Thursday, April 28, 2016

सम ढाणी : रांची से रेत के शहर जैसमलेर तक - 8 (1)

कुलधरा से सम की ओर कैब से प्रस्थान करते हुए दो ही शब्द बार-बार जेहन में आ रहे थे एक ‘मरुस्थल’ दूसरा ‘रेत के टि‍ब्‍बे‘। इन्हीं के आकर्षण के चलते तो हम गए थे अपने घर से इतनी दूर  राजस्‍थान के जैसलमेर में । कुलधरा से सम पहुंचने में बहुत ही कम समय लगा हमें, महज़ 42 किलोमीटर की दूरी । संयोग से हमारा कैब ड्राईवर ‘लच्छू’ बेहद बातूनी मगर दिलचस्प इंसान , उस पर तुर्रा यह कि, महाशय भूगोल विषय से बी.ए.पास सो रास्ता कब कट पता ही नहीं चला । 


सुनहरी रेत पर हम

कहते हैं कि‍ लौह-युग के वक़्त वैदिक भारत में यह सारा इलाका समुद्र था, जिसे लवणसागर यानि खारा समुद्र के नाम से जाना जाता रहा और जब भगवान राम सीता जी को खोजने निकले तो इसी रास्ते से गए । परन्तु अपने आग्नेय अस्त्रों से इस समुद्र को भी सुखाते चले।  कहते हैं यहाँ आज तक भी समुद्री वनस्पतियों के फॉसिल या जीवाश्म मिलते हैं। नारियल के सघन बन कभी यहाँ रहे होंगे क्योंकि उनके भी रेत में गहरे दबे अवशेष यहाँ मिले हैं। 
हमारी इस जानकारी का समर्थन जब कैब के ड्राइवर ने कि‍या तो  हमारे बड़े बेटे अमित्युश की बहस लच्छू से हो गई , जिसे हमारे इलाके में स्थित राजमहल हिल्स में मिलने वाले फॉसिल्स की जानकारी अपनी पाठ्यपुस्तकों के माध्यम से थी और उसका यह मानना था कि फॉसिल्स सिर्फ पहाड़ों में मिलते हैं। बालहठ के आगे भगवान की भी नहीं चली, सो ड्राइवर ने हार मान ली और चुप्‍पी लगा गए। 

रेगि‍स्‍तान...बीच-बीच में हरी झाड़ि‍यां 
रास्ते में कुछ अच्छे रिसॉर्ट्स  दिखाई दिए भव्य..खूबसूरत, यहाँ पाए जाने वाले पीले पत्थरों को तराश कर किलेनुमा बने हुए , जैसे राजपूताना का इतिहास जीवित हो रहा हो उनमें । मगर वक्त नहीं था कि‍ रूककर देखते। हमारी बुकिंग के हि‍साब से हमें शाम चार बजे कैंप में एंट्री करनी थी। जब हम सम पहुंचे तो कई कैम्प नजर आए। मगर कहीं रेत का नामोनि‍शान नहीं था। सड़क कि‍नारे कहीं कहीं बालू पड़ी थी । जैसे हमारे यहां भी होते हैं। हम बड़े नि‍राश हुए। लगा, क्या यही  देखने हम इतनी दूर आए है। हमारे यहां तो इससे ज्‍यादा बालू मिल जाएगी ।

हमारी नि‍राशा को भांपकर और उतरे हुए चेहरे देख लच्छू महाराज ने कहा “आप लोग जीप सफारी करोगे”। पहले तो हमने मना कर दि‍या क्योंकि‍ चार बजने ही वाले थे। पर उसने आग्रह कि‍या कि‍ मेरे कहने पर चले जाओइतनी दूर आए हो। हम मान गए।


जीप सफ़ारी का आनंद लेते हमदोनों 


उसने गाड़ी एक छोटे से झोपड़े के आगे लगा दी। शायद वहां चाय-पानी की व्यवस्था थी, स्थानीय भाषा में ऐसी जगहों को थड़ी कहते हैं।  वहां से  जीप में बैठे हम। खुली जीप थी अजीब सी जोंगा टाइप । दो मि‍नट के अंदर जीप हवा से बातें करने लगीऔर जैसे चमत्कार हुआ , हम एकदम रेगि‍स्तान पहुंच गए। लगा अभी तो कोलतार की चि‍कनी सड़क पर चल रहे थे और अचानक रेत का समंदर। गाड़ी के पहि‍ए से लग कर जबरदस्त रेत उछल कर हमारे चेहरे पर चि‍पक रही  थी । हम हवा से बातें करते जा रहे थे।

