Monday, January 26, 2015

सजग स्मृतिपटल की धुरी पर अवस्थित उपालम्भों की ऐकांतिक निजता : सुश्री रश्मि शर्मा


फेसबुक पर मि‍त्र सूचि‍ में एक नाम है..कंडवाल मोहन मदन। ऐसा सुधि‍ पाठक कम ही देखा है मैंने। उन्‍होंने न केवल मेरी कि‍ताब की पाठकीय समालोचना की, बल्‍ि‍क कि‍ताब से इतर भी मेरे मेरे लेखन को यहां शामि‍ल कर बेहद पठनीय और रोचक बना दि‍या।

दि‍न से आभार और धन्‍यवाद कंडवाल जी का....


"नदी को सोचने दो "
सजग स्मृतिपटल की धुरी पर अवस्थित उपालम्भों की ऐकांतिक निजता : सुश्री रश्मि शर्मा
(एक पाठकीय समालोचना : कण्डवाल मोहन मदन)
उपालम्भों की चितेरी कवियत्री सुश्री रश्मि शर्मा (जन्म ०२ अप्रैल ) की कविताओं और गद्य गीतों से मेरा परिचय पाठक के तौर पर लगभग पिछले ढाई - तीन सालों से रहा है।
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“क्या… वो दि‍न भी आएगा मेरी जि‍दंगी में जब तुम इन नीले फूलों को समेटकर मेरे दामन में भरोगे....कहोगे.....इन्हें संभाल लो....और अब मुझे भी.....मैं तुम्हारी ही तलाश में आया हूं.....सात समुंदर तो नहीं मगर.....समुंदर सी दूरी लांघकर....
क्योंकि तुमने बुलाया है मुझे.....हवाओं से संदेशा भेजकर...फूलों की खुश्बू् बांटकर....
मैं स्वप्न में आने वाला वही इंसान हूं....जि‍सने लाल चुनर पहनाया था तुम्हें...... एक अनदेखे की आस लि‍ए तुम जी रही थी...अब वो चेहरा देख लो तुम....
मेरी वायलि‍न की धुन तो पहचान चुकी हो....नीले गुलमोहर की डालि‍यां पूर्व परि‍चि‍त हैं तुमसे....बस मैं अनदेखा हूं...आओ..देख लो....पहचान लो.....ताकि अब सपने में आने वाले का एक चेहरा होगा...और तुम महसूस कर सकोगी उसे...
हां...ये सच है....मेरी कल्पनाओं को मूर्त रूप मिलना ही चाहि‍ए...मैं जीना चाहती हूं..प्रेम के अद़भुत पलों को....महसूस करना चाहती हूं कि जब कोई प्रेम में डूबता है तो जिंदगी कैसे गुनगुनाती है.....प्रेम भरी बातें सुन कैसे दहक उठते हैं गाल.....आंखों में पि‍या का अक्षत कैसे छाता है....
मैं इतनी दूर से वायलि‍न नहीं सुनना चाहती अब....मुझे पास आना है.... तुम मुझे बाजुओं के घेरे में लेकर जकेरेंदा की दरख़्हत तले वायलि‍न सुनाना...मैं आंख बंद कर खो जाउंगी....
ओ मेरे नील.....मेरी सभी इंद्रि‍यां तुम तक पहुंच कर थम जाती है....मैं बस तुमको देखना चाहती हूं....तुम्हें ही सुनना चाहती हूं और तुम्हेंं सोचना चाहती हूं..
मेरे जीवन का एकमात्र लक्ष्य अब तुम हो.......शायद यह वो पड़ाव है जि‍से पार करूं तब ही जिंदगी आगे बढ़ेगी....वरना थम जाएगा सब......”
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कवियत्री और कहानी लेखिका आदरणीया अर्चना ठाकुर जी; मृदुला शुक्ल़ा जी; रंजू भाटिया जी; अंजू शर्मा जी ; आशा ओझा जी और आदरणीय माया मृग जी; सेमन्त हरीश जी के पश्चात रश्मि शर्मा जी की फेसबुक या ब्लोंग पर लिखी रचनाओं को ही शुरुआत में मैंने ज्यादा पढ़ा है। बाद में कई ख्यातिलब्ध हस्ताक्षरों को पढ़ने का सिलसिला चल निकला।“ रश्मि जी का एक और आलेख यहाँ.......
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“उसके झरझर गि‍रते आंसू में इतनी ताब है.....हृदय में इतनी वेदना है्.......कि जहां-जहां उसके आंसू गि‍रे....वहां पलाश के पेड़ उग आए.....
जब यादों का मौसम आता है...बसंत आता है....पेड़ के सारे पत्ते उसकी याद में झर जाते हैं और नग्न पलाश का वृक्ष राजकुमारी की आंसुओं से बने लाल फूलों से जंगल भर जाता है........
कि‍..... जाने वाला इन यादों के फूलों को देखकर लौट आए......और राजकुमारी की अतृप्त आत्मा् को सुकून मि‍ल जाए.......
जानती हूं.......ये मेरी कोरी कल्पना है, मगर मैं जब भी पलाश के फूल देखती हूं....अहसास होता है कि इनके पीछे कोई मार्मिक कहानी जरूर होगी।“
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“मुझे ही छलनी कर रहे हैं इस कैक्टस की तरह मन में उगे कांटे........”
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“जरा सी देर हुई नहीं कि सारे घर में मेरे नाम का शोर मचा देते थे........सुनो न.....सुनो न......
अब क्या हो गया...आओ न वापस.....है कोई मजबूरी तो वो ही बता दो तुम...अब पक्का मैं चुप नहीं रहूंगी। तुमने कहा था न जाते वक्त........कुछ बोलो न....मीठा सा.....मैंने हर बार की तरह झि‍ड़क दि‍या...मगर अब
देखो..आज मैं कह रही हूं...........मुख़्.तसर सी बात है......''तुमसे प्यांर है''……..
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उनकी "धोरों खिला कांस फूल (एक अकथ कथा ) श्रृंखला ",…………………………………………
“लड़का प्रेम के बि‍रवे को रोपना चाहता है। वह कास के फूल की तरह तुरंत पथरीली सी जमीन....या धोरों सी रेतीली ज़मीन... उस लड़की के मन मे खि‍लाना चाहता है....अपने प्यार की सुगंध से दुनि‍या को मदहोश करने की ख्वाहि‍श है.....
उन लोगो को भी गलत साबित करने को जो मानते हैं ... समझदार लोग प्रेम में नहीं पड़ते।
यह प्यार है....रेत में फूल खि‍लने का.....सूखी धरती से पानी नि‍काल लाने का .....”
