Wednesday, June 20, 2018

लद्दाख में अंति‍म दि‍न





अब और कुछ संभव नहीं था कि‍ देखा जा सके। हम होटल की ओर लौट चले। रास्‍ते में स्‍थानीय बाजार का एक चक्‍कर लगाया जहाँ दुकानदार लोग हाथों में छोटे-छोटे धर्म चक्र घुमाते हुए सूखे खूबानी और बाकी दैनि‍क उपयोग की चीजें बेच रहे थे। ज्‍यादातर ड्राई फ्रूट्रस ही थे। ऐसा वि‍शेष कुछ नहीं जो लि‍या जाए। हमने बस कुछ खूबानी पैक करा लि‍ए। 


बाजार घूमते समय एक वि‍शेष चीज सह जरूर लगी कि‍ वहां सब कुछ उपलब्‍ध है। सारी आधुनि‍क सुवि‍धाएं है। खाने-पहनने और सजावट का सारा समान उपलब्‍ध है। लेह, लद्दाख का जि‍ला मुख्‍यालय है। खूब चहल-पहल है और सकड़ों पर जाम भी लगता है जैसा हमारे यहां। लौटते वक्‍त हम भी बहुत देर फंसे रहे। वह तो हमारा ड्राइवर सभी गलि‍यों से वाकि‍फ़ था , तो इधर-उधर से हमें नि‍कल ले गया। मगर इतनी देर और इतने दि‍न में यह समझ आ गया कि‍ सैकड़ों मील दूर से लाई गई सब्‍जि‍यां और फल उपलब्‍ध हैं। पुरानी पीढ़ी तो परंपरागत लि‍बास पहनती है मगर नए फैशन की मुरीद है नई पीढ़ी। 

जीवनशैली बहुत सरल और प्‍यारे लोग रहते हैं लद्दाख में। यहां के वासी हि‍ंदी आराम से समझते और बोलते हैं। राज्य में बोले जाने वाली आम भाषाओं में लद्दाखीपुरिगतिब्बतनहिन्दी एवं अंग्रेजी शामिल हैं। यहां के लोग हाथ में भी छोटा-सा प्रेयर व्हील लेकर घूमते हैं।  इसमें एक कागज में मंत्र लिख कर रखा जाता है। जब इस  प्रेयर व्हील को घुमाया जाता है तो यह मंत्र उच्चारण का प्रभाव देता है। मेरा मन भी हो रहा था कि‍ एक प्रेयर व्‍हील ले लूं। यहां के पर्व के बारे में पूछताछ से पता चला कि‍ तिब्बती बौद्ध धर्म के सबसे महत्वपूर्ण त्यौहारों में से एक है साका दावा’ जिसमें गौतम बुद्ध का जन्मदिनबुद्धत्व और उनके नश्वर शरीर के ख़त्म होने का जश्न मनाया जाता है। इसे तिब्बती कैलेंडर के चौथे महीने मेंसामान्यतः मई या जून में मनाया जाता है जो पूरे एक महीने तक चलता है।

गाल्डन नमछोटबुद्ध पूर्णिमादोसमोचे और लोसर नामक त्यौहार पूरे लद्दाख में बड़ी धूम-धाम से मनाए जाते है और इस दौरान यहाँ पर्यटकों की भीड़ उमड़ पड़ती है। दोसमोचे नामक त्यौहार दो दिनों तक चलता है जिसमें बौद्ध भिक्षु नृत्य करते हैंप्रार्थनाएँ करते हैं और क्षेत्र से दुर्भाग्य और बुरी आत्माओं को दूर रखने के लिए अनुष्ठान करते हैं।  मैं जि‍तना अधि‍क जान सकूं लद्दाख को, इस कोशि‍श में थी। हायर सेकेंडरी तक शि‍क्षा दी जाती है। मगर सि‍नेमा हॉल एक भी नहीं दि‍खा। दुकानों की भरमार है। महि‍लाएं भी खूब संभालती हैं बाजार। 

