Friday, July 10, 2015

सोचने को बुलाती नदी...'' नदी को सोचने दो''




मेरे कवि‍ता संग्रह ' नदी को सोचने दो' की समीक्षा अनुराग अन्‍वेषी जी ने की है और यह जुलाई अंक के 'पाखी' पत्रि‍का में प्रकाशि‍त हुई है।

आप भी एक नजर डालें....


सोचने को बुलाती नदी
-अनुराग अन्वेषी
कविता संग्रह : नदी को सोचने दो
कवयित्री : रश्मि शर्मा
प्रकाशक : बोधि प्रकाशन
मूल्य : 120 रुपये
कभी किसी ने पूछा था कि कविता को कविता, कहानी को कहानी और उपन्यास को उपन्यास ही क्यों कहें; जबकि तीनों में शब्द ही होते हैं। अब तो कई बार इन तीनों विधाओं के रूप भी एक दूसरे से अदला-बदली करते दिखते हैं। अपनी बात उन्होंने साफ करते हुए कहा था कि कहानी पद्य रूप में लिखी जाने लगी है और कविताएं गद्य में।
इस सवाल का जवाब नदी, तालाब और समुद्र के प्रतीक से समझा जा सकता है। तीनों में मूल तत्व पानी है, पर तीनों की प्रकृति अलग है। समुद्र के भीतर जबर्दस्त उथल-पुथल होती है, पर बाहर से शांत और स्निग्ध दिखता है। उसका आकार भी इतना विशाल होता है कि इस किनारे से उस किनारे तक देखना नामुमकिन - यह उपन्यास का स्वरूप है। तालाब अपने रूप और गुण दोनों स्तरों पर कहानी की तरह होता है। कहानी में उसके तमाम किनारों को देखा जा सकता है, उसकी सीमाओं को उसकी समग्रता में समझा जा सकता है। और कविता नदी की तरह होती है। लगातार बहती हुई। बिल्कुल अल्हड़। अपने मुहानों को तोड़ती हुई। अपनी दिशा को अपने वेग के मुताबिक मोड़ती हुई। नई दिशाओं में बहती हुई और नए अर्थ-स्वाद में बहाती हुई।

रश्मि शर्मा के कविता संग्रह 'नदी को सोचने दो' से गुजरते हुए, बार-बार मुझे कविता के लिए नदी का प्रतीक बेहद सटीक लगता रहा। पहली नजर में इस संग्रह की अधिकतर कविताएं प्रेम कविताएं लगती हैं। पर जब-जब आप कविताओं पर सोचते हैं तो उसका प्रवाह आपको मध्यवर्गीय स्त्री जीवन की ओर ले जाता है। जहां टूटन है। आक्रोश है। समझौता है। संभावनाएं हैं। और इन सब के बावजूद त्याग और समर्पण की वह अनगिन कहानियां हैं जो किसी मध्यवर्गीय स्त्री के खाते में जबरन रखी हुई दिखती है। जिसे देख पुरुष वर्चस्व वाला समाज कहता है कि यही भारतीय स्त्री की 'आदर्श' छवि है।

जीवन संवारने की कोशिश में इन सारी यातनाओं को झेलता हुआ स्त्रीमन कई बार विद्रोह की मुद्रा तो बनाता है, पर वह विद्रोह करता नहीं। बल्कि वह अपने विद्रोह का दमन करता हुआ दिखता है। क्योंकि उसे उसके छुटपन से ही भारतीय स्त्री की 'आदर्श' छवि घुट्टी की तरह पिलायी गई है। तो स्त्री का वह 'आदर्श चरित्र' उसे विद्रोह करने से रोकता है और घुटते रहने को वह अपनी नियति मान जीवन को किसी भी शर्त पर संवारने की कोशिश करती है। 'नदी को सोचने दो' संग्रह की एक कविता है 'हिसाब'।

