Monday, June 8, 2015

जो मैं तोड़ दूं .........


जो मैं मान लूं
तुम कभी से नहीं थे मेरे
न वो पाक रूह थी कोई
न कोई इंसान था अपना सा
बस एक साया था
और उस साए से
मोहब्‍बत हो गई थी मुझको
जो मैं तोड़ दूं
मन्‍नतों का धागा
काटकर अपनी कलाई
रि‍सने दूं लहू के साथ तेरी याद
तेरे वादों के बुलबुले को
एक फूंक से कर दूं मटि‍यामेट
सोच लूं
तेरी बातें थी कि‍सी कहानी का प्‍लाॅट
और हंसू जी भर कर
अपनी ही बेवकूफि‍याें पर
बोलो मान लोगो तुम न उस दि‍न
कोई रूह नहीं होती
इस दुनि‍या में
जन्‍मों-जन्‍मों का कोई बंधन नहीं होता

(( बस...कुछ ऐसे ही.....मन का मनका))

3 comments:

डॉ. मोनिका शर्मा said...

समय के साथ मिलते कितने सबक , बढ़िया रचना

प्रभात said...

सुन्दर रचना!

Jyoti Dehliwal said...

रश्मि जी, हर किसी को नहीं मिलता यहाँ प्यार जिंदगी में ...! प्यार न मिलने पर होने वाली पीड़ा का बहुत ही सुन्दर वर्णन किया है आपने!