हम वापस होटल आए तो बच्‍चों ने जि‍द की कि‍ हर दि‍न यहां खा रहे खाना, इसलि‍ए आज कहीं बाहर जाएंगे। लेह का प्रसि‍द्ध 'ति‍ब्‍बती कि‍चन' हमारे होटल के पास ही में थो। वहां खूब भीड़ होती है। लोग कतार लगाकर अपनी बारी का इंतजार करते हैं। वि‍देशि‍यों की भीड़ लगी थी वहां। हमने भी कैंडि‍ल लाइट डि‍नर लि‍या। खाने का स्‍वाद बि‍ल्‍कुल हमारे शहर के जैसा। जो चाहो, उपलब्‍ध। शायद यही वजह है कि‍ वहां इतनी भीड़ होती है। 

खाने के बाद कुछ दूर तक टहलने नि‍कले। पास ही में एक जगह घेरकर छोटा सा बाजार बना दि‍या गया था। दुकानों के मालि‍क महि‍ला-पुरुष दोनों ही थे। ति‍रपाल से ढककर बंद होने ही जा रहा था। कुछ और देखने की ललक से हम घूमने लगे। कुछ मोति‍यों की माला, कुछ इयररि‍ंग्‍स और पायल ले लि‍ए अपने संगी-साथि‍यों को सौगात देने के लिए। यहां आकर सबसे कटी रही क्‍योंकि‍ फोन केवल पोस्‍टपेड ही काम करते हैं। जि‍ओ का नंबर भी नहीं काम आया यहां।



रात भर की बात थी। सुबह जल्‍दी उठकर सबसे पहले छत की ओर भागे। भूरे-कत्‍थई रंग के पहाड़, पहाड़ों के ऊपर बर्फ की परत और हरे लहराते पॉपलर के पेड़। अब एयरपोर्ट की तरफ। हसरत भरी नि‍गाहों से लेह को देखते हुए। जि‍म्‍मी ने हमें एयरपोर्ट पर जुले-जुले कहकर वि‍दा कि‍या। हम उसके शुक्रगुजार हैं क्‍योंकि‍ वह महज ड्राइवर नहीं, गाइड भी बन गया था। हमारी सुवि‍धा और पसंद का पूरा ख्‍याल रखा जि‍म्‍मी ने यात्रा के दौरान। 
 लेह से दि‍ल्‍ली की उड़ान फि‍र वापस अपने घर रॉची। बहुत प्रि‍य हो गए लद्दाख। आऊंगी दुबारा....जुले-जुले। 

हमारा ड्राइवर जि‍म्‍मी.


                                              .......समाप्‍त...... 

Monday, June 18, 2018

हॉल ऑफ फेम - लद्दाख




सि‍न्‍धु का मोह मन में लि‍ए सीधे पहुँचे हॉल ऑफ फेम । यह शहर से 4 कि‍लोमीटर की दूरी पर है। पर्यटक यहां सुबह नौ से शाम के सात बजे तक जा सकते हैं। दोपहर मे एक से दो तक बंद रहता है। लद्दाख में भारतीय सेना की वीरता व कुर्बानियों का इतिहास समेटने वाले हॉल ऑफ फेम को एशिया के सर्वश्रेष्ठ 25 संग्रहालयों की सूची में शामिल किया गया है। यह संग्रहालय देश के पाॅँच संग्रहालयों में सबसे ऊपर है। हॉल ऑफ फेम का निर्माण लेह में 1986 में हुआ था। इसमें लद्दाख में सियाचिन ग्लेशियर व कारगिल में पाकिस्तान से हुए युद्धों के साथ अन्य सैन्य अभियानों में भारतीय सेना की उपलब्धियों के साथ क्षेत्र की कला व संस्कृति को भी सॅँजोया गया है। इसमें युद्ध स्मारक के साथ वार सीमेट्रीएडवेंचर पार्क बनाकर लोगों को समर्पित किया गया है। 