कहता है वो/कि मुझसे/कब, क्‍यों और कहां/का हि‍साब/मत कि‍या करो/मुझे चैन से जीने/दि‍या करो।/और जो मैं कह दूं/कि‍सी रोज/कि‍/मेरे सोने-जागने/हंसने-बति‍याने/यहां तक कि‍/चलती सांसों का भी/जो हिसाब रखते हो/न रखा करो/तुमको मि‍ली स्‍वतंत्रता का/दसवां हि‍स्‍सा भी/मुझे जीने दि‍या करो/उस दि‍न/मेरे सम्‍मान में जो/कसीदे पढ़े जाएंगे/क्‍या आंखों में आंसू भरकर भी/हम कि‍सी को बता पाएंगे।

औरत का एक संघर्ष यह भी है कि जिसे देखा, जिसे सुना, जिसे पहचाना, जिसे महसूसा...अचानक एक दिन वह इतना अनजाना क्यों लगने लगता है। रश्मि की कविता 'पेड़ जड़ से उखड़ा नहीं करते' में इसे ऐसे कहा गया 'हां,/सदि‍यां गुजर गईं/तुम्‍हें तलाशते/पहचानते/कि तुम वही हो/जि‍सके साथ जुड़ा है/जनमों का बंधन... /मगर/आज तुम मि‍ले हो
ऐसे वक्‍त...इस जगह, जहां/जड़ें इतनी गहरी हैं/कि चाहूं तो भी/मिट्टी हट नहीं सकती/नया पौधा पनप नहीं सकता/फि‍र क्‍या करूं/सदि‍यों के रि‍श्‍ते का/जन्‍मों के बंधन का…'

'नदी को सोचने दो' संग्रह की कई कविताओं में यह बात शिद्दत से सामने आती है बढ़ती उम्र के साथ बढ़ता है दुख और घटता जाता है प्रेम। जीवनसाथी की शुष्कता अक्सर भीतर बसती जाती है और वह स्त्रीमन में सन्नाटा बुनती है। खुशियां बाहर से भीतर नहीं आतीं, बल्कि वह भीतर फूटती हैं। इन कविताओं में मध्यवर्गीय स्त्री का प्यार उसके समर्पण की कहानी है, जैसे नदी विलीन हो जाती है समुद्र में। पर इस स्त्री को शिकायत है कि उसे झील मिली। वह कहती है कि 'हां/ये सच है/कि हर नदी तलाशती है/एक समन्दर/जहां विलीन करना होता है उसे/अपना अस्तीत्व/तुम झील बनकर क्यों मिलते हो/किसी नदी से/बन जाओ न/विशाल हृदय लेकर/एक शांत, नीला समन्दर।' (नदी को सोचने दो)

पर आखिर यह मध्यवर्गीय स्त्री चाहती क्या है? क्या उसकी चाहत इतनी अतार्किक या 'खतरनाक' है कि इस मर्दवादी भारतीय समाज की बुनियाद हिल जाएगी? दरअसल यह इस हठी समाज का झूठा दंभ है जो स्त्री की मासूम चाहत की अनदेखी करता है, सुनकर अनसुना करता है। एक स्त्री जब कहती है 'हल्‍की ठि‍ठुरन/शाम की गंध/और एक प्‍याली
चाय की तलब/चलो/आज तुम ही बना लो/एक प्‍याली चाय/मैं तुम्‍हारी
पीठ से सट, आंखें मूंद/महसूस करूंगी/चीनी-पत्‍ती के साथ/प्रेम मि‍ला कर
बनती, चाय की गंध/कैसी होती है/और/कैसा होता है/ऐसी चाय का स्‍वाद।' ऐसी प्यार भरी गुजारिश भी इस पुरुष के दंभ को चोट पहुंचाती है। फिर तो चाय का स्वाद भी कड़वा होता है। चीनी की मिठास की चाहत मन में खटास बुनती है और स्त्री को उसका सबसे करीबी चेहरा भी अंधेरा रचता नजर आता है। तब स्त्री प्रतिकार करती है। पर उसका प्रतिकार भी उसके मन की तरह कोमल होता है। वह अपने समर्पण को उसके चरम पर ले जाती है, इस उम्मीद में कि शायद पुरुष समझ पाए कभी इस कोमलता को और बदल ले अपना रवैया। कभी सोचा था/जैसे दूर क्षि‍ति‍ज में/धरती-अंबर/एकाकार नजर आते हैं/वैसे ही एक दि‍न/उजाले और रात की तरह/मि‍लकर/हम भी सांझ बन जाएंगे।/मगर अब हममें-तुममें/बस इतना/बाकी बच गया है/जैसे धरती और बादल का रि‍श्‍ता/इसलि‍ए/जब जी चाहे/बरस जाना तुम/मैं धरती बन समेट लूंगी
अपने अंदर/सारे आरोप-प्रत्‍यारोप/और अहंकार तुम्‍हारा/तुम्‍हारा प्‍यार/रेत में पड़ी बूंदों की तरह/वि‍लीन होता देखूंगी/मगर/प्रति‍कार में कभी/तुम्हें, तुम सा/आहत नहीं करूंगी/उस हृदय को/एक क्षण के लि‍ए भी जि‍समें/मुझे/जगह दी थी तुमने/क्‍योंकि‍ मेरा प्‍यार/अदृश्‍य हवा है।/जि‍से महसूसा जा सकता है/मगर देखा नहीं/तुम्‍हारी तरह/बादल नहीं/जो ठि‍काने बदल-बदल कर बरसे।(हम सांझ बन जाएंगे)
स्त्री का यही भरोसा, उसकी यही वेदना, उसका यही त्याग और उसका यही निश्छल प्यार - इस मर्दवादी समाज को डराते हैं। उसे डराते हैं इसीलिए कि पुरुष नाम के जीव के पास जीवन के ये तत्व उसी मात्रा में मौजूद नहीं हैं जो कमजोर और नाजुक सी दिखने वाली स्त्री के पास हैं।

