Thursday, July 11, 2024

वाणभट्ट की आत्मकथा बनाम गाँव की व्यथा


अपनी छोटी सी लाइब्रेरी में एक किताब ढूंढ़ रही थी कि अचानक नजर पड़ी एक पीली सी, फटी जिल्दवाली किताब पर। जैसे कितने दिन से बीमार पड़ी हो और सेवा-सुश्रुषा के लिए इंतजार कर रही हो। उत्सुकतावश उसे रैक से निकाला। किताब थी हजारी प्रसाद द्विवेदी की 'वाणभट्ट की आत्मकथा।' 1974 में प्रकाशित 8 रुपए 50 पैसे मूल्यवाली पुरानी किताब थी। मैं यह देखकर हैरान हुई कि यह कोई खरीदी हुई नहीं, बल्कि लाइब्रेरी की किताब है, जिसमें रामेश्वर सिंह पुस्तकालय, ओरमाँझी की मुहर लगी थी।

किताब के हाथ में आते ही अचानक मेरा गाँव मेरे जेहन में करवटें बदलने लगा। जी हाँ, ओरमाँझी मेरे गाँव का नाम है। राँची शहर से महज 20-22 किलोमीटर दूर। अब तो वहां तक पहुँचने के लिए चौड़ी सड़क बन गई है। सड़क के दोनों ओर बाजार बन गए हैं, दुकानें खुल गई हैं। पहले सा वहां अब कुछ भी नहीं रहा। लोगों की आवाजाही, भीड़ और शोर-शराबे में मेरा वह गाँव अब गुम हो गया है जिसकी याद रामेश्वर सिंह पुस्तकालय की मुहर लगी इस किताब ने दिला दी है।

 'वाणभट्ट की आत्मकथा' हाथ में पकड़े सोच रही हूँ कि लाइब्रेरी की यह किताब भला मेरे पास कैसे? हम शहरी हो चुके लोगों की स्मृतियाँ अब तकनीकों पर निर्भर रहने लगी हैं। मेरी स्मृतियाँ उस दौर की हैं जब इक्के-दुक्के घर में लैंडलाइन फोन हुआ करता था। टीवी नाम की कोई चीज होती है - यह पढ़ा तो था, मगर पहली बार तब देखा जब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या हुई थी, और गांव में एक अकेले घर में टीवी देखने के लिए इतनी भीड़ उमड़ पड़ी थी कि लगा कोई मेला हो। सामने बैठी भीड़ और पीछे खड़े बेशुमार लोग...और हम जैसे बच्चे उचक-उचक कर प्रधानमंत्री की अंतिम यात्रा देख रहे थे। हालांकि साल बीतते-बीतते हमारे घर भी ब्लैक एंड व्हाइट टीवी आ गया, जिसमें आनेवाले कृषि दर्शन का भी इंतजार बहुत शिद्दत से किया जाता था।

बाद के दिनों में लैंडलाइन फोन भी बहुत सामान्य सी बात हो गई थी, यानी एक मोहल्ले में दो-चार फोन तो होते ही थे। ये सारे फोन नंबर हमारी जुबान पर बसे होते। फोन नंबर के लिए डायरी पलटने की जरूरत नहीं पड़ती थी। हालांकि तब भी हमसब अपने पास छोटी सी फोन डायरी रखते थे, जहां सबके नंबर नोट रहा करते थे। लेकिन अभी याद करने की कोशिश कर रही हूं तो अपने बच्चे, पति और दोस्‍तों में भी किसी के मोबाइल का नंबर याद नहीं। मजे की बात यह कि मुझे खुद का दूसरा नंबर याद नहीं। जब जरूरत पड़ती है तो मोबाइल के फोन कॉन्टैक्ट में जाकर नंबर निकाल लेती हूँ।

