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Tuesday, November 1, 2016

गोधन : पंच पर्व का अंति‍म दि‍न


अगला दि‍न भाई दूज का होता। हम लड़कि‍यों काेे तब तक व्रत रखना होता है जब तक पूजा नहीं हो जाती। यह पूजा महल्‍ले में कि‍सी एक के घर होती और सब लोग वहीं आकर पूजा करते। गोबर से आंगन या छत में यम-यमी की आकृति‍ बनती। बाहर चौकोर घेरा बनाकर पूरा घर बनाया जाता। घर के अंदर गोबर से कई चौकोर खाने बनते और घेरे के अंदर सांप, बि‍च्‍छू, चूल्‍हा आदि‍ बनाया जाता है। इस पूजा में सबसे कष्‍टप्रद बात होती रंगीनी या भटकईया का कांटा ढूंढना।  बहनेंं पूजा के दौरान अपने भाई को श्राप देती है, फि‍र थोड़ी देर बाद पश्‍चताप करने के लि‍ए जीभ पर रंगैनी का कांटा चुभाती हैं। अपने भाई की लंबी उम्र की कामना से पूजा करती हैं और कहानी सुनती हैं। दो या तीन कहानी तो पक्‍का बोली जाती थी चााची, ताई द्वारा। हमें बड़ा मजा आता यूं सुनकर कहानी। जि‍समें भाई बहन का प्‍यार होता आैर अक्‍सर भाभि‍याें की बुरी छवि‍ होती।

सबसे वि‍चि‍त्र बात की पूजा समाप्‍त होने के बाद यम-यमी के सीने पर एक ईंट धरा जाता और उसमें एक पांव धरकर सारी बहनेंं गीत गाते हुए पार होती थी। अपने भाई की रक्षा और उनके दुश्‍मनों काा बुरा हो, यह कामना करती हैं बहनें। यह पर्व अब भी मनाया जाता है। इसके बाद भाई को प्रसाद देने के बाद बहनेंं कुछ खाती। प्रसाद में चना होता जि‍से भाई को नि‍गलना होता है। पूजा के वक्‍त रूई की एक माला बनती है, जि‍से 'आह जोड़ना' कहते हैं। इस माला को बनाते वक्‍त मौन रहा जाता है और भाई की मंगलकामना की जाती है। जि‍से पूजा के बाद भाई की कलाई में पहना दि‍या जाता है। भाई भी बहनों को पैसे या कोई उपहार देते। मुख्‍यत: यह भाई-बहनों के बीच के प्‍यार को बढ़ानेे वाला त्‍योहार है, राखी के अलावा। इस दि‍न सभी भाई अपनी बहन के घर जाते। मान्‍यता है कि‍ जि‍स भाई की हड्डी को बहन का श्राप लगा होता है, उसकी आकाल मृत्‍यु नहीं होती।

आधे से ज्‍यादा दि‍न इन्‍हीं सब में पूजा-पाठ में बीत जाता। शाम होते-होते अहसास होता कि‍ पंचपर्व दीवाली खत्‍म हुई। थोड़ी मायूसी होती कि‍ अब शांति‍ है मगर सि‍र्फ दो-तीन दि‍न। फि‍र महापर्व छठ की गहमागहमी शुरू। यानी हमारी संस्‍कृति‍ में उत्‍साह और उमंग बनाा रहता है पूरे वर्ष। मगर मेरे लि‍ए दीवाली से अच्‍छा कुछ नहीं।


Monday, October 31, 2016

सोहराई : एक अनूठी रस्म


दीपावली की दूसरी सुबह..यानी सोहराई का दि‍न। सबसे पहले हमें उठकर घरौंदे से कुल्‍हि‍या-चुकि‍या नि‍कालना होता जि‍समें रात खील-बताशे भर के रखे थे। उसे भाइयों को देती। हम बहनों को खाना नहीं था।
हम उठकर देखते तो पता लगता है गौशाले की सफाई हो चुकी है। गोबर से लीपा जा चुका है। आंगन में लकड़ी के चूल्‍हे पर बहुत मात्रा में अनाज पक रहा है। पांच तरह के अनाज मिलकर बनते थे जिसे पख्या कहा जाता था! देखते ही दादी का आदेश होता...जाओ चौक पूर आओ। यानी रंगोली बनाओ। तब हम दीवाली के दूसरे दि‍न रंगोली बनाते थे। घर के बाहर से अंदर गौशाले तक।

