Monday, July 23, 2012

मौन का जंगल

सफर के पहले पड़ाव पर
हूं अभी
देखना एक दि‍न..
तुम्‍हारी उठाई
खामोशि‍यों की दीवार में
सेंध लगा दूंगी
और दाखि‍ल हो जाउंगी
मौन के उस जंगल में
जहां सिर्फ
नीला नभ और हरी धरती
तुम्‍हारे साथी हैं.....
वहां मैं
खिलखि‍लाहटों के
इतने पौधे रोपूंगी
कि
गुंजायमान हो उठेगी
चारों दि‍शाएं....
और तुम
कस्‍तूरी मृग बन ढूंढना
उन खुशि‍यों को
जो फूटेगा
तुम्‍हारे ही अंदर से......।

14 comments:

Rajesh Kumari said...

आपकी इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल २४/७/१२ मंगल वार को चर्चा मंच पर चर्चाकारा राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आप सादर आमंत्रित हैं

डा. गायत्री गुप्ता 'गुंजन' said...

बहुत ही प्यारी रचना... :)

डा. गायत्री गुप्ता 'गुंजन' said...

कृपया ब्लॉग पर से टिप्पणी-नियंत्रण हटा दें...

Sunil Kumar said...

बहुत अच्छी भावाव्यक्ति , बधाई

expression said...

वाह...........
बहुत सुन्दर रश्मि जी...

अनु

कविता रावत said...

और दाखि‍ल हो जाउंगी
मौन के उस जंगल में
जहां सिर्फ
नीला नभ और हरी धरती
तुम्‍हारे साथी हैं.....
..बहुत खूब!

सुशील said...

वाह !
बहुत सुंदर !!
पहले खुशियों की
कस्तूरी बनायेंगी
फिर तुमको मृग बना
उसे ढूँढने में
लगायेंगी !!

सुशील said...

वाह !
बहुत सुंदर !!
पहले खुशियों की
कस्तूरी बनायेंगी
फिर तुमको मृग बना
उसे ढूँढने में
लगायेंगी !!

शारदा अरोरा said...

bahut badhiya...badi dhrishthta se aur haq se dakhil ho jayengi...

वाणी गीत said...

मौन के जंगल में सेंध ...
बढ़िया !

Pallavi saxena said...

बहुत सुंदर भाव संयोजन....

Kailash Sharma said...

बहुत सुन्दर...

bkaskar bhumi said...

रश्मि जी नमस्कार...
आपके ब्लॉग 'रूप-अनुरूप' से कविता भास्कर भूमि में प्रकाशित किए जा रहे है। आज 25 जुलाई को 'मौन का जंगल' शीर्षक के कविता को प्रकाशित किया गया है। इसे पढऩे के लिए bhaskarbhumi.com में जाकर ई पेपर में पेज नं. 8 ब्लॉगरी में देख सकते है।
धन्यवाद
फीचर प्रभारी
नीति श्रीवास्तव

Onkar said...

वाह, बहुत सुन्दर