Wednesday, March 20, 2013

(((...वि‍श्‍व गौरैया दि‍वस पर कुछ यादें...)))

आज वि‍श्‍व गौरैया दि‍वस है। पि‍छले वर्ष ही ये पोस्‍ट मैंने लि‍खा था, जि‍सका बाद में आलेख के रूप में  वि‍स्‍तार कि‍या। चीजें वही हैं.....समस्‍याएं भी वहीं। इसलि‍ए एक बार फि‍र आपलोगों के ध्‍यानार्थ इसे पोस्‍ट कर रही हूं। 




.......लगभग छह वर्ष की लड़की गर्मी की छुट़टि‍यों में नानी घर गई। एकदम
सुबह चीं..चीं...चीं की आवाज से उसकी आंख खुल गई। उसने देखा...कमरे के
छज्‍जे पर एक घोसला है और एक गौरेया फुदकती सी....कभी खि‍ड़की से अपने
घोसलें तब जाती.....फि‍र वहां से खि‍ड़की के रास्‍ते बाहर फुर्र..र..र हो
जाती। जब वापस आती तो उसकी चोंच में छोटे-छोटे ति‍नके होते। लड़की वह
बड़ी गौर से अपनी बि‍स्‍तर पर लेटकर सारी प्रक्रि‍या कौतूहल के साथ देखती
रही। थोड़ी देर बाद उसने महसूस कि‍या कि‍ घर का आंगन चि‍ड़ि‍यों के
चहचहाने से गुलजार हो गया है। उसे बड़ा अच्‍छा लगा। इतनी सुबह उठने की
आदत नहीं थी उसे मगर....चहचहाहट की इस आवाज ने उसकी  जि‍ज्ञासा बढ़ा दी
और वह चुपके से दबे पांव बाहर जाने लगी। उसे आता देख नानी ने चुप से
इशारा कि‍या....शी..शी....ध्‍यान से। देखना कहीं तुम्‍हें देखकर सब उड़ न
जाएं। उसने सर हि‍लाकर नानी को नि‍श्‍चिंत कि‍या और धीमे से आंगन में उतर
आई। देखा.......ढेर सारी गौरैया आंगन में बि‍खरे दानों को चुग रही है और
पानी से भरे बाल्‍टी और टब में नहाकर नि‍कलते हुए शोर मचा रही है। उसे
बड़ा अच्‍छा लगा ये सब। पहली बार जो देखा था। थोड़ी देर बाद सारी गौरया
उड़ गई और आंगन सूना हो गया। इसके बाद लड़की कमरे में गई। देखा...अपने
घोसलें को बनाने के लि‍ए ति‍नके ढो कर लाने के क्रम में ढेर सारे ति‍नके
कमरे में गि‍रे हुए हैं और नानी झाड़ू से उन्‍हें समेट रही है। यह देखकर
लड़की ने अपनी नानी से कहा- नानी, इन घोसलों को हटा क्‍यों नहीं देती।
देखो तो....सारा घर गंदा कर दि‍या इसने। तब नानी से हंसते हुए
कहा....नहीं रे...घर में चि‍ड़ि‍यों का घोसला बनाना अच्‍छी बात होती है।
कहते हैं इससे घर में लक्ष्‍मी आती है। इसलि‍ए मैं कभी कि‍सी चि‍ड़ि‍ये
को घोसला बनाने से नहीं रोकती। क्‍या हुआ जो घर गंदा होता है। वैसे भी
साफ-सफाई करनी होती है...एक के बजाय दो बार कर लूंगी। फि‍र कहा....तुमने
देखा न...कितना अच्‍छा लगता है जब इनकी चहचहाहट से नींद खुलती है तो। और
जब ये मेरे आंगन में उतरती है तो लगता है सूने घर में ढेर से मेहमान चले
आए हैं। और मेहमान तो भगवान होते हैं न पगली। इसलि‍ए तुम भी इन्‍हें दाना
खि‍लाया करो....गर्मियों में पानी दि‍या करो। देखो....ये तुम्‍हारी
दोस्‍त बन जाएंगी।मुझे नानी की वो सीख आज तक याद है और रोज चि‍ड़ि‍यों को
दाना डालती हूं....पानी भी। मगर अब ये खत्‍म हो रही हैं क्‍योंकि जैसी
सीख नानी से उस लड़की को यानी मुझे दी.....वैसी शायद सबको नहीं मि‍ली
होगी।

