल पहुंचे और जल्‍दी सोने की कोशि‍श की ताकि‍ सुबह यानी 25 दि‍संबर को दोपहर तक कोच्‍चि‍ शहर देख कर शाम मुन्‍नार में बि‍ताने की योजना थी। मगर कहां हो पाता है सब कुछ मनचाहा।

रांची से ट्रैवल वाले से बात और बुक कर के गए थे,  मगर उसने वक्‍त पर गाड़ी हमें नहीं भेजा। दरअसल 25 दि‍संबर था उस दि‍न और ज्‍यादतर लोग छुट्टी पर थे। मगर ये हमारी समस्‍या नहीं थी क्‍योंकि‍ अग्रि‍म राशि‍ भी जमा कर दी गई थी। मगर अब क्‍या कहें....। पैसे दे चुके थे सो दूसरी गाड़ी नहीं कर सकते थे। बच्‍चे तो सुबह से स्‍वीमि‍ंग पूल पर मस्‍त हो गए मगर हमलोग क्‍या करें। चूंकि‍ हमने एयरपोर्ट के पास ही होटल लि‍या था । हमारा प्‍लान यह था कि‍ सुबह नाश्‍ते के बाद होटल छोड़ देंगे और कोच्‍चि‍ शहर घूमते हुए मुन्‍नार के लि‍ए नि‍कलेंगे। इंतजार करते- करते दोपहर एक बजे के आसपास आई गाड़ी।  हमारा मन खराब हो चुका था क्‍योंकि‍ हम कोच्‍चि‍ नहीं घूम पाएंगे ये पता था हमें।




बहरहाल, हम वहां से नि‍कले मुन्‍नार के लि‍ए। ड्राइवर नया था शायद। उसने चार के बजाय छह घंटे लगा दि‍ए। रास्‍ता पहाड़ी था, मगर रास्‍ते में मि‍लने वाली नदि‍यों ने मन मोह लि‍या। बि‍ल्‍कुल पोस्‍टर वाले सीन। रास्‍ते में देवीकुुलम नामक जगह में एक झरना दि‍खाई दि‍या। हम पहाड़ी रास्‍ते में चक्‍कर खा रहे थे इसलि‍ए थोड़ी ताजगी के लि‍ए गाड़ी रूकवाई। पास जाकर वाकई नि‍राशा हुई क्‍योंकि‍ एकदम पतली सी पानी की धार ऊपर से गि‍र रही थी और लोग तस्‍वीरेंं नि‍काल रहे थे। कोच्‍चि‍ रोड पर मुन्‍नार से 8-10 कि‍लोमीटर पहले है यह झरना । अथकुड फॉल्‍स। हमारे झारखंड में तो कमाल के झरने हैं.. मन मोहने वाले। आगे हमें दो और झरने दि‍खे पर हमलोग रूके नहीं।

उसी झरने के पास उतरकर हम ताजादम हो लि‍ए। आसपास पंक्‍ति‍बद्ध दुकानें लगी थीं। कच्‍चे आम, अन्‍नानस, आंवले अाादि‍ पलास्‍टि‍क के पैकेट में बंंद कर रखे हुए थे। ऐसा, जि‍से देख सच में मुंह में पानी आ जाए। हमने आम खाया क्‍योंकि‍ हमारे यहां इस मौसम में कच्‍चे आम नहीं मि‍लते। पहाड़ी रास्‍तों में मैंने हमेशा देखा है कि‍ आसपास बंदर बहुत होते हैं। सड़क कि‍नारे एक कतार में  बैठकर बंदर कुछ खा रहे थे। बहुत सुंदर लगा तो एक तस्‍वीर ले ली।


रास्‍ते में कई मसालों के आउटलेटस दि‍खे, जि‍नकी अपनी खेती भी थी। वो लोग पर्यटकों को अंदर बगान में ले जाकर मसालों के पेड़ दि‍खाते थे।  मगर हम रूके नहीं । पहुंचने की जल्‍दी थी। केरल मसालाेंं  के लि‍ए भी प्रसि‍द्ध है। कई बगान रास्‍ते में मि‍ले। एक जगह जब चक्‍कर ज्‍यादा महसूूस होने लगी तो रूके। वहां दुकान से  कुछ लौंंग , दालचीनी, गोलमि‍र्च भी खरीदा। गोलमि‍र्च  के पेड़ भी देखे।