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और बनारस पर लिखी मणिकर्णिका घाट कथा श्रृंखला , ………………………………………………………
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“आओ......आज मणि‍कर्णिका घाट पर धूनी रमाएं......तुम शंकर बन ढूंढना मेरे कर्णफूल...मैं पार्वती की तरह तुम्हें परेशान करना चाहती हूं.......आखि‍र ये शाश्वत सवाल मेरे मन को भी तो मथता है कि‍ तुम्हारा वक्त सबके लि‍ए है....मेरे हि‍स्से में इतना कम क्यों .... मुझे पता है तुम भी उलझ जाओगे...परेशान रहोगे....मगर मुझे संतुष्टि ‍ तो होगी कि‍ ये परेशानी सि‍र्फ मेरे लि‍ए है।“
……………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………..उत्तराखंड चीड़ और देवदारों की कथा श्रृंखला ,
तुम लौट के आ जाओ , मै तय करूंगी सजा तुम्हारी ………………………………………………………………………….
“पश्मीजने के रंगों सी नरम-गरम हैं अदाएं तुम्हारी ,
वादि‍यों से जैसे चलकर आ रही हो, शुआएं तुम्हांरी !!...................................
चाँद के नीचे हर रात आकाशदीप सी जलबुझी हूँ मैं ,
तुम लौट के तो आओ, मैं तय करूंगी सजाएं तुम्हारी !!”
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साधिकार उपालम्भों की झड़ी में निष्णात ………………………………………………………………………………………………………..
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“कानों में तभी गूंजा.. उसका कहा......मैंने जोग ले लि‍ए....अब जोगी हो गया हूं मैं....। आंखों में सवाल था मगर जुबां चुप थी मेरी तब। जानती थी...खुद ही कहेगा वो....कहा उसने
मैं हंस पड़ी.....कि‍सी के प्यार में आकंठ डूबे हो और खुद को जोगी कहते हो...कहा उसने......”
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और वो .......
“आज अमलताश को भी बड़े करीब से देखा जाकर। मगर उसमें उत्सा…ह का पीला रंग नहीं था शामि‍ल.....उसमें था मेरी उदासी का पीलापन.....नि‍स्तेज...रंगहीन सा...खुद में खोया-खोया
कहां हो जान.....यूं इस तरह रूठकर कोई दूर जाता है क्या...दूरि‍यों के परदे में छि‍पकर मेरे सब्र का इम्तहान न लो।
आओ न......इससे पहले कि अमलताश का रंग मेरी उदासी का रंग बनकर रह जाए....बैंगनी बैगनबेलि‍या का सारा रंग उड़ जाए.......चले भी आओ......कि तुम बि‍न बहुत उदास है कोई...”
……………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………..पश्मीनो की रंगों सी नरम नरम हर अदा सी और अन्य कई गध्यगीत श्रृंखलाएँ फेसबुक पर प्रशंसा पाती रही हैं ……
“हर शाम मैं/ करती हूं उसका इंतजार
जो देर रात मुझ पर
अथाह प्यार बरसाता है
मेरे माथे को चूमकर
अपने मन-मंदि‍र की देवी बताता है
और मेरी चुभन को
मन के चोट को सहलाए बि‍ना
अपनी अंकशायि‍नी बना
प्रगाढ़ नि‍द्रा में लीन हो जाता है
हर शाम मैं
करती हूं उसका इंतजार
और जागती आंखों से सपना बुनती हूं
कि‍ कल नहीं मि‍लेगा कोई नया दंश
वो जाते वक्त
प्रेम के तीन शब्दों के शब्दो के अलावा
और कुछ नहीं कहेगा
मेरी पीठ में अब कुछ नहीं चुभेगा
मेरे मन से कुछ रि‍सेगा नहीं दि‍न-रात…..”
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रश्मि जी Rashmi Sharma क़ा "रूप - अरूप" नामचीन ब्लॉग वर्ष २००८ से मशहूर रहा है , ब्लॉग्स की दुनिया में। कवियत्री के शब्दों में ही .......
“भारत के सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगों की डायरेक्टरी का यह 2012-13 संस्करण 30 सितम्बर 2013 को ज़ारी किया गया है । इसमें करीब 300 ब्लॉग हैं । इस सूची में मेरा ब्लॉग “रूप- अरूपhttp://rooparoop.blogspot.in/ भी शामि‍ल है।
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विद्यार्थी जीवन से शुरू हुयी साहित्यिक यात्रा 'प्रभात खबर ' और इतर राष्ट्रीय और क्षेत्रीय समाचार पत्र / पत्र - पत्रिकाओं से होते हुए पंद्रह वर्षों का दीर्घ सम्पादकीय अनुभव समेटे हुए है। अध्यवसायी शोधी प्रकृति की यह कवियत्री उद्द्घोषिका एवं अतिथि रूप में श्रव्य दृश्य माध्यमों (क्षेत्रीय आकाशवाणी और दूरदर्शन केन्द्रों ) में काम कर चुकी हैं । इनके साझे लेखन प्रकाशन , सम्पादन और शोध काव्य /लेख संग्रह में 'शब्द संवाद' , ' स्त्री होकर सवाल करती है ' , "विरह गीतिका ", " धूप के संग " और "सारांश समय का " मुख्य हैं। सी एस डी एस द्वारा प्रदत्त राष्ट्रीय विशिष्ट (श्रव्य दृश्य ) माध्यम फ़ेलोशिप २०१३ हेतु चयनित, सम्प्रति सहयोगी सम्पादिका 'पूरी दुनिया' और स्वतंत्र लेखन , पत्रकारिता में व्यस्त महिला है रश्मि शर्मा।
"नदी को सोचने दो " (आई एस बी एन 978 -93 -84979 -08-9 ) उनका प्रथम स्वतंत्र अतुकान्त काव्य संग्रह है। १६० (एक सौ साठ ) पेज का यह संग्रह मात्र रूपये 1 2 0 /- ( एक सौ बीस ) मूल्य का पेपरबैक संस्करण है , जिसमे 101 (एक सौ एक ) कवितायेँ संकलित हैं। ऋचाएं और प्रकाशन स्तर की गुणवत्ता प्रशंसनीय है। उक्त पत्रिका बोधि प्रकाशन तरु ऑफसेट जयपुर से, दिसंबर २०१४ में ही मुद्रित हुयी है। कम्प्यूटर ग्राफिक चिर परिचित बनवारी कुमावत राज का है और आवरण संयोजन "तरु टीम " का है , साथ ही आवरण चित्र है उर्वर चित्रकार और नए रूप में (अब) कवियत्री "ईरा टॉक " का।
