Wednesday, September 30, 2015

तुम बि‍न....

रात
पूरे आकाश में
अकेला था चांद
जैसे
पूरी का़यनात में
मैं
तुम बि‍न.....






मन पसीजता है
देखूं
कि‍ फि‍र आवाज दूं 
प्‍यार से सहलाऊं
कि‍ भुला दूं

मन पागल है
कभी नहीं टि‍कता
अपनी बात पर

उलझ जाता है
फि‍र से
उसी मकड़जाल में
जि‍से 
बामुश्‍कि‍ल तोड़
बाहर आया था एक दि‍न....

4 comments:

अजय कुमार झा said...

ये मन बावरा और ये चाँद सांवरा ...........
सुन्दर रचना ..जारी राहिए जी

राजेंद्र कुमार said...

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (02.10.2015) को "दूसरों की खुशी में खुश होना "(चर्चा अंक-2116) पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ, सादर...!

GathaEditor Onlinegatha said...

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Onkar said...

उम्दा रचना