Tuesday, August 8, 2017

डूबती सांझ.....


" डूबती सांझ का सूरज सदा दे
द‍िल में है क्‍या आज बता दे
नद‍ियों के संगम में भीगी है यादें
सामने आकर तू भी मुस्‍करा दे "

Friday, August 4, 2017

शरीफा और चारआना


हम 'बड़ा' बोलते थे उन्‍हें। हम, यानी मैं और मेरी पक्‍की वाली सहेली मनु, साथ ही बड़ा के घर वाले और मुहल्‍ले के सारे लोग। 'बड़ा' का अर्थ है बड़ी मां। वो एक उम्रदार कर्कशा ब्राह्णण औरत थीं, ऊपर से वि‍धवा। कोई संतान भी नहीं। जमाने के प्रति‍ जि‍तनी कटुता उनके अंदर थी वो सब चेहरे से झलकता था और वो इसे छि‍पाने की भी कतई कोशि‍श नहीं करतीं। सारा परि‍वार हंसता-खेलता और वो बगल में एक छोटी सी कुटि‍या में अपनी दुनि‍या समेट कर रखती। कमरे के अंदर पुआल का बि‍छौना, उसके ऊपर एक मोटी सी कथरी या लेदरा, जो शायद उन्‍होंने फटे-पुराने कपड़ों से खुद ही सि‍ली थी, हमेशा बि‍छी रहती। पास में एक ढि‍बरी रखी रहती जो रात को अंधेरे कमरे में उजाला करती।

उनके खाने के बर्तन भी अलग रखे होते। दो स्‍टील की थाली और दो गि‍लास। मगर वो हमेशा चमचमाते मि‍लते। रोज चूल्‍हे की राख से मांजा करती थी अपने बर्तन। एक गि‍लास  रखा था उन्‍होंने पानी के लि‍ए और दूसरी चाह..यानी चाय के लि‍ए। वो हमेशा लाल चाय पीती। बि‍ना दूध वाली। खूब सारी चीनी डाल...सुड़क-सुड़क कर। घरवाले उनका खाना उनकी ही कोठरी में दे जाते। वो अकेले ही खाती।

उनके पति‍ की मौत कब हुई, ये तो नहीं पता क्‍योंकि‍ मैंने होश संभालते ही उन्‍हें इसी तरह देखा। वो बकरि‍यां पालती थीं। जाने ये उनका शौक था या जरूरत। दि‍न भर आंगन में बंधी बकरि‍यां रात को उसी कोठरी में सोती थी जहां बड़ा रहती थीं। शायद वो अपना अकेलापन इनसे बांटती थी। मुझे बहुत आश्‍चर्य होता था कि‍ कैसे कोई बकरि‍यों के साथ एक ही कमरे में सो सकता है। 

एकदम सुबह उठकर बड़ा कुएं पर चली जाती नहाने। रस्‍सी-बाल्‍टी से पानी खींचकर एक बड़े से बाल्‍टी में भर लेती और वहीं 15-20 ईंटो को जोड़कर बनाई जगह पर बैठ, साबुन से अपनी सफे़द साड़ी को साफ करती। बड़ा ने कभी ब्‍लाउज नहीं पहना। बस एक धोती जो टखनों ऊपर होती, वो कमर को घेरते हुए सामने सीने को ढकती और बांयी बांह के ऊपर से नि‍कलकर पीठ से होती हुई दाहि‍नी कमर में खुंसी रहती। मगर उनके वस्‍त्र कभी अस्‍त-व्‍यस्‍त नहीं होते। जैसे साध लि‍या हो उन्‍होंने अपने मन की तरह कपड़ों को भी। बहुत कम कपड़े थे उनके पास। जो भी वो रंगहीन। वि‍धवाओं के वस्‍त्र ऐसे ही होते हैं कई जगहों पर। वो कपड़े पहने-पहने नहाती। कुएं से ठंडा पानी नि‍कालकर खुद पर उड़ेलती जाती। उन्‍हें देखकर मेरा भी मन होता कि‍ ऐसे ही नहाऊं। पर मां नहीं नहाने देतीं।

बड़ा नहाकर अपने कपड़े पसारती और एक छोटी कंघी से अपने बाल बनाकर  बकरि‍यों को लेकर नदी की तरफ चली जाती। वो कि‍सी से बात नहीं करतीं। कोई पूछता तो हां-हूं में जवाब और जो कोई दुबारा बात छेड़ता तो 'हम नई जानबऊ'  (मुझे नहीं मालूम) बोलकर आगे नि‍कल जाती। उनके रूखे केश और रूखा मुंह देखकर फि‍र सामने वाले की हि‍म्‍मत नहीं होती कि‍ वो कुछ कहे।

कुएं के बगल में ढेर सारे पुदीने लगे थे। हरे-हरे, सुगंधि‍त। कभी-कभी मां कहती- जाआे कुछ पत्‍ते तोड़ लाओ। आज इमली संग मि‍लाकर चटनी पीसनी है या पुदीने की शरबत बनानी है। मुझे पुदीने का शरबत बहुत पसंद था। मैं भागकर जाती, पर इसका ध्‍यान रखती कि‍ कहीं आसपास बड़ा न हो। मुझे उनकी झि‍ड़की से बड़ा डर लगता। वो हम बच्‍चों को देखते ही अपनी बड़ी गोल आंखे नि‍कालकर घूरती...का है ?....मैं भाग आती।

मगर हमारे साथ बड़ी मुश्‍कि‍ल थी। हमारी बेहद पसंदीदा चीज उनके कब्‍जे में थी। हम कि‍तना भी कोशि‍श कर लें, उनकी आंखों के नीचे से नि‍कल आना नामुमकि‍न था।

दरअसल मुझे और मनु को शरीफा यानी सीताफल बेहद पसंद थे और बड़ा के बगान में इसके पांच पेड़ थे जो मौसम पर फलों से लद जाते और हमें ललचाते। हम इस फि‍राक में रहते कि‍ कैसे पेड़ से फल तोड़े जाए। हम दोनों कक्षा तीन में थे। स्‍कूल से आने बाद कोई काम नहीं। खेलते रहते इधर-उधर। मनु और मैं शरीफा के पेड़ में फूल से फल आने और उसके बड़े होने फि‍र उनका रंग हरा से हल्‍का सफेद होने का इंतजार करते। इसके पहले फल तोड़कर भी कोई फायदा नहीं था क्‍योेंकि‍ कच्‍चे फल में कोई स्‍वाद नहीं आता। हम ललचाई आंखों से शरीफे के पकने का इंतजार करते। हालांकि‍ घर में सभी फल आते थे, मगर पेड़ पर पके शरीफा का स्‍वाद अतुलनीय होता है।

वैसे हमें आम भी बहुत पसंद थे और गर्मिंयों की दोपहर आम के पेड़ के नीचे ही गुजरती थी कि‍ कब पके आम टपके और हम खाएं। आम के पेड़ गांव में बहुत थे । हमारे घरों में भी थे , इसलि‍ए इतना आकर्षण नहीं था आम के लि‍ए जि‍तना सीताफल के लि‍ए था।