"आदर्श" जी को भेंटस्वरूप उपहार और परिजनों तथा मित्रों को आभार व्यक्त करते , इस कविता संग्रह का पुरोवाक् लिखा है रांची से ही सम्बन्ध रखने वाले , वरिष्ठ कविवर श्रद्धेय विद्याभूषण जी ने। उनका कथन कि , " मानव संवेदनाओं की नमी महसूस करने के लिए ............. हम सब के लिए ....... अतल तल की यात्रा अनिवार्य है ”….. (सर्वथा सत्य है, वो आगे कहते हैं) …… “ सच यह है कि ये कवितायें अपनी प्रकृति के बारे में स्वयं इतना कुछ कह देती हैं , कि उन्हें किसी अलग वकालतनामें की जरूरत नहीं। इन कविताओं से गुजरते हुए मुझे बार - बार यह आश्चर्य घेरता रहा है , कि आज के समस्या संकुल प्रश्नवाही समय में इस तरह की सहजता कैंसे बची रह सकती है ; जो इस कवियत्री की नैसर्गिक त्वरा है ”।
' गणेश- चतुर्थी' को कलमबद्ध उनकी "अपनी बात" में कवियत्री ने स्वयं का परिपेक्ष प्रस्तुत किया है। "जेनेटिक्स " और " जीन पूल " की बात छेड़ते हुए उनका कहना है कि यद्यपि लेखन उन्हें विरासत में नहीं मिला है, पर कवितायेँ उनके लिए युगों युगों से संचित स्व - थाती को शब्दों से प्रकट करने का माध्यम रहा है . .... वो कविता को सहज सजग स्त्री मन के संवेगों आवेगों और बिम्बों को स्पर्श करने का जरिया मानती हैं। … जो समाज के सर्वव्यापी त्राण और दबाव की मानसिकता के बावजूद भी स्त्री के कोमल अंतस मानस के स्मृतिपटल का एक अभिन्न हिस्सा होती है। उनके लिए कविता समय की रोज लिखी जा रही किताब के सफों पर हासिये में बची खाली जगहों में हस्ताक्षर करने की तरह है। कवियत्री के शब्दों में ही .......
“जिंदगी की भागदौड़ के बीच कई बार अनुभव कि‍या कि‍ मेरा भी अपना एकांत है, और जि‍से प्रगट करना नि‍जी आवश्यकता।इस हेतु जो साध्य,-साधन मेरे साथ थे, जो शि‍ल्प गढ़े थे और जो वर्जनाएं सामने थीं, जब ये सब अपर्याप्त् लगे और मन के भाव कागज में उतरने लगे, तो उन्हें समेटने की जरूरत हुई।“
"प्रस्तुत कविता संग्रह "नदी को सोचने दो " में प्रेम जीवंत अनुभूति की साधिकार अभिव्यक्ति है और पगलाई हवाओं में पूजा के पवित्र दीप को प्रज्वलित रखने का मेरा हठयोग भी …
"………… अर्पण हो या तर्पण , आख़िरी निशानी हर कोई। संभाल कर रखता है। "
कवियत्री ने अपनी कविताओं को श्रेणीबद्ध नहीं किया है। उनकी १०१ रचनाओं को समुचित आलोचना हेतु श्रेणीबद्ध करने से पूर्व, उनके चुने सभी १०१ कविता - शीर्षकों को ( कोष्ठक में लिखे संयोजक शब्दों को छोड़कर ) अवलोकित किया जा सकता है, उन्ही के शीर्षकों से बनाई गयी इस पाठक की एक कोशिश के रूप में प्रस्तुत अकविता के माध्यम से। जो निम्नलिखित है :-
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………….नहीं करना ब्याह मुझे , हम साँझ बन जायेंगे
मैंने सिर्फ प्यार किया था
नहीं चाहा था कि तुम लहर बन के आओ
क्यों टूटती है इस कदर, आधी रात की उचटी नींद
परिणति प्रेम की, कसक सी, जो होती है
न लाँघी हो जिसने अपनी दहलीज
चिरैया को खुद ही उड़ा देता है, एक इत्तिफ़ाक
काश ! तुम एक चरवाहे होते (तो)
पेड़ जड़ से नहीं उखड़ा करते।
अभिशप्त आत्माओं की नींद (और) 'चांगु ' झील सी आँखें
कब्रगाह फूलों की सी, जिंदगी एक शाम है
मुर्दों का शहर (और ) चाहतों से उपजी उदासियाँ
हवाओं की अलगनी (और) सूनी सी शाम
तेरी याद वाली हिचकी, शाम बन ढल जाती है
(वो ) ठिठकी हुयी शाम (और ) तेरी यादों का मौसम
खुशियों के पल (में ) कुम्हलाया फूल (सा )
(या) बैंगनी फूल (का ) कैलेण्डर
मौन का जंगल (और) ऊब की चिड़िया
वो गली बहुत याद आती है बहुत याद आएगी
तेरे बगैर, शाम की उदासी, अलकनंदा के तट पर
तीन अहसास ,
प्यार और मानसून ,
गुलमोहर और कब्र ,
शब्द और भाव
याद की घूँट (सी ) एक प्याली चाय
छोड़ दिया हमने भी, हिसाब
दिन रात से पहरेदारी है मेरी
पिंजरे की दुनिया (में) उदासीन गीत,
याद नहीं किया करते
जिंदगी इतनी भी रहमदिल नहीं होती
मेरे पास कोई स्याहीशोख नहीं,
मुझे शब्द दो !
मै झरना हूँ, हसरतें मेरी, उलझने मन की
मेरा चाहना, एक घर अंतरिक्ष में
तुम क्या कहते हो उसे, मै और घास, हँसियें सा चाँद
अंतिम गाँठ , अंतिम प्यार हूँ
गन्दुमी आकाश में, झरता रहा मेह
जलते कपूर सा प्रेम, नहीं आएगा वो !
पूरनमासी की रात, चांदनी के पेड़ तले,
सितारों की छावं में हूँ
हरी चूड़ियों में, जीवन का यज्ञ (से) तुम , तुम
रंग (तुम), तुम ही छावँ , प्रारब्ध थे तुम
तुम्हारा दिया नाम, फूल पलाश का
चिठ्ठी तेरे नाम की (सी) जवाँ यादें (और) अनछुई सी प्रीत
दीप मेरे नाम का, सामर्थ्य लम्बे इन्तजार का, वो तुम्ही तो थे !
मन का मौसम भीगा सही; कि, दिन आज बड़ा ख़ास है
(मै) निराकार हूँ , (मेरा) प्रेमगीत,
यादों के गरम लिहाफ (सा)
प्रीत की रीत (और) प्रेम ऐंसे ही होता है
जरूर सोचना, महसूस करना इस प्यार को
ओ जाने वाले ! अब लौट ही जाओ तुम !
