Tuesday, March 9, 2021

'' मैं ''


जब से यह फोटो क्‍लि‍क हुआ है, जाने क्‍यों लगता है इसके पीछे कोई कहानी छि‍पी है, जि‍से महसूस तो कर पा रही हूं..मगर शब्‍द नहीं दे पा रही। 

क्‍या मैं कि‍सी बीती कहानी का हि‍स्‍सा हूं या कोई कहानी आगे लि‍खी जाएगी जि‍सका मुख्‍य पात्र बेंच और उस पर बैठी अकेली '' मैं '' हाेऊंगी। वैसै ऐसी सैकड़ों दोपहरें बीत चुकी है इस जि‍ंदगी में। दोपहर का सन्‍नाटा, तेज धूप की थोड़ी सी छांंव में खुद को छुपाने की कोशि‍श। 

क्‍या कुछ नहीं गुजरा है जीवन में।  

Monday, February 22, 2021

और अब तो...

                           

देखने में यह एक साधारण सा दृश्य है। एक बैलगाड़ी, खुला मैदान जिसकी दाहिनी तरफ़ आधा बना कमरा है और ठीक उसके पास मंदिर जैसी कोई जगह।

मगर मुझे दिख रहा....

बैलगाड़ी पर सामान लदवाते पापा और पीछे दोनों पाँव झुलाते बैलों के गले की टुनटुन के साथ-साथ सिर हिलाती कुछ दूर तक जाती मैं...

पक्की सड़क पर पहुँच कर पापा ने गोद में उठाकर उतार दिया नीचे... 

          घर जाओ...शाम को चढ़ना इस पर

वह सामने मंदिर के बाहर ढाक और ढोल की लगातार ध्वनि। बेलबरण है आज....दुर्गा माँ की जिस मूर्ति को बनते हुए बंद किवाड़ की फाँक से आँख सटाकर देखते आए थे...उस मूर्ति का आज साक्षात दर्शन होगा। 

 वो अधबना कमरा, कमरा नहीं स्टेज है..जिस पर कल से रामलीला होगी और हमलोग शाम से ही अपने-अपने बोरे बिछाकर जगह मड़िया लेंगे। 

 दुर्गा पूजा और रामनवमी के तीन दिन हमारे घर वाले हमारा चेहरा देखने को तरस जाते थे।

 यह पुराना मंदिर और स्टेज तोड़कर एक विशाल मंदिर बन गया है, जहां रामलीला नहीं होती अब।बचपन के बेशक़ीमती कई साल जिस मैदान में खेल-कूदकर गुज़ारा...उस स्थान को ऊँची चारदीवारी से घेर दिया गया है, जिसे देखकर मुझे जेल सा एहसास होता है.....और मैं घबराकर उस ओर पीठ कर लेती हूँ।

बहुत पहले से ही बैलगाड़ी नहीं रही हमारे पास.., फिर खेल का मैदान, पुराना मंदिर...

और अब तो...

पापा भी नहीं रहे...

 


Sunday, February 21, 2021

शायद ... प्रेम !


- जीवन से सारे संबंध धीरे-धीरे वि‍लग क्‍यों होते जाते हैं ? 

- अलग होने पर ही नए पत्‍ते आते हैं। शायद एक दि‍न मैं भी...

- तुम पत्‍ता नहीं हो मेरे लि‍ए !

- तो क्‍या हूं ?

- थोड़ी जड़, थोड़ी मि‍ट्टी, थोड़ा धूप, थोड़ा पानी 

- कवि‍ता है ..

- न, बस आग्रह...छोड़ के मत जाना। सहन नहीं होगा। 

................। 


Wednesday, January 13, 2021

पेरवा घाघ का जल करता है मोहि‍त


खूंटी-तोरपा तो न जाने कि‍तनी बार गई मगर वहींं पास में एक खूबसूरत जलप्रपात है, पेरवा घाघ जि‍से देखने की इच्‍छा बहुत पहले से थी, जो इस साल पूरी हुई।     

पेरवा यानी कबूतर और घाघ का अर्थ है गि‍रता हुआ जल। झारखंड में कई घाघ हैं मगर पेरवा घाघ  के हरे जल को देखकर आप मोहि‍त हुए बि‍ना नहीं रह सकते। सात खटि‍या की रस्‍सी डालने पर भी जि‍सकी गहराई की थाह नहीं ली जा सकी, वह जगह है पेरवा घाघ।  

प्राकृति‍क सौंर्दय के गुणगान से पहले जो एक अनूठी कहानी पता चली, उसे बता दूं। जहां से कारो नदी का पानी गि‍रता है, उसके आसपास चट्टानों से बनी गुफाएं हैं। कि‍वंदति‍ है कि‍ पहले उस जगह असंख्‍य कबूतर रहते थे। जि‍स पत्‍थर से पानी गि‍रता है, उसे स्‍थनीय लोग सुग्‍गाकटा कहते हैं। उस पत्‍थर को एक सुग्‍गे अर्थात तोते ने काटकर ऐसा स्‍थान बनाया कि‍ पानी वहां से गि‍रने लगा, और जि‍स चट्टान को काटकर अलग कि‍या वह पानी से बहुत हुए कुछ दूर जाकर ठहर गया है जि‍स पर सैलानी पि‍कनि‍क मनाते हैं। 