बहुत खूबसूरत नजारा था जहां हम रूके। दूर पहाड़ की ऊंचाई तक नारि‍यल के पेड़ आैैर नीचे रंगबि‍रंगे फूल। दूर धुंध में घि‍रे पर्वत श्रृंखला, जि‍से देखकर उत्तराखंड याद आ गया। कुछ तस्‍वीरें लेने के बाद हम आगे बढे। जल्‍द ही शाम ढलने वाली थी। एक मोड़ आया और चारों तरफ चाय के हरे-हरे बगान नजर आने लगे।


सारे ढलान में चाय की पत्‍ति‍यां ऐसे बि‍छी थी जैसे कोई मोटी कालीन बि‍छी हो हरे रंग की। मन हुआ दौड़ पडूं उस रास्‍ते में । बीच- बीच मेे  सि‍ल्‍वर ओक के पेड़।  लोग झुंड के झुंड सड़क कि‍नारे गाड़ी खड़ी कर चाय के बागान में उतरे चले जा रहे थे। शाम की लालि‍मा छाने लगी थी। हमें अपने होटल तक पहुंचना था। हमलोग  होटल 'आर्कि‍ड हाइलैंडस'  में ठहरे थे जो मुन्‍नार बाईपास रोड में है।  हम पहुंचे तो हरी चाय से स्‍वागत कि‍या गया। स्‍वाद और गंध ने हमारी आधी थकान उतार दी। साामान कमरे में रख अपना कैमरा थाम हम भागे तुरंत चाय के बगान की तरफ क्‍योंकि‍ कल की शाम हमें यहां रूकना नहीं था।





कुदरत ने खूबसूरती बख्‍शी है इस जगह को। कोहरे से ढंकी पहाड़ि‍यां, बगान और चारों तरफ बि‍खरी हरि‍याली। बेहद रूमानी जगह है मुन्‍नार । मुन्‍नार नाम इसे मि‍ला नल्‍लथन्‍नी, कुंडल और मथि‍रपुझा नदि‍यों के संगम में स्‍थि‍त होने के कारण। मुन्‍नार तमि‍ल भाषा के दो शब्‍द मून तीन और आर नदि‍यां से मि‍लकर बना है। यह जगह समुद्रतल से 1600 मीटर की ऊंचाई पर स्‍थि‍त है।  मुन्नार का हिल स्टेशन किसी जमाने में दक्षिण भारत के पूर्व ब्रिटिश प्रशासन का ग्रीष्मकालीन रिजॉर्ट हुआ करता था।  

यहां के विस्तृत भू-भाग में फैली चाय की खेती, औपनिवेशिक बंगले, छोटी नदियां, झरने और ठंडे मौसम यहां का मुख्‍य आकर्षण है। हालांकि‍ हम दि‍संबर के अंति‍म सप्‍ताह में यहां थे मगर हमारे लि‍ए मौसम बि‍ल्‍कुल सामान्‍य था। जैसे हमारे झारखंड बि‍हार में अक्‍टूबर के महीने में गुलाबी ठंड पड़ती है, ठीक वैसा ही मौसम यहां का लगा हमें। मुन्‍नार में प्रत्‍येक 12 वर्ष के उपरांत यहां नीला कुरीजी  नामक फूल खि‍लता है जि‍ससे पूरी पहाड़ी नीली हो जाती है। दरअसल यह बैंगनी रंग की होती है मगर देखने पर नीली लगती है। यह फूल अब 2018 में खि‍लेगा। जाहि‍र है, हम केवल कल्‍पना कर सकते हैं और कोशि‍श की अगले बरस फि‍र आएं।   

हम जि‍स चाय बागान में घुसे वहां टाटा का बोर्ड लगा हुआ था। टाटा ने यहां चाय के संग्रहालय भी बनवाया है, जि‍समें तरह-तरह के चाय के नमूने रखे हैं। मगर हम जा नहीं पाए। हालांकि‍ हमें पता था कि‍ टाटा के अधि‍कतर चाय बगान यहां हैं और हमने कई बोर्ड भी लगे देखे। 