 सबसे पहले तो द्वार तक जाकर ही मन में देशभक्‍ति‍ की भावना ठाठें  मारने लगी। अंदर तस्‍वीरों के द्वारा लद्दाख का भौगोलि‍क वि‍वरण देखने को मि‍ला। लद्दाख को ' लैंड ऑफ हाई पासेस' के नाम से जाना जाता है अर्थात उच्‍च मार्गों की भूमि‍ कह सकते हैं। देश के उत्तरी क्षेत्र में, लद्दाख के पास भारत में सबसे ऊंचे नहीं हैं बल्कि दुनिया भर में सबसे ऊंचे पास के रूप में माना जाता है। लद्दाख में 20 पास हैं जो इसे उच्च पास की भूमि बनाता है। "ला" का अर्थ है पास और "ढक" का अर्थ कई होता है। 
यहां हमने लद्दाख की संस्कृति, वनस्पतियों और जीवों, इतिहास और तथ्यों के बारे में जाना। कई सवाल थे, कई नाम थे जेहन में जि‍सका जवाब और अर्थ हमे यहां ओर मि‍ला। यह भी पता चला कि‍ लद्दाख के नामग्याल राजवंश की स्थापना बासगो राजा, भगन ने की थी। पारंपरि‍क वेशभूषा और रीति‍-रि‍वाज एवं यहां हो रहे उत्‍पाद की भी पूरी जानकारी दी गई थी।



इससे नि‍कलकर हम 'वार गैलरी', ' हीरोज गैलरी' की ओर बढ़ें। भारतीय सेना ने संग्रहालय के अंदर उन सैनिकों की तस्वीरें और चीजें रखी हैं। गैलरी में 1962 के भारत-चीन से हुए युद्ध का पूरा वि‍वरण है। यहां आप 1999 के कारगि‍ल युद्ध की तस्‍वीरें देखेंगे और शहीदों के बारे में जानकर फख्र से अपना सीना चौड़ा होता भी महसूस करेंगे। शहीदों की तस्‍वीर देख एक तरफ हमारी आंख नम हो आई तो दूसरी ओर युद्ध में प्रयुक्‍त हथि‍यार देख रोमांच होने लगा।






शहीदों के स्‍क्रैप बुक, पाकि‍स्‍तरनी सि‍पाही की चि‍ट्ठी भी पढी हमने। इतनी चीजें की आप गर्व कर सके कि‍ एक भारतीय हैं। ऐसे सैनि‍कों को नमन जि‍नके कारण हम आज सुरक्षि‍त है और वह कुर्बान हो गए। कप्तान विजयंत थापर जिन्हें कारगिल युद्ध शहीद और वीर चक्र (बहादुर पुरस्कार)  प्राप्‍त हुआ था, उन्‍होंने युद्ध के लिए आगे बढ़ने से पहले अपने परिवार को एक पत्र लिखा था, जिसे 'द लास्ट पोस्ट' नामक दीवार पर भी प्रदर्शित किया गया था।आगे एक स्मारिका कॉर्नर है। यहां  मग, कैप्स, शॉल और टी शर्ट प्राप्त वि‍क्रय के लि‍ए रखे गए थे। मैंने कुछ शॉल और कपडे के बैग खरीदे ताकि‍ कुछ यादगार मेरे पास रहे।



अब हम पीछे की ओर नि‍कले। यहां युद्ध स्‍मारक के साथ वार सीमेट्री और एडवेंचर पार्क बना हुआ है। कुछ देर वहां गुजारा और तस्‍वीरे भी ली। बहुत तेज हवा चलने लगी थी। मगर सेना की शौर्य गाथा जान पाए यहाँ आकर। मेरा मानना है कि‍ हर भारतीय को एक बार लेह जाकर हॉल ऑफ फेम जरूर जाना चाहि‍ए। खुद-ब-खुद आपके अंदर देशभक्‍ति‍ की भावना जागृत हो जाएगी। 