रांची से पेरवा घाघ की दूरी करीब 75 कि‍लोमीटर है। इस बार हमने खूंटी हाेकर तोरपा जाने के बजाय नया रास्‍ता चुना, जो लोधमा होते हुए कर्रा पहुंचता है। मैं पहली बार इस सड़क से होकर कई। पक्‍की सड़क, दोनों तरफ हरि‍ति‍मा और खाली रास्‍ता। पि‍छले कुछ वर्षों में झारखंड में सड़केंं बन गई हैं, जि‍स कारण घूमना अब ज्‍यादा सुखद लगता है। कर्रा पहुंचने के बाद बांयी ओर नि‍कलने पर एक रास्‍ता दाहि‍नी तरफ तोरपा के लि‍ए नि‍कलता है और सीधा वाला खूंटी की ओर। 

खूंटी क्‍यों जाना, जब हमने नया रास्‍ता चुना है। तो हमलोग सीधे तोरपा चौक पहुंच गये। वहां चौक बांयी ओर एक रास्‍ता जशपुर की ओर नि‍कलता है। करीब 16 कि‍लोमीटर आगे जाने पर जंगल के बीच है पेरवा घाघ।  नीचे जाने के दो रास्‍ते हैं। जहां बोर्ड लगा है, उससे आगे जाने पर सीढ़ि‍यां उतरकर नीचे जाना पड़ता है। वहीं बांयी तरफ थोड़ा आगे जाकर पार्किंग में गाड़ि‍यां लगती हैं, उससे होकर जाना ज्‍यादा आसान है। हमें यह पहले से पता था इसलि‍ए दूसरा रास्‍ता चुना हमने। 

इस कोरोना में भी इतनी अधि‍क गाड़ि‍यां पार्किेग में खड़ी थीं, कि‍ अनुमान हो गया नीचे जबरर्दस्‍त भीड़ होगी। पूरे रास्‍ते ग्रामीण खाद्य पदार्थ की दुकान सजाकर बैठे थे। फुचका ( गोलगप्‍पा) के ठेले, धुसका, छि‍लका, मूंगफली...जाने कि‍तने कि‍स्‍म के व्‍यंजन थे। यह लगा कि‍ कोई बि‍ना खाने का इंतजाम कि‍ये भी आ गया तो खाने के लि‍ए पर्याप्‍त सामग्री यहां उपलब्‍ध है। मगर हमलोग तो खाना वहीं बनाने के लि‍ए सब कुछ लेकर आये थे। 

फॉल गुलजार था। सब ओर लोग भरे पड़े थे। कहीं खाना बन रहा तो कहींं चूल्‍हा सुलगाया जा रहा। हमने भी एक साफ जगह चुनकर दरी बि‍छा कर सामान जमा लि‍या।  नजर घुमाने पर सब ओर पानी तो दि‍खा पर झरना दि‍खाई नहीं दि‍या। पता चला पुल पारकर जाने पर ही झरना दि‍खेगा। कुछ लोग खाना बनाने में लग गये और बाकी लकड़ी के बने छोटे से पुल को पार करने का कि‍राया 5 रूपये देकर पार कर गये। पता लगा कि‍ ग्रामीणों ने पर्यटकों की सुवि‍धा के लि‍ए खुद ही इस पुल का नि‍र्माण कि‍या है और इससे प्राप्‍त शुल्‍क का साफ-सफाई में उपयोग कि‍या जाता है।  

पुल पारकर पत्‍थरों पर चढ़कर ऊपर जाना पड़ा। बेहद गर्मी थी दि‍संबर के अंति‍म दि‍नों में भी। ऊपर से दि‍खा कलकल करता सफेद झरना और नीचे हरा पानी। अद्भुत दृश्‍य। ऐसे हरे रंग का झरना मैंने झारखंड में पहली बार देखा था।हम  कुछ देख बैठकर वहां की सुंदरता नि‍हारते रहे। ऊंचे-ऊंचे चट्टान से बहकर आता पानी और उस पर तैरती एक लकड़ी की नाव जि‍से दोनों ओर से रस्‍सि‍यों से बांधकर खींचा जा रहा था। पर्यटक मि‍त्र जयसि‍ंह ने बताया कि‍ यह अनूठा आइडि‍या उनका ही है जि‍ससे सैलानी पानी के नजदीक तक जा सकते हैं। दो साल पहले इस नाव का नि‍र्माण कि‍या गया था। अभी एक ही नाव है मगर पहली जनवरी से एक और नाव उतारा जा रहा है क्‍योंकि‍ अब बहुत भीड़ होने लगी है। पांच वर्ष पूर्व ग्रामीणों ने समि‍ति‍ बनाकर पेरवा घाघ को संवारने का कार्य शुरू कर दि‍या था।

हमारा भी मन हो गया कि‍ झरने के पास जाएं, इसलि‍ए लौट आए। वापस आकर देखा कि‍ हमारे कूछ साथी पानी में कूद चुके हैं। जहां झरना गि‍रता है वहां गहराई है मगर आगे नि‍कलने पर पानी कई चट्टानों से वि‍भक्‍त होकर बहती है। हम जहां ठहरे थे वहां पानी गहरा नहीं था। वैसे भी  इतनी तीखी धूप थी सबका मन नहाने के लि‍ए मचल उठा। पानी बेतरह ठंडा था मगर मस्‍ती में सब घंटो झूमते-नाचते और नहाते रहें। 

खाने के बाद नाव पर सैर के लि‍ए चलें। वहां बहुत भीड़ थी पर हमने पर्यटक मि‍त्र जयसि‍ंह को कह रखा था इसलि‍ए हमारी बारी पहले आ गई। हम सब नाव पर बैठकर झरने की ओर जाने लगे। पेरवा घाघ की खासि‍यत है कि‍ यह झरना सालों भर सूखता नहीं है। इसी झरने के बगल में एक गुफा है जहां शि‍वलि‍ंग है। कई पीढ़ी पहले यहां के ग्रामीण उस शि‍वलि‍ंग के दर्शन के लि‍ए जाते थे। थोमन सि‍ंह नाम का ग्रामीण सात दि‍नों तक इस खोह में रहा था, ऐसा ग्रामीण कहते हैं। 

