Sunday, May 1, 2016

मुझे भी चाहि‍ए ऑफ डे


रि‍तेश शाम को ऑफि‍स से आते ही सोफ़े पर ढह गया। टाई की नॉट ढीली करते हुए पत्नी नि‍क्की को आवाज लगाई- सुनो, जरा बर्फ डालकर शरबत तो दो, इस गर्मी ने प्राण ही जैसे खींच लि‍ए। इतनी गर्मी है कि‍ मन करता है घर से बाहर ही न जाऊं।
पत्नी नि‍क्‍की ने हामी भरते हुए कहा- हां गर्मी तो है, एक-दो दि‍न की छुट्टी ले लो। रि‍तेश ने लंबी सांस लेते हुए कहा- अभी छुट्टी कहां, त्योहार भी खत्म हुए सारे। तभी जैसे उसे कुछ याद आया। अरे, मई दि‍वस पास ही है न, उस दि‍न तो छु्ट्टी  होगी आॅफि‍स में। मजे से घर में रहूंगा सारा दि‍न टीवी देखते हुए एसी में चलाकर पड़ा रहूंगा।

नि‍क्‍की ने शरबत का गि‍लास रि‍तेश की तरफ बढ़ाते हुए कहा-हां भई, आपको तो आराम मि‍लेगा। मजदूर दि‍वस की छु्ट्टी रहेगी। पर हमारा क्‍या। गर्मी हो बरसात, हमें तो एक दि‍न की छु्ट्टी नसीब नहीं। बल्कि‍ आपलोगों की छु्ट्टी के दि‍न ओवरटाइम करना पड़ता है। 


रि‍तेश ने त्‍योरि‍यां चढ़ाते हुए कहा- सारा दि‍न तो घर पर ही रहती हो, न धूप में घूमना न ऑफि‍स के फाइलों में मगजमारी। फि‍र भी शि‍कायत। सुनंदा का हंसता चेहरा मुरझा गया।

लगभग ऐसे डाॅयलाग हर वो गृहणी सुनती है, जो हाउसवाइफ है। उसके कार्य को इतना कम करके आंका जाता है जैसे कि‍ वो सारा दि‍न घर पर सोई रहती है या सास-ननद वाले सीरि‍यल देखकर टाइम पास करती है। सच तो यह है कि‍ अगर आफि‍स आॅवर 8 से 10 घंटे हैं तो एक घरेलू महि‍ला प्रति‍दि‍न 16 घंटे कार्य करती हैं और मजे की बात है इसकी न कहीे कोई गि‍नती होती है न ही इसके बदले उसे पैसे मि‍लते हैं। ऊपर से वर्किंग महि‍लाओं को ज्‍यादा ऊंचा करके मापा जाता है घरेलू महि‍लाओं के मुकाबले।   


ये सच है कि‍ सामाजि‍क सोच में बदलाव आ रहा है मगर पर्याप्त नहीं। कुछ वर्षों पहले तक घर का कार्य करने वाली महि‍लाएं खुद को हाउसवाइफ बोलती थीं, आज संबोधन या स्वपरि‍चय में जरा बदलाव आया है। वो खुद को होममकेर, होम इंजीनि‍यर या घर की सीईओ कहने लगी हैं। 2001  में हुई जनगणना में कहा गया था कि‍ भारत में 36 करोड़ महि‍लाएं नान वर्कस हैं। 

गृहणि‍यों पर एक बार फि‍र से सर्वेक्षण की आवश्यकता है। 2012 में महि‍ला एवं बाल वि‍कास मंत्रालय ने एक प्रस्ताव पारि‍त किया था कि‍ पति‍ के वेतन का 10 से 20 फीसदी हि‍स्सा पत्नि‍यों को दि‍या जाएगा ताकि‍ वो आत्मनि‍र्भर हो सके। महि‍ला एवं बाल वि‍कास मंत्रालय का मानना है कि‍ घर संभालने वाली करोड़ों भारतीय गृहणि‍यों के श्रम को कम करके नहीं आंका जा सकता। हालांकि‍ इस प्रस्ताव को अब तक कानूनी रूप नहीं दि‍या जा सका है, क्‍योंकि‍ तुरंत इसका वि‍रोध शुरू हो गया था।

वाकई ये सोचने की बात है कि‍ जहां घर बाहर कार्य करने वालों को सप्ताह में एक दि‍न की छुट्टी  का कानूनी प्रावधान है वहीं, महि‍लाएं जो प्रति‍दि‍न 16 घंटे काम करती हैं, उनके लि‍ए एक दि‍न का भी अवकाश नहीं। यहां तक कि‍ महि‍ला दि‍वस के दि‍न भी उन्हें कार्य करना पड़ता है। उनके लि‍ए मजदूर दि‍वस के दि‍न भी कोई छुट्टी नहीं। ऐसे समय में जब परि‍वार के बाकी सदस्य घर पर होते हैं, उन्हें ज्यादा कार्य करना पड़ता है।