 कह सकती हूँ कि तकनीकों ने हमें कई तरह की सुविधाएं दी हैं, लेकिन उसपर निर्भर होकर हमने अपना बहुत कुछ गवां दिया है। एक बड़ा हमला तो हमने अपनी स्मृतियों पर ही कर दिया है। अब आँकड़े और फैक्ट हमारी स्मृतियों में नहीं गूगल पर बसने लगे हैं। इसी खोई हुई स्मृति का नतीजा है कि मैं हैरत में हूं लाइब्रेरी को याद कर, जो मेरी स्मृति में नहीं रह गई थी। वाणभट्ट की आत्मकथा ने मानों कई स्मृतियों पर से धूल हटा दी। जेहन का एक पूरा परत धूलरहित कर दिया और मुझे मेरे गाँव की लाइब्रेरी बिल्कुल साफ-साफ दिखने लगी। सच बताऊं तो गाँव आते जाते कई बार यह ख्याल उठता रहा था कि गाँव में पढ़ने-लिखने का माहौल बनाने के लिए एक लाइब्रेरी खोलनी चाहिए। पर इस दौरान कभी मेरी स्मृति में रामेश्वर सिंह पुस्तकालय नहीं आया। 

गाँव में पुस्तकालय खोलने का इरादा इसलिए भी बनता रहा है कि गाँव मुझे प्रिय है। वहाँ का जीवन अब भी लगभग ऐसा ही है कि सूरज डूबने और उगने के साथ ही दिनचर्या खत्‍म और शुरू होती है। यद‍ि शाम ढलने के बाद के समय का सदुपयोग किया जाए, तो बहुत से बच्चों का जीवन और बेहतर हो जाएगा। ज्ञान और अनुभवों की निधि तो पुस्तकों से ही प्राप्त की जा सकती है न! 

मेरे मन में अनवरत चलते विचारों को इस सुखद हैरत ने थाम लिया कि ओरमाँझी में तो बकायदा पुस्तकालय हुआ करता था, जिसका प्रमाण है यह किताब। मगर इतनी महत्वपूर्ण बात भला मैं भूल कैसे गई...?

मेरे घर के ठीक सामने एक मंदिर हुआ करता था। हालांकि अब उसका वह अस्तित्व ही समाप्त हो गया जो मेरी यादों में है। समय के साथ सब परिवर्तित होता गया।अब तक मेरी यादों में बसे उस पुराने मंदिर को तोड़कर एक भव्य मंदिर का निर्माण हो चुका है। अब केवल मंदिर बचा है... मेरे बचपन में उस जगह खेल का मैदान था... वहां नाटक खेला जाता था... वहां छउ नृत्य का आयोजन होता था, वहां नेताओं के भाषण होते थे ..और तो और मदारियों का करतब भी वहीं देखते थे हम। मुख्य मंदिर में प्रति वर्ष दो बार माँ दुर्गा की प्रतिमा स्थापित की जाती थी और पांच दिनों का उत्सव मनाया जाता था। उसी मंदिर के अगल-बगल दो कमरे थे, जिसमें बाईं तरफ का कमरा पूजा-पाठ के दौरान सामान रखने के काम आता था और दाईं ओर वाले कमरे के ऊपर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था 'रामेश्वर सिंह पुस्तकालय।

मैं नहीं जानती रामेश्वर सिंह को, जिनके नाम पर यह पुस्तकालय खोला गया था, मगर वह मेरे लिए अभिनंनदनीय हैं,  जिन्होंने एक ऐसे गाँव में पुस्तकालय की स्थापना की, जहां मूलभूत सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं थीं। यह अलग बात है कि उनके नेक विचारों को संभालकर आगे बढ़ाने वाला कोई व्यक्ति नहीं मिला, वरना कम से कम पुस्तकालय का अस्तित्व तो नहीं मिटता।  

यादों पर पड़े जाले साफ करने से याद आता है कि अंदर लकड़ी के आलमीरे में खूब किताबें थीं...ठूसी हुईं-सी, जहां घुसने पर अजीब तरह की सीली गंध घेर लेती थी। शाम होते ही बल्‍ब की पीली रौशनी जब दरवाजे से बाहर न‍िकलकर बरामदे पर पड़ती तो पता चल जाता क‍ि गांव के ही रघु चाचा अपना द‍िन का काम खत्‍म कर अवैतनि‍क लाइब्रेरियन के रूप में कार्यभार संभालने आ गए हैं। 

