Monday, May 19, 2014

मि‍लन के इंतजार में....


बहुत बड़ा है हमारा देश
और हमारे शहर के दरमि‍यां
दूरी भी है हजारों मील लंबी
मगर आना चाहो तो
आ सकते हो
तुम मुझसे मि‍लने
दो पल, दो घंटे
या दो दि‍न के लि‍ए

मैं चाहती हूं देखना
तुम्‍हें हंसते, गुनगुनाते
मेरी आंखों में आंखे डाल
बति‍याते
यकीन मानो
मुलाकात जरूरी है
कि‍ मि‍लना
वक्‍त का ठहर जाना
और एक पल को
हजार दफ़ा जीना होता है

अक्‍सर
मेरी इच्‍छा होती है
कि‍ जब मैं सांझ को
कि‍सी काम से
दूर पैदल चलती जाऊं
कहीं पास से चलकर
तुम मेरे पास आओ
दो मुझे
एक छोटी मुस्‍कान
और अपने वजूद की खुश्‍बू
मुझे सौंप चले जाओ

मैंने देखा है अक्‍सर
बस के टि‍कट खि‍ड़की में
कतार पर लगे
और रेलवे प्‍लेटफार्म पर
मेरे इंतजार में बैठे तुम्‍हें
इस असमंजस को
चेहरे पर चि‍पकाए
कि‍ मि‍लूं या न मि‍लूं

इस बार
तुम बेधड़क चले आओ
इस पार जो है
उसे बस तुम्‍हारा ही इंतजार है
कि‍सी से एक बार मि‍लकर
ख़त्‍म नहीं होता कुछ
एक मुलाकात
जिंदा रहती है  तमाम उम्र
फि‍र मि‍लन के इंतजार में....

तस्‍वीर...रास्‍ते पर मेरे कैमरे की नजर



7 comments:

ब्लॉग बुलेटिन said...


ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन धरती को बचाओ - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

सुशील कुमार जोशी said...

बहुत सुंदर रचना ।

Digamber Naswa said...

तस्वीरें रहती हैं दिल में ताज़ा हमेशा .. फिर मिलन की खुशबू ताज़ा रहती है अगली मुलाक़ात तक ... इसलिए आना ...
एहसास लिए रचना ...

राजेंद्र कुमार said...

बहुत ही सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति, धन्यबाद।

आशा जोगळेकर said...

एक मुलाकात
जिंदा रहती है तमाम उम्र
फि‍र मि‍लन के इंतजार में....
बहुत सुंदर।

गिरिजा कुलश्रेष्ठ said...

इन्तज़ार जिन्दा रखता है तमाम उम्मीदों को , सच कहा।

Onkar said...

सुंदर कविता