Sunday, July 14, 2019

एकांत...


टुकड़ों में नींद
मुट्ठी भर याद
कुछ अधूरी सी बात
और बेहिसाब एकांत
चलो कर लूं आज
यादों की जुगाली
कि
जिंदगी में हर दरवाजा
आगे की ओर नहीं खुलता....

5 comments:

Meena Bhardwaj said...

नमस्कार !
आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" 16 जुलाई 2019 को साझा की गई है......... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आप भी आइएगा....धन्यवाद!

Sweta sinha said...

वाह

Anita saini said...

बहुत ही सुन्दर
सादर

Anuradha chauhan said...

बहुत सुंदर रचना

Alaknanda Singh said...

सही कहा रश्म‍ि जी , जिंदगी में हर दरवाजा
आगे की ओर नहीं खुलता.... बहुत खूब