क्रमश:- 19 

Saturday, June 16, 2018

स्तकना गोम्‍पा और सि‍ंधु का मोहपाश



अब वापस लेह शहर की ओर। हेमि‍स को पीछे छोड़ते ही आगे एक पुल मि‍ला। वहां आगुंतको के लि‍ए धन्‍यवाद लि‍खा था। पुल के नीचे मटमैली सि‍न्‍धु नदी बह रही थी। बौद्ध धर्म के प्रतीक लाल-पीले-नीले पताके फहरा रहे थे। पास ही कुछ पुराने मि‍ट्टी और पत्‍थरों से बने घर थे जि‍नके लकड़ी के दरवाजे खुले हुए थे। हमने कुछ तस्‍वीरें लीं। मन हुआ एक बार फि‍र सि‍ंधुु के जल को स्‍पर्श कर लें। पर मन को मन ही मन समझाकर सिन्धु के कलकल को महसूसते हुए वापस लौट चले कि‍ अब आज भर इस सुंदर संसार का हि‍स्‍सा बनना है। भर लो आँखों में खूबसूरती। 



हमारे साथ-साथ सिन्धु भी बलखाती चल रही थी कि‍ मेरी नि‍गाह दूर एक मठ पर पड़ी। जि‍म्‍मी से पूछा-कौन सा मठ है। उसने बताया स्तकना। मुझे वह इतना खूबसूरत लगा कि‍ वहीं गाड़ी सड़क कि‍नारे रोक दी। जाने की इच्‍छा को त्‍यागना पड़ा ,क्‍योंकि‍ कई कि‍लोमीटर अंदर जाना पड़ता। हालांकि‍ लेह से इसकी दूरी मात्र 25 किमी दक्षिण में है। स्तकना यानी (टाइगर नाक) की आकार की एक पहाड़ी पर स्थापित एक बौद्ध मठ है। 
स्तकना मठ एक सुनसान चट्टान पर 60 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है इसका निर्माण लगभग 1580 में महान विद्वान संत चोसजे जम्यांग पालकर ने किया था। जि‍म्‍मी ने बताया कि‍ इस मठ में बहुत सारे चि‍त्रों और कलाकृति‍यों का संग्रह कि‍या गया है। इसकी देखभाल ति‍ब्‍बती बौद्ध धर्म के द्रुकपा संप्रदाय के बौद्ध भि‍क्षुओं द्वारा की जाती है। यह मठ आज भी 15वीं शताब्‍दी की परंपरा और संस्‍कृति‍ को दर्शाता है।





शाम होने से पहले सिन्धु का कि‍नारागोल-गोल पत्‍थर और पीछे नदी के कलकल के साथ दूर स्‍तकना मठ। नदी के दोनों पाट के कि‍नारे हरे-हरे पेड़। उसके ऊपर आसमान में सफेद बादल। नजर हटाना मुश्‍कि‍ल है वाकई। मैं बहुत देर वहीं ठहरी रही। मन नहीं हो रहा था कि‍ नजर हटाऊँ वहाँ से। सि‍ंधु से जुड़ाव एक बार फि‍र मन में उछाल मारने लगा। सि‍ंधु के माहपाश में बंधी कलकल धारा के कि‍नारे और बीच में उगे पौधों पर नजर ठहरी है। दूर पहाड़ी पर ऊपर की ओर जाती सीढ़ि‍यां मन को लुभा रही। लगता है पैदल-पैदल सि‍ंंधु की लहरों को महसूसते ऊपर गोम्‍पा में पहुंच जाऊं तो कि‍तना मोहक अनुभव हाेगा। मठ के नीचे बस्‍ती आबाद है। कई गोम्‍पा नजर आ रहे। सि‍ंधु जीवनरेखा है लेह के लि‍ए, सि‍ंधु की यादें अनमोल है मेरे लि‍ए और स्‍तकना मठ देखने की चाहत जि‍ंदा है, कि‍ अगली बार जल्‍दी जाऊं। 