मैं तब बहुत ही छोटी थी और मेरा उपयोग बस इतना था कि माँ मुझे भेजती थीं किताबें लाने के लिए। मुझे याद है उस समय माँ के माथे से पल्लू कभी सरकता नहीं था और किसी बाहरी आदमी से कुछ लेन-देन करना हो तो दरवाजे की ओट से उनका हाथ ही बाहर आता था। इसलिए इस आदान-प्रदान का माध्यम मैं ही बनती थी। 

हालांक‍ि उस समय पर्दा या घूंघट प्रथा नहीं थी क्‍योंक‍ि मां घर में आराम से साड़ी का पल्‍लू कमर में खोंसकर काम क‍िया करती थी। बस जब दादाजी घर के अंदर आते तो उनकी आहट म‍िलते ही सर पर पल्‍लू रख लेतीं थी मां। दादी कभी सर पर आंचल नहीं लेती थीं, मगर मां बाहर वालों और खासकर क‍िसी बुजुर्ग को देखते ही झट माथे पर आंचल खींच लेतीं।  

कई बार लाइब्रेरी बंद कर लौटते समय रघु चाचा मेरी माँ के लिए किताबें ले आते और दरवाजे से मुझे पुकारते। उस समय मां की रसोई का वक्‍त होता था इसल‍िए अपना नाम सुनकर मैं बाहर दौड़ती और पहले उनकी लाई किताब माँ को थमाती और वापसी में उनको माँ की पढ़ी हुई किताबें पकड़ा देती। 

मैं तो यह बात बिलकुल भूल गई थी कि इसी किताब को तीन बार रीन्यूवल कराने के बाद भी माँ की पढ़ने की इच्छा बरकरार रही तो उन्होंने इसका मूल्य चुकाकर अपने पास रख लिया था... और जाने कैसे यह मेरी लाइब्रेरी की किताबों के बीच चुपचाप छुपा रहा। तब गाँव की महिलाएँ उस पुस्तकालय तक नहीं जाती थीं... पुस्तकालय ही क्यों...सब महिलाएँ घर से बाहर बस तीन वजहों से निकलती थीं... उन्हें डॉक्टर के पास जाना हो, मंदिर जाना हो या फिर वोट देने। उनके पास चौथी कोई वजह नहीं थी, जिसके लिए देहरी से उनके पाँव बाहर आते। ऐसे माहौल में मेरी माँ का जबरदस्त पाठक होना अभी भी हैरान करता है मुझे।  

मुझे याद है, मेरे पिता अखबार नियमित रूप से पढ़ते थे मगर किताबों में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं थी, इसलिए माँ ही लाइब्रेरी की सदस्य बन गई थीं। जाने पि‍ता की रजामंदी से या छुपकर.. पता नहीं। उन दिनों गाँव में किताबों की दुकान नहीं होती थी, इसलिए पुस्तकालय ही एकमात्र जरिया था अपनी पढ़ने की भूख शांत करने का। दोपहर के एकांत में मां को हमेशा ही क‍िताब पढ़ते पाया था मैंने।

अतीत हमेशा से बहुत सुंदर और मोहक लगता है। अब याद करती हूं तो याद आता है कि जब मेरी उम्र कहानियां और उपन्यास पढ़ने की हुई, तब तक लाइब्रेरी बंद हो चुकी थी। वैसे किताब की दुकान तो अब भी नहीं है वहां, वहीं ही क्‍यों..शहरों में भी एक-एक कर सभी दुकानें बंद हो चली है...और अब सारा ज्ञान लोग मोबाइल से प्राप्त करते हैं। बदलते गांव को देखती हूं तो निराशा होती है। अब न वहां पहले की तरह प्यार है न व्यवहार। भले ही सिर से पल्लू उतर गया हो, औरतें हाट-बाजार करने लगी हैं, मगर यह किसी के ख्याल में नहीं आया कि मरती हुईलाइब्रेरी को बचा लिया जाए, या गाँव में पढ़ने की संस्कृति विकसित हो। बल्कि अब वो गाँव , कस्बा हो गया है और निरंतर कई होटल और मॉलनुमा दुकानें खुल गई हैं, मगर बौद्धिक विकास के लिए अब भी वहां कोई प्रयास नहीं किया जा रहा।   