मुश्‍कि‍ल ये थी कि‍ बड़ा को हमारी कमजोरी मालूम चल गई थी। हमें घर और बारी यानी बगान के आसपास मंडराते देखकर वो फलों की पहरेदारी करने लगी थी। हमें सुनाकर कहती....'हम गि‍न के रखि‍यैयला सब शरीफा..जे कोई तोड़तई, उके तो डंटा से मारबई।'  (हमने गि‍न रखा है फल। जो कोई तोड़ेगा उसे डंडा से पीटेंगे। ) हमलोग इस धमकी से सहम जाते और चुपचाप नि‍कल जाते। अब अगले दि‍न बि‍ल्‍कुल पास नहीं फटकते, ताकि‍ उन्‍हें लगे कि‍ हम वाकई डर गए हैं। मगर दूसरे दि‍न ढलते न ढलते मौका लगाकर हम पहुंच जाते पेड़ के पास, यह देखने के अबकी कौन सा वाला शरीफा पकेगा।

उनके घर में और लोग भी थे। उनके देवर देवरानी और उनके बच्‍चे। राहत की बात थी कि‍ उन्‍हें हमारी पसंद मालूम थी और वो लोग जब भी फल तोड़ते तो हमें बुलाकर दो-चार खाने को दे देते थे। वो लोग कच्‍चे फल गदराने पर तोड़ लेते और पुआल के ढेर पर पकने रख देते। पर हमें तो चाहि‍ए था पेड़ का पका फल, जो बड़ा के कब्‍जे में था। वो बि‍ल्‍कुल नहीं देना चाहती थी हमें।

मगर एक दि‍न बड़ी अजीब सी बात हुई। मैं और मनु अपने घर के बाहर खेल रहे थे। वहां से बड़ा का घर दि‍खता है। हमने गौर कि‍या वो अपने कोठरी के दरवाजे पर खड़ी होकर बहुत देर से हमारी तरफ देख रही थी। जब मेरी नजर मि‍ली तो उन्‍होंने इशारे से हमें बुलाया। हमें कुछ समझ नहीं आया पर मैं और मनु दोनों उनके पास गए।

वो बोली- शरीफा खाबे का ?
(शरीफा खाओगी क्‍या)
हमें तो यही चाहि‍ए था। दोनों ने एक स्‍वर में जवाब दि‍या...हां
वो फि‍र बोलीं- मगर इकर पैइसा लगतऊ
(मगर इसके पैसे देने पड़ेंगे) 
अब मैं और मनु एक दूसरे का मुंह देखने लगे। तब हम छोटे से थे...लगभग 8 वर्ष की उम्र रही होगी। पॉकेटमनी का तो सवाल ही नहीं उठता। फि‍र भी चांस लेने के लि‍ए हमने पूछा- ''कि‍तना पैसा लोगी बड़ा''

वो बोलीं- एक शरीफा के चारआना, इकर से कम नई। लेवेक हो तो ले...नई तो जा, हम इके बाजार में बेच देबई।
(एक फल के 25 पैसे। इससे कम नहीं। लेना है तो लो वरना बाजार में बेच देंगें) 

अब हम घबाराए। जि‍स शरीफे को आंख के आगे बड़ा  होते देखा उसे अपने सामने से नि‍कल कर कैसे जाने दे। हम दोनों सखि‍योें में आंखों ही आंखों में बात हुई और दोनोें अपने घर की तरफ दौड़े- सरपट।  मैं तो जाकर मां के गले से झूल गई..

''मां...ओ मां...एक चवन्‍नी दो न''।
मां ने पूछा- ''क्‍या करेगी पैसे का''...जवाब में नखरा दि‍खाया। ''क्‍या मां...चारआना भी नहीं दे सकतीं तुम। कुछ लेना है न ''।
मां ने फि‍र कहा- ''क्‍या लेना है सो तो बोल, देती हूं अभी''।
 अब तो बताना पड़ा....''मां...बड़ा  शरीफे के बदले पैसे मांग रही है। दे दो न। बहुत खााने का मन हो रहा है''।

पता नहीं क्‍या सोचकर मां ने कुछ नहीं कहा और चुपचाप से पैसे मेरी हथेली में धर दि‍ए। मैं बाहर आकर मनु की राह देखने लगी। थोड़ी देर में कूदती-फांदती वो भी दि‍खलाई पड़ी मुझे। चेहरे से लग रहा था कि‍ पैसे मि‍ल गए हैं उसे भी।

अब हम गये बड़ा के दुआरे यानी दरवाजे पर। आज पहली बार उनके मुंह में हंसी देखी मैंने और स्‍वर भी मीठा सा लगा। कहा- ''ले आई पैसा'' ..हमने अपनी मुट्ठि‍यां खोल दी उनके सामने। उनका चेहरा जरा खि‍ल गया। उन्‍होंने अपनी अंधेरी कोठरी के पुआल के ढेर के नीचे से दो बड़े आकार के शरीफे नि‍काले आैर हमारे हाथ में धरा। कहा- ''अबकी जब भी खाने का मन करे तो आ जाना, मगर पैसे लेकर''। हमने अपना सर हां में हि‍लाया और बाहर जाने लगे। तब उन्‍होंने पीछे से आवाज देकर कहा...'सुन मईंया मन'..शरीफा फ्रॉक में छुपाकर ले जा और केकरो नई बताबे कि‍ हम दे हि‍यउ।
(बच्‍चि‍यों फल को फ्रॉक में छुपाकर ले जाओ और कि‍सी को बताना नहीं) 

हमने सहमति‍ जताते हुए एक दूसरे को देखा..हम दोनों की आंखों में एक प्रश्‍न कौंध रहा था, मगर तब हमें जवाब नहीं मि‍ला और सच तो ये है कि‍ हमने जानने की कोशि‍श भी नहीं की कि‍ इसका कारण क्‍या है। मगर हम बराबर चवन्‍नी देकर शरीफे खाते रहे बरसों तक। बड़ा थोड़ी प्‍यार भरी मुस्‍कान से मि‍लने लगी हमसे। हम उनके इशारे का इंतजार करते, कि‍ कब वो अपने पास बुलाए। 

हमें बड़ा की मन:स्‍थि‍ति‍ का पता तब लगा जब सबकुछ समझने की उम्र हुई। मगर अफसोस तक तक बड़ा हमें छोड़कर जा चुकी थीं। जब ऐसी ग्रामीण महि‍लाएं जो कम उम्र में वि‍धवा हो गई, जि‍नकी अपनी कोई संतान नहीं आैर घर से उपेक्षि‍त एक कोने में पड़ी दो वक्‍त की रोटी नि‍गल कर अपने मरने का इंतजार कर रही हैं, तब मुझे उस दि‍न 'बड़ा'  की आंखों में अट्ठनी मि‍लने के बाद की चमक याद आती है।

वो एक उम्‍मीद थी कि‍ छुपाकर बेचे गए शरीफे से मि‍लने वाले दो पैसे ही सही, उनके अपने होंगे। मैनें देखा तो नहीं पर लगता है उस अंधेरी कोठरी में एक गुल्‍लक छुपा रखा होगा बड़ा ने, जो पूरा न सही आधा तो भर ही जाता होगा, मेरे और मनु के शरीफे के बदले दि‍ए पैसों से। शायद कुछ और भी बच्‍चे होंगे जो 'बड़ा'  की बात मानते हुए यह कि‍सी से शेयर नहीं कि‍या होगा कि‍ बड़ा अपने बगान का शरीफा बेचती है....चार आने में। 

03.08.17 को 'दैनि‍क भास्‍कर' में प्रकाशि‍त कहानी 



Tuesday, August 1, 2017

जरा बति‍या लें कुछ....


