Monday, August 5, 2013

अब नहीं फटता धरती का सीना....


एक न एक सीता
रोज ही देती है
अग्‍निपरीक्षा
और 
राम युग की तरह
नि‍ष्‍कलंक
नि‍कल ही आती है
बाहर

मगर 
 नहीं फटता अब
धरती का सीना
नहीं समाती उसमें
कोई भी सीता
शायद धरती और
इस जमाने की जानकी
जानती है
पुरुष  छल

कि‍ देनी होगी
जिंदगी भर उसे
कदम-कदम पर परीक्षा
जब अकारण कलंक को ढोना है
तो क्‍यों इस
अमूल्‍य जीवन को
खोना है.....


तस्‍वीर--साभार गूगल

3 comments:

तुषार राज रस्तोगी said...

बेहद भावपूर्ण कविता

महेन्द्र श्रीवास्तव said...

ओह, बहुत सुंदर

Aparna Bose said...

जब अकारण कलंक को ढोना है
तो क्‍यों इस
अमूल्‍य जीवन को
खोना है..........bahut sundar abhivyakti