Thursday, November 26, 2015

एक खुशी है छि‍टकी.....


जब कहतेे हो , याद रखूंगा
ये ढलती शाम, घेरती ठंड
और जलती रौशनी के संग
संझा के दीप की टि‍मटि‍माती
लौ के पीछे
तुम्‍हारा दि‍पदि‍पाता चेहरा

ऐसा लगता है
तुम कि‍सी अंतहीन सफ़र पर
जाने की तैयारी में हो
और देहरी पर मैं प्रतीक्षारत वि‍रहा

हर रात गहराती,
मुंदती आंखों के आगे
एक चेहरा लहराता है
न पाया मगर
मेरी ही बिछड़ी रूह का
वो साया है

मोहब्‍बत की आग से
सुलगी है जो जिंदगी
उस पर हैं तेरे ही नाम के दो हर्फ़
खामोशी की दीवार पर
लि‍खी नीली रौशनाई है
जन्‍मों की आग में तपकर
ये नेमत हमने पाई है

एक खुशी है छि‍टकी सी
रूप है दमका
दीप की रौशनी सा प्‍यार तुम्‍हारा
बि‍खरा है आत्‍मा पर
भरी-भरी सी हूं तुम्‍हारी मौजूदगी से
तुम दूर हुए, तो क्‍या.....।  

5 comments:

राजेंद्र कुमार said...

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (27.11.2015) को "सहिष्णुता का अर्थ"(चर्चा अंक-2173) पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ, सादर...!

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, २६/११ और हम - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

Raravi said...

बहुत सुंदर रचना. मैं सोच रहa tha कi इस कविता के साथ आपने ये तस्वीर क्यो लगाई होगी. और किसने खींची होगी यह तस्वीर? कयa तस्वीर लेना यह बताना है की मैं इस रूप को सदा सदा याद रखना चाहता हूँ----
sach me sundar rachna hai.

Mukesh Kumar Sinha said...

सुन्दर कविता

हिमकर श्याम said...

सुन्दर और भावपूर्ण रचना।