रंगोली बनाने के लि‍ए चावल के आटे का घोल बनाते और उस पर सि‍ंदूर लगाकर सजाते। वहीं सीखा मैंने रंगोली बनाना। मगर बाहर से अंदर तक बनाते-बनाते कमर दुख जाती क्‍योंकि‍ हमारे घर में गौशाला पूरे आंगन और बगान को पार कर पीछे था। मगर नि‍यम यही था कि‍ पूरे रास्‍ते बनाना है।

इस बीच गाय-बैल को नहा दि‍या जाता। उसके बाद उसके पूरे शरीर में दीयों काे अलग-अलग रंग में डुुबाकर छाप लगाई जाती। उनके सींग पर तेल मला जाता। फि‍र आंगन से अंदर उनकी पूजा कर लाया जाता। गौशाले के नाद में उनके लि‍ए पकाया गया अनाज परोसा जाता। सारा दि‍न कुछ न कुछ क्रम चलता रहता।

जब शाम के चार बजते, तो सारे लोग अपने जानवरों को, वि‍शेषकर गाय-बैल को खूंटे से नि‍काल लाते। उन्‍हें खुला छोड़ दि‍या जाता। सारे जानवर इकट्ठे होकर उछलते-कूदते। हमें बहुत मजा आता देखकर। उस दि‍न इनको पूरी स्‍वतंत्रता होती कि‍ जि‍धर चाहे चले जाए। कोई रस्‍सी नहीं पकड़ता। घंटे-दो घंटे तक यही सब चलता। हम बच्‍चे कभी बाहर जानवरों को देखने जाते तो कभी उनके दौड़ने से डरकर घर में छुप जाते।

सांझ ढलने से पहले सब लोग अपने-अपने जानवरों को हांककर वापस गोशाला ले आते। गौ-पूजा की समाप्‍ति‍ होती। देर शाम फि‍र दीये नि‍काले जाते। आज बासी दीयों का ही प्रयोग होता सजावट के लि‍ए। हां, मदि‍र, तुलसी आदि‍ में नए दीये लगते।  कल के बचे पटाखे चलाये जाते। फि‍र से एक छोटी दीवाली मनती।


Sunday, October 30, 2016

दीपावली की बधाई .....जगमग-जगमग दीप जले



अगले दि‍न सुबह नींद खुलती तो देखती पापा और दादी बड़े से बरतन में पूजा घर के सारे भगवान को नहला रहे होते। उस दि‍न सुबह सि‍र्फ पूजा के कमरे की सफाई होती और भगनाव नए वस्‍त्र पहनते। उस दि‍न पूजा होने तक पापा व्रत रखते। मां रसोई में लगी होती। हम बच्‍चे नााश्‍ता करने के बाद बड़े से बाल्‍टी या टब में पानी भर सारे दीये भि‍गो देते। घंटे भी बाद पलट के रखते।अपने घरकुंदवा या घरौंदा सुंदर से सजाते। दोपहर तक नहा-धोकर नए कपड़े पहन लेते।

अक्‍सर गोधूि‍ल बेला में दीया जलाया जाता था। मां पूजा के कमरे में लक्ष्‍मी पूजन की तैयारी करती और मैं और छोटी बहन थाली में घी के दीपक लगाते। नये कपड़े पहनकर तैयार हो जाते। हम सहेलि‍यों में यह बात पहले तय हुई रहती थी कि‍ शाम को मंदि‍र में दीपक लगाने साथ ही चलेंगे। जैसे सांझ ढलने काे होती, सहेलि‍यां घर के सामने आ जाती। मेरे घर के आगे ही शि‍व और दुर्गा मंदि‍र था। गांव के हर घर से कोई न कोई आता पहले मंदि‍र में दीया जलाने। नि‍यम था कि‍ पहले मंदि‍र में भगवान के आगे दीया लगेगा, फि‍र सबलोग अपने घर में लगाएंगे।

