Friday, February 15, 2019

पल्लव नया....


मन के अरण्य में 
स्मृतियों की बंजर हथेली पर
सूखे- झरे पात हैं
एक-एक कर
चुन लूँ
बिखरी यादों को
इस उदास मौसम में
पतझड़ के आख़री पत्ते की तरह
और गुनगुनाती धूप में
धीमे-धीमे
दुख से बाहर आने का
कोई रास्ता देखूँ
कि सुना है
वसंत की ऊँगलियों में
जादू है
वो खिलाएगा पल्लव नया
उगेगा सरसों पीला
कि फिर वसंत आ रहा ।

Tuesday, February 12, 2019

तुम्हें खो देती....



आज फिर तेरी याद आयी...बेतरह आयी...इतनी कि सम्भाली न गयी और आँसुओं से अपना ही दामन तर हो गया।

तू बिछड़ा है तो क़ुसूर मेरा है ना ..तू तो जाने कब से बता रहा था मुझे कि अब मैं रहूँ न रहूँ, तुम्हें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला। हर बार झगड़े के बाद मैं रूठती और फिर मान भी जाती....

दरअसल दूसरे को अपनी नज़र से जस्टिफ़ाई करने की ग़लत आदत जो है। ख़ुद ही सोचती ...तुम्हें बुरा लग रहा होगा ...मेरे बिना उदास होगे ....मेरी राह देखते होगे ...और मैं ख़ुद ही ख़ुद को समझा के पास चली जाती।

ये सच है कि तुम तब मुझे समेट ज़रूर लेते थे..सहलाते थे मेरा आहत स्वाभिमान...मैं सब भूल के साथ हो जाती...सिमट जाती। कभी सोचा नहीं ऐसा कि तुम्हें फ़र्क़ नहीं पड़ता कोई ...कि तुम नहीं आवाज़ देते ...कि तुम नहीं करवटें बदलते सारी-सारी रात...

कह ही दिया न पहली बार उस रोज़...''यू केन गो'' ....और मैं सच में चली गयी ...ये तीन शब्द कितना असर कर गया मुझ पर।

ना...ये शब्द नहीं थे...तुम्हारी इच्छा थी ..वो चाहत जिसे तुम मेरे बेख़बर प्यार को जताना चाह के भी जता न पाए कभी, वो काम इन शब्दों ने कर दिया ..

आख़िर ये पहली बार कहा था तुमने .. नहीं मानती तो तुम्हें खो देती...

Monday, February 11, 2019

मैकलुस्‍कीगंज..... जि‍ंदा है अब भी


उम्र कुछ भी हो...आंखों में कुछ सपने सदा वैसे ही रहते हैं, जैसे बचपन में देखा हुआ आकाश का चांद या नदी में लगाई छलांग...या कुछ आदतें, जो परि‍स्‍थि‍तयों की नहीं, जी गई जि‍ंदगी की सौगात होती है।     

उन्‍न्‍हतर वर्ष की उम्र में भी 'कि‍टी मेमसाहब' की आंखों में चमक कौंध जाती है लैंप से लपकी रोशनी की तरह, जैसे वह अभी दौड़ पड़ेगी हाथों में हरि‍केन लैंप उठाए... सांझ को रांची से लौटी बस से उतरते अपने परि‍जनों को रास्‍ता दि‍खाने, मैकलुस्‍कीगंज की गलि‍यों में। 

यादों के समंदर में गोते लगाते कहती हैं कि‍टी - ''पहले बि‍जली नहीं थी। न गाड़ी न कोई और सुवि‍धा। पहले एक बस चलती थी। पहले डेढ़ रुपया भाड़ा था जो बढ़कर पांच रुपए हुआ। तब हरि‍केन लैंप लेकर जाते थे, रास्‍ता दि‍खाने के लि‍ए। अब तो रांची जाना हो तो गाड़ी बुक करनी पड़ती है। यह आफत है हमारे लि‍ए। पहले सब कुछ कि‍तना अच्‍छा लगता था।''  


कि‍टी मेमसाहब यानी 'कि‍टी टेक्‍सरा' मैकलुस्‍कीगंज की पहचान हैं। फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने वाली कि‍टी फल बेचती थी रेलवे स्‍टेशन के बाहर। जो कोई भी आता है मैक्‍लुस्‍कीगंज, वह कि‍टी मेमसाहब को जरूर ढूंढता है, चाहे वो पर्यटक हो या पत्रकार, लेखक हो या फि‍ल्‍म नि‍र्माता। सब उसकी आखों से मैकलुस्‍कीगंज का अतीत देखना चाहते हैं और अक्‍सर उनकी कामना पूरी होती है...हमारी तरह। 