आओ
जरा बति‍या लें कुछ
आप फेरो
माला मनके की
मैं मन के फेरे लगा लूं
इन खूबसूरत वादि‍यों से
थोड़ी खूबसूरती
यादों में अपन बसा लूं
कलकल नदि‍यों का स्‍वर
अपने भीतर भर लाऊं
ओ दुनि‍यां के छत के वासि‍यों
मैं भी जरा तुम सी
सुंदर हो जाऊं
हि‍मनदि‍या सी छलछल
बहती जाऊं...बहती जाऊं

Sunday, July 23, 2017

क्या करें हम .....


ल्की-हल्की सी बारिश 
और तनहा यहाँ हम 
ऐसे में तुझको याद न करें
तो और क्या करें हम 

पत्तों पर ठहरी शबनम 
और बूँदों के नीचे ठहरें हम 
इस बयार में तेरा नाम न पुकारें
तो और क्या करें हम 

आसमान जब देता है 
धरती को बारिश की थपकी 
ऐसे में सावन को ना निहारें 
तो और क्या करें हम 

डाकिया बन बूँदे
पहुँचाती है यादों के ख़त
ऐसे में किवाड़ ना खोलें
तो और क्या करें हम 

उमड़ते काले बादलों को देख
नाच उठता है मन-मयूर
ऐसे में ख़ुद को ना सवारें 
तो और क्या करें हम ।

Thursday, July 20, 2017

क्‍यों माना जाए तीन तलाक ?

तलाक..तलाक..तलाक। ये तीन शब्‍द कहने मात्र से पति‍-पत्‍नी का रि‍श्‍ता खत्‍म हो जाता है, चाहे उस रि‍श्‍ते की उम्र दो महीने पुरानी हो या बीस वर्ष। इस संबध में हि‍ंदू और मुस्‍लि‍म धर्म के अनुसार स्‍थि‍ति‍ अलग है। हि‍ंदू धर्म में जहां इसे सात जन्‍मों का बंधन माना गया है वहीं मुस्‍लि‍म धर्म में यह एक अनुबंध है। यह स्‍त्री-पुरुष के बीच का करार है कि‍ अगर उनमें कि‍सी भी हाल में नि‍भ नहीं पाए तो तलाक लेकर संबध तोड़ा जा सकता है। मगर यह अधि‍कार केवल पुरुषों को है कि‍ वो चाहे तो तीन तलाक बोलकर शादी तोड़ दे। सुनने में बहुत सहज लगता है मगर इसके पीछे की पीड़़ा और डर सि‍र्फ एक औरत ही समझ सकती है। अब तक यह होता आया था,  पर अब आगे नहीं हो सकेगा, इसकी उम्‍मीद नजर आने लगी है।

तीन तलाक का मुद्दा अभी छाया हुआ है। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चली कई दि‍नों तक। केंद्र सरकार ने अपना पक्ष साफ रखा है कि‍ इस्लाम में तीन तलाक जरूरी धार्मिक रिवाज नहीं है और वो इसका विरोध करती है। सरकार का तर्क है कि संविधान पुरुषों और महिलाओं को बराबरी का अधिकार देता है और अदालत को इसी आधार पर इस प्रथा की समीक्षा करनी चाहिए तो उधर मुस्‍लि‍म पर्सनल लॉ बोर्ड और कई मुस्‍लि‍म धर्मगुरु इसे धर्म से जुड़ा मसला बता रहे हैं। उनका कहना है कि‍ इस पर कोर्ट में कार्रवाई न हो। मगर सरकार और खुद मुस्‍लि‍म महि‍लाओं का मानना है कि‍ तीन तलाक मानवाधि‍कार और महि‍लाओं के अधि‍कार से जुड़ा मुद्दा है।

हम जरा पीछे मुड़कर देखें तो हमें शाहबानो प्रकरण याद आता है। इंदौर की शाहबानों के कानूनी तलाक भत्‍ते पर देश भर में राजनीति‍क बवाल मच गया था। मुस्‍लि‍म महि‍ला शाहबानों को उसके पति‍ मोहम्‍मद खान ने 1978 में तलाक दे दि‍या था। पांच बच्‍चों की मां थी शाहबानों और उम्र थी 62 वर्ष। गुजारा भत्‍ता पाने के लि‍ए कानूनी लड़ाई लड़ी। केस भी जीत लि‍या मगर भी उसे पति‍ से हर्जाना नहीं मि‍ल सका। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने शाहबानो केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पुरज़ोर विरोध किया। 

इस विरोध के बाद 1986 में राजीव गांधी की सरकार ने मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 1986 पारित किया।  इस अधिनियम के तहत शाहबानो को तलाक देने वाला पति मोहम्मद गुजारा भत्ता के दायित्व से मुक्त हो गया था। तलाक-तलाक-तलाक कहकर अपनी जि‍ंदगी से पत्‍नी को बेदखल करने के इतने वर्षों बाद भी मुस्‍लि‍म महि‍लाओं की स्‍ि‍थति‍ में कोई परि‍वर्तन नहीं आया है। 

इस घटना के बाद यह मुद्दा तब गर्म हुआ जब उतराखंड की रहने वाली शायरा को उसके पति‍ ने चि‍ट्ठी भेजकर तलाक दे दि‍या। शायरा की शादी इलाहाबाद के रिजवान से 2002 में हुई थी।  पहले तो रिजवान उसे बहुत प्रताड़ित करता था, जिसके बाद रिजवान और शायरा अलग-अलग रहने लगे थे। एक दिन रिजवान ने चिट्ठी भेजकर शायरा को तीन बार तलाक कह दिया।

शायरा का कहना है कि‍ शादी के पहले ही दिन रिजवान उस पर अत्याचार करने लगा। अप्रैल 2015 में पति रिजवान ने तीन बार तलाक कहकर शायरा से नाता तोड़ लिया। शायरा ने यह भी आरोप लगाया है कि उसके शौहर ने उसका 6 बार जबरन अबॉर्शन करवाया है और वह उस पर गर्भनिरोधक गोलियां खाने के लिए भी दबाव बनाता था। शादी के 15 साल बाद ये रि‍श्‍ता तब टूटा, जब उसके घर तलाकनामा पहुंचा। शायरा की सुप्रीम कोर्ट से मांग है कि उसे अपने भरण-पोषण दो बच्चों की कस्टडी चाहिए।

सोशलॉजी से ग्रेजुएट शायरा न्‍याय के लिए अड़ी हुई है। खुलकर कहती हैं कि इस्लाम धर्म में पुरूषों के मुकाबले महिलाओं को बेहद कम अधिकार दिए गए हैं। उनके मुताबिक जब शादी सैकड़ों लोगों की मौजूदगी में तमाम रस्मों व दूल्हा और दूल्हन की रजामंदी के बाद ही पूरी मानी जाती है तो तलाक सिर्फ पुरूषों को अकेले में भी तीन बार बोलकर या लिखकर कह देने से क्यों मान लिया जाता है। बहुत वाजि‍ब सवाल है। 

 सुप्रीम कोर्ट में 23 फरवरी, 2016 को दायर याचिका में शायरा ने गुहार लगाई है कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी)  के तहत दिए जाने वाले तलाक-ए-बिद्दत यानी तिहरे तलाक, हलाला और बहुविवाह को गैर-कानूनी और असंवैधानिक घोषित किया जाए। गौरतलब है कि शरीयत कानून में तिहरे तलाक को मान्यता दी गई है। इसमें एक ही बार में शौहर अपनी पत्नी को तलाक-तलाक-तलाक कहकर तलाक दे देता है। 

