Tuesday, September 27, 2022

मन के घेरे ( कहानी )

 

-    रश्‍मि‍ शर्मा

उनकी आँखेँ पहले मिचमिचाई और फिर मुँद-सी गईं। ऐसा सोचते या कहते हुए वह एक खास तरह के सुख से भर उठी थी, ऐसा सुख जिसका शब्दों में ठीक-ठीक अनुवाद शायद संभव नहीं था - ‘सोचा था तुम मर जाओगी तो उसकी दूसरी शादी करा देंगे।‘  

उसे हैरत हुई कि कैसे कह पा रही हैं वह यह बात जबकि अभी-अभी, ठीक दस मिनट पहले डाक्‍टर ने आश्वासन के साथ ही चेतावनी भी दी थी कि‍ अभी तो कोई बीमारी नहीं दिख रही, मगर प्रीकॉशन नहीं लिए गए, तो कुछ भी हो सकता है।


शायद उन्‍होंने सुना ही नहीं ठीक से, या फिर अचानक ही भारी हो उठे माहौल को हल्‍का करने के लि‍ए मजाक कर रहीं हो। वैसे यह भी संभव है कि उनकी दिली इच्छा हो कि बीमारी वही रहे, बस बीमार बदल जाए। अचानक ही कहीं पढ़ा या किसी से सुना हुआ वह प्रसंग याद हो आया- बादशाह बाबर अपने बेटे हुमायूं से खूब मुहब्बत करता था। एक बार हुमायूं  गंभीर रूप से बीमार हो गया। उसके बचने की कोई उम्मीद न देखकर बाबर ने ऊपरवाले से दुआ की - ' तू  हुमायूं की जिंदगी लौटा दे। बदले में मैं अपनी ज़िंदगी कुर्बान करने को तैयार हूं।कहा जाता है कि‍ बाबर की दुआ कुबूल हुई, हुमायूं  धीरे-धीरे सेहतमंद होने लगा और बाबर बीमार। कुछ दि‍नों बाद ही बाबर की मृत्‍यु हो गई। 

 बाप-बेटे के मोहब्बत की इस कहानी के खांचे में भला वह कहां से फि‍ट बैठ रही है, उसे समझ नहीं आया। शायद यह उनके  बोलते रहने की आदत का ही हासिल है। कोई सुने न सुने बोलते ही रहना है। कई बार इस अति‍ के कारण अर्नगल भी बोल जाती है वह। फिर भी एक बार साफ-साफ कह देना ही ठीक होगा कि मौत मुझे नहीं, आपके लाडले को आवाज दे रही है, इसलि‍ए होश मत खोइए आप। 

 पर यह सोचते हुए एकबारगी वह कांप गई। क्‍या सच में शलभ....अगर शलभ को कुछ हो गया तो...?

 

'ओहो! कितना प्‍यार करती हो न तुम उनसे..! ' न जाने मन के कि‍स कोने से एक तंज भरी आवाज आई थी।

 साथ रहते-रहते तो सभी को प्‍यार हो जाता है...क्‍या हुआ जो उनके बीच का प्रेम चुक गया। न, चुका नहीं था, सच तो यह है कि प्यार जैसा लगा था, पर प्यार था ही नहीं... प्यार न हो, न सही, मगर एक बंधन तो है, जि‍समें बंधे है दोनों। वैसे भी कि‍तने शादीशुदा जोड़े हैं, जि‍नके बीच प्‍यार नदी सा बहता और सागर सा उफनता है! मगर रहते हैं न साथ...  और इस रि‍क्‍तता की भरपाई के लि‍ए ही तो सब बच्‍चे पैदा करते हैं। सहसा उसे अपने बेटे अंशु की याद हो आई।

 अंशु का चेहरा आंखों में कौंधते ही भय की एक तेज सी लहर कृतिका की रीढ़ में दौड़ गई। उसे शलभ को खो देने के अंदेशा से ज्‍यादा इस बात की कल्‍पना डरा रही थी कि‍ वह कैसे पालेगी अंशु को अकेली। वह तो कोई नौकरी भी नहीं करती। कई बार चाहा कि‍ कहीं न कहीं काम पर लग जाए, मगर हमेशा शलभ ने ही मना कि‍या- ‘मेरा बचपन तो अकेले ही बीता। मजबूरी थी कि‍ मां को नौकरी पर जाना पड़ता था। यहां जब दो-दो कमाने वाले हैं ही तो फिर...’

 अब वह कैसे बताती शलभ को कि‍ अंशु के गर्भ में आने से पहले अकेले घर में रहना उसके लि‍ए कि‍तना कठि‍न था। घर क्‍या, उसका जीवन ही इतना दुश्‍वार था कि‍.....

 कार में बगल की सीट पर बैठी वह, यानी उसकी सास बहुत देर से उसका चेहरा देखे जा रही थी। शायद उसके अंदर चल रहे उथल-पुथल को भांपने की कोशिश कर रही थी या फि‍र अपने कहे पर कोई प्रति‍क्रि‍या नहीं मि‍लने से हैरान थी। मुमकि‍न है, वह यह भी सोच रही हो कि‍ वह सावि‍त्रि‍ की तरह अब कि‍सी तपस्‍या का संकल्‍प  लेगी। 

    बिना कुछ कहे मुंह फेर लिया कृतिका ने और कार की बंद खिड़की से दौड़ते-भागते शहर को देखने लगी। उसके हाथों में रिपोर्ट्स की फाइल थी, जिसके पन्ने न जाने किधर से घुस आई हवा से फड़फड़ा रहे थे। उसने उंगलियों के दबाव से पन्नों को स्थिर करने की कोशिश की। फर्राटे से दौड़ती कार के अंदर अजीब सा सन्नाटा बिखर गया था।