 दूर पहाड़ियां कुहासे में डूब रही थी। फटाफट कुछ तस्‍वीरें कैमरे में कैद की। बहुत ही सुंदर नजारा...मन कहे रूक जा रे रूक जा। पहाड़ि‍यों में दि‍प-दि‍प कर बत्‍ति‍यां जलनी शुरू हो गई थी। मन मोहता है ये नजारा शुरू से मेरा। दूर घाटि‍यों में बने मकानों की रौशनी बहुत अच्‍छी लगती है रात के अंधेरे में। अब हम वापस होटल आ गए।  मगर कमरे में न बैठकर वहीं टैरेस पर बैठकर पहाड़ के नजारे का लुत्‍फ़़ उठाने लगे। तय हुआ कि‍ बि‍ल्‍कुल सुबह उठकर हम चाय बगान की सैर करेंगे। 





सुबह बहुत जल्‍दी उठे। आसमान में बादल थे। हमेे पता नहीं लग रहा था कि‍ सूरज नि‍कला भी है या नहीं।  जल्‍दी से कैमरा थाम कर बाहर नि‍कले। अदभुत नजारा..पहाड़ के ऊपर कुहासे की परत घि‍री थी। होटल के बाहर नि‍कलते ही गुलमोहर के पेड़ पर नजर गई। लाल फूल खि‍ले थे। कल कुछ नीले गुलमोहर भी नजर आए थे रास्‍ते में। अर्थात हमारी तरफ के गरमि‍यों कि‍ सारे फूल अभी यहां खि‍लते हैं। अच्‍छा लगा। हम पैदल ही नि‍कले थे। तब तक सूरज की रूपहली धूप सब तरफ फैल चुकी थी। सड़क के दोनों तरफ रंंग-बि‍रंगे फूल, ऊपर चि‍ड़ि‍यों का कलरव। इधर चर्च बहुत हैं। मगर आगे मोड़ पर आश्‍चर्यजनक रूप से एक छोटा सा मंदि‍र मि‍ला। अच्‍छा लगा देखकर। 

आगे जि‍धर नजर उठती, चाय के बगान की हरी पत्‍ति‍यों का गलीचा बि‍छा था। बीच-बीच में सि‍ल्‍वर ओक के पेड़। अभी सूरज की कि‍रनेंं पूरी धरती तक नहीं उतर पायी थी । ऊपर पेड़ की फुनगि‍यों में धूप अटकी हुई थी। पेड़ों से छन-छन के कुछ रश्‍मि‍यां नीचे पत्‍ते पर गि‍रने लगी थी। जहां सूरज की रौशनी थी वहां के पत्‍ते धुले-धुुले से जरा हल्‍के हरे रंग में चमक रहे थे तो दूसरी तरफ कुछ पत्‍ते गाढ़े हरे रंग के थे। 

कुछ तोते पेड़ की फुनगि‍यों पर बैठकर खा रहे थे। सब कुछ स्‍वच्‍छ और सुंदर। सुबह की महक ने स्‍फूर्ति भर दी थी बदन में। कल्‍पनाओं को साक्षात देखना बहुत अच्‍छा लग रहा था। अब धूप जरा तेज होने लगी थी। हम वापस लौटे अपने बसेरे की तरफ क्‍योंकि‍ आज हमें यह जगह छोड़ना था। हमलोग शहर से कुछ पहले ही ठहर गए थे, प्रकृृति‍  के ज्‍यादा करीब रहने को। अब हमें मुन्‍नार शहर भी जाना था। 



