Tuesday, September 24, 2013

क्षणि‍काएं....

1. अब तलक
   दुनि‍या थी और थी मैं
   अब मैं हूं
   और मेरी दुनि‍या हो तुम.......


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2. ये दर्द जो तुझसे मुझे आज मि‍ला है
ये मेरे जन्‍मों के इंतजार का सि‍ला है...

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3. भर दो जागती आंखों में नींद ऐ रात की परी
कि दर्द भरी रातों की मि‍याद बस इतनी ही थी....


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4.तुम मि‍ले हो
तो ग़म भी मि‍ला है
यही तो चाहा था
अब नहीं कोई गि‍ला है...

10 comments:

पूरण खण्डेलवाल said...

सुन्दर प्रस्तुति !!

रविकर said...

आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीय चर्चा मंच पर ।।

Reena Maurya said...

बेहद खुबसूरत प्रस्तुति....
मनभावन...
:-)

सरिता भाटिया said...

नमस्कार!
आपकी यह रचना कल बुधवार (25-09-2013) को ब्लॉग प्रसारण : 127 पर लिंक की गई है कृपया पधारें.
सादर
सरिता भाटिया
बस इक नजर चाहिए :
''गुज़ारिश''

संजय जोशी "सजग " said...

बहुत सुंदर .और उम्दा ....रश्मि जी

ई. प्रदीप कुमार साहनी said...

खूबसूरत रचना |

Swati Vallabha Raj said...

क्या कहने …. सुन्दर

Aparna Bose said...

aapne bhavnaon ko kam shabdon mein behad khoobsurati se abhivyakt kiya hai Rashmi ji...

Laxman Bishnoi said...

बहुत सुंदर रचना
जय जय जय घरवाली

मदन मोहन सक्सेना said...

सुन्दर अभिव्यक्ति .खुबसूरत रचना
कभी यहाँ भी पधारें।
सादर मदन
http://saxenamadanmohan1969.blogspot.in/
http://saxenamadanmohan.blogspot.in/