क्रमश:- 18

Friday, June 15, 2018

लद्दाख का आकर्षण- हेमि‍स मठ



अब हेमि‍स की ओर। कुछ दूर बाद बेहद खूबसूरत द्वार मि‍ला। रास्‍ते की बेमि‍साल खूबसूरती का जि‍क्र क्‍या करूँ। ऊँची पहाड़ी में हमारी गाड़ी चढ़ती जाती है और हम अभि‍भूत होते जाते हैं। खासकर यह सोचकर कि‍ 16वीं सदी में जब आवागमन की पर्याप्‍त सुवि‍धा भी नहीं थीतब इतने दुर्गम मठों का नि‍र्माण कि‍स तरह कराया गया होगा। हेमि‍स गोम्‍पा सि‍ंधु तट से सात कि‍लोमीटर पहाड़ि‍यों की ओट मे है। हमारे ड्राइवर जि‍म्‍मी ने बताया कि‍ वि‍देशी आक्रमणकारी ने कई मठों को लूटा, मगर पहाड़ि‍यों के ओट के कारण इस मठ पर उनकी नजर नहीं पड़ी इसलि‍ए बच गया। हमने देखा उफपर कत्‍थई रंग का पहाड़ है। इसी से सटा है गोम्‍पा। पहाड़ी की ढलान पर पोपूलस का सुंदर जंगल है।



मठ पहुँचने के पहले ही कई छोटे-छोटे लामा मि‍ले हमें। अपने हाथों में थैला उठाए, तो कुछ तालाब में नहाते मूँड़े सिर वाले लामा। बहुत अच्‍छा लगा देखकर। मठ के पास पहुँचकर पहले टि‍कट लेना पड़ा। इसके बाद हम जब अंदर आए तो वाकई आँखें हैरत से खुली रह गईं। 









लेह से करीब 45 कि‍लोमीटर की दूरी पर है हेमि‍स मठ। इसका नि‍र्माण 1630 ई में स्‍टेग्‍संग रास्‍पा नंवाग ग्‍यात्‍यो ने करवाया था।1972 में राजा सेंज नापरा ग्‍वालना ने मठ का पुर्नर्नि‍माण करवाया। मठ की स्‍थापना धर्म की शि‍क्षा को बढ़ावा देने के उद्देश्‍य से की गई थी। यह मठ बाकी अन्‍य मठों से संपन्‍न और बड़ा भी है। यहां के दरवाजे की पेंटि‍ंग बहुत खूबसूरत है। जब हम पहुँचे तो बहुत भीड़ नहीं थी। पहले एक मंदि‍र में गए। वहाँ बुद्ध की एक सुंदर प्रति‍मा थी। मोहकसौम्‍य। प्रति‍मा ने नारंगी रंग का वस्‍त्र धारण कि‍या हुआ था। प्रति‍मा छोटी थी। अब हम मुख्‍य मंदि‍र की ओर चलेजो बि‍ल्‍कुल पास ही में था। 






यह मूर्ति अपेक्षाकृत बड़ी थी और परि‍धान का रंग पीला था। हाँ का मुख्‍य आकर्षण ताँबे की धातु में ढली भगवान बुद्ध की प्रति‍मा है। लामा बैठकर मंत्रोच्‍चारण कर रहे थे। बि‍ल्‍कुल शुद्ध आध्‍यात्‍मि‍क वातावरणहाँ ध्‍यान लगाने का मन करे। अभी इस मठ की देखरेख द्रुकपा संप्रदाय के लोग कि‍या करते हैं। मठ के दो मुख्‍य भाग है जिन्‍हे दुखांग और शोंगखांग कहा जाता है। यह लोग बौद्ध धर्मके महायान संप्रदाय की वज्रयान शाखा के अनुयायी माने जाते हैं। हेमि‍स में जाकर जब मन्‍त्रोचार के बीच आप दर्शन करते हैं बौद्ध मूर्ति का तो नि‍:संदेह आत्‍मि‍क शांति‍ का अनुभव करेंगे। मंत्रोचार के शब्‍द हमें नहीं पता चल रहे थे मगर इतना असरदार था स्‍वर कि‍ गूंज भीतर तक महसूस हो रही थी।