जनवरी के सर्द दि‍नों का एक रवि‍वार चुना और दो गाड़ि‍यों में हम आठ लोग नि‍कल गए एकदम सुबह  मैकलुस्‍कीगंज के लि‍ए। रास्‍ते में सरसों के खेत और मटर की फलि‍यों का सौंदर्य देखते हुए रांची से 65 कि‍लोमीटर की दूरी तय कर ली तकरीबन दो घंटे में। बहुत पहले गई थी तो रास्‍ता बेहद खराब था। अब पहले से बेहतर है और एक आनंददायक यात्रा का लुत्‍फ उठाया जा सकता है। 


 मैकलुस्‍कीगंज नाम ही ऐसा है जो सबको बेहद आकर्षि‍त करता है। लगता ही नहीं कि‍ यह झारखंड के कि‍सी हि‍स्‍से का नाम है। इसे ' मि‍नी लंदन'  भी कहा जाता है। आदि‍वासी प्रदेश का एक गांव जहां वि‍देशी बसे हैं , जि‍नकी बोलचाल और संस्‍कृति‍ देसी भी है और वि‍देशी भी। वे लोग दशहरे मेंं मेला भी घूमते हैं और चर्च जाने के साथ-साथ क्‍लब में भी होते हैं। दरअसल इस जगह का नाम था लपरा, जि‍से मैकलुस्‍की टि‍मोथी ने बसाया था। इसके पीछे भी एक कहानी है। 

जब अंग्रेज भारत आए तो अपने राजपाट के प्रसार के लि‍ए पटरि‍यां बि‍छाकर रेल चलाई, पोस्‍ट आफि‍स बनाया। यहां काम करने के लि‍ए अंग्रेज हि‍ंदुस्‍तान बुलाए गये क्‍योंकि‍ जब तक भारतीय यह काम नहीं सीख जाते, उन्‍हें अंग्रेजों की जरूरत पड़ती ही थी। मैकलुस्‍की के पि‍ता आयरि‍श थे और रेलवे में नौकरी करते थे। जब वो बनारस पोस्‍टेड थे तो एक ब्राह्मण लड़की से प्‍यार कर बैठे और तमाम वि‍रोध के बाद भी उन दोनों ने शादी कर ली।     

पि‍ता वि‍देशी, मां देसी और उनसे उत्‍पन्‍न बच्‍चे दोनों संस्‍कृति‍यों को देखते और कहीं स्‍वीकार्य कहीं अस्‍वीकार्य होते, महसूस करते बड़े हुए। ऐसे में मैकलुस्‍की भी अपने समाज की छटपटाहट बचपन से देखते आए थे। अपने समुदाय के लि‍ए कुछ करने की भावना शुरू से उनके मन में थी। ऐसे में जब 1930 के दशक में साइमन कमीशन की रि‍पोर्ट में एंग्‍लो-इंडि‍यन समुदाय के प्रति‍ अंग्रेज सरकार ने कि‍सी भी तरह की जि‍म्‍मेदारी नहीं ली, तो उनके सामने अपने अस्‍ति‍त्‍व का ही संकट खड़ा हो गया। तब मैकलुस्‍की ने तय कि‍या कि‍ एंग्‍लो-इंडि‍यन समुदाय के लि‍ए भारत में ही एक गांव बसाएंगे। 

प्रॉपटी डीलि‍ंग व्‍यवसाय से जुड़े टि‍मोथी जब बि‍हार के रांची-पलामू के बीच, खलारी से नजदीक इस जगह पर पहुंचे तो यहां की आबोहवा और जामुन, करंज, सेमल, महुआ, आम के पेड़ देखकर इतने मोहि‍त हुए कि‍  एंग्‍लो-इंडि‍यन परि‍वार यहीं बसाने का नि‍र्णय कर लि‍ए। अभी भी यहां के आम की बहुत प्रशंसा होती है। 


''कॉलोनाइजेशनसोसाइटी ऑफ इंडिया लिमिटेड''  नाम की एक संस्था का गठन किया और इसी संस्था के नाम पर रातू महाराज से यहां की दस हजार एकड़ जमीन खरीदी। पूरे भारत से दो लाख एंग्लो इंडियन को प्रकृति के इस स्वर्ग में बसने का आमंत्रण दिया। 1932 तक लगभग 400 एंग्लो इंडियन परिवारों ने मैक्लुस्कीगंज में बसना तय कर लिया।

रांची-लातेहार रेलखंड पर सुंदर बंगले बने। सामुहि‍क खेती की शुरूआत की गई। फलों के बगीचे बने और अलग-अलग हि‍स्‍सों से एंग्‍लो-इंडि‍यन यहां आकर बसने लगे। 1935 में मैक्‍लुस्‍की के नि‍धन के बाद लपरा गांव का नाम बदलकर रखा गया - मैकलुस्‍कीगंज। 

