Thursday, July 23, 2015

हरी घास की चटाई पर.....


अब सि‍द्ध न रहे
तुमको
वो त्राटक, वो सम्‍मोहन।
भूल चुके तुम
मारण मोहन उच्‍चाटन।।
वो सारे वचन।
और हरी घास की चटाई पर
फूल झाड़ते जेकेरेंदा का
वो नीलाभ कंचन।।
अब एक बदली
मेरी मीत बनी, जो
वि‍हान तक ले आई।
चांद पकड़ने की
ये हसरत मेरी, मुझे
दि‍न अवसान तक ले आई।।
अब उड़ के चली मैं
तज सब बंधन
साक्षी है, नीलंका गगन।।

7 comments:

yashoda Agrawal said...

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शुक्रवार 24 जुलाई 2015 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

yashoda Agrawal said...

दीदी...
अद्भुत रचना...
चांद पकड़ने की
ये हसरत मेरी, मुझे
दि‍न अवसान तक ले आई।।

सादर

Rajendra kumar said...

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (24.07.2015) को "मगर आँखें बोलती हैं"(चर्चा अंक-2046) पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

दिगम्बर नासवा said...

आपकी हसरत पूरी हो ... चाँद मुट्ठी में हो ...
बढ़िया है रचना बहुत ....

Dr.NISHA MAHARANA said...

bahut khoob .....

ज्योति-कलश said...

sundar ,mohak abhivyakti

सुशील कुमार जोशी said...

सुंदर रचना ।