Wednesday, November 21, 2012

दि‍ल..

यूं तो दि‍ल की लगी को हमने इसलि‍ए छुपा रखा है
कि इनकार-ए-मोहब्‍बत से कहीं दि‍ल न टूट जाए..
मगर ये न चाहा है कभी कि‍ तुम्‍हारे सि‍वा
मेरा दि‍ल कभी और कि‍सी का हो जाए.....

9 comments:

"अनंत" अरुन शर्मा said...

वाह क्या बात है
अरुन शर्मा - www.arunsblog.in

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया said...

वाह,,,बहुत उम्दा प्रस्तुति,,

recent post...: अपने साये में जीने दो.

Rohitas ghorela said...

bahut hi umda souch hai ji aapki...


waah.

Reena Maurya said...

वाह..
बहुत ही सुन्दर मनभावन
प्रस्तुति...
:-)

Sunil Kumar said...

kya bat hain bahut sundar....

Rajesh Kumari said...

खूबसूरत पंक्तियाँ वाह !!!

madhu singh said...

kya khoob,:)

poonam said...

sunder

महेन्द्र श्रीवास्तव said...

बढिया, बहुत सुंदर