इतनी कहानी तो शायद पेरवा घाघ जाने वाले पर्यटक जानते ही हैं मगर मैं वो सुना रही हूं जो बहुत कम लोगों को पता होगा। 

पेरवा घाघ की गुफाओं में पेरवा का देव रहता था। जरूरत के समय वह ग्रामीणों को जीवि‍का चलाने के लि‍ए धान और मछली कर्ज के रूप में दि‍या करता था। उसी धान की खेती कर और मछली पालन करके स्‍थानीय निवासी जीवि‍कोर्पाजन करते थे। जब फसल पकती तो कर्ज चुका देते थे वह।  मगर एक बार ऐसा हुआ कि‍ कि‍सी ग्रामीण ने करहैनी धान ( काले रंग का धान) देव को लौटा दि‍या। जला हुआ धान देखकर देव रूष्‍ट हो गया और उसने कर्ज देना बंद कर दि‍या। 


कहानी यहीं खत्‍म नहीं होती....

देव ने बाहर नि‍कलना और लोगों से मि‍लना और कर्ज देना बंद कर दि‍या।वह साल में एक बार अपने ससुराल जरूर जाता है। तोरपा-मुरहू रोड में एक गांव है पहरि‍या, वही सुसराल है उसका। परंतु वह सामने से नहीं जाकर 'बि‍ंगकि‍लोर' अर्थात सांप के जाने वाले नाले से होकर जाता है अपने ससुराल। पेरवा देव जब ससुराल जाता है तो घनघाेर बारि‍श होती है और सभी तालाब में बेहि‍साब मछलि‍यां मि‍लतीं हैं।   

एक अनोखी परंपरा चली आ रही है देव के ससुराल में। पहरि‍यां गांव के लोग मानते हैं कि‍ उनके यहां लड़की पैदा हुई तो पेरवा का देव उन्‍हें उठा कर ले जाएगा। इसलि‍ए लड़की के जन्‍मते ही उन्‍हें सि‍ंदुर लगाने का रि‍वाज आज भी है। 

इस अनूठी कहानी के आलोक में मैं सारे दृश्‍य देखती और कल्‍पना करती झरने के नजदीक पहुंची। सब उल्‍लास से भरे चि‍ल्‍ला पड़े। पानी का छींटा हम पर पड़ रहा था और ऊपर खोह या गुफाओं को तलाशती मेरी नजरेंं प्राकृति‍क सुंदरता पर ठहर-ठहर जा रही थी। बेशक झरने की ऊंचाई ज्‍यादा नहीं और नीेच से देखनेेपर लगता है समतल से पानी गि‍र रहा है। मगर संकरी घाटी होने के कारण पानी का जमाव बहुत ही सुंदर लगता है। 

मेरी ऊपर उद्गम पर जाने की इच्‍छा अधूरी रह गई क्‍योंकि‍ शाम ढलने वाली थी और जंगल-चट्टान को पारकर ही वहां पहुंचा जा सकता है। 

                       





 नाव से उतरकर देखा कि‍ सूरज कहीं छि‍प सा गया था, हालांकि‍ अस्‍त होने में समय था पर हम बहुत नीचे थे इसलि‍ए बस लालि‍मा ही दि‍ख रही थी। पानी, बड़े-बड़े पत्‍थर और अस्‍त होते सूर्य की नरम ताप ने सुंदर वातावरण बना दि‍या था। पार्किंग तक लौटते अंधेरे की चादर तनने लगी थी। हमने प्रकृति‍ और पेरवा घाघ को मन ही मन शुक्रि‍या कहा और लौट आये।  

Monday, January 11, 2021

सोहराई पेंटिंग का जादू

कुछ वर्ष पहले एनएच 33 पर रांची से रामगढ़ जाने वाली सड़क से गुजरी तो देखा, ओरमांझी बिरसा जैविक उद्यान के पास दीवारों पर बड़ी खूबसूरत पेंटि‍ंग उकेरी गई है। इतनी खूबसूरत कि‍ नि‍गाहें फिर-फिर देखने को वि‍वश हो जाएं। सोहराई पर्व तो जानती थी मगर पेंटि‍ंग की तरह इसे दीवारों पर उकेरा हुआ पहली बार देखा था।

उसी क्षण इच्‍छा हुई कि‍ इन दीवारों पर कूची चलाकर खूबसूरत बनाने वालों से मि‍लूं और प्रत्यक्ष  देखूं कि‍ कैसे सधे हाथों से दीवारों पर रंग-बि‍रंगी आकृति‍ उकेरी जाती है।

हमारे झारखण्ड में  सोहराई पर्व  दीपावली के दूसरे दि‍न  मनाया जाता है। बचपन की याद है कि दीपावली की दूसरी सुबह..यानी सोहराई के दिन जानवरों को सजाकर उन्मुक्त विचरने के लिए छोड़ दिया जाता था।

उस वक़्त सोहराई पेंटिंग तो नहीं जानती थी मगर आसपास के घरों में दूधी मि‍ट्टी से दीवारों पर आकृति‍यां बनाते देखा था घरों में। कई घरों में भिंडी के डंटल वाला हि‍स्‍सा काटकर उसे रंग में डूबोकर दीवार पर फूल-पत्‍ति‍यां उकेरी जाती। कई दीवारों पर तो उँगलियों से ही इतनी सजीव चि‍त्रकारी होती थी कि मिट्टी के घर खिल उठते थे।

बचपन की यादों को ताज़ा करने के लिए शहर के विभिन्न हिस्सों समेत रेलवे स्टेशन में भी सोहराई पेंटि‍ग नजर आने लगा। सरकार स्थानीय कला को बढ़ावा दे रही,  यह सोचकर बहुत अच्छा लगा।