 शायराबानों के बाद 28 वर्षीया आफरीन है जो इस तरह तीन तलाक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची हैं। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य और केंद्र सरकार, महिला आयोग समेत सभी पक्षों को इस मामले में नोटिस भेजकर जवाब मांगा है।आफरीन का आरोप है कि शादी के बाद से ही उनको दहेज के लिए ताने दिए जाते थे जो बाद में मारपीट में बदल गया। आफरीन की शादी 24 अगस्त 2014 को इंदौर के सैयद असार अली वारसी से हुई थी। 17 जनवरी, 2016 को शौहर ने स्पीड पोस्ट से तीन बार तलाक लिखकर भेज दिया।

इन दि‍नों तो तलाक फेसबुक, ई मेल, स्‍काईप और फोन के द्वारा दि‍या जाने लगा है। इन सबसे पुरूषों को तो कोई फर्क नहीं पड़ता मगर महि‍लाओं की स्‍थि‍ति‍ खराब हो जाती है। वह भावनात्‍मक और आर्थि‍क रूप से टूट जाती है। शौहर बच्‍चों का उत्‍तरदायि‍त्‍व नहीं लेना चाहता। यह सब नि‍यम महि‍लाओं के खि‍लाफ है और उनके अधि‍कार से वंचि‍त रखते हैं। 

उत्‍तराखंड की शायरा और जयपुर की आफरीन के अलावा भी ऐसे कई केस सामने आए हैं तीन तलाक की शि‍कार हुई हैं। उन्‍हें न तो मेहर की रकम ही मि‍ली और न भरण पोषण। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में शायरा के वकील बालाजी श्रीनिवासन का कहना है, ‘इस याचिका में शरीयत के दकियानूसी कानूनों को चुनौती दी गई है., इसलिए हंगामा हो रहा है। हमने याचिका में कुछ ठोस कानूनी मामलों का जिक्र किया है जिससे यह साबित होता है कि तिहरा तलाक, निकाह हलाला और बहुविवाह किस तरह से मुस्लिम औरतों को गुलाम बनाए रखने के तरीके हैं। साथ ही इस तरह के मामलों में आए कुछ मिसाल बने फैसलों का भी जिक्र किया है जो शायरा के केस में मददगार साबित हो सकते हैं। कुछ ऐसे विशेषज्ञों की टिप्पणियों और चर्चित सर्वे को भी दर्ज किया है जो इस ओर इशारा करते हैं कि इस तरह की प्रथाएं मुस्लिम औरतों पर एक तरह से हिंसा करने का एक जरिया बनी हुई हैं। 

इस संबंध में सोचने वाली बात यह भी है कि‍ तकरीबन 22 मुस्लिम देश, जिनमें पाकिस्तान और बांग्लादेश भी शामिल हैं, अपने यहां सीधे-सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से तीन बार तलाक की प्रथा खत्म कर चुके हैं। इस सूची में तुर्की और साइप्रस भी शामिल हैं जिन्होंने धर्मनिरपेक्ष पारिवारिक कानूनों को अपना लिया है। ट्यूनीशिया, अल्जीरिया और मलेशिया के सारावाक प्रांत में कानून के बाहर किसी तलाक को मान्यता नहीं है। ईरान में शिया कानूनों के तहत तीन तलाक की कोई मान्यता नहीं है।  कुल मिलाकर यह अन्यायपूर्ण प्रथा इस समय भारत और दुनियाभर के सिर्फ सुन्नी मुसलमानों में बची हुई है।

तीन तलाक के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षि‍त रखा है। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) ने अदालत से कहा कि उसने फैसला किया है कि वह काजियों के लिए एक दिशा-निर्देश जारी करेगा, जिसमें वे मुस्लिम महिलाओं द्वारा निकाह के लिए अपनी मंजूरी प्रदान करने से पहले उन्हें तीन तलाक प्रथा से बाहर निकलने का विकल्प प्रदान करेंगे।  

फैसला जो हो,  इसके पक्ष और वि‍पक्ष में धर्म और कानून की लड़ाई चले मगर इस सत्‍य से इंकार नहीं कि‍या जा सकता कि‍ तीन तलाक औरतों के अधि‍कार के खि‍लाफ है। अभिनेत्री और सामाजिक कार्यकर्ता शबाना आजमी ने एक बार फिर से तीन तलाक प्रथा की आलोचना की है। शबाना आजमी ने कहा है कि तीन तलाक अमानवीय प्रथा है और मुस्लिम महिलाओं के बुनियादी अधिकारों का उल्लंघन करता है। महि‍ला मुद्दों को प्रमुखता से उठाने वाली नाइस हसन कहती हैं कि‍ शाहबानों के समय मुस्‍लि‍म महि‍लाएं अपने हक को लेकर उतनी मुखर और तैयार नहीं थी जि‍तनी अब हैं।
महि‍लाएं सड़क पर उतर रही हैं।  तीन तलाक से मुक्‍ति‍ का नारा बुलंद है और उतनी ही बुलंद है महि‍लाओं की इच्‍छाशक्‍ति‍। बात मात्र इतनी है कि‍ परंपराओं के नाम पर हम गलत प्रथा का त्‍याग करेंगे। स्‍वस्‍थ समाज के लि‍ए गलत परंपराओं को त्‍यागना ही उचि‍त है। मुद्दा तलाक हो या कोई अन्‍य बुराई। लॉ कमिशन ऑफ इंडिया के पूर्व चेयरमैन ताहिर महमूद ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि तीन तलाक की जगह एक तलाक भी हो तो भी व्हाट्सऐप, ईमेल से तलाक़ देने की बीमारी रह ही जाएगी. इसलिए एकतरफ़ा तलाक़ की प्रक्रिया समाप्त होनी चाहिए. मर्द की मर्जी से से न होकर औरत-मर्द दोनों की रजामंदी से तलाक हो। यही उचि‍त है। 

क्‍या है तीन तलाक
.......................
इस्लाम में तलाक के तीन तरीके प्रचलि‍त हैं। पहला है तलाक-ए-अहसन। इस नि‍यम के अनुसार तलाक-ए-अहसन में शौहर बीवी को तब तलाक दे सकता है जब उसका मासिक चक्र न चल रहा हो (तूहरा की समयावधि)। इसके बाद तकरीबन तीन महीने की समयावधि जिसे इद्दत कहा जाता है, में वह तलाक वापस ले सकता है। यदि ऐसा नहीं होता तो इद्दत के बाद तलाक को स्थायी मान लिया जाता है। लेकिन इसके बाद भी यदि यह जोड़ा चाहे तो भविष्य में शादी कर सकता है और इसलिए इस तलाक को अहसन (सर्वश्रेष्ठ) कहा जाता है।
 दूसरे प्रकार के तलाक को तलाक-ए-हसन कहा जाता है. इसकी प्रक्रिया की तलाक-ए-अहसन की तरह है लेकिन इसमें शौहर अपनी बीवी को तीन अलग-अलग बार तलाक कहता (जब बीवी का मासिक चक्र न चल रहा हो) है। यहां शौहर को अनुमति होती है कि वह इद्दत की समयावधि खत्म होने के पहले तलाक वापस ले सकता है। यह तलाकशुदा जोड़ा चाहे तो भविष्य में फिर से शादी कर सकता है। इस प्रक्रिया में तीसरी बार तलाक कहने के तुरंत बाद वह अंतिम मान लिया जाता है।तलाकशुदा जोड़ा फिर से शादी तब ही कर सकता है जब बीवी किसी दूसरे व्यक्ति से शादी कर ले और उसे तलाक दे। इस प्रक्रिया को हलाला कहा जाता है।
 तीसरे प्रकार को तलाक-ए-बिद्दत कहा जाता है. इसमें तलाक की उस प्रक्रिया की बुराइयां साफ-साफ दिखने लगती हैं जिसमें शौहर एक बार में तीन तलाक कहकर बीवी को तलाक दे देता है. तलाक-ए-बिद्दत के तहत शौहर तलाक के पहले तीन बारशब्द लगा देता है या मैं तुम्हें तलाक देता हूंको तीन बार दोहरा देता है। इसके बाद शादी तुरंत टूट जाती है. इस तलाक को वापस नहीं लिया जा सकता। तलाकशुदा जोड़ा फिर हलाला के बाद ही शादी कर सकता है।

