Wednesday, March 30, 2016

मन तो मतंग है...



प्रवाह...
जल में दीप का,
मन में मीत का
एक मोहता है
दूसरा
हर गति‍ रोकता है
प्रवाह...
हवा तय करती है दि‍शा
मन तो पतंग है
बस मतंग है....

3 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (01-04-2016) को "भारत माता की जय बोलो" (चर्चा अंक-2299) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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मूर्ख दिवस की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Madhulika Patel said...

बहुत सुंदर .हाँ मन हमेशा गतिशील रहता है .

Madhulika Patel said...

बहुत सुंदर .हाँ मन हमेशा गतिशील रहता है .