इसी मैकलुस्‍कीगंज के सरकारी गेस्‍टहाउस में हमने सुबह की चाय पी और नि‍कल पड़े उन पुर्तगीज शैली के बंगलों की तलाश में,  जो अपनी वि‍शि‍ष्‍टता के कारण अब भी आकर्षण के केंद्र-बि‍ंदु है। हालांकि‍ झारखंड के लंदन के नाम से ख्‍यात मैकलुस्‍कीगंज में जहां कभी 400 गोरे परि‍वार रहते थे, अब बमुश्‍कि‍ल दस-बारह परि‍वार ही बचे हैं यहां।  

एंग्‍लो-इंडि‍यन के अलावा बाद में सेना के अवकाश प्राप्‍त अधि‍कारी और कलकत्‍ता के लोगों ने भी मैकलुस्‍कीगंज में बंगला खरीदा। यहां अभी भी लोग अभि‍नेत्री अपर्णा सेन का बंगला देखने जाते हैंं। बांग्‍ला उपन्‍यासकार बुद्धदेव गुहा ने भी बंगला खरीदा था और मैकलुस्‍कीगंज पर लि‍खे उपन्‍यास के कारण भी मैकलुस्‍कीगंज कोलकातावासि‍यों में लोकप्रि‍य हुआ। कथाकार वि‍कास झा ने भी ‘मैकलुस्‍कीगंज’ उपन्‍यास लि‍खा, जि‍स पर उन्‍हें सम्‍मान प्राप्‍त हुआ है। अपर्णा सेन ने फि‍ल्‍म 36 चौरंगी लेन की पटकथा मैकलुस्‍कीगंज से प्रेरि‍त होकर ही लि‍खी थी और अभी कोंकणा सेन शर्मा ने फि‍ल्‍म बनाई है 'डेथ इन द गंज।' 

चाय-नाश्‍ते के बाद हम सीधे गए रेलवे स्‍टेशन, जहां कि‍टी मेम साहब फल बेचा करती थी।एक तरह से रेलवे स्‍टेशन  मैकलुस्‍कीगंज की पहचान भी है।  कुछ वहीं के साथी आ गए हमारे पास ताकि‍ हम कम समय से ठीक से देख लें पूरा कस्‍बा। हां, अब यह गांव कस्‍बे में परि‍वर्तित हो गया है क्‍योंकि‍ जगह-जगह दुकानें खुल गई हैं...आवागमन बढ़ गया है। यहां पहुंचकर मालूम हुआ कि‍ एक कि‍लोमीटर की दूरी पर ही कि‍टी मेमसाहब का  घर है, तो हमलोग पहले उनसे ही मि‍लने चल पड़े। 




कि‍टी अपने घर के बाहर ही मि‍ल गई। बेर, आम, और कई तरह के वृक्षों से घि‍रा है उनका घर। देखते ही पूछती हैं-  ''आपलोग कहां से आए हैं ?'' .वार्तालाप की शुरूआत अंग्रेजी में ही होती है। बाद वो हि‍ंदी में उतर आईं, जब वो कुर्सी लाने लगी और हम सभी उनके दरवाजे सीढ़ि‍याेंं पर ही  बैठ गए घेरकर। कि‍टी के साथ उसकी नति‍नी 'पि‍हू' भी थी, जो अपनी नानी से चि‍पकी हुई थी। 

हमारे सवालों का बहुत संयत तरीके से जवाब दे रही थी कि‍टी , जबकि‍ कई लोगों का कहना था कि‍ वह इधर बात करने से कतराती हैं। इस उम्र में भी बहुत आकर्षक है वो। पैदा यहीं हुई पर वि‍देशी छाप स्‍पष्‍ट है चेहरे पर। एक फि‍रंगी को देहाती लहजे में बात करते देखकर हमें भी अच्‍छा लग रहा था। गोद में अपनी नाति‍न को लि‍ए हमारे सवालों से बचपन में चली जाती हैं कि‍टी......उनके चेहरे पर छाई स्‍नि‍गधा ने महसूस करा दि‍या कि‍ पुराने पन्‍नों का उलटना सुखद लग रहा है उन्‍हें भी। 


बचपन याद करते हुए कहती हैं....रेलवे स्‍टेशन और मेरे घर के आसपास बाघ घूमते थे उन दि‍नों। एक बार लकड़बग्‍घा बकरी को पकड़ ले गया था। बहुत मुश्‍कि‍ल से बचाकर लाए थे। 

'' डर नहीं लगता था बाघ से?''  

'' न..कैसा डर ? हमलाेग सब साथ ही रहते थे। तब यहां इतना आदमी कहां होता था ?'' 

'' कि‍स क्‍लास तक पढ़ी हैं?'' 