स्त्री अपने छोटे-बड़े सारे अवसरों को मन के पन्नों पर बेहद संवार कर संजोती है। पर उसकी पीड़ा अगर खुशियों के मुकाबले ज्यादा हो जाती है तो जीवन को सहेजने की कोशिशों पर उसकी हताशा हावी हो जाती है।
ले आई थी।एक कोरी सी डायरी।जि‍समें।मोति‍यों से अक्षरों में।लि‍खना चाहा मैंने।खूबसूरत नर्म सी सुबह।और बारि‍श के बाद।क्षिति‍ज में फैले धुंध को।मुट्ठियों में समेट लेने के।अहसास से भरे।हसीन हसरतों के कि‍स्‍से।तुम्‍हारे साथ और।तुम्‍हारे बगैर गुजरे, वक्‍त के चीथड़े।मगर
नामालूम कैसे।खूबसूरत हरफों के ऊपर।उलट पड़ी स्‍याही, मि‍ट गया सब।अब फैले हैं।नीले-नीले धब्‍बे, और।मेरे पास कोई स्‍याही सोख भी नहीं। (मेरे पास कोई स्याही सोख नहीं)
नदी को सोचने दो रश्मि शर्मा का पहला काव्य संग्रह है। इसमें शामिल कविताओं से यह उम्मीद जगती है कि अगले संकलन में इस सोचती नदी का प्रवाह और तेज होगा, उसकी धारा की धार और मंजेगी और कथ्य खुलकर बहस करेगा।

4 comments:

Kavita Rawat said...

अनुराग अन्‍वेषी जी द्वारा आपकी कवि‍ता संग्रह 'नदी को सोचने दो' की समीक्षा प्रस्तुति बहुत अच्छी लगी।
कवि‍ता संग्रह 'नदी को सोचने दो' के प्रकाशन पर बहुत बहुत हार्दिक मंगलकामनाएं!

Kavita Rawat said...

अनुराग अन्‍वेषी जी द्वारा आपकी कवि‍ता संग्रह 'नदी को सोचने दो' की समीक्षा प्रस्तुति बहुत अच्छी लगी।
कवि‍ता संग्रह 'नदी को सोचने दो' के प्रकाशन पर बहुत बहुत हार्दिक मंगलकामनाएं!

Digamber Naswa said...

सुन्दर समीक्षा अनुराग जी के द्वारा ... आपको इस संग्रह के प्रकाशन की बहुत बहुत बधाई ...

Onkar said...

बहुत सुन्दर