रागि‍नी कपूर एक होम मेकर है। शादी से पहले वो कि‍सी कंपनी में अच्छे पद पर थी , पर उन्हें परि‍वारि‍क जि‍म्मेदारि‍यों के कारण नौकरी छोड़नी पड़ी। रागि‍नी कहती हैं कि‍ सभी दि‍न तो रोज सुबह उठकर बच्चों का टि‍फि‍न, 
 सास-श्वसुर के और पति‍ के नाश्ते और उनके बाहर के बाद उसे थोड़ा वक्त मि‍ल जाता है। घर की साफ-सफाई, खाना बनाना और अन्य कार्य करने के बाद कुछ देर के लि‍ए वह टीवी देख लेती है या पढ़ लेती है। पर जि‍स दि‍न सभी लोग घर पर रहते हैं सब कुछ अस्त-व्यस्त हो जाता है। सुबह पति‍ देर से सोकर उठेंगे। बच्चे भी छुट्टी के मूड में रहते है। फि‍र सब लोग अपनी पसंद का खाना चाहते हैं। सबके लि‍ए अलग-अलग बनाओ, उनकी बाकी फरमाईश पूरी करते-करते ऐसा दि‍न नि‍कलता है कि‍ अपने लि‍ए जरा भी वक्‍त नहीं मि‍लता।

अब यूं तो होम मेकर बनना या बाहर कार्य करना कि‍सी भी स्त्री की अपनी च्वायस या परि‍वारि‍क परि‍स्थि‍तयों पर नि‍र्भर करता है। सेंटर फोर वर्क-लाइफ पालि‍सी के एक अध्‍ध्‍ययन के अनुसार अधि‍कतर भारतीय महि‍लाएं शादी के बाद घरेलू जि‍म्मेदारी और बच्चों की परवरि‍श के कारण ही नौकरी छोड़ती हैं। एक हजार औरतों के ऊपर कराए गए सर्वे के बाद पता चला कि‍ 51 प्रति‍शत ने वि‍वाह के बाद और 52 प्रति‍शत ने बच्चे पैदा होने के बाद दबाव में आकर नौकरी छोड़ दी। इन औरतों का मानना था कि‍ घर और आफि‍स की दोहरी जि‍म्मेदारी में पि‍सने लगी थीं। मजबूरी में उन्हें नौकरी छोड़ने का फैसला लेना पड़ा।


अब ये सोचने वाली बात है कि‍ होम मेकर और नौकरीपेशा महि‍लाओं के बीच तुलना उचि‍त है या नहीं।  यह देखने में आता है कि‍ कई जगह वर्किंग महि‍लाओं को दोहरी जि‍म्‍मेदारी नि‍भानी पड़ती है या घर के कार्य के लि‍ए उसे नौकरों और बाईयों पर नि‍र्भर होना पड़ता है जि‍सके एवज में उसके तनख्‍वाह से एक मोटी रकम खर्च हो जाती है, उस पर संतुष्‍टि‍ भी नहीं मि‍लती। 

मगर इतना तो सच है कि‍ हम गृहणि‍यों के कार्य को कम करके नहीं आंक सकते। अगर उनके कार्य को पैसे के हि‍साब से आंका जाए तो आप हैरत में पड़ जाएंगे कि‍ इन कामों के लि‍ए कि‍सी को रखा जाए तो कि‍तना पैसा खर्च करना पड़ सकता है आपको। एक होममेकर महि‍ला , सफाईकर्मी, रसोईया, माली , केयर टेकर, बीमार पड़ने पर नर्स, इंटीरि‍यर डि‍जाइनर, बच्चों के लि‍ए टीचर आदि‍  कई भूमि‍काएं नि‍भाती हैं।

ग्लोबल एन.जी.अो हेल्थ ब्रि‍ज ने एक अध्ययन के बाद बताया कि‍ यदि‍ इन घरेलू कार्यों का मूल्य तय कि‍या जाए तो भारतीय स्त्रि‍यां वर्ष भर में यू.एस के 612.8 बि‍लि‍यन डालर्स के बराबर काम करती हैं। इसमें से भी ग्रामीण्‍ महि‍लाएं शहरी महि‍लाअों के बनि‍स्पत ज्यादा कार्य करती हैं। 
यही कारण हैे कि‍ घरेलू महि‍लाओं के लि‍ए मेहनताने की मांग समय-समय पर उठती रही है। कुछ दि‍नों पहले केरल में नेशनल हाउसवाईव्स यूनि‍नय ने ऐसी ही मांग की थी और यूक्रेन एवं वेनेजुएला जैसे देशों में भी ऐसे संगठन बने हैं।
ऐसे जुमले सुनकर कि‍सी भी गृहि‍णी को तकलीफ और अपमान महसूस होता है कि‍- ये घर पर ही रहती है। या पूरे दि‍न में कि‍तना काम ही करती हो। होममेकर्स के कार्य का सही आकलन मद्रास हाईकोर्ट ने कि‍या है। मदुरई में एक महि‍ला की दुर्घटना में मृत्यु हो गई। ऐसे मामले में मोटर व्‍हीकल एक्‍सीडेंट ट्रि‍ब्‍यूनल यह देखता है कि‍ मरने वाला कि‍तना कमाता था, उसके बाद परि‍वार की वेदना, इलाज का खर्च, संतान आदि‍ का आकलन करने के बाद मुआवजा तय कि‍या जाता है। अबर इस तरह से देखा जाए तो ऐ घरेलू महि‍ला का जीवन अमूल्‍य है और उसका मूल्‍यांकन हो ही नहीं सकता। गृहणी के 24 घंटे का काम, मेहनत, अपनापन का आर्थि‍क मूल्यांकन कि‍या ही नहीं जा सकता। 