 कृति‍का की सास की  मिचमिचाई आंखें अब पूरी तरह खुल गई थीं। कुछ देर तक उसकी तीखी निगाहें कृति‍का  के चेहरे पर टि‍की रहीं, फि‍र  सामने देखने लगीं वह।

 कृतिका ने मन ही मन सोचा, शायद मुझसे ज्यादा उनको सांत्वना की जरूरत है। लगता है यह झटका बर्दाश्‍त नहीं हो रहा उनसे। वैसे भी ससुर जी के जाने के बाद भावनात्मक रूप से वह पूरी तरह शलभ पर ही निर्भर हैं। किसी विधवा माँ के लिए इससे बड़ा झटका क्या हो सकता है कि उसकी आँखों के आगे उसका इकलौता बेटा... कुछ कह-सुन लेने से उनका मन हल्का हो जायेगा। 

 सास की बात सुनकर एक बार तो मन हुआ था कि सीधे-सीधे पूछ डाले  अगर डॉक्टर की आशंका सच साबित हो गई तो?पर होंठो से शब्‍द बाहर नि‍कलते, उसके पहले ही उसने अपनी दांतों से जीभ को दबाते हुए रोक लि‍या था खुद को।  उसका यह जवाब किसी बम की तरह फूटता उनके सर पर और कार के भीतर ही एक जलजला आ जाता। इतना कोसती वह कृति‍का और उसके पूरे खानदान को कि‍...   

 सास की बात से उसके भीतर चिढ़ और गुस्से का बवंडर उठा था पर ऊपर से संयत थी कृतिका। थककर एक बार उसकी तरफ नजर डाला कि शायद वही कुछ कहे...बात आगे बढ़ाए, मगर उधर भी ऐसी ही चुप्पी थी। चुप्पी के इस पुल को पार करने के लिए उसे उचित शब्द मिल नहीं रहे थे।

 पीछे छूट चुकी डॉक्टर की हिदायतें कृतिका के कानों में किसी हथौड़े की तरह बज रही थीं,  उसने सोचा घर पहुँचते ही शलभ की दराज में पड़े गुटखा और तंबाकू के सारे पैकेट आज डस्टबिन के हवाले कर देगी... कनपटी की नसें उभरने लगी हैं... एक छोटा सा भी तनाव उसके माइग्रेन को नींद से जगा देता है। पर आज की बात तो बहुत बड़ी है, ऊपर से सास की यह जहरबुझी बात...

 खुद को संभालने की कोशिश में वह फिर बाहर देखने लगी। आंखों के आगे पूरी दुनिया खुली हुई थी और यादों के घोड़े प्रकाश की रफ्तार से दौड़ लगा रहे थे। नीली रौशनी से नहाया कमरा है। निर्विकार चेहरे के नीचे उसका तराशा गया अंग-अंग थिरक रहा है। बिस्तर पर लेटने वाले की निगाहें उसकी त्वचा से चिपक सी गई हैं और उसके थिरकते बदन को पता है कि एक दौर और बाकी है...मगर उसके पहले यह...

 नाचना उसका शौक नहीं..दर्द से टहक रहा उसका बदन। नहीं..यह बदन का नहीं मन का दर्द है जो शि‍राओं से होते हुए उसके अंग-प्रत्‍यंग में फैलता जा रहा है। उसके पैर जैसे मन-मन भर भारी हो गये हैं।  जी करता है, जहां है वहीं ढह जाए, प्रस्‍तर शि‍ला में बदल जाए। कृतिका की दाहिनी हथेली दरवाजे के हैंडल को सख्ती से मसल रही है, उसकी उँगलियाँ पसीने से भर उठी हैं...सालों से स्थगित गुस्सा उसकी नसों में तेजी से फैलता जा रहा है...

धच्‍चके से कार रुकी तो वह सोच से बाहर आई। दरवाजा खोलकर एक तरफ से कृतिका तो दूसरी तरफ से उसकी सास निकली। दोनों बि‍ना कोई बात कि‍ए कदमताल करती घर के अंदर प्रवेश कर गई, ऐसे जैसे कि‍ अब आपस में उनके बोलने-बति‍याने को कुछ रखा ही नहीं। सच तो यह है कि‍ कृति‍का दो अलग भावनाओं को एक साथ जी रही थी। उसका एक मन अपने भविष्य की चिंता में कातर हुआ जा रहा था तो अतीत की वीथियों में उलझा दूसरा मन सालों पुराने हिसाब की भरपाई की सभावनाएं तलाश रहा था। कृतिका अपने इन दो मनों के दरम्यान बेचैन डोल रही थी...

