Wednesday, March 5, 2014

झरबेरि‍यां....


इस बार
झरबेरि‍यों के
कच्‍चे-पक्‍के बेर में है
बड़ा अनूठा स्‍वाद
जैसे
प्‍यार है हमारा

कच्‍चा सा
यादें मीठी सी
और दूरि‍यां
लगती खट़टी सी
है तेरा वादा
भी
खटमि‍ठ सा
सुनो
हमारे प्‍यार को
रहने देना
अधपका ही
क्‍योंकि
कच्‍चा कसैला होता है
पका गि‍र जाता है
अधपका ही
आंधि‍यों से लड़
पाता है......



आंगन कि‍नारे की झरबेरि‍यां.....

13 comments:

HARSHVARDHAN said...

आपकी इस प्रस्तुति को आज कि गूगल इंडोर मैप्स और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

expression said...

बहुत प्यारी खटमिट्ठी रचना..

अनु

सुशील कुमार जोशी said...

वाह !

सुशील कुमार जोशी said...

वाह !

Asha Saxena said...

बहुत शानदार |

Neeraj Kumar said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति KAVYASUDHA ( काव्यसुधा )

Kailash Sharma said...

लाज़वाब अहसास और उनकी प्रभावी अभिव्यक्ति...

राजेंद्र कुमार said...

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (07.03.2014) को "साधना का उत्तंग शिखर (चर्चा अंक-१५४४)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें, वहाँ आपका स्वागत है, धन्यबाद।

Tushar Raj Rastogi said...

बहुत सुन्दर

कविता रावत said...

बहुत बढ़िया झरबेरि‍यों जैसी रचना ...

Abhi said...

कच्‍चा कसैला होता है
पका गि‍र जाता है
अधपका ही
आंधि‍यों से लड़
पाता है......

in panktiyo ko padh ke bahut achha ehshas hua. Aapne is vichar ko kya shabd diye hai.

Pratibha Verma said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति। । होली की हार्दिक बधाई।

Aditi Poonam said...

बहुत प्यार भरी खट्टी-मीठी सी रचना .....