कुछ लोगों से पता किया तो जानकारी मिली कि‍ दीपावली के आसपास हजारीबाग के कुछ गांवों में जाने पर वहां की दीवारों पर रंग उकेरते कलाकार मि‍ल जाएंगे।

देखने की जि‍ज्ञासा तो जबरदस्‍त थी, इसलिए दीपावली के दूसरे दि‍न कुछ साथि‍यों के साथ एकदम सुबह नि‍कल पड़ी राँची से हजारीबाग की ओर । हजारीबाग से करीब 35 कि‍लोमीटर दूरी पर स्‍थि‍त है भेलवाड़ा गांव, जहां की पार्वती देवी सोहराई की मंजी हुई कलाकार है।

हमारे एक साथी पहले भेलवाड़ा जा चुके थे इसलिए
सुबह  करीब ग्‍यारह बजे हमलोग भेलवाड़ा गांव में पार्वती देवी के घर के सामने खड़े थे। मैं तो उनके घर के बाहरी दीवार की खूबसूरत कलाकृति देखकर ही पागल हुई जा रही थी।  

वि‍भि‍न्‍न प्रकार के फूल-पत्‍तों के साथ जानवरों की आकृति‍ से पूरी दीवार रंगी हुई थी। सफेद, काला, हल्‍का पीला और कत्‍थई या मि‍ट्टी के रंग का प्रयोग कर सभी आकृति‍यां बनाई गई थीं। आकृति‍यों में स्‍पष्‍ट नजर आ रहा था घोड़ा, सांप, मछली और कई अनचि‍न्‍हे से जानवर एवं फूल-पत्‍ति‍यां। 

हमारे साथ गये लोग पार्वती देवी को तलाशने लगे और मैं रंगों और पेंटिंग की दुनि‍या में खो गई। फटाफट कई एंगल से तस्‍वीरें नि‍कालने लगी।

पार्वती देवी अपने गाय-बकरि‍यों को लेकर चराने गई थी।  पड़ोस के एक आदमी को कह उनको अपने आने की खबर भि‍जवाई और हमलोग सोहराई पेंटिंग देखने में डूब- से गए। कहना न होगा, कि‍ खपरैल घर भी इन रंगों और आकृति‍यों से इस कदर खूबसूरत लग रहा था कि‍ आज के टेक्‍सचर भी इसके आगे कुछ नहीं।


कुछ देर में ही पार्वती देवी आ गईं और उन्‍होंने घर के अंदर का दरवाजा खोला। हालांकि‍ बाहरी कमरा खुला था जि‍स पर एक खाट बिछी हुई थी। बुलाने जाने से पहले उनका पड़ोसी इतनी मेहमानवाजी नि‍भा गया कि‍ हमें घर के अंदर बि‍ठा दि‍या था। यह सम्मान भी गांवों में ही मिलता है । शहर में अनजान लोगों को कोई घर के कमरे में नहीं बिठाता।

मगर हमलोगों को बैठना कहां था ? हमें तो पेंटि‍ग की बारीकी देखनी और समझनी थी। यह सब बि‍ना पार्वती देवी के आए संभव नहीं था। उनके आने तक मैंने आसपास के जमा हुए लोगों से इतनी जानकारी प्राप्‍त कर ली कि‍ गांव की आबादी करीब दौ सौ की है, जि‍नमें कुछ घर करमाली और अधि‍कांश कुर्मी महतो के हैं। यह भी देश के सामान्‍य गांव की ही तरह है मगर अब इस गांव की पहचान सोहराई आर्ट बन गया है। गांव के अधि‍कांश घरों में सोहराई पेंटिंग होती है, मगर पार्वती देवी ने सोहराई को अंतरराष्‍ट्रीय पहचान दी है।


अब हमलोग पार्वती देवी के आंगन में पहुंच गए। चारों तरफ की दीवार पर पेंटिंग की हुई थी। सामने गोहाल था जि‍समें बकरी और गाय बंधे थे। लि‍पाई कर मि‍ट्टी की दीवारों को चि‍कना कर दि‍या गया था और उसके ऊपर कलाकारी की गई थी।



''कि‍न रंगों का प्रयोग कर आकृति‍यां उकेरती हैं आप?''  , इस सवाल पर जवाब में पार्वती देवी ने बताया कि केवल प्राकृति‍क रंगों का ही इस्‍तेमाल करती हैं वह।

पेंटिंग करने की प्रक्रिया में  दीवारों को पहले गोबर से लीपा जाता है। इसके बाद नागरी मि‍ट्टी से उसकी पुताई कर एक तरह से कैनवास बना दि‍या जाता है। फि‍र हाथों के इस्‍तेमाल से वि‍भि‍न्‍न आकृति‍यां बनाने लगती हैं दीवारों पर।

यह हुनर उन्‍हें वि‍रासत में मि‍ली है। कहती हैं कि‍ जब वो बारह साल की थी तभी अपनी मां से यह सब कुछ सीखा था। सोहराई पेंट करके वो घोड़ा, खरगोश, कदंब के पेड़ और फूल-पत्‍ति‍यां उकेरती हैं दीवार पर।

मैंने सोहराई पेंटिंग में हाथी, सांप, मोर और हरि‍ण की भी आकृति‍ देखी थी, मगर पार्वती देवी ये सब आकृति‍यां नहीं बनातीं। क्‍यों ,पूछने पर कोई स्पष्ट कारण नहीं बता पाईं। बस इतना कहा कि हमें शुरू से ही मना कि‍या गया है, इसलि‍ए नहीं बनाते।  कई कलाकार दूसरे रंगों का भी इस्‍तेमाल कर लेते हैं मगर हम केवल प्राकृति‍क रंग का ही उपयोग करते हैं।

जाहिर है, मन में उठा सवाल होंठो पर आ गया-

'' रंग कहां से लाती हैं ?'' 