रानाईयां ! आज बरस जाना, सर्वस्व बन जाओ
बरसात के बाद, सूखा दरख़्त हरा हो जायेगा
ये पुनर्जन्म है , फिर एक पत्थर अहिल्या बनेगी ।
"नदी को सोचने दो"
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प्रस्तुत कविता संग्रह की ( 101) एक सौ एक; कविताओं को लचीले ढंग से निम्न श्रेणियों में बांटा जा सकता है। ( कुछेक कवितायेँ दो या तीन श्रेणियों में भी शामिल की जा सकती हैं अपने भावगूंथन और अर्थ व्यापकता के कारण, इसीलिये एक सौ एक (101) कविताओं के बजाय यहाँ पर एक सौ ग्यारह (111) कवितायेँ दिखेंगी आपको चार विभिन समूहों में।). . … यह मात्र मेरी सोच है। गुनीजन संभवतया कुछ और ढंग से नए वर्ग- संवर्ग बना दें, या विरोध करें इन्हे श्रेणीकृत करने का। यहां श्रेणी कृत करने का उद्देश्य सम्यक समालोचना ही है बस।
(अ) उपालम्भ कवितायेँ / स्त्री - पुरुष विमर्श तिरपन (53) कवितायेँ
(ब) सम्बोधन गीत / प्रकृति विमर्श की आठ (08) कवितायेँ
(स ) आमंत्रण कवितायेँ / स्त्री - पुरुष विमर्श अट्ठाइस (28) कवितायेँ
(द ) प्रेम और जीवन - दर्शन / इतर बाईस (22) कवितायेँ
इन कविताओं में देव - दीपावली / बनारस, बांस का फूल, बांस शलाका , बादल, मौला, बाबा ( प्रसून जोशी की कविता सा ब्याह बिलकुल न करने का और ब्याह मात्र लोहार से करने का साम्य और दूरता भी नजर आती है , कथ्य विपरीत है.… ), कैलेण्डर, चाँद, घास , आकाश दीप , चरवाहा , कृष्ण , अर्श - फर्श , गीतिकाव्य , चिरैया , अर्पण - तर्पण , रानाईयाँ , उर्दू शब्द , भाव बिम्ब , समासिक शब्द , अलंकार और मीठे उपालम्भ दृष्टित और प्रतिध्वनित होतें हैं , कुछेक उपालम्भ तो इतने मीठे, निर्दोष हैं कि सदियों से रूठा नायक भी तरसे इन्हें पाने को, और अगर उसे ये शिकायतें लगाई जाएँ, तो नंगे पावँ उलटा दौड़ के आ जाये नायिका के पास।
उपालम्भ कवितायेँ / स्त्री - पुरुष विमर्श की तिरपन (53) कवितायेँ, पेज १३, १५,१६,३६, ३७,४०,४१,४५,४६,४७,४९,५०,५१,५२,५३, ५४,५५,५८,५९,६०,६२,६४,६६, ६७,७०,७१,७२,७३,
७६,७७,८६,८७,८८,८९,९५,९८,१००,१०८,१०९,११०,१११,११२,११३,११४,११५,१२०,१२८,१३२, १३३,१३४,१४४, १४५, १४७,१५२,१५३,१५५,१५६,१५७,
१५८, १६० पर बिखरीं पडी है।
सम्बोधन गीत / प्रकृति विमर्श की आठ (08) कवितायेँ, पेज १७,२४,२५, ३३,३४, ११८,११९,१२९,१३०,१३१,१३५,१३६,१३७,और १३८,१३९ पर मुद्रित हैं।
वहीं आमंत्रण कवितायेँ / स्त्री - पुरुष विमर्श की अट्ठाइस (28) कवितायेँ , पेज १८,१९,२० से २३, २६, २७ से ३२ , ३५, ३८,५६,६५,६८,६९,९३,९५,९७, १०४ से १०७ , ११६,११७,१२४ से १२७,१४१ से १४३, १४६ और १५३ पर लिखी हैं।
प्रेम और जीवन - दर्शन / इतर विषयों की बाईस (22) कवितायेँ पेज ३१,४२,४४,४८,५१,६१,६२,७२,७३,७५,७८ से ८५, ९०,९१,१०३,१२१ से १२३ और १४८ से १५१ तक फ़ैली हुयी हैं. …
शुक , कबूतर या भ्रमर गीत / मेघ या पवन दूत की परंपरा से िरला विरला कोई कवि या कवियत्री ही अछूता रहा होगा आज तक.... यहाँ भी सम्बोधन गीत / प्रकृति विमर्श की आठ (08) कविताओं में वह परम्परा झलकती है बादल , मौला , चाँद , घास आदि रूपों में।
इस कविता संग्रह की शुरुआत होती है शीर्षक गीत " नदी को सोचने दो " से जहाँ प्यार कर नंदन - कानन में तवील सन्नाटा मुहं बाएं खड़ा खड़ा है , और उमड़ आया है रेत का समंदर भी । नदी का सूखकर रेत में बदलना , नदी की निरंतर तलाश समुद्र की स्व - अस्तित्व विलीन करने को और नायक का समुद्र सा विशाल होने की बजाय; संकुचित झील सा बन मिलन को पहुंचना और चाहना करना , नदी को बहुत अखरता है ,, और यही कारण बन जाता है उपालम्भ का। उपालम्भों की चितेरी कवियत्री को विलक्षण रामबाणीय उपालम्भ लाने में महारत हासिल है , यह मैंने एक नहीं बीसियों कविताओं और बीसियों गद्य आलेखों में स्वयं देखा है और महसूस किया है। इसका साक्षात उदहारण इसी कविता संग्रह से चुनी उनकी बीसियों उद्धरण समीक्षा के अन्त में दे रहा हूँ।.....
उनका कहन है कि .......