रेत पर लोटपोट होते आदर्श और अमि‍त्युश 
जीप वाले ने रेत के टि‍ब्‍बों पर चढ़ाते-उतारतेऔर हमारी कभी डर से कभी आनंद से नि‍कलने वाली चीखों के बीच एकदम सबसे ऊंचे टि‍ब्बे के उपर आकर गाड़ी रोक दी। लगा ठीक वक्त पर ब्रेक नहीं लगता तो हम नीचे गि‍रे होते। पर बहुत कुशल और अनुभवी होते हैं इन रेतीले रास्तों के ये चालक। यह अरबाज़ था।

अन्य पर्यटक स्थलों से एक अलग बात यहाँ देखने को मिली कि लोग बहुत दोस्ताना होते हैं और आपको बिना पूछे भी सब बताने को आतुर होते है सो अरबाज़ भी बताने लगा कि‍ इसी जगह बजरंगी भाईजान की शूटिंग हुई थी, सलमान खान ने इसी टिब्बे के नीचे वाली सड़क से बॉर्डर पार की थी उस फिल्म में ,कपिल शर्मा की फिल्म ‘किस किस को प्यार करूँ’ का एक पूरा गान यहीं फिल्माया गया , उसमें कुछ सीन बड़ा बाग  के  भी हैं । चारों तरफ रेत ही रेत। 

लहरि‍या...रेत पड़ी धारि‍यां 

हवाओं के चलने से रेत पर धारि‍यां पड़ गई थी जिन्हें साक्षात् सामने देखकर मुझे विश्वास हो चला कि राजस्थान के प्रसि‍द्ध लहरि‍या प्रिंट  का कांसेप्ट यहीं से लि‍या गया लगता है। लंबी-लंबी
मुड़ी हुई लहराती धारि‍यां। रेत ही रेत ,इन्हें गोल्डन सैंड  डयून्स कहा जाता है सुनहरी रंग की धारियों से लबरेज नीले शुभ्र आसमान के नीचे दूर तक नज़र दौड़ गई तो लगा आसमान और रेत गले मिल रहें वहां।  रेत पर ये सुनहरी धारियां हवाओं के पहले सीधे फिर आड़े तिरछे प्रबल झोंकों से बनती हैं। लगता था जैसे स्वयं भगवान् विश्वकर्मा आकर यहाँ चित्रकारी कर गए हों ..अतुलनीय ...अविस्मरणीय  । दूर-दूर कहीं कहीं खींप की झाड़ि‍यां नजर आ रही थी कहीं-कहीं उगी हुई। अचानक देखा मैंने कुछ पीले फल पड़े हैं रेत के ऊपर। इन्‍हें तुम्बा या गढ़ तूम्बा कहा जाता है और इसका प्रयोग एक वाद्ध्‍य यंत्र के रूप में कि‍या जाता है। प्राचीन काल में ऋषि मुनि अपने साथ जो कमण्डल रखते रहे वह भी इसी को सुखा कर खोखला कर के बनता था । यह फल खरबूजे की आकृति  का था आयुर्वेद में इसे इन्द्रायण के नाम से जाना जाता है और कई प्रकार की औषधियां इस से बनती हैं यह एक दुर्लभ प्रजाति का पौधा है ।



रेत से खेलते 

रेत के ऊंचे नीचे पहाड़ों पर अपनी ऐडवेंचर भरी ड्राइव को थाम कर अब अरबाज़ ने गाडी के बड़े टिब्बे की चोटी पर ले जा कर रोक दी उस ने बताया कि यह थार का टिब्बा कहलाता है और सबसे खूबसूरत और बड़ा भी है चारों तरफ पीली रेत..नीला आसमान। दूर-दूर तक कि‍सी का पता नहीं। अनछुई रेत देखकर बहुत मजा आया। हम जि‍धर चल रहे थेहमारे पैरों के नि‍शान बनते जा रहे थे। हमने खूब सारे फोटो लिए । सब रेत से खेल रहे थे। उस पर दौड़ लगा रहे तो कभी लोटपोट हो रहे थे। जि‍धर की हवा होतीमुट्ठि‍यों में भरा रेत उधर का रूख कर लेता। अच्‍छी बात सह थी कि‍ हम जहां थे वहां आसपास कोई और नहीं था। जैसे समंदर के बीच हमारी नाव इकलौती हो और हम लहरों से खेल रहे।  


अभि‍रूप अपनी ही धुन में 

हमारा मन चाह रहा था कि‍ हम कुछ देर और रूके। मगर समय की पाबंदी थी। शाम भी ढलने लगी थी . वापसी के वक्त जीप वाले ने दूसरे रास्ते से वापस लाया। हम दो मि‍नट में अपने कैब वाली जगह पर पहुंच गए ,जहाँ ड्राइवर हमारा इंतज़ार कर रहा था ।


नीले आसमान तले सोनल रेत 

क्रमश:......


3 comments:

Madan Mohan Saxena said...

बेह्तरीन अभिव्यक्ति ...!!शुभकामनायें.

रश्मि शर्मा said...

Thank you

Dharmendra Gupta said...

Old memory of 1994 is refreshed