Saturday, August 23, 2014

हम डरते हैं.....


हम डरते हैं
चुप्‍पि‍यों से
तल्‍खि‍यों से
सवालों से
और सफाइयां देने से

क्‍योंकि‍

वक्‍त और
अनुभवों ने
पैने कर दि‍ए हैं
हमारे पंजे

अब हम सुनते नहीं
सहते नहीं
बस
आक्रमण करते हैं

क्‍योंकि‍

पटखनी देकर
आगे नि‍कलना
अब स्‍वभाव नहीं
जरूरत है

अब हम
मनुष्‍य नहीं
पशुवत हैं
अपने नाखून और दांत
पजा रहे हैं
कर रहे हैं खुद को तैयार

क्‍योंकि‍

कभी भी कि‍सी पर भी
मारना पड़ सकता है
झपट्टा
अब कोई नहीं दोस्‍त
न कोई रह गया अपना

सारे प्रति‍द्वंधि‍ हैं
जि‍न्‍हें परास्‍त कर ही
जिंदगी की दौड़ में
आगे नि‍कल सकते हैं।

7 comments:

rohitash kumar said...

आज का ऐसा कड़वा सच है जो जाने अनजाने सबके व्यक्तिव का हिस्सा बनता गया है।

kuldeep thakur said...

सुंदर प्रस्तुति...
दिनांक 25/08/2014 की नयी पुरानी हलचल पर आप की रचना भी लिंक की गयी है...
हलचल में आप भी सादर आमंत्रित है...
हलचल में शामिल की गयी सभी रचनाओं पर अपनी प्रतिकृयाएं दें...
सादर...
कुलदीप ठाकुर

Onkar said...

बहुत सुंदर

सु..मन(Suman Kapoor) said...

सुंदर प्रस्तुति

Anusha Mishra said...

बहुत बढ़िया

Smita Singh said...

वाह ...

Yashwant Yash said...

बहुत ही बढ़िया


सादर