Tuesday, April 1, 2014

प्रकृति‍-पर्व सरहुल


'फूल गईल सारे फूल, सरहुल दिना आबे गुईयाँ'



कल है झारखंड का प्रकृति‍ पर्व सरहुल.....मांदर और ढोल की थाप पर झूमेंगे युवा......

चारों तरफ साल के वृक्ष में फूल आए हैं..मदमाते सुगंध से प्रकृति‍ झूम रही है....सरहुल 'साल' के फूलने का ही पर्व है्.....

इस दि‍न सखुआ या सरई के फूलों से पूजा की जाती है....यानी प्रकृति‍ की पूजा....
प्रकृति‍ का आनंद लेना हो अभी साल, पलाश, सेमल, महुआ के फूल और सुगंध में डूब जाएं....एक दि‍न जंगल के वसंत को जि‍ए....

हम भी सरहुल मनाएं...झूमर-नृत्‍य में खो जाए.....

जिंदगी यही खि‍लती है...जंगलों में...एक बार देखि‍ए तो सही...

my photography....साल वृक्ष पर खि‍ले फूल....

9 comments:

प्रतिभा सक्सेना said...


हर ऋतु का अपना रंग-रूप और गंध है, पर

इन नगरों को प्रकृति से जुड़ने का समय कहाँ!

Kuldeep Thakur said...

सुंदर रचना...
आपने लिखा....
मैंने भी पढ़ा...
हमारा प्रयास हैं कि इसे सभी पढ़ें...
इस लिये आप की ये खूबसूरत रचना...
दिनांक 03/04/ 2014 की
नयी पुरानी हलचल [हिंदी ब्लौग का एकमंच] पर कुछ पंखतियों के साथ लिंक की जा रही है...
आप भी आना...औरों को बतलाना...हलचल में और भी बहुत कुछ है...
हलचल में सभी का स्वागत है...

Kuldeep Thakur said...

सुंदर रचना...
आपने लिखा....
मैंने भी पढ़ा...
हमारा प्रयास हैं कि इसे सभी पढ़ें...
इस लिये आप की ये खूबसूरत रचना...
दिनांक 03/04/ 2014 की
नयी पुरानी हलचल [हिंदी ब्लौग का एकमंच] पर कुछ पंखतियों के साथ लिंक की जा रही है...
आप भी आना...औरों को बतलाना...हलचल में और भी बहुत कुछ है...
हलचल में सभी का स्वागत है...

Upasna Siag said...

जिंदगी यही खि‍लती है...जंगलों में...एक बार देखि‍ए तो सही...sahi kaha

ब्लॉ.ललित शर्मा said...

सरहुल पर्व झारखंड की सीमा से लगे छत्तीसगढ़ के सरगुजा में भी मनाया जाता है।

दिलबाग विर्क said...

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 03-04-2014 को चर्चा मंच पर चर्चा " मूर्खता का महीना " ( चर्चा - 1571 ) में दिया गया है
आभार

आशीष भाई said...

बढ़िया प्रस्तुति व रचना , रश्मि जी धन्यवाद !
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देवेन्द्र पाण्डेय said...

इन पर्वों को याद करना..याद दिलाना..जितना हो सके सहेजना जरूरी है।..सुंदर पोस्ट।

Dr.NISHA MAHARANA said...

prakriti ki pooja hamare dil ko umangon se sarabor kar deti hai sundar rachna ...