बाहर दो छोटे चबूतरे में लाल और सफेद रंग के दो झंड़े हवा में उड़ रहे थे। परि‍सर बहुत बड़ा है। इसके बाद हम तीसरे कक्ष में गए। यहाँ बौद्ध की प्रति‍मा थी मगर उ्ग्र मुखमुद्रा थी। उनके लि‍ए वि‍भि‍न्‍न खाद्य पदार्थ और फल अर्पित कि‍ए गए थे। जो अनुयायी वहां आ रहे थे उनके हाथों में भी फल थे, जि‍से वो अर्पित कर रहे थे।लकड़ी के कई खंभों पर टि‍का था छत। वहीं से लकड़ी की सीढ़ि‍याँ ऊपर तक गई। हमलोग भी छत गए खूबसूरत मठ है साथ ही पीछे की पहाड़ी से और खूबसूरती बढ़ गई। अब हम बाहर आकर भि‍त्तिचि‍त्र देखने लगे। मठ की दीवारों पर जीवन चक्र को दर्शाते कालचक्र को भी लगाया गया है। उधर दूर पहाड़ि‍यों के ऊपर भी एक बुद्ध प्रति‍मा दि‍खी। कुछ देर परि‍सर में घूमने और दो मंजि‍ला मठ के दर्शन के बाद हम संग्रहालय देखने के लि‍ए गए। हाँ एक समृद्ध संग्रहालय भी है। यह मुख्‍य मार्ग से काफी दूर पर है और बहुत ही वि‍शाल परि‍सर में है। अंदर जाते ही वि‍क्रय के लि‍ए सामान रखे थे। हमने भी कुछ सजावटी समान खरीदा और संग्रहालय देखने आगे बढ़ गए।



इस संग्रहालय में हेमि‍स मोनेस्‍ट्री का इति‍हास और पुराने राजाओं की तस्‍वीर के साथ कई महत्‍वपूर्ण जानकारी भी दी गई है। मगर तस्‍वीर लेने की इजाजत नहीं।  हाँ ति‍ब्‍बती कैलेण्‍डर के अनुसार पांचवें माह की 10 और 11वीं तारीख को बड़ा उत्‍सव 
का भी आयोजन कि‍या जाता है। यह प्रत्येक वर्ष गुरु पद्यसंभवाजिनके प्रति लोगों का मानना है कि उन्होंने स्थानीय लोगों को बचाने के लिए दुष्टों से युद्ध किया थाकी याद में मनाया जाता है। इस उत्सव की सबसे खास बात मुखौटा नृत्य है जिसे देखने के लिए देश-विदेश से कई लाख लोग आते हैं। हर बारहवें वर्ष में यहां का लामा बदल जाता है। बहुत देर तक तस्‍वीरें नि‍हारते रहे। बहुत मन हो रहा था तस्‍वीरों में इन्‍हें सहेजने का। मगर इजाजत नहीं तो मुमकि‍न नहीं हो पाया।


पूरा हेमि‍स मठ घुमने के बाद हम बाहर नि‍कले। पीछे खाने-पीने के कई स्‍टॉल लगे हुए थे। हमें भूख लग आई थी। फ्राइड राइस और थुकपा खाकर नि‍कल गए।