 उसने रिपोर्ट्स डायनिंग टेबल पर रखे और रसोई की ओर चली गई। उसकी सास, जिसका नाम मंजुलता है, हमेशा की तरह गेट के ठीक बाईं तरफ वाले अपने बेडरूम में समा गई। शलभ सीधे ऑफिस चला गया था।

 शाम को शलभ के घर आते ही कृतिका और मंजुलता दोनों ही उसके कमरे की तरफ लपके। कृ‍ति‍का एकटक देख रही थी शलभ का चेहरा। हमेशा ही मौजूद रहनेवाली लापरवाही अब भी वहाँ टंगी हुई थी, जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो या फिर उसे कोई फर्क ही नहीं पड़ता। कृतिका जानती थी कि‍ उसके कुछ कहने का असर नहीं होगाउसके साथ ही कमरे में सास का आना भी उसे चुभा था कहीं...। कभी-कभी लगता है कि‍ शलभ पर असली हक तो सास का है, वह केवल नाम का रि‍श्‍ता नि‍भाने के लि‍ए इस घर में मौजूद है। क्‍या उनको यह समझना नहीं चाहि‍ए कि‍ इतनी बड़ी बात के बाद कुछ पल हमें पहले एकांत में बात करने देती।   शलभ के आते ही वह जिस तेजी से कमरे की तरफ लपकी थी, उसके दुगुने रफ्तार से वह बाहर निकलकर फिर से रसोई में घुस गई।     

 जैसा सोचा था, ठीक वैसी ही तेज आवाजें बेडरूम से किचन तक आ रही थीं। माँ-बेटे का परस्पर प्यार उफान पर था... इन बेनतीजा बहसों से उसका जी ऊब चुका था। कृतिका ने मिक्सी का नॉब तीन पर घुमा दिया। अब उसे कुछ सुनाई नहीं पड़ रहा था और वह सुनना भी नहीं चाहती थी। उसे अपने बच्चे के लिए मिल्कशेक तैयार करना उस बहस में उलझने से ज्‍यादा जरूरी लगा। ग्लास में मिल्कशेक ढालते हुए एक बार फिर डॉक्टर का गंभीर चेहरा उसकी आँखों के आगे आकर खड़ा हो गया- ‘प्रीकॉशन नहीं लिए गए, तो कुछ भी हो सकता है।’ मिल्कशेक ग्लास से बाहर गिरते-गिरते बचा। उसने सायास खुद को बरजा, जानबूझकर गुटखा चबाते शलभ का चेहरा अपनी आँखों के आगे रखा और एक अजीब तरह की उबकाई के अहसास से भर उठी। 

 डिनर के बाद शलभ जब कमरे में आया तो हमेशा की तरह उसके मुंह में पान मसाला भरा हुआ था। ऐसे समय में वह कृति‍का से कोई बात नहीं करता। बस अपना मोबाईल लेकर बि‍स्‍तर पर दूसरी तरफ मुंह करके लेट जाता है... यदि जि‍द करके वह कुछ कहती भी तो हाथ के इशारे से हां या ना बोलकर बात खत्‍म। इसलि‍ए अब अूममन वह सोने से पहले उससे कोई बात नहीं करती। उसे जरा भी पसंद नहीं कि‍ बात करते समय पीक मुंह से बाहर आए, या जर्दे की तीखी गंध उसके आसपास देर तक बनी रहे।

 पर आज उससे नहीं रहा गया और उसके मुंह से नि‍कल आया- ''डाक्‍टर की चेतावनी के बाद भी कोई फर्क नहीं पड़ा तुम्‍हें। अब तो संभल जाओ।'' 

 जवाब में शलभ ने बुरी तरीके से घूरा था उसे जैसे कह रहा हो कि‍ बेहतरी इसी में है कि‍ वह चुप हो जाए।   

 रात के किसी पहर फिर एक सपना आया। तेज हरहराता पानी और उसमें डूबती उतरती वह। बचने की लगातार कोशि‍श कर रही है। कि‍नारे बहुत सारे लोग नजर आ रहे हैं, मगर उसकी ओर कोई नहीं देख रहा। उसे बाहर नि‍कलना है। बस जरा दूर और आ जाए....  किनारा दिख रहा, मगर लहरों से लड़ते-लड़ते वह थक चुकी है। भय से उसकी आंखें बंद हो गई कि अगर वह अभी डूब जाती है तो अंशु ...


सपना में सपना नहीं, कल्पना है यह। नींद खुलने पर महसूस हुआ कि तेज चल रही है सांसे और धड़कनें ऐसी कि लगे दिल पसलियों से टकरा रहा है। उसे आजकल अक्सर ही यह सपना आता था। जागती आंखों से बंद आखों का सपना दुहराते हुए एकदम चौंक उठी वह। आज कुछ नया आ जुड़ा था उस सपने में, यह एकदम नई बात थी कि‍ किनारे से कोई हाथ बढ़ा रहा था। कौन था...कौन था वह चेहरा। लाख कोशिशों के बाद भी उसे याद नहीं आया कि उसने वाकई कोई हाथ देखा था या उन हाथों का एक धड़ भी था जिस पर एक चेहरा टंगा था। देर तक सोचने के बावजूद वह सपना और कल्पना के बीच फर्क नहीं कर पाई। वह बेतरह थकी थी, बिस्तर पर पड़े-पड़े उसे नींद आ गई।


सुबह परदे की फांक से निकल धूप का एक नन्‍हा टुकड़ा उसके चेहरे पर नाच रहा था। आंखों की पपोटों पर रौशनी की मुलायम तपि‍श से उसकी नींद टूटी। अनायास मुस्करा उठी वह। धूप के टुकड़े को हौले से सहलाया जैसे उसे शुक्रिया कह रही हो...  