हम थाली में दीप लेकर घर के सामने वाले मंदि‍र में सबसे पहले जाते। वहां दीया जलाकर प्रणाम करते फि‍र सहेलि‍यों के साथ बातें करते हुए दूसरे मंदि‍र की ओर नि‍कलते। गांव के दोनों छोर पर दो मंदि‍र थे। हमलोग दोनों मंदि‍र में दीया लगाते। इसी क्रम में पूरे् गांव की परि‍क्रमा भी हो जाती और हम सजावट देख लेते। तब तक सारे घरों में दीये लगने शुरू हो जाते। कि‍सी घर की छत पर दीया स
जा मि‍लता तो कि‍सी घर के बाहर केले का थंब लगाकर उस पर दीया इस तरह से लगाया मि‍लता कि‍ि‍ अद्भुत दृश्‍य नजर आता। कहीं बच्‍चे फूलझड़ी छोडते मि‍लते। 

इस तरह हम सारे गांव घूमकर घर आते। तब तक मां घर को दि‍ये से रौशन कर रही होती या उसकी तैयारी में लगी होती। इधर पूजा चलती रहती और हम कोने-कोने को रौशन कर रहे होते। छत, आंगन, कुंआ यहां तक कि‍ गौशाला में भी दि‍ये सजाते। मजे की बात कि‍ हमें जरा भी थकान नहीं होती। तब तक पूजा संपन्‍न हो जाती। मां की आवाज पर आरती में शामि‍ल होते।


इसके बाद बारी आती हमारे घरौंदों के पूजन की। हमारे हाथों से बना हमारा छोटा सा घर पूरा सजा संवरा रहता। दूधि‍या मि‍ट्टी के लीपने के बाद उस पर रंग-बि‍रंगी चि‍त्रकारी कर हस्‍तकला का नमूना पेश करते थे हम।
जि‍तने मि‍ट्टी के खि‍लौने थे, उन सबको सजा देते थे छोटे से घर में। हमारी ग्‍वालि‍न के हाथों के दि‍ए झकमक जलने लगते और घर भरने के लि‍ए भाई के नाम से छोटे चुकि‍ए में खील-बताशे भरते। सबसे दि‍लचस्‍प बात है कि‍ उसमें पांच तरह के अनाज होते थे और दीपावली के एक दि‍न पहले हम खुद भुनवा कर लाते थे।


प्रसाद लेने के बाद सीधे घर के बाहर। पटाखों का थैला सबके हाथ में होता और फूलझड़ी़, आलू बम, सांप, बीड़ी बम, जलेबी, अनार...;क्‍या कुछ नहीं होता था हमारे पास। जी भरकर पटाखे छोड़ते और पूरे मैदान में दौड़ते फि‍रते..दोनों हाथों में फूूलझड़ी थामे..जैसे हमारे पैरों को जलेबी की रफ्तार मि‍ल गई हो।  

नहीं भूल पाती वो पल..वो दि‍न। जब सारे पटाखे खत्‍म हो जाते तो सामने मंदि‍र में जाकर बैठ जाती और अपने सजे हुए घर को अपलक देखती। लगता..इससे सुंदर घर नहींं कोई दूसरा। हो भी नहीं सकता। तब तक मां की फि‍र आवाज आती...खाना खा लो पहले। हमलोग सब मि‍लकर भोजन करते। उसके बाद फि‍र एक दौर चलता पटाखों का। इस बार मां-पापा भी शामि‍ल होते हमारे साथ।   




देर रात तक कई दौर चलता पटाखों का। इस बीच मैं तेल और बाती लेकर एक चक्‍कर सारे दीयों की लगाती। जि‍स दीये का तेल कम मि‍लता उसमें दुबारा तेल भरती और जि‍सकी बाती ज्‍यादा जल चुकी हो, उसे बदल देती। मेरा यह कार्य तब तक चलता रहता जब तक मैं नींद से चूर होकर बि‍स्‍तर में नहीं चली जाती। सारेे लोग सो जाते और मैं दीया-बाती करती रहती।