उन दिनों साप्ताहिक बाजार में एक किताब की दुकान लगती थी, जिसमें चंपक, नंदन, मधु मुस्कान से लेकर राजन-इकबाल, गुलशन नंदा, रानू और सुरेंद्र मोहन की किताबें बिकती थीं। यह दुकान बाजार के एकदम अंतिम छोर पर लगा करती थी, जैसे कोई उपेक्षित चीज हो, जिसकी माँग ऐसी नहीं कि उसका सामने प्रदर्शन कर  ग्राहकों को आकृष्ट किया जाए। हालांकि मैं उस दुकान की नियमित ग्राहक थी क्योंकि माँ के लिए किताबें लाते-लाते पढ़ने का चस्का मुझे भी लग चुका था।

उन दिनों आस-पड़ोस की लड़कियां जो हाई स्कूल में पढ़ती थीं, सब माँ की दोस्त होतीं और मेरी बुआएं बन जातीं। स्कूल के बाद वो सब की सब माँ के पास आ जातीं और उनकी बैठकी जमती... फिर वो पत्रिकाएं, उपन्यास पूरे गांव में घूमते, जिसे शायद छुपाकर पढ़ा जाता, क्योंकि दादी के शब्दों में माँ काम का हर्जा कर किताबें पढ़ती थीं... इसलिए दादी को देखते ही किताबें छुपा दी जातीं।  

 हालांकि माँ बहुत काम करती थीं, और उन दिनों घर में मेहमानों का तांता सा लगा रहता था। तब न फोन था न ही पूछकर किसी के घर जाने का चलन। रिश्तेदार और दोस्त अचानक आ जाते और हफ्तों रहते। न उन्हें जाने की जल्दी होती न घरवालों को भगाने की हड़बड़ी। मिट्टी के चूल्हे पर खाना पकता और पाँत में बैठकर सब खाते। लकड़ी सुलगाते और उससे निकलते धुएँ से माँ की आँखें लाल हो जातीं, मगर कभी कोई शिकायत नहीं की।  तब न मिक्सी थी न फ्रिज...न ही गैस का चूल्हा... फिर भी बहुत कुछ पकातीं मेरी माँ... खुशी-खुशी। दूर गांव से कोई रेलयात्रा के लिए जाता, तो बीच रास्ते उतरकर घर आ जाता कि रात की गाड़ी है... दोपहर यहीं खा कर निकलेंगे और रात की रोटी बांध देना। न कहने वाले को हिचक, न देने वाले के माथे पर शिकन...

 बाजार से खरीदी हुई सब्जियों को ताजा रखने का एक जुगाड़ उस समय देखा था। पकी हुई सब्जी हो या बिना पकी हुई, उन्हें किसी बर्तन में रखकर रस्सी से उस बर्तन को बांध दिया जाता था और घर में बने गहरे कुएँ में पानी के पास लटका दिया जाता था। कच्ची सब्जियों को ताजा रखने का एक दूसरा उपाय था कि मिट्टी की जमीन पर सब सब्जियां रखकर उसके ऊपर जूट का बोरा भिंगाकर ढक दिया जाता। इस तरफ हफ्ते भर सब्जियां हरी रहतीं। यकीन मानिए मेरी यादों में उन सब्जियों का हरापन अबतक बचा रह गया है, जो अब फ्रिज भी नहीं बचा पाता। धनिया-पुदीना कभी बाजार से खरीदना नहीं पड़ता था। कुएँ के आसपास की जमीन पर धनिया-पुदीना के पौधे लहलहाते रहते, जब जरूरत हुई, जितनी जरूरत हुई तोड़ लिया। इन पौधों को पानी देने की भी जरूरत नहीं पड़ती थी। क्योंकि कुएँ के आसपास नहाने से लेकर बर्तन माँजने तक का काम होता था और इस दौरान बहने वाला पानी इन पौधों तक खुद पहुंच जाता था। उस पुदीने की जो महक हुआ करती थी, वह अबके पुदीने में नहीं मिलती।