हमलोग तैयार होकर दस के बजाय 11 बजे होटल से नि‍कले। शहर जाने के लि‍ए हमें ऊपर की ओर थोड़ी और चढ़ाई करनी थी। हमारी गाड़ी जैसे ही आगे बढ़ी, जरा और ऊंचाई पर पहुंचे, हमने तुरंत गाड़ी रूकवाई और भागे तस्‍वीरों के लि‍ए। बि‍ल्‍कुल वही नजारा जो हमने पोस्‍टरों में देख रखा था। ऊंचाई ऐसा दि‍खता है जैसे  हरे गलीचे में पतली-पतली धारि‍यां खींच दी गई हो। दरअसल चाय की पत्‍ति‍यों को तोड़ने के लि‍ए बनी पतली पगडंडि‍यां इसे अलग रूप देती है। इस खूबसूरती को शब्‍दों में बांधना बड़ा मुश्‍कि‍ल है। कहीं शंकुल तो कहींं सीधी तो कहीं घुमावदार। बस हरा रंग, हरी धरती और कुहासे से भरा पहाड़। रास्‍ते में सर्पीली सड़क इस नजारे की खूबसूरती बढ़ा रही थी। बि‍ल्‍कुल नीला आसमान और हरी धरती। कुहासे की चादर बि‍छी थी दूर पहाडि‍यां पर। 
अब हम कुछ देर में मुन्‍नार शहर में थे। शहर आम शहरों की तरह ही लगा। रास्‍ते में कुछ मंदि‍र मि‍ले और कई खूबसूरत चर्च भी। मगर हमें हरीति‍मा को देखना था सो आगे बढ़ गए। शहर से बाहर जाने पर जाम मि‍लने लगा। खूब सारे पर्यटक थे।
मुन्नार से लगभग 3 किमी दूर स्थित टॉप स्टेशन की ऊंचाई समुद्र तल से 1700 मीटर है। मुन्नार-कोडैकनल सड़क पर स्थित यह सबसे ऊंचा स्थान है। टॉप स्टेशन देखने आने वाले पर्यटक मुन्नार को अपना पड़ाव बनाते हैं और इस टॉप स्टेशन से पड़ोसी राज्य तमिलनाडु के विहंगम दृश्यों का आनन्द लेते हैं।



 सड़क केे दोनों ओर गाड़ि‍या लगी थी। चाय के बागान को घेरा गया था, इससे पता लगता था कि‍ अंदर जाने की मनाही है। लोग सड़क कि‍नारे खड़े होकर फोटो खि‍ंचवा रहे थे। एक तरफ ढेर सारी दुकाने लगी थी। नारि‍यल पानी, भुट्टे, कार्न और कई फल वाले।गाड़ी से उतरते ही कुछ फोटोग्राफर लपके कि‍ फोटो नि‍कालेंगे चाय बगान की टोकरी के साथ। मैंने मना कि‍या। मुझे खुद फोटो लेना थाा इस नजारे क। एक दो घाोड़ेवाले भी टहल रहे थे बच्‍चों को बि‍ठाकर। जि‍नका यह टी गार्डन था, उन्‍होंंने अपने बोर्ड लगाए हुए थे।



कुछ देर हम रूके। पता कि‍या कि‍ आगे झील है, जहां बोटि‍ंग की जाती है। मगर इस वक्‍त हमारे पास उतना समय नहीं था। हमें वाकई अखर गया कि‍ थोड़ा और वक्‍त लेकर आना चाहि‍ए। मैं तो हमेशा यह मानती हूं कि‍ जहां भी जाओ, पूरा वक्‍त दो। मगर परि‍वार के कई लोगोें के साथ रहने पर थोड़ा मुश्‍कि‍ल होता है। इस बार हम आठ लोग एक साथ थे। सबकी अलग पसंद। बहरहाल मन मार के हमने गाड़ी मुड़वाई और वापस।रास्‍ते में वन वि‍भाग का खूबसूरत नर्सरी मि‍ला। मेरा बड़ा मन हुआ मगर इतनी ज्‍यादा भीड़ बााहर ही मि‍ली कि‍ लगा हर हाल में घंंटे भर लग ही जाएंगे। सो बाहर से एक नीलकमल की तस्‍वीर ली। कुछ फूलों के रंग को आखों में भरा और तेजी से नि‍कल लि‍ए अगले पड़ाव की तरफ । अब हमें कोवलम जाना था। समुद्र् तट क्‍योंकि‍ बच्‍चों को समुुद्र बेहद पसंद है।  

