Tuesday, August 6, 2013

सपनों के सि‍तारे टांक दूं ..


एक आह तड़प उठी
ख्‍वाहि‍शों की 
तलछट से
कह दो तो
उम्र की कोरी ओढ़नी पर
सपनों के सि‍तारे टांक दूं ..

शबनम सी झरती है
शब भर याद
चाहत मेरी
और वो बेख्‍याल
अब कर दो हद मुकर्रर
कि कलम कागज के लि‍ए
है बेकरार ...

8 comments:

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन 'बंगाल के निर्माता' - सुरेन्द्रनाथ बनर्जी - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

expression said...

बहुत सुन्दर......
अनु

sushma 'आहुति' said...

भावो को संजोये रचना.....

आशा जोगळेकर said...

इस कलम को कागज मिले और साकर हों ये अनोखे भाव ।

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत ही खूबसूरत.

रामराम.

Aparna Bose said...

BEHAD KHOOBSURAT RASHMI JI

कालीपद प्रसाद said...

बहुत बढ़िया !
latest post: भ्रष्टाचार और अपराध पोषित भारत!!
latest post,नेताजी कहीन है।

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया said...

भावों की लाजबाब अभिव्यक्ति,,,

RECENT POST : तस्वीर नही बदली