लाइब्रेरी और किताबों की बात से ध्यान आया कि किसी क्लास की किताबें कैसे एक हाथ से दूसरे हाथ तक होती हुईं सालों साल विद्यार्थियों के काम आती थीं। कोर्स की किताबों का ऐसा उपयोग होता कि जैसे रेशा-रेशा वसूल करे कोई। पांचवीं कक्षा में जानेवाले छात्र के माता या पिता पहले से ही छठवीं कक्षा में जाने वाले बच्चे और उसके माता-पिता को कह देते कि उसकी किताब मुझे दे देना। परीक्षा समाप्त होने के बाद सीनियर बच्चे से किताबें ले ली जातीं।

 बड़े शौक और खुशी से परीक्षा परिणाम आने के पहले ही पुरानी जिल्द हटा दी जाती...भूरे रंग का, थोड़ा खुरदुरा खाकी पेपर आता। बच्चा अपनी माँ की सहायता से आटे को पकाकर उससे लेई (गोंद) तैयार करता। फिर एक-एक कर पुरानी किताबों पर नई जिल्द चढ़ती। उसे अच्छे तरीके से साटकर नया-सा बना दिया जाता। उन किताबों के ऊपर सफेद  कागज चिपकाया जाता और स्केल से लाइन खींचकर नाम लिखने की जगह बनाई जाती। मगर अभी नाम नहीं लिखा जाता, क्योंकि सीनियर बच्चा इस शर्त के साथ किताबें देता कि अगर वह फेल हुआ...तो वापस ले लेगा।

 हालांकि किताबें उन्हीं छात्रों से ली जातीं, जिन पर भरोसा होता कि वह फेल नहीं करेगा। यह सिलसिला तब तक चलता जब तक किताब फट न जाए और पढ़ने लायक न बचे। इस तरह किताबों के एक सेट से कई साल बच्चे पढ़ लेते। यह आपसी प्रेम का भी परिचायक है और बचत का भी। कोई बच्चा नाक सिकोड़कर फरमाइश नहीं करता  कि उसे नई किताबें ही चाहिए। परीक्षा परिणाम घोषित होने के बाद कॉपियाँ खरीदकर उन पर जिल्द चढ़ाई जाती और पिछले वर्ष की कॉपियों के बचे पन्ने को एक साथ सीलकर उनसे रफ कॉपी बनाई जाती।  

अब इस्तेमाल की यह प्रणाली गांवों से भी बाहर हो गई। ठहर कर सोचिए तो पता चलेगा कि इस व्यवस्था के खत्म होने के पीछे का कारण है हर वर्ष किताब के सेट में थोड़ा सा बदलाव। इससे एक ही घर का बच्चा आगे की कक्षा में पढ़ रहे भाई या बहन की किताबों का उपयोग नहीं कर पाता। खासकर निजी स्कूल मैनेजमेंट कमीशन के लालच में निजी प्रकाशकों की किताबें ही कक्षा में चलाते हैं और इस कारण विद्यार्थियों को नई किताबें खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ता है।

उन दिनों क्लास से बाहर की किताबें पढ़ने वाले बच्चों का अपना ग्रुप होता। एक किताब को सब पढ़ते..एक-एक कर। स्कूल के बाद वाला समय जुगाड़ और खेल का होता। पहले मानसिक संतुष्टि के लिए किताब की खुराक जमा की जाती, फिर बाहर खेलते भागते बच्चे। कल्पनाओं की दुनिया में घिरे बालक कभी जमीन खोदकर पाताल में बौने ढूंढ़ने की कोशिश करते तो कभी उड़ने वाले ड्रैगन तलाशते। गांव के बच्चे खेल-खेल में प्रकृति को जानते-समझते।

