Saturday, January 12, 2013

भ्रम टूटा है.....



कहीं कुछ भी नहीं बदला
बस एक
भ्रम टूटा है
और आंखों का कोर
तब से भीगा जा रहा है....

ये आंसू भी तुम्‍हारी तरह
दगाबाज हैं
बि‍न बुलाए आते हैं
और
न चाहने पर भी
रि‍सते रहते हैं
लुप्‍त नदी की तरह
धरा और चट़टान का
सीना चीरकर...

कुछ दि‍न
और
बस कुछ दि‍न
प्रेम न सही, भ्रम ही होता
खाली मुट़ठि‍यों में
अहसासों की छांव तो होती
यादों में
एक नाम तो होता.....

छलि‍ए
दो मुस्‍कान दि‍ए थे तुमने
अब आंचल भर
आंसू के फूल दि‍ए हैं
भुला सकूं
इतने हल्‍के नहीं उतरे थे तुम

कहो तुम्‍हीं
क्‍या करूं उन आवाजों का
जो दि‍नरात
गूंजते हैं कानों में
छलि‍या तू...दगाबाज तू...
और
मेरा प्‍यार भी तो है तू....

8 comments:

Vinay Prajapati said...

अति सुंदर कृति
---
नवीनतम प्रविष्टी: गुलाबी कोंपलें

शालिनी कौशिक said...

बहुत सही सार्थक अभिव्यक्ति भारत सदा ही दुश्मनों पे हावी रहेगा .
@ट्वीटर कमाल खान :अफज़ल गुरु के अपराध का दंड जानें .

यशवन्त माथुर said...

लोहड़ी और मकर संक्रांति की हार्दिक शुभ कामनाएँ!

दिनांक 14/01/2013 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपकी प्रतिक्रिया का स्वागत है .
धन्यवाद!

आशीष ढ़पोरशंख/ ਆਸ਼ੀਸ਼ ਢ਼ਪੋਰਸ਼ੰਖ said...

तेरा दगा, मेरी दुआ!

--
थर्टीन रेज़ोल्युशंस

निहार रंजन said...

छलि‍ए
दो मुस्‍कान दि‍ए थे तुमने
अब आंचल भर
आंसू के फूल दि‍ए हैं
भुला सकूं
इतने हल्‍के नहीं उतरे थे तुम

सुन्दर अभिव्यक्ति.

expression said...

वाह...
प्रेम भी...उलाहना भी..
बहुत सुन्दर
अनु

Manika Mohini said...

मर्म को छूने वालो कविता। बहुत सुन्दर अहसास की कविता।

Laxmi Kant Sharma said...

कहो तुम्‍हीं
क्‍या करूं उन आवाजों का
जो दि‍नरात
गूंजते हैं कानों में
छलि‍या तू...दगाबाज तू...
और
मेरा प्‍यार भी तो है तू....मर्मस्पर्शी