 कहते हैं कि तलाक-ए-बिद्दत या एक साथ तीन बार तलाक कहकर तलाक देने की प्रक्रिया यह सुनिश्चित करने के लिए शुरू की गई थी कि जहां जोड़े के बीच कभी न सुधरने की हद तक संबंध खराब चुके हैं या दोनों का साथ रहना बिल्कुल मुमकिन नहीं हैं वहां तुरंत तलाक हो जाए। 

''राष्‍ट्रसंवाद'' पत्रि‍का में छपा आलेख 


Tuesday, July 4, 2017

यूं भी होता है....




उस पर भरोसा नहीं करती
राई-रत्ती जितनी भी नहीं
मगर उसकी परेशानियों से
उतनी ही दुखी होती हूँ
जितना कि वो......
एक दिन भी उसको
याद नहीं करना चाहती
मगर एक पल ऐसा नहीं बीतता
जो उसकी याद के साये में न गुज़रे
जानती हूँ सच-झूठ के ताने-बाने से
बुना है उसने अपना जीवन
अपनी सहूलियत के हिसाब से
रिश्ते बनता और तोड़ता है वो
हर बार सोचती हूँ
इस बार तोड़ ही दूँ हर रिश्ता
जहाँ ठहरी एक बार
वहीं से वापस उलटे क़दम लौट जाऊँ
हज़ार बार कहा उसे
और उससे ज़्यादा ख़ुद को
दिल में जो हो प्यार तो नहीं है
मगर क्या कमाल कि बिन उसके
एक शाम नहीं गुजरती मुझसे
उलझी हूँ उसके संग ऐसे
जैसे उलझा हो ऊन का गोला
रब ने एक स्वेटर सा बुन दिया हमें
बने रहे साथ, उघड़े तो साथ-साथ
बचेगा बस टुकड़ा-टुकड़ा
किससे पूछे अब क़िस्मत का लेखा
किस गाँठ से जोड़ा किस डाल से तोड़ा
मेरा स्याह उसका सफ़ेद है
किसी के संग यूँ रहने में
जाने उस रब का क्या भेद है।


प्रभात खबर ' सुरभि' में 30 जुलाई 2017 को प्रकाशि‍त रचना 


Saturday, June 24, 2017

न नि‍काले कोई....


"ये ज़हर मेरे लहू में उतर गया कैसे".....रात भर गूंजती रही कमरे में मेहदी हसन की दर्द भरी आवाज.....
ऐसा ही होता है जब प्रेम और प्रेम से उपजा दर्द तराज़ू के दो पलड़ों में बराबर तुलता है। वक़्त ठहरा होता है। साल की सबसे छोटी रात सबसे लंबी कब हो जाती है .....यह दर्द के लहरों पर सवार उस प्रेमी से पूछिये जिसके हिस्से केवल फ़रेब आया हो।
मगर जब कोई खुद को किसी गहरी आवाज के साये में दर्द भरे शब्दों के बीच छोड़ देता है ....तो यह मान लेना चहिये कि अब दर्द पीना आ गया उसे। न देता हो तो न दे कोई हाथ....न निकाले कोई उसे फिर से छोड़ जाने को।
कितना मज़ा है ग़म में कि मदिरा की घूँट पहली बार हलक से उतरे ....आह....जलन का अपना मज़ा है।
ओ जालिम....तुम्हें नहीं पता....खुद को खुद ही सँभालने से अच्छी कोई शै नहीं होती इस दुनियां में .....जाओ कि दर्द से उफ़ नहीं करता कोई.... फिर गूंजने लगी वो ही आवाज..... मैं होश में था.....


Sunday, June 18, 2017

पि‍ता


लोरि‍यों में कभी नहीं होते पि‍ता
पि‍ता होते हैं
अाधी रात को नींद में डूबे बच्‍चों के
सर पर मीठी थपकि‍यों में

कौर-कौर भोजन में
नहीं होता पि‍‍‍‍ता के हाथों का स्‍वाद
पि‍ता जुटे होते हैं
थाली के व्‍यंजनों की जुगाड़ में

पि‍ता कि‍स्‍से नहीं सुनाते
मगर ताड़ लेते हैं
कि‍स ओर चल पड़े हमारे कदम
रोक देते हैं रास्‍ता  चट्टान की तरह

पि‍ता होते हैं मेघ गर्जन जैसे
लगते हैं तानाश्‍ाााह
दरअसल होते हैं वटवृक्ष
बाजुओं में समेटे पूरा परि‍वार

जीवन में आने वाली कठि‍नाइयों को
साफ करते हैं पि‍ता
सारी नादानि‍यों को माफ़ करते
आसमान बन जाते हैं पि‍ता

जीवन भर छद्म आवरण ओढे़
नारि‍यल से कठोर होते हैं पि‍ता
एक बूंद आंसू भी
कभी नहीं देख पाता कोई

मगर बेटी की वि‍दाई के वक्‍त
उसे बाहों में भर
कतरा-कतरा  पि‍‍‍‍घल जाते हैं पि‍ता
फूट-फूट कर रोते हुए
आंखों से समंदर बहा देते हैं पि‍‍‍‍ता

Tuesday, June 6, 2017

नेतरहाट : खूबसूरती सुबह और शाम की




अब शाम का रंग बदलने लगा थ्‍ाा। सूरज के आसपास नारंगी रंग फैला था। एक के बाद एक पहाड़ दूर तक नजर आ रहे थे। लोगों का ध्‍यान सब तरफ से हटकर सूरज की ओर था। आसमान साफ था, सो हम आराम से देख पा रहे थे कि‍ कैसे सूरज के आसपास लालि‍मा बढ़ती जा रही है और गहरे होते आसमान में सूरज कि‍तना खूबसूरत लगने लगा।

धीरे-धीरे सूरज डूब गया। अब हल्‍का उजाला था। लोग वापस  जाने लगे। पर अब हम वहां आराम से बैठे थे। चाय के साथ आलू की पकौड़ी बनावाई क्‍योंकि‍ दुकान में प्‍याज खत्‍म हो गया था। आसपास एक दो घर थे। कुछ गांववाले बैठे थे। पर्यटक सारे जा चुके थे।


आसमान में चांद चमक रहा था। सखुआ के फूल चुनने लगे हमलोग। वादि‍यां और मनमोहक लगने लगी। शांत वातावरण में ऐसा लगा जैसे कोई बासुंरी बजा रहा हो। जरूर वो चरवाहा मधुर बांसुरी बजाता होगा जि‍सके आकर्षण में बंधकर मैग्‍नोलि‍या को प्‍यार हो गया होगा उससे। अद्भुत है जगह..जहां एक प्रेम कहानी जि‍ंदा है। वहां चरवाहे और मैग्‍नोलि‍या के प्रेम की तस्‍वीरें उकेरी हुई हैं। उस घोड़े की भी प्रति‍मा है जि‍सके साथ वो लड़की कूद गई थी घाटि‍यों में।  अब हमें जाना था। एक प्रेम कहानी को मन में गुनते हुए वहां से वापस आए।


