Monday, January 30, 2017

शाम का सुनहला दामन


शाम
पिघलता सोना या नीला समंदर
मुँडेर पर उग आया है
इंतज़ार का बिरवा
मेरे बाद भी वो जगह ख़ाली नहीं हुई
फूल गुलैची के
अब भी महकते हैं सरे शाम
खंडहर हो गया वो घर
वीरान है वो गलियाँ
कोई नहीं आता गुलाबी दुप्पटा संभाले
बेचैन होकर छत पर
गली में नज़रें बचाकर कोई नहीं देखता
अब मुँडेर की तरफ़
बस शाम की ख़ूबसूरती अब भी वही है
सूने से छत पर
आज भी उतरती है शाम
अपना सुनहला दामन पसारे ....।

तस्‍वीर...कुछ रोज़ पहले की

3 comments:

kuldeep thakur said...

दिनांक 31/01/2017 को...
आप की रचना का लिंक होगा...
पांच लिंकों का आनंद... https://www.halchalwith5links.blogspot.com पर...
आप भी इस प्रस्तुति में....
सादर आमंत्रित हैं...

प्रतिभा सक्सेना said...

ऐसी अनुभूति रिक्तता-बोध से मन को भारी कर देती है.

Digamber Naswa said...

शाम भी वही ... मंज़र भी वही ... शायद देखने वाली नज़रें बदल गयीं ... ख़ूबसूरत है फ़ोटो ...