'
मुस्करा लो, मगर तुम्हारा सपना कभी पूरा नहीं होगा'

जाने कब शलभ उठ गया था और उसकी ओर देख रहा था, उसे पता भी नहीं चला।

''
वैसे भी दि‍न हो या रात, मेरे सपने कब पूरे होते हैं,''  बुदबुदाती हुई कृतिका ने बिस्तर छोड़ दिया। न उसने पूछा कि किस सपने की बात कह रहा वो, न बताया शलभ ने। 

 कृति‍का बचती है शलभ के साथ कि‍सी भी बहस में उलझने से। उसकी कि‍सी बात का जवाब दि‍या नहीं कि‍ वह बात खिंचती हुई इतनी लंबी हो जाती है कि‍ झगड़ा समाप्‍त होने का नाम ही नहीं लेता। घर का पूरा माहौल बदल जाता है। उनके बीच की तल्‍खी पूरे घर को लपेटे में ले लेती है और बेचारा अंशु सहम सा जाता है। सीधी सी बात भी दिनों तक व्‍यंग्‍य में कही जाती है और तब कृति‍का का हंसना-रोना सब मुश्‍कि‍ल हो जाता है।

 शलभ के सामने किसी का फोन आ जाए तो और आफत...व्यंग्य में एक खास तरह का उलाहना भी शामिल हो जाता है, उन उलाहनों के शब्द उसे किरचों से चुभते हैं। सामान्य दिनों में बहुत तरह से समझाया, सफाइयाँ भी दी, पर अब थककर सफाई देना भी छोड़ दिया था उसने। समझो, जो समझना है। भीतर ही भीतर लहूलूहान हो जाती है वह और फोन को कई-कई दिनों तक साइलेंट मोड में डाल देती है। गुस्से में खुद को ही तकलीफ देती है, अपनी माँ तक के फोन नहीं उठाती।

 बेडरूम से बाहर आती कृतिका की नजर सामने टेबल पर पड़े मेडिकल रिपोर्ट्स पर गई, उसे लगा उसकी मुक्ति का मार्ग इन रिपोर्टों से होकर ही निकलेगा... एक पल को उसकी पलकें जैसे किसी दुआ में मुंदी थीं...

 घर के काम निबटाती कृतिका का यह अहसास और गहरा हुआ जा रहा है कि यंत्रवत सी हो गई है उसकी जिंदगी। सालों से उसका समय अंशु के साथ ही गुजरता है। शलभ और सास सुबह-सुबह ड्यूटी पर चले जाते हैं। वह अंशु को संभालते और काम निबटाते हुए बहुत बार थक के चूर हो जाती है। मगर किससे कहे अपनी तकलीफ। सास घरेलू होती तो कुछ जिम्मेदारियां उठा लेती। शलभ तो वापस आने के बाद जो टीवी में घुसता है, फिर निकलने का नाम नहीं लेता। फिर तो उसे चाय भी वहीं चाहिए और खाना भी।

उधर शलभ की फरमाइश और सास की जरूरतें पूरी करते- करते अंशु को सुलाने का समय हो जाता। रात बिस्तर पर पड़ते ही आंखें मुंदने लगती, मगर वह...सिहर उठता है उसका तन, जैसे रेशा-रेशा ऐंठने लगा हो…बेतरह प्‍यास लगने लगती है ऐसे समय। शरीर इस ढंग से प्रति‍कार करता है उस वक्त जैसे उसका सारा बदन पत्‍थर में बदल गया हो। अब वहां न धूप है न पानी..बस एक ठंडापन पसरा है। स्‍पर्श कामनाओं का ज्‍वार नहीं जगा पाते। वह जड़ हुई ऐसे छटपटाती है जैसे कि‍सी मछली को नदी से बाहर लाकर रेत में पटक दि‍या गया हो और छत पर टंगी आंखें किसी तूफान के गुजर जाने का इंतजार कर रही हों...  आंख की कोरों से रि‍सता आंसू अंधेरे के दामन में खुद को छुपाता तकिये में समाता जाता है।

  '' फालतू की हैं ये रिपोर्ट्स। आजकल डॉक्टरों का बस एक ही काम है, डराकर पैसे ऐंठना। सब बिजनेस है आज के जमाने में। वो जमाना गया जब डॉक्टर मरीजों की सेवा करते थे। अब हम मरीज नहीं ग्राहक हैं, ग्राहक! पहले बीमारी के नाम से डरायेगा, फि‍र हजारों का टेस्‍ट, दवा...  सब इनलोगों की मि‍लीभगत है। जितना ऐंठ सको, ऐंठ लो।'' शलभ अखबार थामे भुनभुना रहा था, पर कृतिका समझ रही थी कि वह अपनी बात उसके और मां के कानों तक पहुंचाना चाहता था।

 चुपचाप रही कृतिका। जानती है जवाब देने का कोई फायदा नहीं। अभी कुछ बोली नहीं कि वह इस कदर चि‍ढ़ कर जवाब देगा कि उसका तन-मन सुलग जाएगा।  

 ''तुनकमिजाज जरूर है शलभ, पर दि‍ल का भला है...'' सास ने उन दोनों के बीच की तनातनी को भाँपते हुए हमेशा की तरह अपने बेटे का पक्ष लिया है...  ”थोड़ा बर्दाश्‍त ही कर लोगी तो कुछ बि‍गड़ नहीं जाएगा। 

 जाने खुद को क्या समझती है यह इंस्‍पेकटरानी..अंदर ही अंदर दांत पीसती कृति‍का का जी हुआ कि आज ईंट का जवाब पत्थर से दे मारे। पर सामने टेबल पर पड़े मेडिकल रिपोर्ट्स को देख उसने किसी तरह खुद पर काबू पाया...

