‘फजिरे- फजिरे’ …
फजिरे से बारिश हो रही है। नींद में थी तब से बूँदों की रुनझुन सुन रही हूँ। अब तो शाम ढलने वाली है और लगातार बारिश… थोड़ी ठंड भी महसूस हो रही है। बारिश में मन अच्छा हो जाता है।फजिरे लिखकर सोच रही हूँ कि आख़िर इसी शब्द से शुरुआत क्यों हुई ? अलसुबह, पौ फटने से पहले या प्रातः काल भी तो लिख सकती थी। मैं इस शब्द का उपयोग बोलचाल में नहीं करती।
मगर मेरे दादा जी सुबह के लिए यही शब्द इस्तेमाल में लाते थे। यही नहीं, वह उर्दू मिश्रित हिंदी के कई शब्दों का इस्तेमाल रोज ही करते थे। शायद इसलिए मेरे लेखन में उर्दू के शब्द अपनेआप आ जाते हैं, कोई कोशिश करनी नहीं पड़ती।
तो आज बहुत दिनों बाद याद आया है ‘फजिरे- फजिरे’ …
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