Monday, May 25, 2015

आज फिर से याद करें....


एक लम्हा मिलन का
था कि जुदाई का
आओ आज
फिर से याद करें
तुम बिन,
मैं थी बहुत अधूरी
पर मिलकर भी ,
कहाँ हो पाई पूरी
मिल कर तुमसे
और भी
उदास हो गए हम
तुम्हें छू कर आती
हवाओं को
भर तो लिया सांसों में
इक हसरत थी
जी भरकर देखूं
खुद को तेरी आँखों में
ये आरजू भी कहां हो पाई पूरी

4 comments:

suneel kumar sajal said...

अच्छी कविता
सुनील कुमार सजल
sochtaahoon.blogspot.com

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (26-05-2015) को माँ की ममता; चर्चा मंच -1987 पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

कालीपद "प्रसाद" said...

एहसास की बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति !
उत्तर दो हे सारथि !

सु-मन (Suman Kapoor) said...

बहुत सुंदर