Thursday, October 3, 2013

मेरे वजूद की तरह..

जब तुम कहते रहते हो
लगातार
तो जी करता है
कहूं
बस करो, अब चुप भी रहो

और जब
थककर तुम
क्‍लांत पड़ जाते हो
बंद कर आंखें
सोने का उपक्रम करते हो

जी चाहता है
फि‍र सुनूं वो ही आवाज
गुंजता रहता है
कानों में
तुम्‍हारे स्‍वर का
आरोह -अवरोह

प्रतिध्‍वनि‍त होता है
मेरे ही नाम का उच्‍चारण
जो अपनी बारम्‍बरता के कारण
लि‍पट गया है
मेरे ही 'औरा' से
मेरे वजूद की तरह......


तस्‍वीर.....दमन के अरेबि‍यन समुद्र की 

10 comments:

ajay yadav said...

bahut khub

sushma 'आहुति' said...

खुबसूरत अभिवयक्ति......

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया said...

बहुत बढ़िया,सुंदर सृजन !

RECENT POST : मर्ज जो अच्छा नहीं होता.

Darshan jangra said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा कल - शुक्रवार - 04/10/2013 को
कण कण में बसी है माँ
- हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः29
पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया पधारें, सादर .... Darshan jangra


parul chandra said...

बहुत सुन्दर भाव..

राजीव कुमार झा said...

बहुत सुन्दर .
नई पोस्ट : नई अंतर्दृष्टि : मंजूषा कला

Reena Maurya said...

कोमल भावसिक्त सुन्दर रचना...
:-)

dr.mahendrag said...

वजूद ही वजूद की तलाश में,बहुत ही सुन्दर भाव के साथ रचित कृति

कालीपद प्रसाद said...

बहुत सुन्दर !
नवीनतम पोस्ट मिट्टी का खिलौना !
नई पोस्ट साधू या शैतान

Brijesh Neeraj said...

आपकी यह सुन्दर रचना दिनांक 04.10.2013 को http://blogprasaran.blogspot.in/ पर लिंक की गयी है। कृपया इसे देखें और अपने सुझाव दें।