आजकल के बच्चों से पूछा जाए तो वे शायद पपीता और पाकड़ के पेड़ भी न पहचानें, मगर ग्रामीण बच्चे खेल-खेल में शिक्षा ग्रहण करते।  एक खेल हुआ करता था- अत्ती -पत्ती कौन पत्ती। सब बच्चे एक जगह इकट्ठा होते और उनमें से एक बच्चा निकलकर दौड़ जाता गांव में किसी भी ओर और किसी पेड़ की पत्ती तोड़ लाता। बाकी बच्चों को उसे पहचानना होता कि किस पेड़ की पत्ती है। जो जवाब नहीं दे पाता, उसकी बारी होती कि वह कोई ऐसा पत्ता लाए, जिसे पहचानना कठिन हो। इस क्रम में छोटी उम्र से ही बच्चे लगभग सभी पेड़-पौधे पहचानने लगते थे, जिससे आगे जाकर उनका प्रकृति से गहरा जुड़ाव हो जाता था। बच्‍चे सभी पेड़ पौधों की व‍िशेषता से वाकि‍फ होते थे और अनजाने ही प्रकृत‍ि की सुरक्षा की भावना उनमें घर कर जाती थी। आम की गुठली खाकर फेंकने पर भी उसमें पत्‍ते न‍िकल आते तो बड़े एहत‍ियात से उसे ऐसी जगह रोप द‍िया जाता ज‍हां उसे पेड़ बनने में कोई परेशानी न हो। अब तो गांवों में भी जगह म‍िलना मुश्‍क‍िल हो गया है। घर और उसके चारों ओर इंच-इंच को पक्‍का करना शायद शहरी और अमीर होने की न‍िशानी मान ली गई है। 

 सब कुछ सीख लेना, पा लेना सबके नसीब में नहीं होता। झारखंड के एक सज्जन को 'लाइब्रेरी मैन' के नाम से पुकारा जाता है। यह एक ऐसा इनसान है, जिसका सपना था आईएएस अधिकारी बनने का, मगर गरीबी के कारण महँगी किताबें नहीं खरीद पाए और उनका सपना, सपना ही बनकर रह गया। अपनी परेशानी को जानते हुए इस इनसान ने गरीब बच्चों की सहायता के लिए राज्य के पांच जिलों में 40 पुस्तकालय की स्थापना की और इस लाइब्रेरी की मदद से हजारों युवा अपने सुनहले भविष्य की इमारत गढ़ने में लगे हैं।

 कुछ सुखद है तो बहुत कुछ दुखद भी। मेरे गांव की लाइब्रेरी के बंद हो जाने का जितना दुख मुझे है, उससे शायद कहीं ज्यादा ही दुख हुआ था, जब पता चला था कि करनाल में 'पाश पुस्तकालय'  तोड़ दिया गया। मन बड़ा ही आहत हुआ था सुनकर कि पुस्तकालय की 8 हजार किताबें तीन जगह शिफ्ट कर दी गईं। अगर हम साहित्य को संभालकर नहीं रखते, तो समाज को कैसे संभालेंगे... उस पर वह पुस्तकालय जो अवतार सिंह सिंधू के नाम पर स्थापित थी, उसे हम बचा नहीं पाए तो क्या हैरानी की बात है कि रामेश्वर सिंह पुस्तकालय की किताबों को दीमक लगने के बाद पुस्‍तकालय ही बंद कर दिया जाए।