 '' स्‍कूल गई ही नहीं...पचास के दशक में यहां स्‍कूल था भी नहीं। हां, अमरूद, आम, शरीफा के बगान थे।'' 

'' नाना आए थे बाहर से..कहां, ये पता नहीं। नाना की पेंशन राशि‍ बहुत थोड़ी थी। आर्थिक स्‍थि‍ति‍ ठीक नहीं थी। इसलि‍ए बचपन गाय-बैल चराते बीता और थोड़े बड़े होने पर फल बेचते थे। बीमारी में भी जानवरों का ही सहारा था। गाय बैल बेच के इलाज करते थे।''  

खेती-बाड़ी के अलावा जीवि‍का को कोई साधन नहीं था तब। बीच में नक्‍सलि‍यों का आधि‍पत्‍य सा हो गया था यहां। रांची से भी लोग नहीं आते थे घूमने। 
'' तब का माहौल कैसा था ?''  इसके जवाब में कहती हैं कि‍टी - ''नक्‍सली आते थे मीटि‍ंग करने हमारे घर के आसपास। उनसे परेशानी नहीं हुई कभी। वो लोग पानी भर कर पीते थे हमारे कुंओं से। बच्‍चों को बि‍स्‍कि‍ट भी देते थे। मगर अब ज्‍याद परेशानी है। बेटा छोटा-मोटा काम कर लेता है बि‍जली का। बेटी पढ़ा लेती है स्‍कूल में मगर उससे आमदनी नहीं होती उतनी।''   

बात करते-करते कि‍टी ने अपनी बकरी को आवाज लगाई - पि‍टकी..डर्र..र्र..र्र..

बकरि‍यां पास की बारी में हरे पौधे चरने जा रही थी। कि‍टी की आवाज सुनकर उसकी ओर लौटती है बकरी। मानव और जानवर के बीच की यह बातचीत लुभाती है मुझे। आसपास कोई और घर नहीं। बताती है कि‍टी कि‍ चार ऐग्‍लो-इंडि‍यंस के घर थे यहां आसपास। एक परि‍वार में  तो कोई जि‍ंदा नहीं बचा। बाकी छोड़ के चले गए। वीरान बंगले के खि‍ड़की-दरवाजे उखाड़ ले गए चोर। ब उनके पोते ढूंढने आते हैं। कहां से मि‍लेगी जमीन?कहां बचा है बंगला ? सब भूमि‍दान में चला गया। 

सरकार के प्रति‍ आक्रोश भी है कि‍टी के मन में। आवागमन की सुवि‍धा नहीं। सरकार के दि‍ए गैस चूूल्‍हे का नॉब ही खराब है। बच्‍चे भी कोई खास काम नहीं करते। कि‍सी तरह जीवन-यापन हो रहा है। हां, राशन के चावल से पेट भर जाता है। 

हमारे आग्रह पर अपना घर दि‍खाती हैं , मगर पुराने अलबम नि‍कालने से एकदम मना करती है। छोटा सा ही, पर वि‍क्‍टोरि‍यन अंदाज का आकर्षक घर है। अंदर की दीवारों में पुराने चि‍त्र लगे हैं। घर तो 1933 का बना हुआ है जि‍से उसके नाना जी ने 1947 में खरीदा था। गर्व से बताती है कि‍ मेरे नानाजी असम के गर्वनर के सेक्रेटरी थे। कि‍टी की मां की तस्‍वीर है जि‍समें वह हाथों में रायफल लि‍ए बैठी हैं। बहुत खूबसूरत महि‍ला, नाम है 'एम.जे. टेक्‍सरा'। कि‍टी की शादी लोकल ट्राइबल रमेश मुंडा से हुई थी। वह अपनी मां को छोड़कर नहीं जा सकती थी, इसलि‍ए एंग्‍लो इंडि‍यन फैमि‍ली में अपना तय रि‍श्‍ता भी छोड़ दि‍या। दीवार पर उड़ती रंगत वाली तस्‍वीर में अपना बचपन दि‍खाती है कि‍टी।



हम कि‍टी से वि‍दा लेकर बंगले की तलाश में चल देते हैं। वह अपने दरवाजे पर पि‍हू को लि‍ए वहीं रूकी रहती है। दर्शनीय स्‍थल के नाम पर अब डेगाडेगी नदी की ओर चलें हम। गाड़ि‍यों का लंबा काफि‍ला देखकर अनुमान हुआ कि‍ बहुत खूबसूरत जगह होगी। मगर नदी के नाम पर पानी की पतली धार थी और आसपास पि‍कनि‍क मनाने वालों की जबरर्दस्‍त भीड़। हम नीचे नदी तक न जाकर ऊपर से ही देखे सब और नि‍कल पड़े बंगले की ओर।  

कई बंगले मि‍ले रास्‍ते में जो अपने खस्‍ताहाल पर रो रहे थे। मन हो रहा था अंदर जाकर देखूं..मगर ऐसा कुछ भी नहीं लगा जो आंखों को तृप्‍ति‍ दे। बल्‍कि‍ एक हूक ही उठी कि‍ काश इन ढहते अतीत को रोक पाती। 