गौरेया की सबसे पहले पहचान 1851 में अमेरि‍का के ब्रुकलि‍न इंस्‍टीटयूट
ने करायी थी। गौरैया खेत की फसल में लगने वाले कीड़े से फसलों की सुरक्षा
करती है। गौरैया उल्‍लास का प्रतीक भी माना जाता है। गांवों मे लाग घर की
दीवारों पर गैरैया के चि‍त्र बनाया करते हैं। मगर बहुत ही दुखद है कि‍ अब
गौरैया औश्र ऐसे ही अनेक छोटे-छोटे चि‍ड़ि‍यों का अस्‍ति‍त्‍व समाप्‍त
होता जा रहा है। इसके कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण कीटनाशक का छि‍ड़काव
है....जि‍सके कारण गौरैयां मर रहीं है। साथ ही मोबाइल फोन से नि‍कलने
वाली तंरगों के कारण इनके अंडे नष्‍ट हो जा रहे हैं। और जब अंडे ही नहीं
रहेंगे तो इनका वि‍स्‍तार कैसे होगा। और मोबाइल तो लगभग आज हर इंसान के
हाथ में है। चाहे शहर हो या देहात। इसके अलावा भोजन की भी समस्‍या हो रही
हैं इन्‍हें पेटृोल जलाने पर नि‍कलने वाला मि‍थाइल नाइटृेट छोटे कीटों को
समाप्‍त कर देता है जो कि‍ नन्‍हें गौराया के बच्‍चों का आहार हुआ करता
है। अब बाग-बगीच खत्‍म तो वहां मि‍लने वाले छोटे-छोटे कीड़े भी खत्‍म हो
जा रहे हैं। इनके नि‍वास की भी समस्‍या है अब तो। लोग के घरों में बगीचे
नहीं होते अब न ही पहले जैसे छज्‍जे, जहां ये रह सके।

इसलि‍ए जरूरी है कि‍ हम 'रेड सूची' मे शामि‍ल इन नन्‍हें....खूबसूरत आवाज
वाले गौरैयों को बचा लें। आंध्र वि‍श्‍ववि‍घालय के अध्‍ययन्‍ के मुताबि‍क
गौरैयों की आबादी में 60 फीसदी की कमी आई है। इसलि‍ए समय है संभलने का।
हर व्‍यक्‍ति‍ अगर व्‍यक्‍ति‍गत प्रयास करे...रोज इन्‍हें दाना
डाले.....गर्मियों में पानी की व्‍यवस्‍था करे.....तो कुछ हद तक
स्‍थि‍ति‍ संभल सकती है। वरना......वि‍कास ने तो इनके वि‍नाश के द्धार
खोल ही डाले हैं। आइए......आज हम इन्‍हें बचाने का संकल्‍प लें।

21 मार्च 2013  को हिंदुस्‍तान के संपादकीय पन्‍ने पर साइबर कॉलम में प्रकाशि‍त आलेख


12 comments:

संध्या शर्मा said...

दोष हम इंसानों का ही है, इन्हें विलुप्त होने की कगार तक पहुँचाने का तो फ़र्ज़ भी बनता है इन्हें बचाने का ...होली की अग्रिम शुभकामनायें.

Rajendra Kumar said...

देखते देखते ही ये प्यारी चिड़िया लुप्त हो जायेगी.इन सब का हम सब ही जिम्मेदार हैं.

शारदा अरोरा said...

sundar jaankari...

दिलबाग विर्क said...

आपकी यह पोस्ट कल के चर्चा मंच पर है
आभार

Chaitanyaa Sharma said...

प्यारी नन्ही गौरैया की चहक सदा बनी रहे ...

Madan Mohan Saxena said...

बेह्तरीन अभिव्यक्ति .शुभकामनायें.

Vikesh Badola said...

आपका यह आर्टिकल आज के हिन्‍दुस्‍तान हिन्‍दी के सम्‍पादकीय पेज के साइबर संसार कॉलम में। बधाई जी।

Vikesh Badola said...

आपका यह आर्टिकल आज के हिन्‍दुस्‍तान हिन्‍दी के सम्‍पादकीय पेज के साइबर संसार कॉलम में। बधाई जी।

Amrita Tanmay said...

सुन्दर आह्वान..

ZEAL said...

With similar memories I appeal the readers to take care of sparrow which is on the verge of extinction.

दिगम्बर नासवा said...

कितना कुछ है जो इंसान खा गया है ... ओर भी खाता जा रहा है ...
काश अपने से अलग हट के कुछ सके मानव ...

Krishna Kumar Mishra said...

आप की पूर्णता की कामना के साथ विश्व गौरैया दिवस की तमाम शुभकामनाये....