Saturday, December 31, 2016

सुस्‍वागतम नववर्ष


पूरे साल
दि‍ल में बसाकर रखी
उसकी आंखों की मुस्‍कराहट
हाेठों में जो रह गया,  वो अनकहा
यही पाथेय बना, यही प्राण्‍ावायु

अब ये है थाती
बरस हो या जीवन
जि‍ंदगी दरि‍यादि‍ल है
मुस्‍कान के लि‍ए है इतनी वजह बहुत ।

सुस्‍वागतम नववर्ष , अभि‍नंदन मि‍त्रों 

Thursday, December 15, 2016

प्रेम में सम्‍मोहन होता है....


लड़की उस दि‍न जरा उदास थी। लड़का भांप गया इस बात को। मगर वजह से अनजान था। वो दोनों छत पर बैठे थे। लड़की गाल पर हाथ दि‍ए खाली आंखों ने आकाश देख रही थी। लड़का कभी उसका चेहरा देखता तो कभी आसपास के लोगों को। 

वह साधारण छत नहीं थी। एक आलीशान महल की छत थी, जि‍सके कंगूरे पर जरा ओट लेकर दोनों बैठे थे। चुप-चुप। लड़का बोलता जाता, लड़की बस हां हूं। अचानक वो लड़की उठी और कहा चलो अंदर..जरा घूम आएं। लड़का यंत्रवत पीछे पीछे। वो दोनों लोगोें का चेहरा देखते....भीड़ देखते और महल की नक्‍काशी भी। चलते-चलते थक से गए।

सबसे ऊपरी मंजि‍ल की सीढ़ि‍यों पर लड़की ने अजीब से भाव से लड़के को देखा। अब शायद वो समझ गया। कोई एक चीज है जो उसका ध्‍यान भटका रही है। उसे कुछ चाहि‍ए.;मगर क्‍या वो शायद लड़की को भी नहीं पता। लड़के को खूब पता था कि‍ कैसे उसे इन सबसे बाहर लाना है। बाहर खूब भीड़ थी। दोनों भीड़ में धक्‍के खाते हुए चल रहे थे।
अचानक लड़की के कानों के पास आकर वो दुहराने लगा....आई लव यू...आई लव यू....। वो लगातार फुसफुसाता रहा। शब्‍दोें में जैसे आत्‍मा उतार दि‍या हो। शब्‍द लड़की के कान से उतरकर उसके जि‍स्‍म में फैलने लगे। वह खो सी गई। बस उसे सुनते हुए। जब लड़के के होंठ बंद हुए तो उसने कहा....तुम जब यूं बोलते हो तो मैं ध्‍यान में चली जाती हूं। बदन से लेकर आत्‍मा का हर बंद खुलता है। मुझे लगता है मैं मरती रहूं और तुम इस तरह मेरे कान में आकर फुसफुसअोगे तो यमराज के पाश खोलकर वापस आ जाऊंगी। 

जो कोहरा था, छंट चुका था। अब दोनों हंस रहे थे। नीले आसमान तले.. प्रेम में सम्‍मोहन होता है।

Wednesday, December 14, 2016

इश्‍क़ के तीन पत्‍ते

जोधपूर कि‍ले की 

बेतहाशा भीड़ थी उस रोज। मेला लगा था, हर बरस की तरह। वो दोनों लड़का-लड़की भी साथ घूमने गए। कि‍ले के बाहर हजारों दुकान सजे थे। कपड़े, गहने, चूडि‍यां, रंग-बि‍रंगे दुपट्टे, घर के सामान। दोनों साथ-साघ घूमते हुए बातें करते जा रहे थे। लड़के का ध्‍यान मेले पर था और उस लड़की से बातें करने पर भी। बहुत देर तक दोनों घूमते रहे।
अचानक लड़की ने कहा...चलो आज इत्‍ती दूर आए हैं तो कि‍ले के अंदर भी घूम लें। लड़का भी सहमत हो गया। शायद वो जरा एकांत भी चाहता था। बाहर मेले में बेहद भीड़ थी। अब वो कि‍ले के अंदर थे। हालांकि‍ दोनों पहले भी कि‍ला घूम चुके थे। मगर साथ साथ घूमने का यह पहला मौका था।