मैकलुस्‍कीगंज अपने अस्‍ति‍त्‍व में आने के बीस-पच्‍चीस सालों के बाद ही वीरान होने लगी। गांव तो बस गया था, मगर जीवन-यापन की कोई ऐसी योजना नहीं थी, जो यहां बांधे रखती उन्‍हें। देश की आजादी के बाद नई पीढ़ी पलायन करने लगी। पहले पढ़ाई के लि‍ए, फि‍र रोजगार के लि‍ए। सुंदर-सुंदर वि‍क्‍टोरि‍यन बंगले वीरान होने लगे। एक समय ऐसा आया कि‍ मैकलुस्‍कीगंज बुजुर्ग एंग्‍लो-इंडि‍यनस की बस्‍ती बन कर रह गया। 

अब दीपक राणा के गेस्‍टहाउस की ओर बढ़े। रास्‍ते में बहुत हरि‍याली। बीच-बीच में लाल पत्‍तों वाला पेड़ घने अरण्‍य के बीच नजर आया। हम कयास न लगा सके तो पास गए देखने कि‍ कौन सा पेड़ है जि‍सके पत्‍ते इतने टहक लाल हैं। पता चला अमरूद के पेड़ हैंं। 

कुछ देर में राणा गेस्‍टहाउस पहुंचे। सभी बंगले अब गेस्‍टहाउस में तब्‍दील हो गए हैं। कि‍टी ने भी कहा था कि‍ राणा गेस्‍टहाउस देखने योग्‍य है। हमने राणा परि‍वार की इजाजत लेकर उनका पूरा घर घूमा। ठाठ-बाट बरकरार रखा है उन्‍होंने। पुरानी यादों को करीने से सहेजकर संजोया है। काफी लोग ठहरे हुए थे उस गेस्‍ट-हाउस में। ज्‍यादातर बंगाली दि‍खे हमें।  हम खाना लौटकर खाएंगे, कहकर घूमने नि‍कले। 

दामोदर नदी मेे पानी खूब था और तट का वि‍स्‍तार भी काफी चौड़ा था। वहां अगले दि‍न मेला लगने वाला था। हर वर्ष संक्रांति‍ के अवसर पर मेले का आयोजन होता है। जागृति‍ वि‍हार भी देखने योग्‍य है। वहां से हम लौटे बंगले देखने की आस में। कि‍सी बंगले में कि‍सी संस्‍था का कार्यालय है तो कोई गेस्‍ट हाउस। मगर वास्‍तव में मैकलुस्‍कीगंज का अतीत जानना हो तो बोनेर भवन देखना चाहि‍ए जहां की दीवारों पर टंगी पुरानी तस्‍वीरेंं एंग्‍लो-इंडि‍यन कॉलोनी के अतीत का परि‍चय कराती है। वहां अब एक आदि‍वासी परि‍वार का नि‍वास है। 


एक खूबसूरत गेस्‍ट हाउस बॉबी गार्डन में हम पहुंचे जहां फूलों ने मन मोह लि‍या। पता चला अक्‍टूबर से मार्च के बीच काफी पर्यटक आते हैं यहां। कैम्‍पस में दूसरी तरफ बच्‍चों का हाॅस्‍टल है। 

जब सभी लोग यहां छोड़कर जाने लगे तो एक समय सन्‍नाटा छा गया था। लगता था मैकलुस्‍कीगंज का अस्‍ति‍त्‍व मि‍टने को है। एक तरफ नक्‍सलि‍यों के कारण पर्यटक नहीं आते तो दूसरी ओर बेरोजगारी की मार। इस बीच आशा की कि‍रण तब फूटी, जब  जब वर्ष 1997 में बिहार के मनोनीत एंग्लो इंडियन विधायक अल्फ्रेड डी रोजारियो ने डॉन बॉस्को एकेडमी की एक शाखा मैक्लुस्कीगंज में खोल दी। इस स्कूल  झारखंड और बाहर के एक हजार से अधिक बच्चे हैं। एंग्लो इंडियन परिवारों ने अपने बंगलों को पेइंग गेस्ट के रूप में बच्चों का हॉस्टल बना दिया। यह उनकी आमदनी का जरिया बना और मैक्लुस्कीगंज को अलविदा कहने से रोक लिया। आज मैक्लुस्कीगंज एक एजुकेशनल हब के साथ पर्यटक स्थल के रूप में अपनी पहचान बना रहा है। डॉन बास्को हाईस्कूल की तुलना नेतरहाट के समकक्ष होती रही है। इस महत्वपूर्ण शिक्षा केंद्र की उपस्थिति के कारण यहां 28 निजी हॉस्टल भी खड़े हो गए हैं। 