 '' न बहु...गुस्‍सा नहीं करते। बस हम चार जने ही तो हैं इस परि‍वार में। सबके जीवन में सुख-चैन बना रहे। भगवान ने इतना सुंदर चेहरा दि‍या है, कुढ-कुढ़ के मत बि‍गाड़।''  उनके शब्दों ने एक बनावटी मिठास ओढ़ ली थी। बेटे को सुनाकर बहू की परवाह करने का यह नाटक वह खूब समझती है।

 पूरी दोमुंही सांप है यह औरत... मन ही मन कुछ बुदबुदाई कृति‍का, मगर प्रकटतः कुछ कह नहीं सकी।

 आज मां की डांट का भी कोई असर होता नहीं दिख रहा था। शलभ ने कभी किसी की सलाह नहीं मानी, आज भी अपनी उसी जिद पर अड़ा हुआ है... 

एक हफ्ते बाद फिर डॉक्टर के पास जाना है, बायोप्सी के लिए। जाने क्या रिपोर्ट आए। डॉक्टर ने ऊपर से भले ढाढ़स बँधाया हो, पर कहीं भीतर उसे भी आशंका है, तभी तो उसने टेस्ट करवाने को कहा है... यदि उसकी आशंका सच साबि‍त हुई तो...

 अपने ही सोच से सहम गई कृतिका... अचानक ही उसने खुद को असहाय और अकेली पाया। थोड़ी देर पहले जिसे मन ही मन दोमुंही सांप और इंस्पेकटरानी कहकर कोस रही थी, उसी सास की सुनाई कहानियों ने उसके अंदर बोलना शुरू कर दि‍या है ... ‘समाज में अकेली औरत का रहना कोई गुड्डे- गुड़िया का खेल नहीं है। छोटे बच्‍चे के साथ भरी जवानी काटना कांटों के ऊपर पांव धरकर चलते जाना है। वो तो कहो मेरे पास पुलिस की नौकरी थी, लोग आँख उठाकर देखने के पहले चार बार सोचते थे... अगर यह वर्दी नहीं होती तो जाने क्या होता मेरे साथ...’

 उसके पास तो कुछ भी नहीं। न नौकरी, न बैंक बैलेंस, न ही कोई वि‍शेष योग्‍यता। अगर वह मर गई तो आज के आज उसके पति‍ की दूसरी शादी हो जाएगी...पर उसकी....जानबूझकर वह आज शलभ की बगल वाली सीट पर बैठी है। सास के रहते कभी कार में शलभ के साथ नहीं बैठती वह...ऐसा करना शलभ की नजर में उसकी माँ का अपमान है। गेयर बदलते शलभ के हाथ पर धीरे से वह अपना हाथ रखना चाहती है... जाने वह किसके लिए आश्वस्ति खोज रही है, खुद के लिए या शलभ के लिए... पर मन है कि कहीं और चला जा रहा है...

 रातें अक्सर बहुत भारी गुजरती थीं उस पर। रोज-रोज का झेलना जब बर्दाश्त के बाहर हो जाता बड़ी मुश्किल से ना में सिर हिलाती वह और अगले ही पल उसके मुंह पर घर का दरवाजा बंद हो जाता। वह सिकुड़ी सहमी लान में बैठी रात गुजार देती। शुरू -शुरू बेचैनी में वहीं टहलती रहती, खूब रोती थी। सीढियों पर उसका बदन पड़ा होता और वह प्रार्थना करती कि सुबह होने से पहले उसे मौत आ जाए।

मगर मौत मांगने से मिल जाए, तो कहना ही क्या।

वह भीतर ही भीतर घुटती रहती पर उसे समझ नहीं आता क्या करे, किससे कहे... एक दिन बहुत सकुचाते हुए, अटक-अटक कर टुकड़ों-टुकड़ों में बताया था उसने सास से सबकुछ। उसे उम्मीद थी सास उसकी तकलीफ समझेगी, पर जो हुआ उसने उसे बुरी तरह तोड़ दिया था।


हो हो हो.. उन्‍होंने बड़ी फूहड़ सी हंसी हँसते हुए कहा था - 'आजकल के लड़के और उनकी फैंटेसी। किसी और ने तो नहीं कहा न तुम्हें नाचने को... शलभ पति है तुम्हारा, उसे खुश रखना तुम्हारा फर्ज है।’

कृतिका के पैरों तले से जैसे जमीन खिसक गई थी। उसकी पुलिसिया रौबदाब से वह खूब प्रभावित होती थी। वर्दी के सहारे अकेले दम एक वि‍धवा ने अपनी औलाद को बड़ा किया, लायक बनाया... पर उसकी इस हंसी ने जैसे उन सारे प्रभावों को धो दिया था... कृतिका ने सोचा - क्या पोजिशन और पोस्ट औरत और मर्द की मानसिकता में कोई भेद नहीं रहने देते।

 उसके भीतर उस समय आश्चर्य से ज्यादा उनके लि‍ए घृणा उपजी थी मन में। जब अपनी बहु का दर्द नहीं समझती तो औरों का क्या समझती होंगी उसका दर्द केवल उसका है, इस अहसास ने उसकी शिराओं में एक गहरी, लंबी उदासी और अकेलापन भर दिया था। मान मर्यादा की लकीरों में कैद कृतिका को जब अपनी मुक्ति का कोई मार्ग नहीं सूझता, तब तकलीफ और अकेलेपन के दुरूह पलों में कई बार वह ईश्वर के आगे हाथ जोड़कर प्रार्थना करती... उसके भीतर गूँजते प्रार्थना के शब्दों में शलभ की मृत्यु की कामना हुआ करती थी।

कार की डैशबोर्ड पर लगी देवी की मूर्ति से मन ही मन शलभ का आरोग्य मांगते हुए कृतिका ने सोचा कहीं उसकी प्रार्थनाओं का ही यह असर तो नहीं कि शलभ.... अतीत में की गई अपनी ही प्रार्थनाओं से उलझकर रह गई थी कृतिका... नहीं-नहीं...वह तो महज गुस्‍से में कहे गए कुछ शब्द थे... अपने आप को नये सिरे से नकारने की इस कोशिश में कृतिका शलभ की खूबियों को याद करने की कोशिश कर रही थी और इस कोशिश में कहीं और उलझती जा रही थी। क्या एक ही व्यक्ति के दो रूप भी हो सकते हैं?

