Monday, February 9, 2015

वि‍श्‍वास का पत्‍थर


अपनी दोनो जहां
दांव पर लगाकर
क्‍या पा लि‍या कि‍सी ने
शाम
अब तक गाढ़ी थी
रातें काजल सी काली है

तेरा दि‍या जहर पी
कोई रात भर तड़पेगा
देह से
आग जनमेगी
फूल का मन झुलसेगा

आकाशगंगा का सबसे
झि‍लमि‍ल सि‍तारा था वो
टूटकर गि‍रा
अब अंधेरे में
अपने
अस्‍ति‍त्‍व को लड़ेगा

आज चांद फि‍र
फलक पर
उजास बि‍खेरता आया है
चि‍ता की राख पर
पड़ा
वि‍श्‍वास का पत्‍थर चमकेगा

तस्‍वीर-- एक थके से इंसान की..जो पल के सुकून को ठहरा है


2 comments:

AWADHESH KUMAR DUBEY said...

बहुत सुन्दर रचना !
गोस्वामी तुलसीदास

रविकर said...

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (11-02-2015) को चर्चा मंच 1886 पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
सादर...!