वहां से नि‍कलकर हम पहुंचे हाइलैंड गेस्‍ट हाउस। साठ के दशक में डी आर कैमरोन मैकलुस्‍कीगंज आए और यहीं के हो कर रह गए। उन्‍होंने हाइलैंड गेस्‍ट हाउस खरीद लि‍या और यहीं बस गए। शि‍क्षक थे कैमरून। उन्‍होंने देश-वि‍देश के कई स्‍कूलों में पढ़ाया है। उनके यहां बसने के फैसले से नाराज उनकी पत्‍नी एंजेला अपने तीन बेटे और एक बेटी के साथ आस्‍ट्रेलि‍या लौट गई।




कैमरून और मैकलुस्‍कीगंज एक समय एक-दूसरे के पर्याय से थे। हर कोई मि‍लता था वहां जाकर। हाइलैंड गेस्ट हाउस एंग्‍लो-इंडि‍यन समुदाय का क्लब था। दिसंबर माह की शुरुआत होते ही इस क्लब में क्रिसमस गैंदरिंग शुरू हो जाती थी। इस गैदरिंग में डांस से लेकर मनोरंजन के अन्य कार्यक्रम होते थे। पूरा दिसंबर माह मैक्लुस्कीगंज क्रिसमस के रंग में डूब जाता था। इस क्रिसमस उत्सव को देखने के लिए काफी संख्या में पर्यटक मैक्लुस्कीगंज आते थे। 


बाद में उनके बुरे दि‍नों में एक पूंजीपति‍ ने उनके गेस्‍ट हाउस और बंगले का सौदा कर लि‍या। उस वक्‍त यह तय हुआ था कि‍ जब तक कैमरून जि‍ंदा रहेंगे, उन्‍हें गेस्‍ट हाउस का एक कमरा रहने के लि‍ए नि‍:शुल्‍क दि‍या जाएगा। कुछ दि‍नों तक तो यह चलता रहा फि‍र उन्‍हें एक बाथरूम में शि‍फ्ट कर दि‍या गया। काफी बीमार रहने लगे वो। जब उनके परि‍वार वालों को यह बात मालूम हुई तो 2009 में उन्‍होंने कैमरून को वापस बुला लि‍या। 

मगर उनकी जान तो मैकलुस्‍कीगंज में बसती थी।  वो अगले ही वर्ष लौट आए मैकलुस्‍कीगंज। मगर इस बार उन्‍हें न रहने की जगह मि‍ली और न ही खाने की सुवि‍धा। पता चला कि‍ बाद के दि‍नों में उनकी मानसि‍क स्‍थि‍ति‍ खराब हो गई थी और उन्‍हेें कलकत्‍ता के एक वृद्धाश्रम में भर्ती कराया गया। अंतत: वो मैकलुस्‍कीगंज की मि‍ट्टी में दफन होने की अधूरी इच्‍छा लि‍ए 2013 में चले गए। इस उजाड़ गेस्‍ट-हाउस के समाने कैमरून को याद करते आंखें भीग आई हमारी। 

ठीक इसके सामने ही है मदर टेरेसा हाॅस्‍टल और मैदान के एक कि‍नारे है मैकलुस्‍कीगंज स्‍थापना का गवाह शि‍ला पट्ट जो झाड़-झंखाड से घि‍रा 3 नवंबर 1934 की अब भी मौजूद है। 

शाम ढलने वाली थी और हमें भूख भी लग आई थी। हम वापस राणा गेस्‍टहाउस की ओर चल पड़े, जहां दीपक राणा और उनकी पत्‍नी ने बहुत प्‍यार से हमें खाना खि‍लाया और वापस रांची की तरफ क्‍योंकि‍ हमें सबसे अंत में लौटते हुए देखना था भारत की गंगा-जमुनी संस्कृति को जो रांची-मैक्लुस्कीगंज रोड पर दुल्ली में स्थित है। यहां एक ही परिसर में मंदिर, मजार, चर्च का क्रूज और गुरुद्वारा है। चारों धर्मों के लोग बड़ी संख्या मेें यहां आकर अपनी मन्नते मांगते हैं और सिर झुकाते हैं। 

पूरे रास्‍ते कि‍टी मेमसाहब की सपनीली आंखें और डी कैमरून के दुखद अंत के साथ-साथ यह महसूस करती लौटी कि‍ कुछ दशक पहले वीरान हुआ मैकलुस्‍कीगंज अपनी आबोहवा हुआ मैकलुस्‍कीगंज अपनी आबोहवा और अनूठेपन के साथ फि‍र जि‍ंदा हो रहा है। धड़क रही है वहां मैकलुस्‍की की आत्‍मा अब भी जो हम जैसों को खींच ही लाता है। अगर बाकी उजड़े बंगले फि‍र से संवर जाए तो पर्यटकों का तांता लग जाएगा यहां। 

Friday, February 1, 2019

मैं मुक्त हूँ, तुम मुक्त हो ..