इसी रात मां काजल बनाती थी आंखों में लगाने के लि‍ए। घी के दीये के ऊपर कांसे का कटाेरी पलटकर रख देती थी रात को सोने के पहले। सुबह जब उसे पलटकर देखते तो कालि‍ख की मोटी परत बि‍छी मि‍लती। उसे कजरौटे में भरती थी मां और हम बच्‍चों को काजल लगाती थी।

दीपावली की रात ऐसा लगता जैसे आकाश के सारे तारे जमीं पर आ गए। तब पूजा पाठ से मतलब नहीं था। दीये रौशन करना और पटाखे चलाना। देर रात हम सोते पर सुबह जल्‍दी जागना होता। 

Saturday, October 29, 2016

छोटी दीवाली


अब धनतेरस के अगले दि‍न छोटी दीवाली। घर की साफ सफाई की समाप्‍ति‍ और मां की रसोई में पकवान की तैयारी शुरू। मां नारि‍यल के लड्डू बहुत स्‍वादि‍ष्‍ट बनाती हैं। फि‍र पारंपरि‍क भोजन की तैयारी। अगले दि‍न धुसका, आलू की सब्‍जी, पुलाव, गोभी की मसालेदार सब्‍जी बनती। मि‍ठाईयां कुछ घर में बनती, कुछ बाजार से आती।
आज छोटी दीवाली के दि‍न थोड़े दि‍ये जलते थे। मंदि‍र में, तुलसी चौरे के नीचे, कुंए और गौशाला में। छत पर चारों दि‍शाओं में और कुछ बाहर..कुछ खि‍ड़कि‍यों कुछ छज्‍जे पर। उस दि‍श हम सि‍र्फ रौशनी जलाते। शोर वाले पटाखेे बि‍ल्‍कुल नहीं। आज पापा छत पर नि‍कले राॅड के ऊपर कंदील लगाते। मैं पूरे वक्‍त उनके सहयोग के लि‍ए खड़ी रहती। बहुत अच्‍छा लगता था अंधेरे आकाश में कंदील को जलता देखना। एक दीपशि‍खा जलती हो आंखों के आगे।

रात हमारे लि‍ए वि‍शेष खास होता। शाम के वक्‍त ही दादी एक पुराना दीया ढूंढकर रख लेती। जब सारे लोग सोने चले जाते तब दादी हाथ में वही दीया, जि‍समें सरसों का तेल भरा रहता, और जलता रहता,  लेकर आती और हम बच्‍चों के तलवे में तेल लगाती। सर पर आरती देकर कमरे में दि‍या घुमाती। ऐसा वो पूरे घर में करती और होठों ही होंठो कुछ बुदबुदाती रहती। सब सोये होते उस वक्‍त। मैं आंखें मूंद सोने का बहाना करती। दादी पूरे घर में दीया घुमाकर घर के बाहर नि‍कलती और दूर मैदान में रख आती। वो दि‍या मेरे कमरे की खि‍ड़की से दि‍खता। मैं लाइट आॅफ कर दि‍या रखने जाती दादी को देखती, और तब तक देखती रहती जब तक दीया बुझ नहीं जाता। गहन अंधकार में एक दि‍या बड़े से मैदान के बीच बेहद आकर्षक लगता। मुझे तब समझ नहीं आता था कि‍ दादी देर रात क्‍यों रखती है दीया। बड़ा रहस्‍यमयी होता था सब। पर बहुत अच्‍छा लगता था। 

Friday, October 28, 2016

दीपावली...धनतेरस की उमंग


दीपावली आते ही मेरे मन में असीम उमंग भर जाती है जो पूरे वर्ष भर में कभी महसूस नहीं होती। यह बचपन की यादों का ही असर है जो अब तक उर्जावान रखता है हमें। दुर्गा पूजा के समाप्‍त होते ही हमारे मन में एक अबूझ सी छटपटाहट भरती कि‍, दीवाली आ रहा है। हमें ये करना है..वो करना है। 