''अलग-अलग रंगों की मि‍ट्टी होती है, जि‍से चरही से दस कि‍लोमीटर दूर सदरा गांव से लाया जाता है। काली, पीली और गेरूआ मि‍ट्टी को पीसकर पहले चलनी से चाल कर फुलाने छोड़ दि‍या जाता है। उसके बाद उस मि‍श्रण में गोंद मि‍लाकर रंग तैयार कि‍या जाता है।''


सोहराई कला का इति‍हास तलाशने की कोशि‍श की तो पता चला कि‍ इस क्षेत्र के इस्को पहाड़ियों की गुफाओं में आज भी इस कला के नमूने देखे जा सकते हैं। इसका प्रचलन हजारीबाग जिले के बादम क्षेत्र में आज से कई वर्ष पूर्व शुरू हुआ था जि‍से बादम राजाओं ने काफी प्रोत्साहित किया।


आदिवासी संस्कृति में इस कला का महत्व जीवन में उन्नति से लगाया गया था, तभी इसका उपयोग दीपावली और शादी-विवाह जैसे अवसरों पर किया जाता था। जिससे कि धन और वंश दोनों की वृद्धि हो सके।


पार्वती देवी के बताने से याद आया कि‍ कोबहर की प्रथा अब भी कई परि‍वारों में है जहां शादी के बाद दूल्हा–दुल्‍हन को एक कमरे में ले जाया जाता है जिसे 'कोहबर' कहते हैं।

कमरे की दीवार पर रंगों से कुछ आकृति‍यां बनाई जाती थी, जि‍समें फूल-पत्‍ते, जानवर और कई बार दुल्‍हन की डोली लि‍ए कहार की आकृति‍ भी होती थी। मैंने कई शादि‍यों में देखा है इस प्रथा को निभाते । कोहबर के आगे दूल्हा-दुल्‍हन बैठकर अंगूठी छुपाने-ढूंढ़ने का खेल खेलते हैं और दुल्‍हन की सहेलि‍यां दूल्हे के साथ चुहल करती हैं।


पता लगा कि‍ बादम राज में जब किसी युवराज का विवाह होता था और जिस कमरे में युवराज अपनी नवविवाहिता से पहली बार मिलता था उस कमरे की दीवारों पर उस दिन को यादगार बनाने के लिये कुछ चिन्ह अंकित किये जाते थे और किसी लिपि का भी इस्तेमाल किया जाता था जिसे वृद्धि मंत्र कहते थे।


बाद के दिनों में इस लिपि की जगह कलाकृतियों ने ले ली और फूल, पत्तियां एवं प्रकृति से जुड़ी चीजें उकेरी जाने लगीं। कालांतर में इन चिन्हों को सोहराई या कोहबर कला के रूप में जाना जाने लगा। धीरे-धीरे यह कला राजाओं के घरों से निकलकर पूरे समाज में फैल गयी। राजाओं ने भी इस कला को घर-घर तक पहुंचाने में काफी मदद की।

कहा जाता है कि‍ यह यह कला हड़प्‍पा संस्‍कृति‍ की समकालीन है। इसका प्रयोग वि‍वाह के बाद वंश वृद्धि‍ और दीपावली के बाद फसल वृद्धि‍ के लि‍ए इस्‍तेमाल करते हैं। मान्‍यता है कि‍ जि‍स घर के दीवार पर कोहबर और सोहराई की पेंटिंग होती हैं उनके घर में वंश और फसल की बढ़त होती है।

पार्वती देवी बताती हैं कि‍ इस कला के बदौलत वह वि‍देश घूम आई और इन सबके पीछे बुलू इमाम का हाथ है, जो तीन दशकों से ज्यादा वक्त से इस कला को मुकाम देने की कोशिश में जुटे हैं।


पार्वती की आंखों में वि‍देश में कला प्रदर्शन कर लौटने की चमक तो है, मगर नि‍यमि‍त आमदनी नहीं होने का मलाल भी है। कहती हैं - ''नाम तो मि‍ला हमें मगर रोजगार नहीं। अगर सरकार इस कला को सहेजती है तो परंपरा जीवि‍त रहेगी, वरना खत्‍म हो जाएगा।''


बात करते करते हम बाहर नि‍कल आए। साथ में कुछ तस्‍वीरे ले ही रहे थी कि‍ दूर से एक झक सफेद कपड़ों में झुकी कमर को लाठी का सहारा देकर हमारी ओर आती एक स्‍त्री दि‍खी। वो पार्वती की 80 वर्षीया मां थी। पास आने पर बताया कि‍ नदी में नहाने गईं थी और वहीं से लोटे में पानी भरकर ला रही हैं।


बातचीत में वो तनिक रूष्‍ट लगीं। '' सबलोग आते हैं देखने मगर कोई पैसा देने नहीं आता। कैसे चलेगा हमारा काम। ''

हमने उनकी कुछ मदद तो की, मगर  इस तरह की थोड़ी-बहुत आर्थिक मदद से काम नहीं चलेगा उनका, हम जानते थे परंतु ज्यादा कुछ तुरन्त कर पाना हमारे लिए भी संभव नहीं था।