 आवेग के उन क्षणों के बीत जाने के बाद सुबह शलभ एक दूसरा ही आदमी होता। वह अक्‍सर ही सीढ़ि‍यों पर थक कर सो जाती। ठंड से उसका बदन अकड़ा होता। सुबह दरवाजा खोलकर उसे शॉल ओढ़ाते हुए शलभ उठाता और बाहों में समेटे हुए अंदर लाकर बि‍ठाता। फि‍र रसोई में जाकर खुद ही चाय बना लाता और उसे प्‍यार से पि‍लाता। वह समझ नहीं पाती कि आखिर ऐसा क्या हो जाता है रातों को।

 नीली रौशनी बदन में लिपटी होती मगर उसके रोम-रोम में एक सिहरन सी व्याप जाती... थकान और थिरकन के बीच शलभ का यह दो रूप उसके लिए किसी रहस्यलोक से कम नहीं था। अभी वह उसके पहले रूप की स्मृतियों को अपने भीतर से धकेलकर बाहर कर देना चाहती है कि तभी पिछली सीट पर बैठी सास का चेहरा उसे सामने लटके शीशे में दिखाई पड़ता है और उस दिन के कहे उसके शब्द उसके कानों में टभक उठते हैं- '' तू नसीब वाली है कि‍ तुम्हारा पति तुमसे प्यार करता है। उन औरतों की सोच जि‍सका आदमी उसके होते कहीं और रात गुजारता है। ऊपरवाले का शुक्राना कर कि‍ जो भी है, बस तेरे लि‍ए ही है।''  

 सालों से चुभनेवाले ये शब्द जैसे आज अपनी तीक्ष्णता भूल से गए हैं। जाने क्यों सास के शब्दों में आज पहली बार तकलीफ की ध्वनि सुनाई पड़ रही है और वह चाहकर भी उन पर  गुस्सा नहीं कर पा रही।

 सहसा उसकी आँखों में उन दिनों की स्मृतियाँ कौंध आईं, जब अंशु के जन्म के बाद महीनों उसकी सास उसके साथ सोती थी। बहाना बच्चे को संभालने का था। शलभ को मजबूरी में दूसरे कमरे में सोना पड़ता। शादी के बाद पहली बार तब वह सुकून की नींद सो रही थी... दिनभर की पुलिसिया ड्यूटी के बावजूद रातों को सास का यह मीठा व्यवहार उसके लिए अप्रत्याशित था। उन्हीं दिनों एक रात किसी भावुक क्षण में उन्होंने उससे कहा था... “मैं शलभ के जिद्दी स्वभाव को जानती हूँ। पर, माँ होने की अपनी सीमाएं हैं, सबकुछ खुलकर नहीं कह सकती उससे। अभी तुम्हारे शरीर को आराम चाहिये इसीलिए तुम्हारे साथ मेरा होना बहुत जरूरी है।‘

 कृतिका हैरान हो सोचती रही थी कि वो वाली सास असली है या यह वाली।  इस तरह अलग भूमिकाएं कैसे निभा लेती हैं वह। कभी जब वह कमरे के अंदर जाने में आनाकानी करती तो जबरदस्ती ठेल कर भेजती थी वह - 'अपने आदमी को खुश रखना औरत की जिम्मेदारी है।' और अब शलभ के आवाज देने पर खुद पूछने चली जाती है - ' बताओ क्‍या बात है, बहु बच्‍चे को संभाल रही है।


अंशु के पैदा होने के बाद बहुत सी चीजें खुद संभलने सी लगी थीं। पर इसी बीच जाने कहाँ से यह आफत आन पड़ी। शलभ के जीभ और होठों की रंगत बदलने लगी थी। अक्‍सर शेविंग करते समय वह आईने में देखते हुए इस बात का अहसास होने लगा था शलभ को, मगर इग्‍नोर कि‍ए जा रहा था। उसने कई बार, बल्‍कि‍ बार-बार कहा था शलभ को कि‍ यह सब चीजें खाना सेहत के लि‍ए सही नहीं। शुरू में तो वह हां, हां कहता, कि‍ बस जल्‍दी छोड़ देगा। कभी कहता कि‍ अभी थोड़ा काम का तनाव है, खाने से रि‍लैक्‍स फील होता है। कभी बोलता ड्राइव करते समय एकाग्रता के लि‍ए खा लेता है, कभी दोस्‍तों का साथ देने के लि‍ए...पर जल्‍दी ही खाना छोड़ दूंगा, मगर बाद में ढि‍ठाई पर उतर आया था।  

 ''नहीं छोडूंगा, क्‍या कर लोगी? ''  

 '' करूंगी क्‍या, ये सारा पाउच उठाकर फेंक दूंगी बाहर।''  

 '' जि‍तना फेंकोगी, उतना मंगा लूंगा... फेंकती रहो...'' तो कभी धमकी देता - '' फेंक के तो दि‍खाओ। तुम्‍हारे मायके से नहीं आता है पैसा।''  

