Monday, November 28, 2011

तुममें.....

इतना डूबी हूं तुममें...
कि‍ अब,
उबरने की न
ताकत बची है
न ख्‍वाहि‍श
बस
अब जाना चाहती हूं
वहां....
जहां से
प्‍यार के सोते फूटते हैं
और न जाने
कि‍स राह नि‍कलकर
मुझ तक पहुंचते हैं
और मैं...
सारा उब-डूब छोड़कर
सम्‍मोहि‍त हो
पास चली जाती हूं
खो जाती हूं
तुममें...
तुम्‍हारी सांसों की आवाज में
सोचती हूं
वो क्‍या है
जो मेरे पैर जमीं पर
टि‍कने नहीं देता
और मैं
दुनि‍या के सारे नि‍यम-कायदे
तज कर
सारी सच्‍चाई भूलकर
बस
डूबती चली जाती हूं तुममें......।

7 comments:

डा.राजेंद्र तेला"निरंतर" Dr.Rajendra Tela,Nirantar" said...

bahut badhiyaa
par meraa khyaal hai
jab doob hee gaye ho
jismein doobnaa chaahte they
phir fikr kis baat kee
log doobne ke ichhaa liye
bhatakte rahte
talash mein zindgee
gujaar dete

संतोष कुमार said...

Waah anupam prem ki sunder parikalpana.
mere blog par aane ke liye bahut bahut aabhaar ..

प्रेम सरोवर said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति है आपकी..। पढ़ना बहुत अच्छा लगा.।
समय मिलने पर मेरे ब्लॉग पर आईयेगा,। धन्यवाद ।

बारिशें said...

कभी कभी लगता है कि जैसे किसी सूफी का ख्याल सामने आ रहा है ... ख़याल एक रूह और जिस्म के साथ ... क्या निराकार से साकार की यात्रा भी होती है ... साकार से निराकार की छुअन के महसूस होने की बात अक्सर होती है ... आप अच्छा सोच सामने लाती हैं ... हमेशा ...

S.N SHUKLA said...

बहुत ख़ूबसूरत प्रस्तुति , आभार .

कृपया मेरे ब्लॉग snshukla.blogspot.com पर भी पधारने का कष्ट करें.

संजय भास्कर said...

दुनि‍या के सारे नि‍यम-कायदे
तज कर
सारी सच्‍चाई भूलकर
बस
डूबती चली जाती हूं तुममें......।
बहुत ही सुन्दर खास कर निम्न पंक्तियाँ

Reena Maurya said...

bas dubati chali jati hu tumamae...
bahut sundar
gajab ka likha hai...