Wednesday, April 20, 2016

बड़ा बाग़ : रांची से रेत के शहर जैसलमेर तक - 5



बड़ा बाग में बच्चों के साथ 

जैसेलमेर में दूसरी सुबह थी हमारी। आज ये होटल छोड़ देना था और रात सम में गुजारनी थी। इसलि‍ए सुबह जल्दी उठकर सब तैयार हुए। चाय के लि‍ए फि‍र छत पर गए, क्योंकि‍ एक नजर देखना था उस शहर को।  छत पर होटल वालों की एक छोटी सी रसोई थी। वहां एक 12-14 साल का बच्चा चाय बनाने की तैयारी कर रहा था। मैंने पूछा चाय कि‍सके लि‍ए बना रहे। कहने लगा, आपलोगों के लि‍ए ही। चाय और दूध हम यहीं से देते हैं। मैंने उससे कहा- तुम हटो, मैं खुद बनाती हूं। उसने सारा सामान सामने रख दि‍या और मैं पसंदीदा अदरक वाली चाय बनाती रही और उससे बातें भी करती रही।

वो लड़का भी सम के पास ही कि‍सी गांव का रहने वाला था। उसने बताया कि‍ जब 'सीजन' होता है तो हमलोग गांवों से यहां आकर होटलों में काम करते हैं। फि‍र गर्मी बढ़ने पर वापस गांव चले जाते हैं। हमारी कमाई का यही वक्‍त है, वरना इस रेत और गर्मी में कौन आता है। वाकई अहसास हुआ कि‍ आसान नहीं ऐसी जगह जीवन गुजारना जहां सालाेभर रोजगार के साधन नहीं हो, बस कुछ वक्‍त कमा कर उससे ही पूरा साल नि‍कालना होता है। 



 बड़ा बाग़ की खूबसूरत छतरि‍यां 

छत से सोनार कि‍ले की चमकती दीवार देखी, फि‍र हल्का नाश्ता कर हमने पैक कि‍या सामान और नि‍कल पड़े। अब हमें रास्‍ते में मि‍लले वाले पर्यटन स्थलों को देखते हुए सम पहुंचना था। बीते दिन किले की छत से जब बच्चों ने हवा में झूमते विंडमिल्स को देखा तो इन्हें करीब से देखने की रट लगा ली थी सो अगली सुबह दस बजे हम नि‍कल पड़े रेत के समंदर के सफर को। उसी रास्ते में मि‍ला बड़ा बाग। जैसलमेर शहर से निकलते ही थोड़ी दूर पर ही हमें सड़क के दाहिनी तरफ धूप में चमकती हुई छतरियां नज़र आने लगीं थीं , इनकी सुनहरी आभा सोनार किले से भी ज्यादा दमक रही थी। कैब वाले से पूछने पर पता चला ये बड़ा बाग़ की छतरियां हैं। हम उत्‍सुक हो गए वहां जाकर देखने के लि‍ए। अनमने से कैब वाले लक्ष्‍मण ने कहा  “ क्या कीजियेगा वहां चलकर, राजाओं के शमशान घाट ही तो हैं “। समझ आ गया कि बड़ा बाग़ हमारे तयशुदा भ्रमण में नहीं है। हमने उसे आश्वस्त किया कि इसका अतिरिक्त चार्ज उन्हें दिया जाएगा। अब वह उत्साह से हमें वहाँ का इतिहास सुनाते हुए वहां ले चला। .पहुँच कर हम दंग रह गए। इतनी खूबसूरत छतरि‍यांइतनी नक्काशी। लगा कई फि‍ल्मों में इस जगह को देखा है हमने। मगर आश्‍चर्य कि‍ पर्यटकों की भीड़ नहीं थी। हां कुछ देशी-वि‍देशी लोग थे। 



पीेछे वि‍ंड मि‍ल्स और आगे छतरि‍यां...बेहद खूबसूरत दृश्य


ताजमहल को देखकर विश्वकवि रविन्द्रनाथ टैगोर ने कहा था –“ताज काल के गाल पर ठहरा हुआ एक आंसू है।  बड़ा बाग़ को देखकर मेरे मुँह से अनायास ही निकल पड़ा यह रेतीली हवाओं में गूंजता दर्दीला गीत है या फिर, रेत के कैनवास पर समय की सुनहरी ब्रश से उकेरा हुआ खूबसूरत स्मृति–चित्र। 