 यहाँ तक आते-आते कृतिका का जायका एक बार फिर से कसैला हो आया है। इनसे बाहर आने की कोशिश में कुछ और पीछे जाती है वह... सुदूर अतीत के ये पन्‍ने जैसे बीते कल की बात जान पड़ते हैं। उसे भी कहाँ पता था कि सबकुछ इस कदर सुरक्षित पड़ा है उसके भीतर। कॉलेज के दिनों में जाने कितने लड़के मरते थे उस पर, मगर शलभ उन सब में अलग था। चाहतों की एक महीन और मौन डोर हुआ करती थी उसकी आँखों में। जाने कितनों का दिल तोड़कर शलभ का हाथ थामा था उसने। पर मुकद्दर की लकीरें लिखता कोई है, जीता कोई और है। ख्वाहिश की आकाश के टिमटिमाते तारे छू लेना इतना भी आसान होता है क्या? अगर जीवन ने इस मोड़ पर लाकर खड़ा किया कि उसे अकेली रहना है, तो आगे का सफर वह तन्हा तय कर लेगी... .

बायोप्सी की रिपोर्ट आने में अभी समय है। मगर न जाने कृतिका किस उधेड़बुन में फंस गई हैं।

उस दिन स्कंद से मुलाकात हुई बाजार में। वह उसका बैचमेट था। उसके पास आते ही हमेशा लगता है जैसे बादलों का एक टुकड़ा सर के ऊपर आ बैठा है और वह सुहानी हवा के झोंके में आनंदित हुई जा रही है।

 यह अहसास अभी-अभी हुआ हो, ऐसा नहीं। उसने पहले भी फील कि‍या था, पर समझ नहीं पाई थी। स्कंद के चेहरे पर सदाबहार मुस्कान रहती है। जब पड़ोस में था तो कभी कॉपी - पेन के बहाने तो कभी अदौड़ी- अचार के लेन-देन के नाम पर सामना हो ही जाता था। हमेशा लगता कि उस मुस्कान और आंखों की चमक के पीछे कोई बात छुपी है। मगर क्या...तलाशती ही रह गई थी कृतिका।

उसे याद है उसके एक जन्मदिन पर सामने पड़ जाने पर उसने पॉकेट से पेन निकालकर दिया था, उसी मोहक मुस्कान के साथ और कहा था ' इससे एग्जाम दोगी तो पेपर अच्छा जाएगा। हैप्पी बर्थ डे ।'


उस छोटी सी बात का अर्थ निकालते, समझते बरस बीते और वह सब छोड़ शलभ से जुड़ गई।

आज लगता है कि समय की जो कद्र नहीं करते, उनके लिए समय भी बैठा नहीं रहता। शलभ दोहरी जिंदगी जीता हुआ इंसान है, जिसके चेहरे पर कभी मोहक मुस्कान नहीं दिखती कृतिका को। वह केवल हावी होने की कोशिश करता है।


''
ठीक तो हो न कृति...'


जवाब में एक छोटी मुस्कान पसर गई कृतिका के चेहरे पर... ' कैसे हैं आप... मतलब... कैसे हो तुम?'' स्कन्द का चेहरा उसकी मुस्कुराहट से नहा उठा है। उसमें अब भी वही मासूमि‍यत और खिंचाव है।

 जाते हुए स्कंद को देखना भला लग रहा था कृतिका को। कुछ रिश्तों के तार अनजाने इतने जुड़े होते हैं कि वर्षों बाद भी मिलने से यूं लगता है कि उतनी ही आत्‍मीयता अब तक बरकरार है।

 उम्मीदों-आशंकाओं और निश्चय-अनिश्चय के बीच झूलते दिन एक-एक कर निकल रहे हैं। कृतिका पर एक खौफ तारी रहने रहने लगी है इन दि‍नों। रातें सुकूनवाली तो कभी नहीं रहीं पर नींद ने कभी उसे निराश नहीं किया। मगर इन दि‍नों नींद पर भी जैसे उन्हीं रातों का पहरा लग गया है। अजब सी छटपटाहट पूरे वजूद पर बनी रहती है। जरा सी नींद पड़ी कि‍ सपने में देखा, उसका कुछ खो गया है और वह लगातार तलाशते हुए इधर से उधर घूम रही है। कई लोग जाने-पहचाने से हैं उसके आसपास, मगर उसे जाने कि‍सकी तलाश है। बेचैन नि‍गाहें ठहरती है, एक चेहरे के ऊपर। वह लगातार उसकी ओर देख कर मुस्‍करा रहा है। वह नजरें फेर लेती है और आखि‍रकार थकी सी कि‍सी पानी पानी से भरे पुल के कि‍नारे बैठ गई है।    

 उसने देखा वही आदमी चुपचाप उसके बगल में आकर बैठ गया है और इशारों से उसे हाथ आगे करने के  कह रहा है। वह चकित सी दोनों हथेलि‍यों को उसके आगे  खोल देती है। वह चुपचाप उसकी हथेलि‍यों के ऊपर अपनी मुट्ठि‍यां रख देता है। जब वह हाथ हटाता है तो सैकड़ों जुगनू उसके हाथों से उड़ने लगते हैं और वह सब भूलकर आसमान की ओर देखने लगती है। 

 तभी नींद खुल जाती है उसकी। कौन था वो ? स्‍कंद ?

