Tuesday, September 29, 2015

शहर को लगा ग्रहण....


कल सांझ
बड़ी ही खूबसूरत थी
चि‍ड़ि‍यों की चहचहाहट के सि‍वा
था सब तरफ शांंति‍ का आलम

चांद कुछ देर से आया फलक पर
लाल, उदास, नि‍स्‍तेज
जाने कहां खो गई थी इसकी चमक
ओह, चांद को तो आज लगा है ग्रहण
जैसे
पि‍छले दि‍नों लगा था मेरे शहर को
सारी रौनक थी गुम
फैली थी जलते टायर की गंध
शहर संगीनों के साए के गि‍रफ़्त में था
मगर बाहर
नि‍कल आया था ग्रहण से तुरंत, मेरा भी शहर
अब रात पूनम की दमकती थी
सारे अमनपसंदों के मुंह पर सुकून भरी हंसी थी।

मगर फि‍र आज सुबह
पूरा शहर दौड़ता-भागता पाया गया
कई स्‍कूलों के गेट से बच्‍चे लौटाए गए
थे बदहवास अभि‍भावक
कल के भूखे मजदूर आज भी,
सड़क पर भटकते पाए गए
इस बार सूरज को खाने राहु नहीं
आया है कोई मौकापरस्‍त गि‍द्ध
नोचने को आतुर इंसानी जि‍स्‍म
वो उम्र नहीं देखता,वक्‍त नहीं देखता
मजहब भी नहीं देखता
बस नोच-खसोट कर ले जाता है अमन-चैन
अफवाहों का बाजार गरम है, लोग सड़क पर कम हैं

आज फि‍र
सांझ बड़ी ही खूबसूरत है
रात गहरी सही, भोर उजाला लि‍ए आएगी
क्‍योंकि‍,
ग्रहण कभी-कभी ही लगता है सूरज को
चांद को, और कभी
हमारे प्‍यारे अमनपसंद शहर को....।

3 comments:

रचना दीक्षित said...

चाँद के ग्रहण की धरती के ग्रहण के साथ तुलना ठीक ही है.

सुंदर प्रस्तुति.

Dilbag Virk said...

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 1 - 10 - 2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2115 में दिया जाएगा
धन्यवाद

Madan Mohan Saxena said...

भावपूर्ण प्रस्तुति.