क्रमश:- 17  

Wednesday, June 13, 2018

रैंचो का स्‍कूल - लद्दाख


अब हमे जाना था हेमि‍स की ओर। मगर उसके पहले रास्‍ते में ड्राइवर जि‍म्‍मी ने पूछा- ‘’वो स्‍कूल देखना है आपलोगों को जहाँ थ्री इडि‍यट की शूटिंग हुई थी।” हमने कहा- “हाँदेखते चलते हैं।” हमारी दि‍लचस्‍पी तो थी ही स्‍कूल देखने के लि‍ए। फि‍ल्‍म का अंति‍म भाग यहीं फि‍ल्‍माया गया था। 

कुछ ही देर में हम स्‍कूल के बाहर थे। हमारे जैसे कुछ और लोग भी अंदर जा रहे थे। बहुत खूबसूरत साफ परि‍सर। ज्ञात हो कि‍ इस स्कूल को 2009 में विश्वस्तर का सबसे प्रेरणादायक निर्माण होने के लिए 'ब्रिटिश काउंसिल फॉर स्कूल एनवायरॉनमेंट' पुरस्कार मिला है। आगे बाईं तरफ नरोपा फोतांग नाम का मठ है। हमने दूर से उसकी तस्‍वीर ली। 



आगे बढ़ने पर पाया कि‍ बच्‍चे अपने कक्ष में पढ़ाई कर रहे थे। इस स्‍कूल का नाम है 'द्रुक व्‍हाइट लोटस स्‍कूल'। इसे थ्री इडि‍यट फ़िल्‍म के बाद से रैंचो स्‍कूल कहा जाने लगा है। 2010 में बादल फटने के बाद यह स्‍कूल पूरी तरह बर्बाद हो गया था ,परंतु आमि‍र खान और सेना के सहयोग से फि‍र से यह सुचारू रूप से चलने लगा है। 




हमें कहा गया कि‍ इसका ध्‍यान रखा जाए कि‍ बच्‍चे का ध्‍यान न भटके। इसलि‍ए अंदर कैमरा क्‍लि‍क करने की मनाही थी। शांत वातावरण, खूबसूरत फूल लगे थे। स्‍कूल परि‍सर में घूमते हम अंदर छोर पर पहुंचे। वहां एक दीवार है जि‍स पर लि‍खा है ' द इडि‍योटि‍क वॉलऔर ' ऑल इज वेल। दीवार में फि‍ल्‍म के कई दृश्‍य पेंटिंग कर उकेरे गए है। स्‍कूल में केवल इसी जगह आप तस्‍वीरें ले सकते थे। बड़ा अजीब लगा देखकर कि‍ कई पर्यटक फि‍ल्‍म में सू-सू वाले सीन की एक्टिंग करते हुए फोटो खिंचवा रहे थे। बाकी लोग हंस रहे थे। कि‍तना असर डालती है कोई फि‍ल्‍म हमारे ऊपर, यह अहसास हुआ। कुछ तस्‍वीरें ली और तुरंत ही वहाँ से नि‍कल पड़े, क्‍योंकि‍ लंच का समय हो रहा था और कुछ ही देर में बच्‍चे कक्ष से बाहर होते। हमारे पास भी वक्‍त की कमी थी,मगर यह कह सकते हैं कि‍ यह आवासीय स्‍कूल इतना अच्‍छा लगा कि‍ मन हुआ कि‍ अपने बच्‍चे का यहीं दाखि‍ला करा दि‍या जाए। 


स्‍कूल के अंदर आते ही नजर पड़ी थी रैंचो कैफे की ओर। कुछ लोग कैफे के बाहर थे और कुछ अंदर भी। हमारा भी मन हुआ इस जगह कॉफी पी जाए। मगर आगे हेमि‍स अपनी ओर खींच रहा था। कल नि‍कल जाना था वापस अपने घर की तरफ। इसलि‍ए वहां से नि‍कल पड़े बाबा रणछोड़दास ( रैंचो) को याद करते हुए। 

क्रमश:- 16