Monday, January 13, 2014

सि‍तारों की छांव में हूं.....


रात
आया था ख्‍वाब
एक जंगल में
अकेले
खामोश चलते जाने का
शायद

यह नि‍यति थी

मगर
कुछ मीठे, कुछ रूखे
अहसास जगाते
से शब्‍द
मेरी थाती बन गए हैं

तुम्‍हें भी पता है
नहीं देखा मैंनें
एक बार भी
गौर से तुम्‍हारा चेहरा
न झांका
उन गहरी आंखों में

जहां शायद
मेरे ही
ख्‍वाब तैरा करते हैं
जो शब्‍द बन
हर वक्‍त मुझे
घेरे रहते हैं

अब खामोशि‍यों के
जंगल से
नि‍कलकर
सि‍तारों की छांव में हूं
ये तुम्‍हारी ही यादें हैं
जि‍नकी गि‍रफ्त में
कल रात से हूं.......



अभी-अभी छत पर उतर आया चांद.....

8 comments:

मिश्रा राहुल said...

काफी उम्दा प्रस्तुति.....
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (14-01-2014) को "मकर संक्रांति...मंगलवारीय चर्चा मंच....चर्चा अंक:1492" पर भी रहेगी...!!!
- मिश्रा राहुल

राजेंद्र कुमार said...

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति। मकर संक्रान्ति की हार्दिक शुभकामनाएँ !

Digamber Naswa said...

एक एहसास जो ख़्वाबों के जरिये दिल में उतर गया ...

राजेंद्र कुमार said...

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति। मकर संक्रान्ति की हार्दिक शुभकामनाएँ !

Kailash Sharma said...

अब खामोशि‍यों के
जंगल से
नि‍कलकर
सि‍तारों की छांव में हूं
ये तुम्‍हारी ही यादें हैं
जि‍नकी गि‍रफ्त में
कल रात से हूं.......

...बहुत सुन्दर...भावों और शब्दों का बहुत सुन्दर संयोजन...

कविता रावत said...

मगर
कुछ मीठे, कुछ रूखे
अहसास जगाते
से शब्‍द
मेरी थाती बन गए हैं
..सच दिल में एक बार उतरे जो वे फिर दिल कभी दूर नहीं होते..
बहुत बढ़िया रचना ..

मिश्रा राहुल said...

काफी उम्दा रचना....बधाई...
नयी रचना
"जिंदगी की पतंग"
आभार

काजल कुमार Kajal Kumar said...

रश्मि जी वास्तव में ही बहुत सुंदर रचना है.