किताबें बागी बनाती हैं...यह पुरातन सोच है मगर आज भी कहीं-न कहीं लोगों के मन में यही बात है।  इन दिनों  स्त्री चेतना, स्त्री आलोचना पर कई किताबें आई हैं। साथ की एक महिला, जो खुद रचनाकार हैं, उसने इन किताबों को उलट-पलट कर वापस दिया। पूछने पर कि क्यों नहीं लिया, उनका जवाब था कि कहीं इन्हें पढ़कर प्रभावित हो गई, सवाल उठाने, विरोध करने लगी तो मेरा परिवार ही टूट जाएगा। 

 इक्कीसवीं सदी में इस सोच पर बेशक किसी को भी हैरत होगी, मगर बहुत कुछ बदलना अभी बाकी है। उस दौर में भी जब मध्यमवर्गीय परिवार की स्त्रियों को घर से बाहर निकलने नहीं दिया जाता था, इसी इलाके में मेहनतकश आदिवासी औरतें अपने लिबास और औरतों के पुरातन डर को परे हटाकर खेतों में काम करतीं और जंगलों में विचरती थीं क्योंकि उनका सामाजिक ढांचा ही ऐसा है। मगर क्या उन्हें शिक्षित होने की जरूरत नहीं..  क्या उनको देश-विदेश और विज्ञान की बातें नहीं जाननी चाहिए?  

यह भी एक सच है कि बेहतरीन जिंदगी की उम्मीद में शहरों का रुख करने से अब गांव के गांव खाली हो रहे हैं। पुरानी विरासत पर नए रंग रोगन चढ़ाने की कोशिश में सब कुछ बदरंग हुआ जा रहा है... हम अपने मूल्य खो रहे हैं। ऐसे समय में जब सतही और उथले ज्ञान का बोलबाला है.. पुस्तकों की जरूरत और शिद्दत से महसूस होती है। खासकर गांवों में बेवजह समय गुजारने वाले बच्चों को प्रतियोगी परीक्षा से लेकर कॉमिक्स, लिटरेचर आदि की किताबें एक साथ मिल जाएं, तो उनकी जिंदगी सँवर जाए।

इन दिनों गांव में भी लोगों को ई - बुक्स के बारे में पता है। एक तो वैसे भी कोरोना काल में पढ़ाई के लिए बच्चों के हाथों में मोबाइल दे दिया गया। अब यह स्लोगन वास्तव में चरितार्थ हो गया है कि 'दुनिया मेरी मुट्ठी में।एक क्लिक में हम जो चाहें, ढूंढ़ या देख सकते हैं। इसके लिए किताबों का पन्ना पलटने की जरूरत नहीं। फिर उस पर चैटजीपीटी के आने से किसी भी सवाल का जवाब तुरंत पा सकते हैं। पर शायद इस खतरे से अनजान हैं लोग कि जो फायदा किताब पढ़ने से होता है, वह कभी ई - बुक्स या किसी भी सर्च इंजन के इस्तेमाल से नहीं पा सकते। किताबें पढ़ते हुए हमारे अंदर एक दृश्य बनता जाता है और पढ़ा हुआ सब हमारे दिमाग में धंस जाता है। जबकि ऑनलाइन पढ़ी हुई बातें हमारे जेहन से जल्दी ही उतर जाती हैं। मगर लोगों को समझ नहीं आती यह बात, इसी कारण पुस्तकालय की जरूरत को कई जगह नकारा जा रहा है।

हालांकि यह सुखद है कि इन दिनों गांव-गांव में कम्युनिटी लाइब्रेरी खुल रही है और उत्साही युवा इसे अलग-अलग गांव कस्बों में खोल रहे हैं। खेती-किसानी करने वाला परिवार अपने बच्चों को महँगी किताबें खरीदकर नहीं दे सकता, मगर ऐसे बच्चे लाइब्रेरी का फायदा उठा सकते हैं। अब गांव-गांव लाइब्रेरी की मुहिम जोरों पर है तो झारखंड सहित पूरे देश में उम्मीद कि लाइब्रेरी खुलेगी और मैं भी अपने गांव के पुस्तकालय में वाणभट्ट की आत्मकथा वापस रख दूंगी।