मैं मुक्त हूँ, तुम मुक्त हो ..
निकल आओ
इस जन्म-मृत्यु के चक्र से
लगा लो डुबकी प्रयाग में 
कर लो संगम स्नान
ले जाओ मेरी यादें
हड्डियों की तरह, राख की तरह
कर दो प्रवाहित
हरिद्वार में
जोड़कर हाथ, कहना
हम दोनों मुक्त हुए
ये अंतिम प्रणाम है...अंतिम प्रणाम है
कहो न प्रिय !
तुम सच लेकर मर गये
हम झूठ जीकर तर गये
मोह के बंध खुल गये
मैं मुक्त हूँ,तुम मुक्त हो ..
इस होलिका से पूर्व
काट जाना साल-सवंत
रिश्ते का यह अबूझ चक्र
तुम्हारे दिल में
अब मैं नहीं रहती
मेरे दिल में अब कोई नहीं रहता
धू-धू कर जलती हूँ
यादों की राख उड़ती है
करो शिव स्नान
मेरी राख से
मैं चिता हूँ मणिकर्णिका घाट की
मैं मुक्त हूँ, तुम मुक्त हो ...

Thursday, January 31, 2019

प्रेम बचा रहे .....


बहती रही धार में...जाने कब से। कई बार कि‍नारे की तरफ जाने को सोचा भी....मगर डर लगता रहा...क्‍या पता डूब ही जाऊं....बेहतर है, बहती चलूं धार के साथ....थपेड़े बर्दाश्‍त करते-करते आदत हो गई।

कभी-कभी जब सम पर होता सब कुछ तो कि‍तना सुकून मि‍लता है।लगता है इससे बड़ा सुख और कुछ नहीं। जो मि‍ल रहा...उससे ज्‍यादा जि‍ंदगी मुझे नहीं देने वाली। समेट लूं..सहेज लूं....

अकेलापन से बड़ा दुख कोई और नहीं...कोई न जाए मेरे पास से....मैं न जाऊं कहीं दूर....नि‍त यही प्रार्थना करती रही ईश से। मैं बचाना चाहती थी...तुम्‍हें...खुद को....अपने रि‍श्‍ते को..और सबसे बढ़कर प्रेम को....

मगर नष्‍ट हो रहा था सब...धीरे-धीरे...महसूस करती कई बार..मगर खुद को भुलावे में रखती...न...कुछ नहीं खो रहा..जो है, जैसा था..;वैसा है।

तुम साथ थे...प्रेम छूट रहा था...नष्‍ट हो रहा था। मैं बार-बार सहेजती..मरम्‍मत करती। मगर कहां हो पाता है ऐसा...साथ रहते भी साथ छूटता जाता है...इस बात को समझने में कई बरस लग गए। हर गुजरता दि‍न..हर गुजरती रात एक बार जरूर महसूस कराती इस बात का, कि‍ प्रेम भी छीजता है।

तुम्‍हें खोकर प्रेम बचाना चाहती हूं...अब धार में बहते रहने का कोई अर्थ नहीं...खुद को कि‍नारे न लगा पाई तो सब नष्‍ट हो जाएगा....

प्रेम सहेजने की चीज है....कि‍ इंसान रहे न रहे..प्रेम बचा रहे थोड़ा ...; 

Wednesday, January 30, 2019

आवाज की तलब.....


दर्द झेलना बहुत मुश्‍कि‍ल होता है..खासकर तब, जब यह दर्द दि‍ल को घायल करने के बाद मन से तन में उतरने लगता है.....मन और तन की तकलीफ साथ-साथ तंग करती है तो समझ नहीं आता कि‍से पहले देखूं....कि‍से शांत करूं.;क्‍या इलाज करूं....

बहुत प्‍यास लगती है इन दि‍नों...जैसे पानी बेअसर हो .....तुम्‍हारे प्‍यार की तरह। जागती रातों में हाथों में गि‍लास लि‍ए सोचती हूं ...कुछ चीजें हमारे लि‍ए इतनी जरूरी क्‍यों हो जाती है...निर्भरता बहुत बुरी शै है.....कि‍सी पर भी हो... ये प्‍यास बुझती ही नहीं..

नींद की गोलि‍यां भी बेअसर है इन दि‍नों....अक्‍सर रातों को नींद खुल जाती है। ऐसे में आवाज की तलब होती है...इस स्‍थि‍त को टालने की कोशि‍श करती हूं....जब बर्दाश्‍त से बाहर होती है तलब और नींद की बेवफाई से बेजार होती हूं तो ले लेती हूं सहारा.....

कुछ बातें...कुछ आवाजें संभालकर रखी थी कभी...आज वो काम आती है बहुत....सि‍राहने गुंजती है तुम्‍हारी आवाज .....लगता है कोई मीठी थपकि‍यां दे रहा है ...आओ मेरे पास... कहता है कोई....धीरे-धीरे नींद की दरि‍या में डूबती जाती हूं....