पार्वती देवी वहां से उठाकर हमें घर के दूसरे हि‍स्‍से पर ले गईं। वहां देखा कि‍ सोहराई कला को कपड़े पर उतारा जा रहा है। कपड़े की तह लगाकर रंगीन मोटे धागे से सि‍लाई कर वैसी ही आकृति‍ उकेरी जा रही है जैसी दीवारों में है। इसे इधर ‘ लेदरा’ कहते हैं जि‍से बि‍छाने या ओढ़ने के काम में लि‍या जाता है। समझि‍ए कि‍ दोहर का ही एक रूप है।

पार्वती ने बताया कि‍ इसकी मांग है, इसलि‍ए  हमलोग लेदरा में पेंटि‍ग करने लगे हैं। इससे कुछ पैसे की आमदनी हो जाती है। एक तरह से काथा स्‍टि‍च जैसा ही लग रहा था देखने में और सुंदर भी।

देर हो चुकी थी और हमलोगों को रांची वापस भी आना था। हमें लौटने का उपक्रम करते देख पार्वती ने थोड़ी उदासी के साथ कहा कि‍ " हमलोग तो एक बार में ही पूरी आकृति‍ दीवार पर उकेर देते हैं, मगर आने वाली पीढ़ी पता नहीं इसे सहेज पाएगी कि‍ नहीं? अब तो घर भी पक्‍के बनने लगे हैं। कहाँ उकेरेंगे इसे और सीखेगा कौन?

फिर धीमे स्‍वर में कहा - "अबकी आइएगा तो पुराने कपड़े लेते आइएगा। हमारे लेदरा बनाने के काम आएगा।"

जाने दोबारा कब जाना हो, मगर एक कसक लि‍ए हम लौटे कि‍ इतनी सुंदर कला कहीं गुम न हो जाए। यह ठीक है कि‍ इन दि‍नों रेलवे स्‍टेशन, शहर की कई दीवारों, और एयरपोर्ट पर हमें सोहराई पेंटि‍ग दि‍ख रहा है, जो नजरों को खूबसूरत तो लगता ही है और देश-वि‍देश में भी ख्‍यात हो गया है। मगर जब तक इसे रोजगार से नहीं जोड़ा जाएगा, युवा पीढ़ी इसे अपनाएगी नहीं। वॉल पेंटि‍ग से नि‍कालकर सोहराई को कैनवास और कपड़ों पर उतारने के प्रयास में ज्‍यादा ध्‍यान देने की आवश्‍यकता है ताकि मिथिला पेंटिंग की तरह इसका बाजार बन सके।  


Thursday, January 7, 2021

रीति‍-रि‍वाज


रास्ते से गुज़रते हुए अचानक नज़र पड़ी कि कुछ लोग हैं और दो युवती पेड़ के तने को पकड़ लिपटी हुई है।दूर से देख कर समझ नहीं आया तो पास गयी...

वहाँ पूजा चल रही थी। कुसुम के पेड़ से लिपटी हुई युवतियाँ सरना माता के आदेश से निश्चल खड़ी थीं।पता चला कहीं पूजा कर रहे हैं पुजारी।वो नहीं आते तब तक उन्हें ऐसे ही रहना है।

लगा, कितना कुछ है झारखंड की संस्कृति में जिसे जानना अभी बाक़ी है ।

Sunday, September 20, 2020

''ल्‍हासा नहीं... लवासा''


यात्राओं में रूचि‍ है...घूमने के साथ-साथ प्रकृति‍ और वातावरण को जीना है, समझना है और खुद को परि‍पूर्ण करना है तो सचि‍न देव शर्मा की कि‍ताब ''ल्‍हासा नहीं... लवासा'' हाथ में उठाइये, और पढ़ जाइये। यकीन मानि‍ए, ऐसा तादाम्‍य बि‍ठा लेंगे आप, कि‍ लगेगा लेखक नहीं...आप ही उन स्‍थानों में घूम रहे हैं। 

आपकी दि‍लचस्‍पी बढ़ाने के लि‍ए पेश है ''ल्‍हासा नहीं...लवासा'' के पहले चैप्‍‍‍‍टर का कुछ अंश जि‍समें जमटा, हि‍माचल प्रदेश का यात्रा वर्णन है....

पुस्तक अंश

  'जमटा में सुकून के पल'  से

कुछ फ़ोटोग्राफ़ी करने की चाहत में मैं विनय के साथ अपना डीएसएलआर कैमरा लिए छह-सात फ़ुट चौड़ी कुछ आठ-दस सीढ़ियाँ उतरकर एक बड़ी समतल सीढ़ी तक पहुँचा ही था कि सीढ़ियों से लगी सीढ़ीनुमा चारदीवारी पर रखे गमलों के बीच से झाँकती सर्पीली, कुछ कच्ची, कुछ पक्की सड़क मानो न जाने किसी अंजान मंज़िल की ओर जा रही थी। मानो ऐसा लगा कि सड़क मेरे कैमरे के निवेदन पर थोड़ी देर के लिए रुकी हुई थी। उस घने पहाड़ी जंगलों के बीच से जाती उस सकरी सुनसान सड़क को कैमरे में क़ैद कर हम थोड़ा और नीचे उतरे तो गुड़हल के ताज़ा फूल अपने सौंदर्य को हमारे सामने परोसने के लिए हमारे इंतज़ार में ऐसे झूमते दिखें जैसे कोई किसी के इंतज़ार में चहलक़दमी करता है।

उस गुड़हल की रंगत कुछ अलग ही थी। शोख़ लाल रंग, काइया हरे रंग से भी गहरे रंग में गहराते पत्ते बारिश के बाद वहाँ पर मेहमानों की खेप को देखकर ख़ुश थे। उनकी सुंदरता का, खिलने और इठलाने का फ़ायदा ही क्या अगर कोई क़द्रदान ही-न-होतो, इसलिए ही आज बने-सँवरे से इतना इतरा रहे थे। उस गुड़हल की तस्वीर मेरे इस यात्रा की दो बेहतरीन तस्वीरों में एक थी।