जब महल के कमरों से नि‍कलकर वे गलि‍यारे में आते तो जरा सा सट जाते। इतना कि‍ हल्‍का स्‍पर्श होता रहे और लगे भी नहीं। चेहरे की खुशी देख कर लग रहा था दोनों को यह अहसास बहुत भा रहा है। दोनों जमाने भर की बातें करते जा रहे थे। बात का सुख...स्‍पर्श का सुख।

जब सीढ़ि‍यां चढ़नी होती, लड़का लड़की का हाथ थाम लेता। जरा अंधेरा कोना आने पर लड़की को अपने बदन से और सटा लेता लड़का..लड़की शरमा जाती। दोनों एक दूसरे के बदन की गर्मी पाकर और खुश होते, जैसे खजाना हाथ लगा हो कोई।
बहुत देर हो गई। वो ठीक बाहर नि‍कलने को थे कि‍ रंग-बि‍रंगे दुपट्टों में लड़की का मन अटक गया। लाल, पीले, नीले शोख रंग से दुपट्टे। बांधनी के रेशमी दुपट्टे। लड़की रूक गई, लड़का बेख्‍याली में जरा आगे नि‍कल गया। जब लड़की ने नजर ही नजर में सारे दुपट्टों काेे अपने में रख कर देख लि‍या, तय कि‍या कि‍ इसमें से एक लेना ही है, तो पाया की चारों तरफ भीड़ है और उस लड़के का पता नहीं। उसकी नजरें सब तरफ लड़के को तलाशने लगी। वो कहीं नजर नहीं आया।

अब वो बाहर भागी, पीछे से दुकान वाला आवाज देता रहा...बाहर नि‍कलकर देखा तो एक स्‍तंभ के सहारे वो लड़का खड़ा था। देख रहा था उसे मुस्‍कराते हुए जैसे उसकी बेचैनी में अपने होने के मायने तलाश रहा हो वो।कोई बेक़रार है सि‍र्फ मेरे लि‍ए, कि‍तना गहरा अहसास है। खुद के बेशकीमती होने का।
अपनी फूली हुई सांसों को थामते हुए लड़की बि‍ल्‍कुल पास जा खड़ी हुई। एकदम से बोली....मुझे बाहाें में भरो, जाेर से। अब लड़का अकबकाया.....यहां...इतनी भीड़ में। लड़की जि‍द्दी..बोली हां..अभी इसी क्षण। मेरी धड़कनेंं काबू में नहीं।

लड़का समझ गया, पल भर को आंखों से ओझल होना उससे बर्दाश्‍त नहीं। उसने बाहों का घेरा बनाकर पकड़ा। जमाने को भूल..जमाने के बीच...अकेले। फि‍र उसकी ऊंगलि‍यां में ऊंगलि‍यां फंसा ली। स्‍पर्श की प्रगाढ़ता से लड़की आश्‍वास्‍त हुई। खुद को जरा और करीब कि‍या उसके। दोनों सटे रहे, बि‍ना बोले। अचानक हंस पड़े। मुस्‍कराते हुए हाथ थामा और गेट के बाहर नि‍कल गए। 

Monday, December 5, 2016

कितने और 'संकल्‍प'


संसद के गलियारों से
सरहद के चिनारों से
पूछ रही एक आहत माँ
घाटी की बलिवेदी पर
कितने संकल्प चढाने हैं
बोलो रणचंडी की झोली में
कितने और शीश कटाने हैं !

नापाक पाक से बात नहीं
बर्दाश्त कोई और घात नहीं
नक्शे में अब ये पाक नहीं
चाहे मरमिटे अपने लाख सही
आतंक के ये धड , ये बाजू
अब काट-काट गिराने हैं !
बोलो रणचंडी की झोली में
कितने और शीश कटाने हैं !

वर्दी में सजा जब निकला था
लौटा तो तिरंगे लिपटा था
माँ के दूध की लाज बचा
शावक का शव, माटी से लिथड़ा था
जो घात लगाकर मारे उसे
उन श्रंगालो को सबक सिखाने हैं !
बोलो रणचंडी की झोली में
कितने और शीश कटाने हैं !

