Monday, May 20, 2013

हंसि‍ए सा चांद


ये हंसि‍ए सा चांद
जब भी मेरी छत पर आता है
जी चाहता है
हंसि‍ए से
मेरे इर्द-गि‍र्द उग आए
बेमतलब के खर-पतवार 
काट डालूं
और कह दूं इस चांद से
फक़त महबूब का चेहरा ही
नहीं दि‍खता तुझमें
तू मेरा औजार भी बन सकता है
मत समझ खुद को केवल
प्‍यार के काब़ि‍ल
कुछ सरफि‍रों का
तू हथि‍यार भी बन सकता है......


तस्‍वीर--साभार गूगल 

6 comments:

सदा said...

वाह ... बहुत खूब

madhu singh said...

तू मेरा औजार भी बन सकता है
मत समझ खुद को केवल
प्‍यार के काब़ि‍ल
कुछ सरफि‍रों का
तू हथि‍यार भी बन सकता है......nice lines,

Dr.NISHA MAHARANA said...

waah bahut khoob ...

jyoti khare said...

मत समझ खुद को केवल
प्‍यार के काब़ि‍ल
कुछ सरफि‍रों का
तू हथि‍यार भी बन सकता है......

वर्तमान का सच तो यही है
बहुत सुंदर रचना


आग्रह है पढ़ें "बूंद-"
http://jyoti-khare.blogspot.in


दिगम्बर नासवा said...

बहुत खूब ... अलग अंजाद से देखना शुरू किया है चाँद को ... हथियार ... एक और रूप ...

shashi purwar said...


बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल बुधवार (08-04-2013) के "http://charchamanch.blogspot.in/2013/04/1224.html"> पर भी होगी! आपके अनमोल विचार दीजिये , मंच पर आपकी प्रतीक्षा है .
सूचनार्थ...सादर!