“बन जाओ न विशाल हृदय
लेकर एक शांत , नीला , समंदर".................अब अपेक्षाओं का पहाड़ नायक के समक्ष खड़ा है मुहँ बाएं।
इस कविता संग्रह का अंत होता है "जरूर सोचना " गीत से, जहाँ प्रेम आदत में शामिल होने से जिंदगी में एक ठहराव आने पर अल्प विश्राम और अल्प विराम की हिदायत देती कवियत्री दिखतीं हैं, ताकि प्रेम के गोमुखी पथ पर कहीं कोई हिमशैल तो नहीं आ के बैठ गया है, अगर एन्सा हुआ है तो थोड़ा ठहर कर उसे पिघलाकर या तोड़कर गोमुखोन्मुख प्रेमपंथ को निरापद कर पाएं दो प्रेम में पगे हुयें लोग ।
आज बरस जाना , नहीं करना है ब्याह मुझे , कैलेण्डर , गन्दुमी आकाश में , हरी चूड़ियों में , जीवन का यज्ञ , पूरनमासी की रात , प्रारब्ध थे तुम , जलते कपूर सा प्रेम , दीप मेरे मन का , काश ! तुम एक चरवाहे होते ? मेरा चाहना , हिसाब , ना लांघी हो जिसने अपनी दहलीज , दिन रात से पहरेदारी है मेरी , प्रेम ऐंसा ही होता है, ओ जाने वाले , मैंने सिर्फ प्यार किया था , जिंदगी इतनी रहमदिल नहीं होती , बैंगनी फूल, यादों के गरम लिहाफ , अब लौट ही आओ तुम , तुम्हारा दिया नाम, फूल पलाश का , जरूर सोचना , हम साँझ बन जायेंगे , छोड़ दिया हमने भी , मैंने सिर्फ तुम्हे प्यार किया था , कब्रगाह फूलों की , बरसात के बाद, अंतिम गाँठ , महसूस करना इस प्यार को , हवाओं की अलगनी , तेर वगैर , 'सूनी सी शाम' और 'उदासी का गीत' पूर्णरूपेण उद्धृत करने लायक कवितायेँ हैं इस कविता संग्रह की।
अलग तेवर/ व्यंग्य / जीजिविषा की भी कवितायेँ है यहाँ। . मसलन ……"नहीं करना है व्याह मुझे" , "हिसाब" , " दीप मेरे नाम का ", रंग ", " जिंदगी शाम है ", परिणति प्रेम की ", " छोड़ दिया हमने भी " इत्यादि। दस से ग्यारह कवितायेँ ऐंसी है जिन्हे चारों श्रेणियों में, दो -दो श्रेणी में एक साथ भी रखा जा सकता है।
आइये! कुछ सहज- सुन्दर सूक्ति वाक्य सी और उपालम्भी या अलग तेवर की कविताएँ और व्यंग्य देखतें हैं .......... .
“मैं
मंत्रमुग्धग नहीं
मंत्रबिद्ध हो जाती हूं
जब
ओम की तरह
गूंजती है कानों में
तुम्हा री ध्वनि
मैं
ध्यान में होती हूं
हो रहा होता है
खुद से साक्षात्कार
जब एक गहरी आवाज
खींच ले जाती है
मुझे अनंत में.....
हां....
लीन होना
ऐसा ही होता है
चाहे ईश्वर में हो
या कि‍सी इंसान में
प्रेम....ऐसा ही होता है......
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“ये हंसि‍ए सा चांद
जब भी मेरी छत पर आता है
जी चाहता है
इस हंसि‍ए से
मेरे इर्द-गि‍र्द उग आए
बेमतलब के खर-पतवार
काट डालूं
और कह दूं इस चांद से
फक़त महबूब का चेहरा ही
नहीं दि‍खता तुझमें
तू मेरा औजार भी बन सकता है
मत समझ खुद को केवल
प्यामर के काब़ि‍ल
कुछ सरफि‍रों का
तू हथि‍यार भी बन सकता है......”
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“चल..../ आज अंति‍म बार
तेरी याद को
तेंदू पत्ते… में भर
कस कर
एक धागे से लपेट दूं
और
सुलगा के उसे
लगाउं एक लंबा सा कश....
फूंक दूं अपने सीने की
सारी जलन
जलती बीड़ी के सि‍रे को
और लहका कर
जल्दह ख़त्मे कर दूं सब
और
चीखकर कहूं दुनि‍या से
लो
छोड़ दि‍या
हमने भी
कश ले-लेकर अपनी ही जिंदगी को पीना.....”
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“कल
बदल जाएगा
कैंलेंडर में साल
और बदल जाएगी
उसमें छपी
तस्वीर भी,
मगर मैं
नहीं बदलूंगी
रहूंगी
वहीं की वहीं
जहां
कई बरसों से
टंगी हूं
मुझे बदलने की
इच्छाब
कइयों ने की
और
मेरा मन भी
चाहता है
बदलाव,
मगर ये संभव
नहीं
क्योंेकि
मैं कैलेंडर नहीं जो
कि‍सी की इच्छा…नुसार
बदल जाऊँ
मैं तो वो औरत हूं
जि‍सके संस्कारों में
जन्म घुट़टी के साथ
पि‍लाई जाती है
ये बात
कि‍
टूट जाना मगर
न बदलना
न जाना
घर से बाहर
बस
डोली से अर्थी तक का ही है
तुम्हारा सफर
इसलि‍ए
इसे बदलने की
जहमत
कोई नहीं उठाता
बस
कैलेंडर की तारीख बदलती है
औरतें तो
सीख ही रही हैं
अभी उठना..चलना
सीख लेंगी एक दि‍न
वो भी खुद को बदलना....”
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“हां
वो तुम ही थे
जो मेरी हर सांझ को
उदास कि‍या करते थे
जो सर्द....कोहरे भरी
तवील रातों को
जाने कहां से छुपकर
आवाज दि‍या करते थे
हां
वो तुम ही थे
जो मेरे भीतर
एक अबूझ सी छटपटाहट
भरा करते थे
नहीं जानती थी तब
उदासी की वजह
बस बेवजह की उदासी के
गले लग
खूब रोया करती थी
पूछती थी खुद से
बार-बार
कि आखि‍र क्याे कमी है
क्याख चाहि‍ए और
इस जिंदगी से
हां
वो तुम ही थे
जि‍सकी आस में डूबकर
खामोश खाली नि‍गाहों से
चांद का
घटना-बढ़ना तकती थी
अब आके जब
तुम मि‍ले हो
, भर गई मैं
एक सुकून तारी है
जि‍स्म -ओ-जां में
चाहती हूं अब छलकूं नहीं
भरे कलश सी रहूं
हां
वो तुम ही थे, तुम ही हो
जि‍सकी आवाज के सहारे
एक आकृति रची मैंने
और अब साकार हुई
तुमसे मि‍लकर...तुम्हें पाकर..”
………………………………………………………………………………………………………………………………………..
“कोई झंझावात नहीं आता अब
मुर्दों का शहर है ये
कोई नहीं जागता अब
सरे शाम....भरी भीड़ में
लुट जाती है
एक औरत की 'अस्मभत'
वो चीखती-चि‍ल्लामती
गि‍ड़गि‍ड़ाती रह जाती है
देखती है उसे
हजारों आंखें
कि‍ बचाओ-बचाओ की गुहार लगाते
रूंध गया उसका गला
मगर चंद दरिंदें
लोगों की भीड़़ से
उठा ले जाते हैं उसे
मगर हाय...