मुझे याद है सबसे पहले गांव में हम घरौंदे बनाने की तैयारी में लग जाते थे। ठीक दशहरा के बाद। स्‍कूल से घर लौटते  ही परि‍वार और आसपास के सारे बच्‍चे कुदाल खुरपी और बोरा लेकर खेतों की ओर नि‍कल जाते। नदी कि‍नारे की चि‍कनी मि‍ट्टी इकट्ठा करते घरौंदे के लि‍ए। उस वक्‍त खेतों में कच्‍ची मूंगफलि‍यां लगी होती। हमलोग उसे भी नि‍काल कर खाते और मि‍ट्टी ढोकर घर लाते। 

उस समय सारे घरवाले अपने काम और सफाई में व्‍यस्‍त रहते। हमारा काम हमें ही करना होता था। दो तीन दि‍नों तक मि‍ट्टी, ईंटे और पटरे यानी लकड़ी के तख्‍तों का इंतजाम करते। अब होती आंगन के एक कोने में घरौंदा, जि‍से घरकुंदवा कहते थे हम...उसे बनाने की तैयारी। बच्‍चों में होड़ लगती कि‍ कि‍सका घर सबसे सुंदर बनेगा। हम बाकायदा पूरा घर बनाते, बाहर आंगन। ईंटे रखकर उस पर मि‍ट्टी चढ़ाते। लकड़ी के तख्‍ते से छत बनाते। कई बार एकमंजि‍ला तो कई बार दो मंजि‍ला। ये सारा काम हमलोग स्‍कूल से लौटने के बाद करते। उसकी लि‍पाई-पुताई का काम धनतेरस के दि‍न तक पूरा कर लि‍या जाता।

उसी दि‍न गांव का कुम्‍हार बड़े से दौरे में दि‍या और कुम्‍हारि‍न अपने दौरे में कुल्‍हि‍या-चुकि‍या और ग्‍वालि‍न लेकर आती। पापा अांगन में बैठकर दि‍ए गि‍नवाते और मैं कुल्‍हि‍या-चुकि‍या, जांता, सि‍ल-लोढ़ा, चूल्‍हा, चकला-बेलना यानी रसोई के सारे बर्तन और घोड़े-हाथी, और ग्‍वालि‍न, एक लड़की की मूर्ति जि‍सके हाथ में दि‍ए बने होते, सारे इकठ्ठा कर लेती।

मेरी कोशि‍श होती कि‍ जि‍तने भी सामान कुम्‍हार ले आए, उसे न लौटाऊं। कई बार पापा खीजते, इतने सारे दि‍ए और खि‍लौनों का करोगी क्‍या। पर मैं नहीं मानती। कहती, पापा मुझे सारे दि‍ए जलाने है। कुम्‍हार भी कहता, ले लो न बाबू, बि‍टि‍या को पसंद है। मैं भी अब बचे हुए सामान कहां लौटा कर ले जाऊंगा। अंतत: मेरी जि‍द पूरी होती। 


धनतेरस के दि‍न शाम को हम बाजार जाते। रौशनी से नहाया बाजार , बर्तनों के ढेर और लोगों की भीड़। उस दि‍न मुझे बड़ा अजूबा लगता। साधारणत: उस वक्‍त गांव की महि‍लाएं बाजार नहीं जाती थी, मगर उस दि‍न देखती सभी लोग, मां, दादी, चाची और पड़ोस की महि‍लाएं खुद जाती और पसंद की चीजें खरीद लाती। मुझे याद है दीवाली के आसपास हर वर्ष वहां नौटंकी वाले आते थे। साथ ही मीना बाजार भी लगता था। देर रात सारे काम खत्‍म कर पूरा का पूरा मुहल्‍ला नौटंकी देखते जाता था। हम बच्‍चे बहुत हैरानी से सब देखते और मां-चाचि‍यों की बातें खत्‍म ही न होती थी।