Tuesday, May 24, 2016

तुम्‍हें वहां तक ले चलूं...



एक सड़क
जो जाती है वहां तक
जहां चूमते हैं बादल जमीं को
आओ
एक बार मैं तुम्‍हें वहां तक ले चलूं
जहां नीले पहाड़ हैं
और उसके पीछे बादलों का गांव
वक्‍त बीतने दो
मेरा बसेरा उसी गांव में होगा
कभी आना चाहो
तो राह की हरि‍याली से पूछना
उसे पता होता है
काले बादलों के घर का पता
जहां बूंदे
दोनों बाहों में समेटे पहाड़ खड़ा होता है
हर प्रेमि‍ल हृदय में बरस जाने को
आओ
एक बार मैं तुम्‍हें वहां तक ले चलूं
जि‍स गांव में
घनेरे काले बादलों का डेरा है........

दो दि‍न पहले ली थी रांची-ओरमांझी के बीच ये तस्‍वीर

3 comments:

Digamber Naswa said...

बहुत खूब ... प्रेम का बसेरा भी वहीं है ...

शिवम् मिश्रा said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " खुशियाँ बाँटते चलिये - ब्लॉग बुलेटिन " , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

Dilbag Virk said...

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 26 -05-2016 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2354 में दिया जाएगा
धन्यवाद