ये आत्मजलीनता की पराकाष्ठा
कहीं कोई सुगबुगाहट नहीं
कि‍सी को नहीं होती पीड़ा
कि‍सी के आंखों में पानी नहीं
हां....यह मुर्दों का शहर है
कोई नहीं जागता अब.....
कोई नहीं जागता अब..”
……………………………………………………………………………………………………………………………………..
“ 'चांगु' झील की तरह
कभी
खूबसूरत थी जो आंखे
अब
सुर्ख गुड़हल सी हैं
थमी सी, जमी सी
जि‍नमें अक्समर
तैरा करती थीं
सपनों की किश्तिं‍यां...
एक तूफान ने
बो दि‍ए
उदासी के फूल
उन आंखों में
अब
नजर आता है
सपनों का खून
डराती है
बताती हैं आंखें
कि , पानी का रंग
बदलता है कैसे”
………………………………………………………………………………………………..
गुलमोहर और कब्र
_______________
“गुजरती हूं रोज
जि‍स सड़क से
उससे उतरकर बायीं तरफ
एक कब्र है
जि‍समें
न जाने कि‍तने बरसों से
सोया है कोई
हर रोज वहां जाकर
पल भर के लि‍ए ठि‍ठकती हूं
सोचती हूं
कि....कि‍सी का तो प्रि‍य होगा
कोई तो इसके लि‍ए रोता होगा
ये शख्सइ..जो चि‍रनि‍द्रा में लीन है
उसकी याद में काश
दो फूल चढ़ा देता
सांझ एक दीप जला देता कोई
क्या सारे अपनों ने
भुला दि‍या इसे.....
मगर आज देखा....अनायास
लाल-लाल फूलों से लदा
एक पेड़ गुलमोहर का
झुक-झुक कर
गलबहियां डाल रहा था
असंख्या पंखुडि‍यों से
कब्र सजा रहा था...
जरूर कि‍सी ने याद में उसकी
कभी पौधा लगाया होगा
और उस पेड़ ने सुन ली
मेरे दि‍ल की सदा....
इसलि‍ए तो उस अनजाने
शख्स की कब्र को
गुलमोहर
यूं सजा रहा था.....।“
……………………………………………………………………………………………………………………………………………………
अंत में यह कहना लाजिमी है, कि भाव, बिम्ब, भ्रमर गीत शैली और प्रतिमानों के संग, शब्द चयन और अर्थ संयोजन में कुशल यह कवियत्री उपालम्भों की खान की स्वामिनी है। नहीं देखे मैंने इनसे उपालम्भ कहीं और काव्य सृजनाओं में, जो भी आज तक मैंने पढ़ा है।
“बहुत अहम है
यह सवाल
क्योंाकि
जब खत्म हो जाएगा
तुम्हामरे प्यार का मौसम
सारे फूल
झड़ जाएंगे डालों से
और छोड़ जाएंगी
गौरैया भी
मेरा आशि‍याना
तब
लगातार होगा धूप-छांव का खेला
मगर सात रंगों का
नहीं उगेगा आकाशी इंद्रधनुष
इसलि‍ए जरूरी है
कि‍ तुम्हाूरे प्यासर का मौसम
जब खत्मे होने वाला हो
उससे पहले
कुछ फूलों को
अपने आंचल में भर लूं
पक्षि‍यों के कलरव को
यादों में समेट लूं
और तुम्हारे प्यार के
सप्तुरंग को
अपने कमरे की दीवारों पर
चि‍पका दूं
ताकि
चलती सांस तक
यह अहसास कायम रहे
कि‍ तुम्हा रा प्या…र
मौसम की तरह
नहीं बदला करता...वो पलता है
हमारे अंतस में
......शाश्वत
सूरज-चांद की तरह।“
अंतर्मुखी ना होते हुए भी एक स्मृति पटल की निजता की धुरी पर टिके रहना उनकी खासियत है , पलायनता विन्मुख ये कवितायेँ सहज समष्टि भाव भी समाहित करतें है प्रायः अपनी व्यष्टि भाव की प्रखरता संग। सरल शब्द विधान और चयन अर्थों की नदी में गहन डुबकी लगाने को मजबूर कर देता है इन ऋचाओं में। उर्दू की नफासत और प्राकृतिक मौलिक अभिव्यक्ति उनका सम्बल है। जहाँ उजाड़ बियाबान में वो एक पत्ती छावँ सी हैं वहीं आदरणीय विध्या भूषन जी का यह कथन सौ प्रतिशत प्रासंगिक और रेखांकित करने योग्य है कि " आत्मीय अभिव्यक्ति की इस आत्मनिर्मित परिधि से बाहर (वो ) कब आएंगी ?”……
कौन सी स्पर्श रेखीय घटना एहसास या विचार होगा वो। । अभी तो भविष्य की अदृश्य अंक में है वह घटना या विचार…
एक बात और यह कविता संग्रह दो कविता संग्रहों में विभक्त भी हो सकता था। । यह कवियत्री के काव्य सृजन की बाहुल्यता को भी रेखांकित करता है।
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अंत में बधाई हो माया मृग सर को बोधि प्रकाशन को और बनवारी कुमावत राज तरु ऑफसेट को और ईरा टॉक /ईरा आर्ट को भी इस संकलन को साकार रूप देने में।
अंत में इसी काव्य संग्रह से ली गई कुछेक उपालाम्म्भों की झडी देखें। आप भी बिना सहमत हुए न रह पायेंगे; इस बात से कि सच में उनके पास उपालम्भों का कोलार (खान) है।
तुम झील बनके क्यों मिलते हो
किसी नदी से
बन जाओ न
विशाल हृदय लेकर
एक शांत ; नीला समंदर
अलकनंदा के तट पर कहना कि...