जैसलमेर से मात्र छह कि‍लोमीटर दूरी पर एक कृत्रिम झील है। जिसे जैतसर टैंक या जैतबाँध कहा जाता है , इसी के किनारों पर हरे पेड़ों का एक सघन झुरमुट है इसी को बड़ा बाग़ की संज्ञा दी गई थी। बड़ा बाग अपने शाही स्मारकों या छतरियों के लिए प्रसिद्ध है जिसे विभिन्न भाटी शासकों द्वारा बनवाया गया है। सब के बीचराजा महारावल जैतसिंह की समाधि‍ सबसे प्राचीन स्मारक है।  पार्क के अंदर स्मारकों के अलावापर्यटक जैतसर टैंक जैत बांध और  गोवर्धन स्तंभ को भी देख सकते हैं। कुछेक छतरियों पर घोड़े पर सवार राजाओं की मूर्तियाँ भी हैं , जो बेहद खूबसूरत हैं।   


बड़ा बाग के ठीक पीछे की हरि‍याली 

हम थोड़ी चढ़ाई चढ़कर पहुंचे सबसे बाद में बने महारावल जवाहर सिंह जी की छतरी पर। इनका जीवनकाल 1914 से 1949 था। यानी हमारे देश को स्वतंत्रता मि‍लने के बाद इनकी मृत्यु हुई।  बड़ा बाग की आखि‍री छतरी महारावल जवाहर सिंह जी के नाम की बनी। पर इससे पहले कि ये पूरी होती उनके पुत्र की मृत्यु हो गई।  उसके बाद इसे अपशकुन मानते हुए यहाँ भाटी राजाओं की छतरियाँ बनाने की परंपरा खत्म हो गयी।

जवाहरसिंह  की छतरी को मंदि‍र की तरह प्रयोग कि‍या जाता है ऐसा लगा। ऊपर एक शि‍वलिंग था जि‍सके ऊपर घड़ा रखा हुआ थाजि‍ससे बूंद-बूंद रिसते पानी से रूद्र का जलाभि‍षेक हो रहा था। 


सुनहरी छतरि‍यां 

 बड़ा बाग का इति‍हास पता करने पर मालूम चला कि‍  सत्रहवीं शताब्दी में महाराजा जय सिंह द्वितीय ने यहाँ बाँध बनाकर एक तालाब बनाया था। पानी का स्रोत मिलने से इस रेगिस्तानी इलाके में भी हरियाली का एक टुकड़ा निकल आया। जय सिंह द्वितीय के पुत्र लूणकरण ने यहाँ एक बाग का निर्माण किया और साथ ही अपने पिता की स्मृति में एक समाधिस्थल बनाया जिसे राजस्थान में 'छतरीके नाम से भी जाना जाता है। तभी से भाटी राजाओं की छतरियाँ यहाँ बनने लगीं। 


एक यादगार पल 

वहां पास में ही देश का सबसे  बड़ा और दुनि‍यां का चौथा सबसे बड़ा विंड एनर्जी पार्क है। इसकी उत्पादन क्षमता 1100 मेगावाॅट है। छतरि‍यों के पास होने पर इसकी बहुत तेज हवा आती रहती हैजो पर्यटकों काे सुकून देती है। लोगों ने खूब तस्‍वीरें खि‍ंचवाई वहां पर। ये छति‍रयां इतनी खूबसूरत लगी कि‍ हमने बहुत वक्त बि‍ताया वहां। फोटोग्राफी के लि‍हाज से भी काफी खूबसूरत है बड़ा बाग। हर समाधि‍ के के ऊपर नक्‍काशीदार पत्‍थर लगे थे और समाधि‍ के बारे में जानकारी भी थी। पर वह लि‍पि‍ हम पढ़ नहीं सकते। 


विंड मि‍ल्स जि‍से देखकर हम मुग्ध रह गए 

कुछ छतरि‍यों के गुंबद ढह गए हैं। यह इतनी खूबसूरत जगह है कि‍ एक बार जरूर देखना चाहि‍ए। छतरी के पीछे अब भी एक ओर हरि‍याली दि‍खाई पड़ती है तो दूसरी ओर विंड एनर्जी पार्क। सरसराती हवाओं के बीच बड़ा बाग हमारे मन में अवि‍स्‍मरणीय छाप छोड़ गया। राजाओं का स्‍मारक कि‍तना खूबसूरत हो सकता है, यह यहाँ आकर महसूस हुआ। 


राजस्‍थानी पगड़ी और बड़ा बाग 

अब यहां से नि‍कले हम अमरसागर झील होते हुए कुलधरा के लि‍ए.....क्रमश:

2 comments:

Laxmi Kant Sharma said...

सूंदर चित्रों के साथ सारगर्भित जानकारी ।

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (22 -04-2016) को "आओ बचाएं अपनी वसुन्धरा" (चर्चा अंक-2320) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'