बहुत कठि‍न है यह संकल्‍प... यह लेना नहीं चाहती थी..मगर कई बार दर्द का इलाज दर्द से ही होता है.....तन अवश और मन लहुलुहान...मगर जीना तो है न.....

जी रही हूं तुम बि‍न......

Monday, January 21, 2019

यादों की जागीर .....


आज फि‍र पूर्णिमा है....जाने इन दि‍नों चांद का मुझसे कैसा नाता हो गया है...मैं समुद्र तो नहीं....मगर चांद रातों में ज्‍वार उठता है मेरे अंदर...सब उथल-पुथल।

पौष पूर्णिमा को सूर्य और चंद्रमा के संगम का दि‍न माना जाता है न...मगर मन का संगम न हो तो कुछ भी नहीं....। कल से महीना बदल जाएगा और साथ ही जीवन भी। मैंने अपने हाथों सब कि‍वाड़ बंद कर दि‍ए। अब न कोई आएगा....और न ही जाएगा। कोई झरोखा खुला रहे तो कि‍सी को देखने...कि‍सी को जानने की ललक बाकी रहती है। 

जो जा चुका..उसे वापस लाना संभव नहीं....लाना भी नहीं चाहती। मेरे आसपास अब खूब बातें ही बातेंं होगी..यादेंं ही यादें। तुम न रहो...यादों की जागीर है मेरे पास। 

मेरा कल्‍पवास शुरू होगा अब...संगम के तट पर नहीं...जहां हूं..वहीं से संकल्‍प लि‍या है कल्‍पवास का.....धैर्य, अहि‍ंसा और भक्‍ति‍...यही है न मूलमंत्र। धैर्य....तुम्‍हारे बि‍ना जीने का....अहि‍ंसा....तुम्‍हारी कि‍सी भी बात पर कोई नाराजगी नहीं...और भक्‍ति‍.....

ईश चरणों में सौंप दि‍या है खुद को....अगले जन्‍म की चाह तो नहीं बाकी अब...पर हां..मोक्ष जरूर पाना है....चांद...मत ज्‍वार उठाओ......नदी में अपनी छाया देखो...

तुम मुक्‍त हो....मैं भी अब मुक्‍त हूं...माया का त्रास नहीं....जि‍तेन्‍द्रि‍य बनना है अब.... 

Thursday, January 10, 2019

फिर से उसे प्यार करना है ..


ज़िंदगी में ग़म
शुमार करना है
एक बार फिर से
उसे प्यार करना है
वक़्त के ख़ाली लिफ़ाफ़े से 
अब जी नहीं बहलता
फूलों की गमक से
अपनी शाम भरना है

नहीं भाता सर्दियों के
उदास मौसम में
धड़कनों का इस क़दर
सर्द हो जाना
किसी की याद में फिर से
दिल बेक़रार करना है
सुन ए दिल एक बार
फिर से उसे प्यार करना है ....।

Wednesday, January 9, 2019

यादों से रि‍श्‍ता ....


बिछड़ने की बात पर 
दो बूँद आँखों से 
बेआवाज़ गिर जाना 
अब न चुभता है 
ना पूछना चाहता है दिल कि 
अबकी बरस
बिछड़ जाओगे तो
कैसे जी पाएँगे ...?
उलझा लोगे ख़ुद को
तमाम उलझनों में
कि सुबह से रात तक
दम न लेने पाओ
मगर किसी शब के सन्नाटे में
चाँद के रूबरू होगे
तो देखना
याद में कैसे तड़प जाओगे !
हर मौसम की तासीर को
भुलाना भी चाहो,
सर्दियों की शाम
जनवरी की किसी उदास दिन में
हवा सिहरा जाएगी बदन
तुम्हारी हथेलियाँ
तलाशेगी उँगलियों की गिरफ़्त
तब ख़ुद को
किस क़दर तनहा पाओगे!
याद रखो
बिछड़ तो जाओगे हमसे
मेरी यादों से कैसे रिश्ता तोड़ पाओगे?

Thursday, October 25, 2018

हवाओं की दस्‍तक ....



अहा....फि‍र करवट लि‍या मौसम ने....सुन रही हूं सर्द हवाओं की दस्‍तक ...शाम गुलाबी है, सि‍हरन जगाती। 

अब पगडंडि‍यों पर वो दौड़ती नजर आएगी...हथेलि‍यों में पारि‍जात के फूल भरे....उधर मंदि‍र के आंगन में गले में ऊनी मफलर डाले बेसब्री से कर रहा होगा वो उसका इंतजार....सर्दियां रूमानि‍यत लि‍ए आती हैं न...प्‍यारा मौसम..प्‍यार का मौसम...गुलाबी-गुलाबी

आ जाओ सर्दी....हमारे पास यादों के गर्म लि‍हाफ़ पड़े है बरसों से...अब धूप दि‍खाने का वक्‍त आ गया...