Friday, February 20, 2015

शाम का सांवला अक्‍स


काश...तुम न होते
तो ये बातें भी न होती
गुजरते शाम का
सांवला अक्‍स
मेरे चेहरे पर न पड़ता

टूटता जब कोई तारा
तो जि‍गर 
चाक नहीं कर जाता
तुम न होते
तो आज ये
वजूद बि‍खरा न होता 


तस्‍वीर...गांव के एक शाम की 


5 comments:

ARUN SATHI said...

khub.. bahut khub

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

सार्थक प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (21-02-2015) को "ब्लागर होने का प्रमाणपत्र" (चर्चा अंक-1896) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Dr.NISHA MAHARANA said...

..no words to say ...

निवेदिता श्रीवास्तव said...

सब कुछ इस एक "काश" में ही सिमट जाता है ...

Digamber Naswa said...

बहुतखूब ... शब्द शब्द बोलते चित्र की तरह ...