वो क्षत विक्षत शव उसका
मैं सूरत भी ना देख सकी
अंग प्रत्यंग विच्छेदित थे उसके
बर्बरता जैसे कहीं नहीं रुकी
संसद में सुरक्षित बैठे लोगों
बोलो कब ये कर्ज़ चुकाने हैं !
बोलो रणचंडी की झोली में
कितने और शीश कटाने हैं !

जिस जगह उसका अवसान हुआ
मन्दिर मेरा, वो शमशान हुआ
पोते-पोति‍यों संग रोज मैं जाती हूँ
उस शेर की कथा सुनाती हूँ
इन बच्‍चों की राह आसान नहीं
इनके सर पर पितृ –वितान नहीं
दूध रक्त औ’ कथ्य से सींच-सींच
किसलय से फौलाद बनाने हैं !
बोलो रणचंडी की झोली में
कितने और शीश कटाने हैं !

संसद के गलियारों से
सरहद के चिनारों से
पूछ रही एक आहत माँ 
घाटी की बलिवेदी पर
कितने संकल्प चढाने हैं
बोलो रणचंडी की झोली में
कितने और शीश कटाने हैं !

शहीद लेफ्टि‍नेंट कर्नल संकल्‍प कुमार के शहादत दि‍वस पर अर्पित कुछ पंक्‍ति‍यां 

Friday, December 2, 2016

बेवफाओं का अंदाज....


गए दि‍न ने आज से कहा ख़बर जो कोई मि‍ले मुझको ख़त लि‍खना बादलों के रंग से जमीं को कोई उम्‍मीद न देना
बेवफ़ाओं का अंदाज बड़ा हसीन होता है।

तस्‍वीर....गुजरे शाम की

Wednesday, November 30, 2016

ओ कचनार.....




चेहरा मेरा था...नि‍गाहें उसकी...वो देखता जाता...लगातार नहीं टि‍कती थींं उसकी नि‍गाहें...कभी आकाश तकता तो कभी रास्‍ता। मगर मुड़कर नि‍गाहें अटकती मेरे ही चेहरे पर। दि‍ल की बेचैनी बज़ाहि‍र थी चेहरे से...दो कदम आगे..तो दो कदम पीछे। मगर हि‍म्‍मत नहीं होती की आगे बढ़कर छू भी ले...

मैं ठहरी रही...देखती रही बेचैनि‍यां उसकी। हालांकि‍ आंखें मेरी भी कह रही होंगी दि‍ल का फसाना। कभी उमड़ता प्‍यार का सैलाब तो कभी बरसना चाहता। देखा जो था इतने बरस बाद उसे। वो आया था फि‍र से। अपने उसी मुस्‍कराहट का फंदा उठाए, जि‍समें फंसकर नि‍कल नहीं पाता कोई।

शरमाहट बरकरार थी उसके होंठों पर। आंखों ने कहा..आओ करीब। जमाने की बंदि‍शों से राह रोकीी। फि‍र हुआ कल मि‍लने का वादा। सांझ को गली में खि‍ले थे गुलाबी फूल..कचनार के। सड़क के दोनों ओर गुलाबी-गुलाबी।
उचककर तुमने तोड़ लि‍या एक फूल....होंठों से छूकर सीने से लगाया और मुड़ गए दूसरी ओर....जानती हूं...कचनार के फूल तुम्‍हें बहुत पसंद है....और मुझे क्‍या कह कर बुला रहे थे आज तुम....

ओ मेरी कचनार.....

Tuesday, November 29, 2016

एक सड़क ख्‍वाहि‍शों की....


न रोज़ मि‍लो हमसे
न बांटों हर ग़म व खुशी
है गुजारि‍श इतनी
जब तक रहो, पूरे रहो
जब जाओ, ग़म न हो यूं चले जाने का.....

Thursday, November 10, 2016

'री आलि‍....

''री आलि‍....देख ये हरि‍याली
पक चलीं सारे धान की बाली''



धनकटनी करती महि‍लाएं