Wednesday, January 7, 2015

बहुत अजनबी लगते हो तुम.....


कई बार
जब तुम्‍हारे कहे
खुरदुरे शब्‍दों से
कटने लगती है
प्रेम की देह
और कुछ दाग बदन पर
यूं उग आते हैं अचानक
जैसे
कोई चिंगारी छि‍टकी हो
आग से
और चि‍हुंक पड़े हों
हम अनजाने
ऐसे समय में
बहुत अजनबी लगते हो तुम.....

4 comments:

राजेंद्र कुमार said...

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (09.01.2015) को "खुद से कैसी बेरुखी" (चर्चा अंक-1853)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

Sanghsheel 'Sagar' said...

nice

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

सार्थक भावप्रणव रचना।

Nitish Tiwary said...

बहुत सुंदर प्रस्तुति, मेरे ब्लॉग पर भी आपका स्वागत है.
iwillrocknow.blogspot.in