Thursday, September 7, 2017

ओ साथी


ओ साथी
तेरे इंतज़ार में गिन रहे
समुद्र की लहरें
जाने कितने समय से
समेट लो अपने डैने
मत भरो उड़ान
लौट आओ वापस
समुद्र वाली काली चट्टान पर
जहाँ समुन्दर का
निरंतर प्रहार भी
पथ से विचलित न कर पाया
मैं थमा हूँ अब भी
मेरी एकाग्रता और इंतज़ार की
मत लो और परीक्षा
कि आना ही होगा एक दिन और
ये न हो कि ना मिलूँ तुमको, फिर कभी।

4 comments:

Digvijay Agrawal said...

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शुक्रवार 08 सितम्बर 2017 को लिंक की गई है.................. http://halchalwith5links.blogspot.com पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

Aparna Bajpai said...

वाह... इंतज़ार की खूबसूरत अभिव्यक्ति

Pratibha Verma said...

बहुत सुन्दर

Onkar said...

सुन्दर रचना