Monday, March 14, 2016

इल्‍जाम


''न देना अब हमें इल्‍जाम 'संग' होने का
इतने चोट खाएं कि‍ पत्‍थर में ढल गए ''




फि‍र एक बार धूप है और तन्‍हाई भी
कौन जाने कि‍स ओर सफ़र करना पड़े.....

3 comments:

kuldeep thakur said...

आपने लिखा...
कुछ लोगों ने ही पढ़ा...
हम चाहते हैं कि इसे सभी पढ़ें...
इस लिये आप की ये खूबसूरत रचना दिनांक 15/03/2016 को पांच लिंकों का आनंद के
अंक 242 पर लिंक की गयी है.... आप भी आयेगा.... प्रस्तुति पर टिप्पणियों का इंतजार रहेगा।

महेश कुशवंश said...

अच्छी कविता

रश्मि शर्मा said...

Dhnyawad