Friday, February 22, 2008

मुखौटे का सच


मैंने हर बार की
मुखौटे के पीछे
इंसान के असली चेहरे को देखने की
पहचानने की कोशि‍श
मगर मेरी नजरों ने
हर बार धोखा खाया
क्‍योंकि‍
असली चेहरों के उपर
कई परत थे नकली चेहरों के
और मैं उनमें उलझती
पहचानने की कोशि‍श करती
फि‍र खाकर धोखा
खामोश बैठ जाती

1 comment:

विनय प्रजापति 'नज़र' said...

हाँ ऐसा ही होता सच्चे लोगों के साथ मैंने भी जीवन से यही सीख ली है! आपकी यह कविता पढ़कर क़तील साहब की यह पंक्तियाँ बरबस याद आ गयीं...

जब भी चाहें इक नय़ी सूरत बना लेते हैं लोग
एक चेहरे पर कई चेहरे सजा लेते हैं लोग