 गांव की यादें ऐसे खींचती हैं कि लगता है शहर छोड़ वहीं बस जाए जाए, जहां सुविधाएं तो कम थीं, मगर प्रेम इतना कि छलकता रहता। भूख लगने पर किसी के घर भी खाना मिल जाता था। तब पानी-भात और अचार में जो स्वाद मिलता था, वह आज के छप्पन भोग में भी कहां। मिलकर खाने से स्वाद और बढ़ जाता है, भूख और तेज हो जाती है। सामूहिकता में जीने वाले हमसब कभी नहीं जानते थे कि न्युक्लियर परिवार क्या होता है। सामूहिकता में जीने के अभ्यास ने हमें उदार बनाया था और निजी खुशियों, सुकून और एकांत की तलाश में बने अब के न्युक्लियर परिवार ने हमारे जीवन को एकाकी और उदास बनाया है। हो सके तो आइए, हम अपने गाँव की ओर चलें। उसे समृद्ध बनाएँ। विकसित बनाएँ और गाँव का वह ‘देहातीपन’ बचाए रखें जिसे इनसानियत, प्यार, स्नेह, अपनत्व, लगाव और स्वाभिमान के रूप में हम जानते हैं।

8 comments:

Sweta sinha said...

पानी भात और अचार तो आज भी मुझे बहुत पसंद है:)
अनगिनत बातों का जिक्र किया आपने जो मन को सहला रही हैं।
बहुत सुंदर लेख।
सादर।
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जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार १२ जुलाई २०२४ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।

आलोक सिन्हा said...

बहुत सुन्दर

Sunil Deepak said...

सुंदर समृतियाँ और सुंदर आलेख

Sudha Devrani said...

सच में बहुत कुछ भूला बिसरा याद दिला दिया आपने...
बेहतरीन लेख।

रेणु said...

Oh रश्मि जी कितनी तंमयता और लगन से आपने कहीं यादों के गाँव का चप्पा चप्पा छान कर जो लेख लिख दिया है उसने स्मृतियों के न् जाने कितने द्वार खोल दिये हैं! मन अनायास उदास हो गया! गाँव की प्रेमी मैं भी हूँ! मैं भी प्रगतिशील गाँव में पली बढ़ी हूँ! आश्चर्य होता है हमें जब समय था पढ़ने के लिए किताबें नही मिली क्योंकि मेरे गाँव में पुस्तकालय नही था पर घर में वो सभी किताबें खूब आती थी जिनका जिक़ आपने किया है! आजके बच्चों की किताबों विशेषकर साहित्य की किताबों से अरुचि देखकर मन जाने कैसा हो आता है! मुझे किताबों का बहुत शौक रहा पर एक पुस्तकालय कभी आज तक अपनी आँखों से नही देखा क्योकि मेरे स्कूल में भी हमारे रहने तक पुस्तकालय नही था! कहने का भाव किताबों का महत्व और उसके लिए व्याकुलता वो पीढी क्या जाने जिसकी उँगली में सारी दुनिया सिमटी है! पाश के पुस्तकालय के शहर से हूँ! अक्सर उनके स्मारक को देखती हूँ तो उनके नाम की लाइब्रेरी याद आ जाती हैं! जिसे भी मैं देख न पाई पर उनका स्मारक खड़ा है! अब तो वहाँ से गुजरते मुझे आपक लेख भी याद आयेगा! वैसे तो लगता नही पर आशा पर संसार आधारित है! एक दिन तकनीक और औद्योगीकरण से ऊबे लोग जरूर पुस्तकों कीविरासत और गाँवों के देहाती पन को बचाने अपने गाँव जरूर लौटेंगे क्योंकि जो सुकून वहाँ है कहीं नही! एक अत्यंत सार्थक और भावपूर्ण सुंदर लेख के लिए हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं🙏

Onkar said...

बहुत सुंदर लेख

रश्मि शर्मा said...

बहुत प्‍यार आपको

रश्मि शर्मा said...

सभी को शुक्रि‍या