नीचे की ओर रिसेप्शन के पीछे की तरफ़ लगे बड़े झूले वाले छोटे से लॉन में एक और बेहतरीन तस्वीर हमारा इंतज़ार कर रही रही थी। उस झूले पर बैठा मैं उस छोटे से लॉन के बीच लगे उस पौधे को निहार रहा था। वह पौधा कुछ अलग था। अचानक उड़कर उस पौधे पर आ बैठी तितली मानो कैमरे के साथ बैठे एक आदमी को फ़ोटोग्राफ़र समझ अपना पोर्टफ़ोलियोशूट कराने के इंतज़ार में बेचैन है। कभी इस पत्ते पर बैठती है तो कभी उस पत्ते पर। इतने में ही विनय ने बटरफ़्लाईचैलेंज दे मारा, “बहुत फ़ोटोग्राफ़र बना फिरता है ना, इस तितली की फ़ोटो खींचकर दिखा तो मानूँ तुझे मैं।यूँ तो मैं कोई फ़ोटोग्राफ़र नहीं लेकिन चैलेंज मिला था तो कुछ तो करना ही था। ज्यों ही मैं कैमरा रेडी करता हूँ वह तितली एक पत्ते पर शांत बैठ जाती है जैसे कि वह भी रेडी हो शूट के लिए। और फिर कभी पंख फैलाती है तो कभी सिमेटती, मानो पोज़ बना रही हो। कहीं तितली उड़ ना जाए इसलिए पहले ऑटोमोड पर फ़ोटो लेना सेफ़ऑप्शन लगा इसलिए पहले ऑटोमोड पर खचाखच तीन चार फ़ोटोज़ खींच डाले। फ़ोटोज़ आए भी ठीक। विनय को दिखाया। वह बोला, “अच्छे हैं,और खींच।फिर अपर्चरमोडट्राइ किया वह भी ठीक आया। लेकिन और पास से फ़ोटो लेने की तमन्ना के चलते ज्यों ही कैमरा तितली के थोड़ा और पास ले गया त्यों ही फुर्र से नदारद हो गई। लेकिन संतोष था कि विनय का चैलेंजआख़िरमीट कर ही लिया।

यार, आज अच्छी फोटॉग्राफी हो गई यहाँ आने पर वरना तो इस कैमरे को भी पड़े-पड़े जंग लग जाता। घर पर तो छुट्टी के दिन का भी एक रूटीनसेट हो चुका है। उसके बाहर कुछ भी कर पाना मुश्किल होता है।मैंने कहा।

विनय तुरंत अपने चिर-परिचित अंदाज़ में बोल उठा, “दोस्त, यही तो फ़ायदा है जमटा जैसी सुकून भरी जगह आने का।

अब हम वापस रिसॉर्ट में ऊपर की ओर चले जा रहे थे। शाम होने को थी। रेस्टोरेंट के बाहर खुले आसमान के नीचे डीजेनाइट की तैयारियाँ शरू हो चुकी थीं। हम अभी तक टीशर्ट और बरमूडा में ही घूम रहे थे। कविता और सौम्याडिनर के लिए तैयार होने के लिए अपने-अपने कमरों में जा चुकी थीं। बच्चे अभी तक झूला झूलने और हाईडएनसीक के चक्कर में धमा चौकड़ी मचाए हुए थे। चैम्प थोड़ा इर्रिटेटेड था। हमेशा की तरह उसकी यह शिकायत थी कि सावी और मनस्वी उसे अपने साथ खिलाने से मना कर रही थीं

बच्चे बार की एंट्रेंस पर बने पूलटेबल को देखकर पूल खेलने की ज़िद कर बैठे थे और ख़ास तौर से चैम्प तो कुछ ज़्यादा ही पगला गया था। ये सब बाद में, पहले जाओ फ़्रेश होकर चेंज करके आओ।विनय ने प्यार भरी डाँट मारते हुए उन्हें टॉपफ़्लोर पर हमारे कमरों की और दौड़ा दिया और हम भी धीरे-धीरे घूमते हुए लोहे की सीढ़ियों पर चढ़ते अपने-अपने कमरे के बाहर तक पहुँच गए। ठीक है तैयार होकर पंद्रह बीस मिनट बाद मिलते हैं।यह कहकर मैं अपने कमरे में आ गया और वह अपने कमरे में।

फ़्रेश होकर मैंने कविता से पूछा, “अरे मेरा कुर्ता-पजामा कहाँ है?” उसने उत्सुकता के साथ पूछा बाहर डीजेनाइट है, वहाँ पर कुर्ता-पजामा पहनोगे!उस समय मुझे उसके चेहरे पर बड़ा-सा प्रश्नवाचक चिह्न साफ़ दिख रहा था। मेरी मर्ज़ी, कुछ भी पहनूँ। वैसे भी मुझे कौन सा डांस करना है।मैंने नाराज़गी के साथ सफ़ाई देते हुए बोला। ठीक है, जो मर्ज़ी पहनो, हम कौन हैं रोकने वाले।कविता ने भी झूठ-मूठ ग़ुस्सा दिखाते हुए बोला। अरे मेरा वह मतलब नहीं था।हो सकने वाली लड़ाई की आशंका के मद्देनज़र मैंने रिट्रीट करने में ही भलाई समझी और धीरे से कुर्तापजामा पहनकर तैयार हो गया। कविता तैयार हो चुकी थी और मनस्वी को तैयार कर हम नीचे रेस्टोरेंट के बाहर ओपन टेरेस की और चल दिए।

