रूप का तिलिस्म जब अरूप का सामना करे, तो बेचैनियां बढ़ जाती हैं...
Friday, February 15, 2019
पल्लव नया....
मन के अरण्य में स्मृतियों की बंजर हथेली पर सूखे- झरे पात हैं एक-एक कर चुन लूँ बिखरी यादों को इस उदास मौसम में पतझड़ के आख़री पत्ते की तरह और गुनगुनाती धूप में धीमे-धीमे दुख से बाहर आने का कोई रास्ता देखूँ कि सुना है वसंत की ऊँगलियों में जादू है वो खिलाएगा पल्लव नया उगेगा सरसों पीला कि फिर वसंत आ रहा ।
4 comments:
आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन 75वीं पुण्यतिथि - दादा साहेब फाल्के और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।
बहुत-बहुत धन्यवाद
मन की अरण्य के सूखे पात और बसंत के जादू की कल्पना, अत्यंत ही मोहक रूप दे गई रचना
को आदरणीया रश्मि जी। बहुत-बहुत शुभकामनायें ।
आप कृपया कमेन्ट को moderation से अलग करे ताकि भविष्य में भी आपके ब्लाग पर आ सकूँ ।
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