मद्रास हाईकोर्ट ने अपने फैसले में बहुत ही सटीक कहा है कि गृहणी (हाउस वाइफ) का काम बेहद अहम् है और इसे कमतर करके नहीं आंकना चाहिए। मदुराई मामले महिला की दुर्घटना मृत्यु के मामले में पति ने ट्रिब्यूनल में क्षतिपूर्ति का मामला लगाया था और फैसले में उसे 1 लाख 62 हजार रुपयों का मुआवजा दिया गया। हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल द्वारा दी गयी रकम को बढ़ाकर 6 लाख 86 हजार किया और ट्रिब्यूनल के फैसले पर यह कठोर टिप्पणी की है कि ट्रिब्यूनल ने महिला की अहमियत को कम आंका। इसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है। 

इसलि‍ए, होममेकर्स को कि‍सी दि‍न की छुट्टी मि‍ले न मि‍ले, उसे कार्य के बदले पैसे भले न दे, उसके कि‍ये कार्य को कम करके न आंके। उन्‍हें इज्‍जत दें। ये सोचे के नि‍:स्‍वार्थ भाव से वो पूरा घर संभालती है। अगर वो चाहे तो धर को छोड़कर वो भी बाहर नौकरी कर सकती हैं। पैसे कमा कर पद संभाल कर अपना नाम कर सकती हैं। मगर वो केवल अपने परि‍वार के लि‍ए सारा त्‍याग करती हैं उपर से उन्‍हें हि‍कारत के शब्‍द सुनने को मि‍लते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि‍ होम-मेकर्स को नान-वर्कर की श्रेणी में रखना उनके श्रम का अपमान है। 

अभी-अभी आई  फि‍ल्म का एंड की में भी यह संदेश दि‍या गया है घर कार्य  एक फूल टाईम जॉब है और इसे पति‍-पत्नी में से कि‍सी एक को उठाना ही होगा तब घर सुव्‍यवस्‍थि‍त तरीके से चलेगा। इसलि‍ए सभी परि‍जनों को चाहि‍ए कि‍ वो घर की गृहि‍णी का सम्‍मान करे। जहां तक संभव हो उनके कार्य की सराहना करें, हाथ बंटाए। और सप्‍ताह न सही, महीने में एक दि‍न उन्‍हें पूरा आराम करने दि‍या जाए तो हर महि‍ला खुद को होम मेकर कहने में गर्वान्वि‍त महसूस करेगी। 

1 मई को प्रभात खबर के सुरभि‍ की कवर स्टोरी 

2 comments:

दिनेश महतो राँची said...

मैं आपकी बात से पूरी तरह सहमत हूँ सिर्फ मर्दों का छुट्टी चाहिए कामकाजी घरेलु महिलाओ को क्यों नहीं उनका पूरा दिन सुबह 5 बजे से लेकर रात को सोने तक पति की बच्चो माता पिता की जरुरतो को पूरा करने में बीत जाता है सबके लिए sunday chutti hai पर गृहणियों के लिए अतिरिक्त काम का बोझ.....मुझे ऐसा लगता है की पतियों को भी पत्नी की काम का सम्मान करना चाहिए या काम से काम मुस्कुराकर दो शब्द कहें या फिर उनकी किये गए कार्यो की तारीफ करें इससे उन्हें ये एहसास होगा की उनकी भी कोई परवाह करने वाला है।........दिनेश महतो

दिनेश महतो राँची said...

मैं आपकी बात से पूरी तरह सहमत हूँ सिर्फ मर्दों का छुट्टी चाहिए कामकाजी घरेलु महिलाओ को क्यों नहीं उनका पूरा दिन सुबह 5 बजे से लेकर रात को सोने तक पति की बच्चो माता पिता की जरुरतो को पूरा करने में बीत जाता है सबके लिए sunday chutti hai पर गृहणियों के लिए अतिरिक्त काम का बोझ.....मुझे ऐसा लगता है की पतियों को भी पत्नी की काम का सम्मान करना चाहिए या काम से काम मुस्कुराकर दो शब्द कहें या फिर उनकी किये गए कार्यो की तारीफ करें इससे उन्हें ये एहसास होगा की उनकी भी कोई परवाह करने वाला है।........दिनेश महतो