Thursday, January 9, 2014

प्रेम....ऐसा ही होता है......


मैं
मंत्रमुग्‍ध नहीं
मंत्रबिद्ध हो जाती हूं
जब
ओम की तरह
गूंजती है कानों में
तुम्‍हारी ध्‍वनि

मैं 
ध्‍यान में होती हूं

हो रहा होता है
खुद से साक्षात्‍कार
जब एक गहरी आवाज
खींच ले जाती है
मुझे अनंत में.....

हां....
लीन होना
ऐसा ही होता है
चाहे ईश्‍वर में हो
या कि‍सी इंसान में

प्रेम....ऐसा ही होता है......


तस्‍वीर..साभार गूगल 

9 comments:

रविकर said...

सुन्दर प्रस्तुति-
आभार आदरणीया-

राजीव कुमार झा said...

बहुत सुन्दर .
नई पोस्ट : सांझी : मिथकीय परंपरा

राजीव कुमार झा said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (11-1-2014) "ठीक नहीं" : चर्चा मंच : चर्चा अंक : 1489" पर होगी.
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है.
सादर...!

jyoti khare said...


बहुत सुंदर रचना
उत्कृष्ट प्रस्तुति
बधाई ---

सुशील कुमार जोशी said...

बहुत सुंदर !

Onkar said...

बहुत खूबसूरत

कालीपद प्रसाद said...

सुन्दर प्रस्तुति !
नई पोस्ट आम आदमी !
नई पोस्ट लघु कथा

केवल राम : said...

मैं
ध्‍यान में होती हूं
हो रहा होता है
खुद से साक्षात्‍कार
जब एक गहरी आवाज
खींच ले जाती है
मुझे अनंत में.....

बेहतर भावाभिव्यक्ति .....!!!

हिमकर श्याम said...

उम्दा रचना, बहुत खूब लिखा है .
http://himkarshyam.blogspot.in/