वन वि‍भाग के रेस्‍ट हाउस में ठहरना था हमें। हम सब नि‍कल पड़े। रास्‍ते में प्रसि‍द्ध नेतरहाट वि‍द्यालय मि‍ला। कुछ देर वहां रूककर देखा हमने। कैंपस के अंदर नहीं गए क्‍योंकि‍ शाम ढल गई थी। नेतरहाट वि‍द्यालय की स्‍थापना 15 नवंबर1954 में हुई थी। 24 जुलाई 1953 को इस वि‍द्यालय की स्‍थापना का निर्णय लि‍या गया था। इसका श्रेय जाता है सर पि‍यर्स को, जि‍नके प्रयास से एक ऐसे आवासीय वि‍द्यालय की स्‍थापना हुई, जि‍सके छात्रों ने अनेकानेक क्षेत्रों में अपने नाम की कीर्ति फैलाई ।  भारतीय शि‍क्षा जगत में सर पि‍यर्स का अतुलनीय योगदान है। जाति‍ से अंग्रेज होने पर भी उन्‍होंने भारत को अपनी कर्मभूमि‍ मान लि‍या था। नेतरहाट का चयन इसलि‍ए कि‍या गया क्‍योंकि‍ ग्रामीण परि‍वेश और वहां की जलवायु उत्‍तम थी। 

 दरअसल इस तरह के आवासीय वि‍द्यालय की मांग तत्‍कालीन बि‍हार के धनी वर्ग की थी, जो अपने बच्‍चों को सि‍ंधि‍या, दून आदि‍ दूर के स्‍कूलों में भेजने के बजाय पास ही कोई वैसा स्‍कूल चाहते थे, जि‍समें वैसी सुवि‍धाएं हों।  वि‍द्यालय में शि‍क्षा का माध्‍यम हि‍ंदी है और नामांकन परीक्षा के आधार पर होता है। हालांकि‍ अब पहले सी उज्‍जवल छवि‍ नहीं, कई और स्‍कूलों का परीक्षाफल भी अच्‍छा होने लगा है पर एक वक्‍त था जब इसी वि‍द्यालय का डंका बजता था।

 इस सुरम्‍य स्‍थल को सामने लाने का श्रेय सर एडवर्ट गेट तत्‍कालीन लेफ्टि‍नेंट बंगाल, बि‍हार एवं उड़ीसा को  जाता है। उन्‍हें यहां की प्रकृति‍क सुंदरता से प्रेम था। उन्‍होंने ही अपने आवास राजभवन शैले हाउस का नि‍र्माण के  साथ-साथ अन्‍य बुनि‍यादी संरचनाएं भी स्‍थापि‍त की। शैले लकड़ी की एक भव्‍य इमारत है। नेतरहाट वि‍द्यालय  के प्रथम सत्र के छात्र इसी इमारत में पढना शुरू कि‍ए थे।

अब हम अपने पड़ाव की ओर अग्रसर थे। वन वि‍भाग के रेस्‍ट हाउस में जाकर आराम करना था। बहुत मोहक और खूबसूरत बना हुआ है रेस्‍ट हाउस। शाम की दूसरी चाय यहीं पी हमने और ढेर सारी बातें भी की। बच्‍चे बैडमि‍ंटन खेलने में लग गए।  कुछ देर बाद जब चांदनी रात में टहलने नि‍कले तो चीड़ के दरख्‍त और यूकोलि‍प्‍टस की गगन छूते पेड़ देखकर हमें रोमांच हो आया। रातरानी की खूश्‍बू से परि‍सर महक रहा था।


मगर यहां नेटवर्क की समस्‍या थी। न रि‍लाइंस का फोन कार्य कर रहा था न जि‍यो न वोडाफोन। बस ऐयरटेल का एक नंबर चालू था। दूसरी दि‍क्‍कत यह कि‍ बहुत छोटी जगह है। खाने-पीने के सामान मि‍लने में भी परेशानी होती है। स्‍थानीय बाजार साप्‍ताहि‍क है, इसलि‍ए सब्‍ि‍जयों की भी आमद कम है। होटल भी कम ही हैं और ऐसे दुकान भी जहां से सामान लि‍या जा सके। हालांकि‍ कुछ घर ऐसे नजर आए हमें जि‍से देखकर लगा कि‍ उनलाेगों ने अपने घर को गेस्‍ट हाउस में तब्‍दील कर दि‍या है। यह देखकर वाकई बहुत दुख होता है कि‍ इतनी खूबसूरत जगह को सरकार तरीके से डेवलप करे तो कि‍तने लोग आएंगे यहां। नेतरहाट को यूं ही 'छोटानागपुर की रानी' नहीं कहा जाता। वाकई बहुत खूबसूरत वादि‍यां हैं मगर उपेक्षा की शि‍कार।


हमारा खाना यहीं रेस्‍ट हाउस में बना। कुछ लोग जगह की तलाश में आए वहां मगर बि‍ना बुकि‍ंग के संभव नहीं था ठहरना। खाने के बाद सबलोग एक बार फि‍र टहलने नि‍कले। गर्मी कम थी। रांची का मौसम तो अब बहुत बदल गया है। बि‍ना एसी के काम नहीं चलता। मगर बाहर तो ठंढी हवा थी और रात कमरे में एक पंखे से काम चल गया। हमें सूर्योदय के लि‍ए सुबह उठना था मगर सोने को कोई तैयार ही नहीं था। मुश्‍कि‍ल से दो-तीन घंटे की नींद ले पाए। सुबह चार बजे सारे लाेग उठकर तैयार।


सूर्योदय के लि‍ए पता लगा कि‍ राज्‍य पर्यटन वि‍भाग का होटल है प्रभात वि‍हार होटल, वहीं जाना होगा। हम सब तुरंत वहां के लि‍ए नि‍कले। पहंचे तो पता लगा कि‍ होटल और आसपास बन रहे बि‍ल्‍ड़ि‍ग के ऊपर चढ़कर लोग देखते हैं सूरज का नि‍कलना। हमें लगा इससे कही बेहतर है अपने रेस्‍ट हाउस के उस प्‍वाइंट से देखना जो खास इसके लि‍ए बनाया गया है। वहां के कर्मचारी ने कहा भी था कि‍ यहां से बहुत अच्‍छा दि‍खता है, आप देख सकते हैं।
अब वापस रेस्‍ट हाउस। उजाला फैलना शुरू ही हुआ था। सूरज नि‍कलने में देर थी। बच्‍चे आनंद लेने लगे। सामने घना जंगल। परतों में पहाड़ दि‍ख रहा था। आसपास चीड़ के पेड़ थे। गुलमोहर के फूल जमीन पर गि‍रे थे। बच्‍चे चीड़ के फल जमा करने लगे तो कभी ट्री हाउस पर चढ़कर सूरज को आवाज लगाने लगे। पूरब की तरफ पहाड़ों के ऊपर, चीड़ की पत्‍ति‍यों के पीछे से सूरज नि‍कलने लगा। हल्‍की धूंध के पीछे से नि‍कलता सूरज सबको रोमांचि‍त कर रहा था। वैसे भी शहराें में लोग कहां देख पाते हैं सूर्योदय। सूरज की पहली कि‍रण का स्‍पर्श कि‍तना सुखकर हो सकता है..यह देर से बि‍स्‍तर छोड़ने वालों को क्‍या पता।