अब तो ढल गयी शाम
कहाँ हो तुम।
पान के पत्ते पर
जलते कपूर सा मेरा प्रेम
जो तिरना चाहता है
अंतिम क्षणों तक
जलना चाहता है
और तुम
चंचल नदी की तरह
मुझे डुबोने को आतुर
बैठे होंगे वो अब भी
गंगा के तट पर
भिगोकर उनको
याद मेरी दिला जाना
जानती हूँ
आँचल में पानी नहीं ठहरता कभी
इसलिए
तुम फूल बनके आओ
मेरे दामन में समा जाओ
आओ न प्रिय
प्रीत की रीत निभा जाऊ
एक पल को न भूली
मेरी रूह तुम्हे
जो कभी ऐन्सा हो जाये
मै काफ़िर कहलाऊँ
औ न बरस जाओ
चांदनी बनके
चांदनी के फूल से
आओ कि गवाही दे रहे
ये शजर
मेरे तुम्हारे
अंतरगुम्फित मन की
आ जा कि
मेरी तरह ये ओस पगी कलियाँ
बुलाती है तुझे भी
जिद जे दरिया को महिवाल की तरह
पार कर आजा
या मौला दे दे अब
मेरे ख्वाबों को उनकी सूरत
मर मर के भी रह गया वो जिन्दा
वही एक ख्वाब
फिर से
इन आँखों में पलना चाहता है
आओ मिलकर पूर्ण करे
जीवन का यह यज्ञ
तुम हवनकुंड बनो
मै समिधा बन तुममे
समाहित हो जाऊ
और पवित्र श्लोक बनूँ
वेदों की पावन ऋचाओं सी
हर जन्म तुम्हें याद आऊँ
और
हाथों में अर्ध्य के लिए
पावन गंगा का जल
साक्षी हैं दसों दिशाएं कि
मेरे मानस में साथ हो तुम हरदम
आज
कार्तिक पूरनमासी की रात
मै समर्पित करती हूँ खुद को; तुम्हें
और; मै बहुत खुश हूँ
मृत्यु का करता है वरन
बांस पर खिलता फूल
ठीक वैन्से ही फूल हो तुम
मेरी जिन्दगी के
और मै बरसों से खडी
हरियाई "बांस- शलाका"
तुम्हारा मिलना ही
अंतिम गति है मेरी
बस
इतना ही तो मांगती हूँ
मेरे निवेदन पर
"हाँ" की मुहर लगा दो न
कि दिन आज बड़ा ख़ास है
ये पुनर्जन्म है
तुमसे मिलना
चाहती हूँ
शाम होने से पहले
एक बार
फिर सब खोने से पहले
जिन्दगी के सफीने को
किनारे तक पहुंचा दूं
वही ठहरों तुम
अपनी बाहें फैलाये
बस कुछ देर और
मत बंधों मुझे बंधन में
मै भोग्या नहीं
मै जागीर नहीं
मै बंधुआ मजदूर नहीं
मुझे दे दो
मेरे हिस्से की आजादी
झूली सांस खुला आसमान
कि मै
कोलम्बस की तरह जीना चाहती हूँ
आज कहती हूँ
कि तुम ही मेरे
पहले प्यार थे
और अंतिम प्यार भी
तुम ही रहोगे
बस तुम ही
चलो
आज तुम ही बना लो
एक प्याली चाय
मै तुम्हारी
पीठ से सट आँखें मूँद
महसूस करूंगी
एंसी चाय का स्वाद
हथेलियों में
धरकर दीप
मन की आँखों से
जो देखा मैंने
अमावस की अँधेरी
रात में गगन
उसका चेहरा मुझे
आकाशदीप सा
नजर आया
अच्छा नहीं लगता
घेरे रहती गोपियाँ तुम्हे
मै राधा बनना चाहती हूँ
पर कृष्ण न बनो तुम
सुनो
तुम चरवाहे ही बन जाओ
मै भी पाल लूंगी कुछ बतखें
क्या जो झलकता है
छलकता रहे
वो प्यार होता है
जो शांत जल में
बैठ जाये मिल जाए
खो जाये एकाकार हो जाये
क्या उसे
प्यार नहीं कहते ?
मगर आज तुम मिले ही
एन्से वक्त ; इस जगह
जहाँ जड़ें इतनी गहरी हैं
फिर क्या करूँ
सदियों के रिश्ते का
जन्मों के बन्धन का
हाँ तुम वही हो
मगर पक्की मिट्टी तले
बरसों से खड़े
और कुछ भी तो नहीं चाहा था
कुछ भी तो नहीं माँगा था
इसके सिवा
कि
तुम संग
जिंदगी की आड़ी तिरछी राह पर
तब तक चलूंगी जब तक
राह सहज सरल ना हो जाये......
जानते थे
तुम भी
कि रास्ते और भी कई थे
निरुपाय निष्कंटक
मगर मैंने नहीं चुना उन्हें
क्योंकि
वो तुम तक नहीं जाते थे
तुमको मिली स्वतंत्रता का
दसवां हिस्सा भी
मुझे जीने दिया करो
कभी होता है यूं कि
वर्जनाओं के भारी परदे तले खुद को छुपाने वाले
सारी दीवारें गिर देते हैं
मगर
उम्र भर ना लांघी हो जिसने अपनी दहलीज
वो लोग
अपने हिस्से का चाँद पाने भी
कभी खुले आसमान तले नहीं आते
मगर चलकर कुछ दूर
तुम हो गए ऐंसे अनजान
जैंसे भूले से
रास्ता भटककर
दो अनजान मुसाफिर
रूक जाते हैं पेड़ की छावं में
क्योंकि मेरा प्यार
अदृश्य हवा है
जिसे महसूसा जा सकता है
मगर देखा नहीं
तुम्हारी तरह
बादल नहीं
जो ठिकाने बदल - बदल बरसे
मै गुंथी हुयी मिट्टी
अब तेरे प्रेम में
निराकार हूँ
'चाँगु' झील की तरह आँखें
कभी खूबसूरत थी जो आँखें
अब सुर्ख गुड़हल सी हैं
डराती है .......
बताती है आँखें
कि पानी का रंग
बदलता है कैंसे
खुशियों की उम्र
बहुत छोटी होती है
मगर उदासियाँ
अंत तक
पूरे शिद्धत
साथ निभाती हैं
जो होकर भी नहीं है
पास मेरे
अब देखो उनकी
मुझे बहुत याद आएगी
ये आत्मलीनता की पराकाष्ठा
कहीं सुगबुगाहट नहीं
किसी को नहीं होती पीड़ा
किसी के आँखों में पानी नहीं
हाँ, यह मुर्दों का शहर है।
और अब तुम्हे भी
आ गया है
खुद को प्यार करना तो
अब मै लौट जात़ा हूँ
हो गया मेरे संग होने का
उद्देश्य पूरा
लौट जाओ तुम
एक नए लक्ष्य की तलाश में
नयी खुशियों की आश में
अभिशप्त आत्माओं को
नींद भी मयस्सर नही होती
किसी के ख्वाब में उतर सकें
एंसी तक़दीर क्योंकर नहीं होती
प्रेम दंश देता है
और फूलों सा
कोमल अहसास भी
बंदिशें जिस्म की होती हैं
रूह तो;
आजाद उडान भरती है।
सच है
जाने वाले को पीछे से
आवाज नहीं दिया करते
वो साँझ
जो दिलों को टुकड़ों में बाँट दे
उसे याद नहीं किया करते
दरअसल
नींद उचटने की वजह
पानी की जरूरत नहीं
रोते दिल की आवाज है
छूकर उसे
बता सकूं कि
खुशबू हो या यादें
बन्दिशे नहीं मानती कभी
मत बनाओ किताबों को
कब्रगाह फूलों की
जिन्दगी शाम है
मै सूना तट
और तुम समन्दर
अभिलाषाओं
और उलाह्नाओं का पहाड़
कामनाओं की अग्नि
............