सौम्या और बच्चे वहाँ पहले से बैठे स्टार्टर्सऑर्डर कर चुके थे। हम पहुँचे ही थे कि ठंडे पड़ते पहाड़ और सर्द होती हवाओं को अपनी गर्म भाप से टक्कर देते हनी चिल्ली पोटैटो हाज़िर थे। डीजे का मद्धिम संगीत भी पूरे वातावरण में ऊष्मा पैदा करने लगा था। जैसे-जैसे हनी चिल्ली पोटैटो का स्वाद जीभ पर चढ़ रहा था वैसे-वैसे वहाँ मौजूद युवक-युवतियाँ डीजे की धुन पर थिरकना शुरू कर रहे थे। महफ़िल अपने शबाब पर आने लगी थी। विनय भी आ पहुँचा था। मौसम ख़ुशगवार था। वैली में बने घरों की लाइटें सितारों की तरह टिमटिमा रही थीं। ऊपर से दिख रहा वह शहर शायद नाहन ही था लेकिन आसमाँ के सितारे, वह तो कहीं नज़र नहीं आ रहे। मैं परेशान था कि हिमाचल के उस छोटे से गाँव के बड़े से रिसॉर्ट में हमारी उस शाम की कौन गवाही देगा, उन तारों के सिवा। मैं सोचता जा रहा था और साथ-ही-साथ विनय के साथ बातों में मशग़ूल था। सहसा रिसॉर्ट की लाइटें गुल हो गईं, डीजे का संगीत शांत हो गया और संगीत पर थिरकते पैर ठिठक गए। सब अचानक से रुक गया। एक क्षण के लिए शून्य पैदा हो गया। इस शून्य के पैदा होते ही न जाने क्यों ख़ुद ही मेरी निगाह आकाश की ओर गई। आसमान में टिमटिमाते सितारें नज़र आने लगे थे। प्रकृति अपने पूर्ण रूप में दिखने लगी थी। लेकिन वह आनंद क्षणिक था। जनरेटर के स्टार्ट होते ही फिर से वही संगीत, संगीत पर नाचते लोग और वही धूम धड़ाका।

मैं और विनय प्रकृति के आंचल में बैठकर बतियाना चाहते थे। हम उठकर नीचे की ओर चल दिए और उस जगह आ पहुँचे जिस जगह कमरों का ब्लॉक था। उधर संगीत का शोर बहुत कम हो चला था। हम नीचे की ओर जाती उन्हीं चौड़ी-चौड़ी सीढ़ियों पर बैठ गए। कोई पाँच मिनट यूँ ही बैठे रहे। प्रकृति को अपने अंतर्मन में सहेज कर प्रकृति जैसा ही बन जाना चाहते थे, ईमानदारी से दिल से दिल की बात करने के लिए प्रकृति की तरह ईमानदार होना भी तो ज़रूरी है। यूँ तो डीजे की आवाज़ कुछ-कुछ उधर तक आ रही थी लेकिन हमें सर्द हवाओं की सर्र-सर्र करती आवाज़ों के अलावा कुछ सुनाई नहीं पड़ रहा था। घाटी में दिखती सितारों की तरह टिमटिमाती लाइटें किसी लालटेन की तरह मुझे दिखाई दे रही थीं। कुछ देर के सन्नाटे के बाद आख़िर विनय ने शुरुआत की, “यार, एक बात बता, अच्छे लोगों को भगवान जल्दी क्यों बुला लेता है?” मैंने जवाब देते हुए कहा, “अच्छे लोगों की ज़रूरत तो इस लोक में भी है और परलोक में भी, शायद इसलिए ही।


Wednesday, September 9, 2020

खि‍ड़की से बारि‍श....


 खिड़की के पार से आती है बारिश की आवाज़

एक ख़्वाहिश करवट लेती है, दम तोड़ देती है ..

Tuesday, August 18, 2020

सूना है माँ का चेहरा ....


घाट उठाने 
सभी रिश्तेदार और करीबी
जमा थे तालाब किनारे

पिंडदान 
फिर मुंडन कार्य में 
सब व्यस्त से हो गए 

वहीं थोड़ी दूर
एक पत्थर पर बैठी माँ
धीमे-धीमे सुबक रही थी

तालाब के पीछे पहाड़
और आसमान में घिरा बादल
हमेशा की तरह सुंदर था

मगर हमारी आँखें
कान की जगह ले चुकी थी
जिसने नाइन को कहते सुना 

उतराय दे अब 
बिछुआ, चूड़ी और बिंदी
कि सुहाग छुड़ाना है 

माँ की रुलाई, रुदन में बदल गई
सब बिलख पड़े
कैसा असहनीय दुःख है यह

डुबकी लगाकर
बाहर आती औरत 
कहीं से भी मेरी माँ नहीं लगी

घर लौटकर 
सब कुछ पहना दिया वापस
मगर बिना सिंदूर के 
कितना सूना लगने लगा है माँ का चेहरा ....।

( तस्‍वीर गूगल से )

Saturday, August 15, 2020

उनके नाम का अंति‍म भोजन....



सखुआ के पत्तल में  
निकाला गया भोजन
सब उन्हीं की पसंद का था 

बैंगन-बड़ी की सब्ज़ी 
कोहड़ा, भिंडी, पालक समेत
कई तरह के व्यंजन परोसे गए 

सज गया पत्तल तो माँ ने कहा
आम का अचार तो दिया ही नहीं
कितना पसंद है उन्हें !

कट गया कलेजा
जब कहा पीछे से किसी ने 
तस्वीर के आगे अर्पित करो
उनके नाम का अंतिम भोजन...

जीवन भर हमें 
मनचाहा खिलाने और
जीने देने वाले पिता के लिए
अब थाली में खाना नहीं परसेगा कोई...।