कुछ देर बात सूर्य की रश्‍मि‍यां फैल गईं सब ओर। हम भी बि‍खर गए अपने अपने पसंद की जगह देखने के लि‍ए। फोटोग्राफी के लि‍ए सबसे अच्‍छा समय होता है।

 मैं कैमरा थामे नि‍कल गई वहीं। देखा दूर जंगल में लोग पानी की बोतल थामे चले जा रहे है। अब लोटे का रि‍वाज खत्‍म हुआ न.....सरकार का नारा अभी हर जगह स्‍वीकार्य नहीं। शायद वो सोच नहीं सो शौचालय भी नहीं। अब नजरें घुमाकर देखा। फूलों का रंग और चटख था। यूकोलि‍प्‍टस के सफेद , चि‍कने तने और गगनचुंबी डालि‍यों ने हैरत में डाला हमें। बेगनबोलि‍या की सफेद, गुलाबी फूल मन मोह रहे थे तो तरह-तरह के फूलों से जमीन पटी हुई थी। पेड़ से गि‍रे भूरे पत्‍ते और पेड़ों पर लगे हरे पत्‍ते मि‍लकर अद्भुत दृश्‍य बना रहे थे। हमने खूब तस्‍वीरें ली।


अब सूरज की गर्मी महसूस होने लगी। हमें वापस जाना था आज ही क्‍योंकि‍ अचानक प्‍लान बना कर आए थे। गर्मी देखकर ये लगा कि‍ दि‍न में कहीं घूमना संभव नहीं होगा। इसलि‍ए बेहतर है एक बार और घूमने के लि‍ए जाड़ों में आए जाए। यहां आसपास कई फॉल है। ऊपरी घाघरा झरना नेतरहाट से चार कि‍लोमीटर की दूरी पर है और नि‍चली घाघरा झरना 10 कि‍लोमीटर की दूरी पर। हालांकि‍ पता चला कि‍ गर्मी के कारण पानी कम है अभी इसलि‍ए जाने का कोई फायदा नहीं।


हमारा मन लोध झरना जाने का जरूर था। इसे झारखंड का सबसे ऊंचा झरना माना जाता है। कहते हैं कि‍ झरने के गि‍रने की आवाज आस-पास 10 कि‍लोमीटर तक सुनाई पड़ता है। यह नेतरहाट से 60 कि‍लोमीटर की दूरी पर बुरहा नदी के पास है।  मगर सभी लोग जाने के लि‍ए तैयार नहीं हुए। सुबह के चार बजे उठने की आदत नहीं कि‍सी की सो सब अलसाए लगे। हमने तय कि‍या कि‍ कुछ दि‍नों बाद फि‍र आएंगे यहां।


अब हमने सामान समेटा और नि‍कल गए। थोड़ी दूर पर नाशपती का बगान मि‍ला। फल लदे थे मगर कच्‍चे थे अभी। अब वापसी में वही सब नजारा। घने दरख्‍त, कोईनार या कचनार के पेड़..चीड़ के ऊंचे पेड़ और बांस के घने जंगल से आती सरसराहट की आवाज। रास्‍ते में नदी मि‍ली जि‍सका पानी कम था।



हां, इस वक्‍त आम के पेड़ के नीचे बच्‍चे कम थ मगर सड़कों पर लकड़ी ले जाते कई लोग मि‍ले। खासकर औरतें। सड़क पर जगह-जगह कुछ सूखने के लि‍ए डाला हुआ था। देखा..ये कटहट के बीज थे। जब कटहल पक जाते हैं तो उनके बीज नि‍कालकर सब्‍जी बनाई जाती है।
मैंने अक्‍सर देखा है गांव में पक्‍की सड़क पर कभी धान सूखने डाला होता है तो कभी महुआ। आज कटहल के बीज देखे वो भी बहुत सारे। धूप सर पर थी। सड़कों में सन्‍नाटा। बच्‍चे सो गए थे सारे। हमें भी नींद आ रही थी। लगभग चार घंटे का सफ़र था और उसके बाद हम अपने घर में। जल्‍दी ही दोबारा आने के वादे के साथ।





Sunday, June 4, 2017

नेतरहाट - बांस के जंगल या चीड़ वन



बचपन से सुना है नेतरहाट के बारे में। एक तो वहां का सूर्योदय और सूर्यास्‍त, दूसरा नेतरहाट वि‍द्यालय, जो अपने शि‍क्षा के कारण बेहद प्रसि‍द्ध है। बि‍हार बोर्ड की परीक्षाओं में माना जाता था कि‍ प्रथम दस तक का स्‍थान नेतरहाट आवासीय वि‍द्यालय के बच्‍चे ही प्राप्‍त करते थे।

यह संयोग ही रहा कि‍ देश के अनेक जगहों में जाना हुआ मगर अपने ही झारखंड के इस सुरम्‍य वादि‍यों में जा नहीं पाई। शायद मन में यह भाव रहा हो कि‍ यह तो अपने घर के पास ही है। जब चाहे जाया जा सकता है। हुआ भी ऐसा ही। आनन-फानन में नेतरहाट जाने की योजना बनी और 2 घंटे के अंदर परि‍वार के कुछ लोगों के साथ नि‍कल पड़ी।

रांची से नेतरहाट की दूरी करीब 155 कि‍लोमीटर है। यह क्षेत्र लातेहार जि‍ले में पड़ता है। कुड़ू के बाद लोहरदगा, फि‍र घाघरा से दाहि‍नी ओर मुड़ना पड़ा नेतरहाट के लि‍ए। रास्‍ता अच्‍छा और जाना पहचाना था, सो आराम से चल दि‍ए हम। घर से नि‍कलते ही दोपहर हो गई थी। समय बचाने के लि‍ए खाना घर ही से पैक कर लि‍ए और चल पड़े। लोहरदगा के पहले एक जगह रास्‍ते में रूककर हमलोगों ने भोजन कि‍या और आगे नि‍कले।

गर्मी का दि‍न.. दोपहर की धूप मगर पूरे रास्‍ते हरि‍याली। आम से लदे पेड़ और नीचे बच्‍चों का जमावड़ा। कोई पत्‍थर चला कर आम तोड़ रहा है तो कोई गुलेल से नि‍शाना साध पके आम जमीन पर गि‍रा रहा है। लड़कि‍यां भी कम नहीं थी। खूब ढेला चलाती दि‍खीं। कुछ बच्‍चि‍यों ने अपने फ्राक में आम समेट रखा था और कुछ तुरंत गि‍रे आमों का स्‍वाद ले रहे थे।


सच कहूं..तो अपना बचपन याद आ गया। आम चुनने के चक्‍कर में कभी गर्मी का अहसास हुआ ही नहीं। सारी दोपहर आम के बगीचे में बीतता था। पूरे रास्‍ते इन पेड़ों और बच्‍चों को देखकर अहसास हुआ कि‍ वाकई फलदार पेड़ लगाना परोपकार का कार्य है। मेरे जैसा कोई भी पथि‍क अपनी इच्‍छा पूरी कर सकता है अपने ही हाथों आम ताेड़ कर खाने की।