..जब तुम
स्पष्टीकरण की सफ़ेद चादर
ओढने लगते हो
इंतजार में खडी
भूल जाती हूँ
कि अब इस गली में
कोई डाकिया नहीं आता
मीलों दूर शहर में
जा बसने वाला
अब नही लिखता
कोई चिठ्ठी
मेरे नाम की
ब़ात मानो मेंरी
इस बार तुम
गुजरे लम्हात के
रेशे से बुन
एक नयी चादर
बना लेना
और
ठण्ड से कांपती
रातों को
यादों के गर्म लिहाफ
पहना देना
यकीनन
कुछ न कुछ बचा रहेगा
इस चादर तले
कि कभी तो
आओगे तुम
और जब दुपट्टे की गाँठ खोलोगे
क्या पता तब तक
तुम मेरा नाम भी भुला चुके होंगे
तो ये नाम याद दिलाएगा
कि कभी हममे भी कुछ था
तुम्हारा दर्द कसकता है ; टीसता है
हरदम
फिर भी ये निस्पृह देह
विदेह हो जाना चाहती है
चंद सालों के बाद
एक छत के नीचे
एक ही बिस्तर पर
एक दूजे की तरफ
पीठ करके सो जाना
क्या प्यार इसलिए ही होता है
और मै अपनी
चुप्पियों क़े साथ
तुम्हे भूलकर भी कोशिश करूं
बहते रहने की
जिन्दा रहने की
दरअसल नींद उचटने की वजह
पानी की जरूरत नहीं
रोते दिल की आवाज है
जो निःशब्द होकर
तुम्हारे कानों तक पहुचेंगी
कुछ भी अन्तर नहीं
मुझमे और घास में
पावों तले दबती है
कुम्हलाती है
जिंदगी की मुराद पाती है
तुम नहीं मेरे दिल के किसी कोने में
कि सफ़ेद फाख्ता
किसी और के बने घोंसलें में
कभी रहने नहीं आती
मेरे सवाल की ले परेशां न हो
दागदार चाँद भी सबको प्यारा है
और बिना जवाब दिए
अलगनी में झूलते रहते हैं
कैंसे बिसरा दूं सब कुछ
यादें ही है मेरे पास
वो गली जो मेरे गावं वाले घर तक
जाती थी
इन दिनों बहुत याद आती है
बहुत याद आती है
और अब
उस काले बादल ने
कर लिया है आँखों में बसेरा
मै रोज रात
चांदनी के चंदोवे तले
करती हूँ बंद आँखें
और वो बादल
बरसता रहता है रात भर
अब शहर का मौसम बदल गया है
अब है यहाँ की हवा अजनबी
वक्त की मार से
खंडहर बन गयी यादों की इमारत
मगर अब भी यादों का मौसम
जवान है; सोलहवें साल की तरह
मुझे भी
उतना ही मान दो
जितना औरों को देती हो
सच कहो जाना
तुम्हे याद नहीं आती मेंरी
जिंदगी के जंगल में
मेरे लिए ही
सिर्फ
फूल पलाश का
सोन चिरैया
सोने के पिंजरें में बंद
पीपल वाले कोटर में
ख्वाब देखते देखते
सो जाती है
तुम्हे भी पता है ये बात
कि आधी रात के बाद का वक्त
न चाँद से मुहब्बत होती है
न भाते हैं सितारे
बैचैन मन फिरा करता है
यादों की गलियों में उदास सा
फिर भी
रात रोज
उदास लम्हों की
सौगात ले कर आती है
और पीला चाँद
नीम की टहनी से झांकता रहता है
यह अहसास हो कि
साथ साथ चलता है कोई; भले ही
तुम पहाड़ के उस पार
और मै तराई में
मत करो मुझे गन्दला
बहने दो अनवरत
मै स्वीकारती हूँ
हाँ; मै झरना हूँ
घर के सबसे अँधेरे कोने में
सीलन भरे कोने में जाकर
तब निकालती हूँ
जब सारा घर
सपनों की चादर ओढ़े
आधी रात का सफ़र
तय कर चुका होता है
तब मै तहों में दबाई हसरतों को
अपने ख्वाबों के बक्से से
हौले से निकालती हूँ
सहलाती हूँ दुलारती हूँ
और खिड़की की झिरियों से
छनकर आ रही
उम्मीद की रोशनी से
नहलाती हूँ
थोडा संयम की लौ
जलाती हूँ
कहती हूँ ऐ मेंरी हसरतों
मिटना नहीं हारना नहीं
उदास भी मत होना
इक दिन तो एन्सा आएगा
जब तुम्हें पूरा करूंगी
और तुम्हे पूरा होना ही होगा
मुझ पर यकीं रखो मेरी हसरतों
इसी जिन्दगी में पूरा करूंगी तुम्हे
बस; मेरे यकीन पर यकीं करना तुम।
(पलायनवाद से विन्मुखता का एक उदाहरण है यह कविता).......
बहुत सी उलह्नाएं भरी पडी हैं 'अंतिम गाँठ' ; यादों के लिहाफ ; अंतिम प्यार हूँ ; परिणति प्रेम की; तुम्हारा दिया नाम; और बहुत सी अन्य कविताओं में यथा पेज 128 से 160 तक की बहुरंगी कविताओं में.....
Rashmi Sharma को अशेष बधाईयाँ।
अक्षुण्ण रहे आपका मौलिक चिन्तन सृजन संवेदनाएं और उपालंभ भी।
आमीन
आमीन
आमीन

4 comments:

Digamber Naswa said...

बहुत ही विस्तृत चर्चा ... आपको बहुत बहुत बधाई ...

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

सार्थक प्रस्तुति।
--
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (28-01-2015) को गणतंत्र दिवस पर मोदी की छाप, चर्चा मंच 1872 पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Neeraj Kumar Neer said...

आप भाग्यवान हैं, आपको ऐसे पाठक मित्र मिले। सुंदर एवं विशद समीक्षा ... हार्दिक शुभकामनायें

Kailash Sharma said...

बहुत सुन्दर और सार्थक समीक्षा...बधाई