Tuesday, March 9, 2021

'' मैं ''


जब से यह फोटो क्‍लि‍क हुआ है, जाने क्‍यों लगता है इसके पीछे कोई कहानी छि‍पी है, जि‍से महसूस तो कर पा रही हूं..मगर शब्‍द नहीं दे पा रही। 

क्‍या मैं कि‍सी बीती कहानी का हि‍स्‍सा हूं या कोई कहानी आगे लि‍खी जाएगी जि‍सका मुख्‍य पात्र बेंच और उस पर बैठी अकेली '' मैं '' हाेऊंगी। वैसै ऐसी सैकड़ों दोपहरें बीत चुकी है इस जि‍ंदगी में। दोपहर का सन्‍नाटा, तेज धूप की थोड़ी सी छांंव में खुद को छुपाने की कोशि‍श। 

क्‍या कुछ नहीं गुजरा है जीवन में।  

6 comments:

कविता रावत said...

हर किसी में एक कहानी नहीं कई कहानियां छुपी रहती है

बहुत सही

Rohitas ghorela said...

जीवन सीधी रेखा तो नहीं।
हो गए हैं हम तो कुछ तो होकर रहेगा।
आइयेगा नई रचना

Onkar said...

बहुत सुन्दर

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

ज़रूर लिखी जा सकती है कहानी । लिखिए ।

प्रतिभा सक्सेना said...

आप का ही तो एक रूप है यह भी - अब चिख डालिये कहानी भी.

Onkar said...

जीवन चलने का नाम