खैर ..इन्‍हीं नजारों के बीच झारखंड के सुंदर गांवों को पार करते हम पहुंचे बनारी गांव। इसके बाद सड़क ऊपर की तरफ जाने लगी। गोल-गोल चक्‍कर खाती सड़कें। ऐसा लगा कि‍ हम कि‍सी पहाड़ पर चढ़ रहे। पि‍छले वर्ष डलहौजी गए तो ऐसा ही लगा था बि‍ल्‍कूुल। नेतरहाट समुद्रतल से 3622 फीट की ऊंचाई पर है। हम जरा आगे बढ़े तो सड़क कि‍नारे बंदर नजर आए, जैसा कि‍ हर पहाड़ी स्‍थल पर दि‍खता है।


हम चक्‍कर खाते ऊपर की ओर जा रहे थे। सड़क के दोनों तरफ बांस का जंगल था। हमने पहली बार बांस का जंगल देखा। अब जाकर नेतरहाट के नाम का अर्थ भी समझ आया। नेतरहाट नाम इस लि‍ए पड़ा कि‍ नेतुर का अर्थ (बांस) होता है और हातु यानि‍ (हाट)। इन दोनों को मि‍लाकर बना नेतरहाट। बहरहाल हम बांस के जंगल के बीच से गुजर रहे थे। बीच-बीच में कचनार के पेड़ भी नजर आ रहे थे। कचनार के फूल बेहद खूबसूरत होते हैं। यहां आदि‍वासी जनजीवन में कचनार के कोमल पत्‍ति‍यों का साग खाया जाता है। बहुत स्‍वादि‍ष्‍ट होता है यह साग। और फूलों की सुंदरता से तो सभी परि‍चि‍त ही हैं।

हम जंगल की सुंदरता नि‍हारते हुए आगे चलते गए। मन में डर भी था कि‍ कहीं सूर्यास्‍त रास्‍ते में ही न हो जाए। बीच जंगल में जाने की इच्‍छा होते हुए भी समय का ख्‍याल रखते हुए हम नहीं रूके। अब जंगल का दृश्‍य बदलने लगा था। बांस का जंगल साल के ऊंचे लंबे पेड़ और चीड़ के दरख्‍तों के जंगल में बदल चुका था। हम खुशी और आश्‍चर्य से चीख ही पड़े....हमारे झारखंड में चीड़ के जंगल..हमें आजतक पता ही नहीं। दि‍या तले अंधेरा इसीलि‍ए कहा जाता है। यहां ऊंचे यूकोलि‍प्‍टस के पेड़ भी हमारा स्‍वागत कर रहे थे।


हम मुग्‍ध भाव से आसपास देखते आगे बढ़ चले। शाम 5 बजे हम नेतरहाट में थे। पूछने पर पता लगा कि‍ सनसेट प्‍वांट यहां से करीब दस कि‍लोमीटर की दूरी पर है। अब वक्‍त नहीं था कुछ देखने-सुनने का। हम सीधे पहुंचे सूर्य डूबने का नजारा देखने। रास्‍ते में एक खूबसूरत बड़ा सा तालाब दि‍खा, जो कि‍सी झील की तरह लग रहा था। 

जब हम सनसेट प्‍वांइट पहुंचे तो सूर्य अस्‍तचलगामी था। एक बछड़ा अपनी मां का दूध पी रहा था। अवि‍ ने रूककर गौर से देखा। तस्‍वीर भी ली। आगे बढ़े तो लोगों की भीड़भाड़ थी। सरकार ने सौंर्दयीकरण करा दि‍या है। बैठने के लि‍ए शेड की व्‍यवस्‍था है तो ऊपर से नजारा देखने का जगह भी। मतलब ऐसी जगह जहां शाम प्राकृति‍क नजारे देखकर बि‍ता सके। 


हम जैसे ही बढ़े..सड़क पर भूरे रंग के फूल बि‍छे थे। जैसे हमारा स्‍वागत कर रहे हो। ऊपर नजरें उठाकर देखा तो साल के पेड़ फूलों से लदे थे। ऊपर नीले आकाश में आधा चांद दमक रहा था। पश्‍चि‍म में आकाश पीला था। दो तीन पहाड़ि‍यां नजर आ रही थी। मुझे डलहौजी की पहाड़ि‍यां याद आई। ऐसा ही खूबसूरत लगता था वहां भी। नेतरहाट पठार के नि‍कट की पहाड़ि‍यां सात पाट कहलाती हैं। आंखों को ऐसा आभास हुआ कि‍ सातों पहाड़ दि‍ख रहे हैं सूरज की पाली रौशनी में चमकते हुए। 



सखुआ के जंगल के बीच है यह स्‍थल। आसपास की मि‍ट्टी का रंग लाल था और बैरि‍केटि‍ंग के बाद एक सुंदर स्‍त्री-पुरुष की प्रति‍मा भी थी। लड़की के हाथ में बास्‍केट और लड़के के हाथ में बांसुरी। स्‍वभावि‍क है जि‍ज्ञासा ठाठें मारने लगी मेरे दि‍माग में कि‍ प्रति‍मा क्‍यों बनाई गई यहां। 

पता चला,  लड़की का नाम मैग्‍नोलि‍या  था।  मैग्‍नोलि‍या एक अंग्रेज अधि‍कारी की बेटी थी। गांव में एक चरवाहा रहता था। वह प्रति‍दि‍न अपने मवेशि‍यों को लेकर जंगल में एक स्‍थान पर जाता, जहां से खूबसूरत आसमान से देखते-देखते घाटि‍यों में छुपता था सूरज। वह बहुत मधुर बांसुरी बजाता था।  मैग्‍नोलि‍या को इसी आदि‍वासी चरवाहे से प्‍यार हो गया। वह रोज चरवाहे की बांसुरी सुनने के लि‍ए वहां जाती। 

जब अंग्रेज 
अधि‍कारी को इसका पता लगा तो बहुत नाराज हुआ। उसने चरवाहे को समझाने की कोशि‍श की। जब नहीं माना तो उसने चरवाहे को मरवा दि‍या। मैग्‍नोलि‍या को जब इसका पता लगा तब वि‍रह से व्‍याकुल होकर इसी स्‍थान पर आई और अपने घोड़े सहि‍त यहां से नीचे घाटी में कूद कर अपने जीवन काे समाप्‍त कर लि‍या। उसी की याद में बना है यह सनसेट प्‍वांइट जि‍से नाम दि‍या गया मैग्‍नोलि‍या प्‍वांइट। आज भी वह पत्‍थर मौजूद है जि‍स पर बैठकर वो चरवाहा बांसुरी बजाया करता था।   जाने कथा सच्‍ची है या गढ़ी हुई, मगर लोगों को आकर्षि‍त करती है। 



अब लोगों की भीड़ बढ़ती जा रही थी। कुछ लोग हमारी तरह कैमरा हाथ में पकड़े पश्‍चि‍म की ओर टकटकी बांधे बैठे थे। धूप से पत्‍ति‍यां चमक रही थी। सखुआ के फूल जमीन पर थे और खुश्‍बू हवाओं में । परि‍सर में एक चाय की दुकान थी। वहां लोगों की भीड़ लगी हुई थी। गरमागरम पकौडि‍यां नि‍कल रही थी। लोग चाय-पकौड़ी के साथ शाम का आनंद ले रहे थे। सूखे पेड़ के ठीक बगल में सूर्यास्‍त का नजारा सबसे सुंदर लगेगा, इस अहसास के साथ मैं वहीं खड़ी रही।

क्रमश: