Saturday, July 4, 2015

पास-पास ही रहूंगी....


न सींचो
शब्‍द-जल से
कि एक दि‍न
पल्‍लवि‍त-पुष्‍पि‍त हो
घना तरूवर बनूंगी...

है चाहत
तो धर लो
मुट्ठि‍यों में
बन कपूर की
पहचानी सुगंध
कहीं पास-पास ही रहूंगी.....

5 comments:

Onkar said...

बहुत सुन्दर

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (05-07-2015) को "घिर-घिर बादल आये रे" (चर्चा अंक- 2027) (चर्चा अंक- 2027) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

सुशील कुमार जोशी said...

सुंदर !

abhishek shukla said...

रचना पसंद आई।

Digamber Naswa said...

चाहत दोनों ही हैं ... किसी एक को निभाना आसान नहीं ...