 वह अकबकाकर उठ बैठी है। चौंक कर बगल में देखा - शलभ गहरी नींद में सो रहा है। वह जाने क्‍या-क्‍या कल्‍पना कर रही है,  कि‍न अंदेशों में डूबी है। डाक्‍टर की बात उसके अंदर घर कर गई है कि‍ इस अनि‍श्चित दुनि‍या में कुछ भी संभव है। उसे याद आया अबतक बायोप्सी की रिपोर्ट आ चुकी होगी, रात देर तक वे ऑनलाइन रिपोर्ट देखने के लिए ओटीपी का इंतजार करते रहे थे।

 कृतिका उठकर सेंटर टेबल से शलभ की मोबाइल ले आती है... रिपोर्ट निगेटिव है।

 उसकी डबडबा आई आँखों में मोबाइल की इबारत धुंधली सी हो उठी है...

 वह खुश होकर शलभ को जगाना चाहती है, तभी उसके भीतर एक अजीब सी बेचैनी चिलक उठती है और अचानक ही उसके बढ़े हाथ ठिठक से जाते हैं। अभी-अभी नि‍कले सूरज के अरुणि‍म चेहरे को बादलों के एक जाने-पहचाने स्‍लेटी टुकड़े ने ढंक लि‍या है। बालकनी में टंगे पिंजरे की चि‍ड़ि‍या जोर-जोर से चीं-चीं कर रही है...

 

***

 

  


2 comments:

डॉ उर्वशी said...

युवा पीढ़ी की कथाकार रश्मि शर्मा की कहानी 'मन के घेरे' एक ऐसी कहानी है जिसमें कृतिका के बहाने कई लड़कियों की कहानी कह दी गई है। अगर सास को पति-पत्नी के बीच प्यार रास नहीं आता और वही उनके बीच विवाद करती है। तब क्या जब पति की जिंदगी में उनकी मां का रोल ज्यादा और आपकी भूमिका न के बराबर हो।

‘सोचा था तुम मर जाओगी तो उसकी दूसरी शादी करा देंगे।' कृतिका की सास का सीधे सीधे यह कहना कहीं भीतर तक झकझोर देने जैसा है। यह सच है कि बहुत से घरों में सास और बहू का रिश्ता आज भी, बेहद नाजुक, तनावपूर्ण और यहां तक ​​कि कॉम्पिटीटिव भी होता है लेकिन ऐसा क्यों होता है?

जीवन में हर कोई खुशहाल शादीशुदा जिंदगी चाहता है। लेकिन रिश्तों का तानाबाना कई बार उलझ सा जाता है। सास-बहू का रिश्ता हमेशा ही बेहद नाजुक रिश्ता रहा है। पति को अपनी मां और पत्नी के बीच अगर संतुलन बिठाना ना आए तो कई बार पति-पत्नी के रिश्ते में दरार पड़ जाती है। उस पर अगर सास भी सचमुच की इंस्पेक्टरानी हो तब नीम चढ़े करेले की तरह ।

एक पढ़ी-लिखी और समझदार लड़की एक बेटे के अपनी मां के प्रति प्यार और समर्पण को स्वीकार कर लेती है लेकिन जब यह महसूस हो कि उसके पति की जिंदगी में उसकी भावनाओं के लिए कोई जगह नहीं है तब वह अपनी तकलीफ का क्या करें? यही तकलीफ है कृतिका की।

हम ऐसा भी नहीं कह रहे कि शादी के बाद लड़के को अपने मां से हर तरह के मोह त्याग देने चाहिए, लेकिन सास अभी भी इस चीज से अनजान क्यूं हैं कि इससे आप पति पत्नी के रिश्ते पर कैसा असर हो रहा है?आपने अपने बेटे की शादी कर दी है। वह मेरा पति है। अगर मुझसे बातें शेयर करता है, तो कोई गुनाह नहीं कर रहा। बेटे की शादी करने के बाद भी कई माएं, अपने बेटे से शादी से पहले वाले व्यवहार की अपेक्षा रखती हैं। ये कैसे संभव है? होना तो यह चाहिए कि सास अपने बेटे को उसकी शादी को प्यार और गरिमा से निभाने और पत्नी के साथ प्यार से रहने के लिए प्रोत्साहित करें।

"शाम को शलभ के घर आते ही कृतिका और मंजुलता दोनों ही उसके कमरे की तरफ लपके। कृ‍ति‍का एकटक देख रही थी शलभ का चेहरा। हमेशा ही मौजूद रहनेवाली लापरवाही अब भी वहाँ टंगी हुई थी, जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो या फिर उसे कोई फर्क ही नहीं पड़ता। कृतिका जानती थी कि‍ उसके कुछ कहने का असर नहीं होगा। उसके साथ ही कमरे में सास का आना भी उसे चुभा था कहीं...। कभी-कभी लगता है कि‍ शलभ पर असली हक तो सास का है, वह केवल नाम का रि‍श्‍ता नि‍भाने के लि‍ए इस घर में मौजूद है। क्‍या उनको यह समझना नहीं चाहि‍ए कि‍ इतनी बड़ी बात के बाद कुछ पल हमें पहले एकांत में बात करने देती। शलभ के आते ही वह जिस तेजी से कमरे की तरफ लपकी थी, उसके दुगुने रफ्तार से वह बाहर निकलकर फिर से रसोई में घुस गई। " कहानी का यह अंश कृतिका और उसकी सास का मनोविज्ञान समझा देता है।

Gajendra Bhatt "हृदयेश" said...

मन को हिचकोले देती, भावनाओं को उतार-चढ़ाव दे कर आन्दोलित करती, स्त्री-व्यवहार मूलक एक सुन्दर कहानी! इस सुन्दर प्रस्तुति के लिए रश्मि जी को साधुवाद!