Thursday, December 17, 2015

होता है धुंआ-धुआं....



जलते सीने को और जलाने को
पीती हूं गरम चाय
भाप से धुंधला जाता है ऐनक
कुछ नहीं होता
बस होता है धुंआ-धुआं....
कोहरे ने लपेटा
वादि‍यों संग मुझको
अपने आगोश में
मैं छटपटा रही हूं छूटने को
गि‍रफ्त से, जाने कि‍सके
कुहासा तो आभास है
हमारे पास होकर भी नहीं
जैसे तुम
अक्‍सर खो जाते हो धुंध में
मेरी आंखों के आगे
भाप से सब धुंधला जाता है
दहकते सीने में लहकते
अंगारे हैं
कुछ यादें है, चंद फरि‍यादें हैं
जिंदगी के कश ले लेकर
फूंक दि‍या अपना सीना
अब
धुंआं है, भाप है, सर्द आहें हैं........।

तस्‍वीर-अभी कोहरे में घि‍रा है शहर....

5 comments:

रौशन जसवाल विक्षिप्‍त said...

सुन्‍दर

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (19-12-2015) को "सुबह का इंतज़ार" (चर्चा अंक-2195) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Onkar said...

सुन्दर रचना

Onkar said...

सुन्दर प्रस्तुति

राजीव कुमार झा said...

बहुत सुंदर .
नई पोस्ट : क्या बोले मन