Monday, November 25, 2013

जीवन का यह यज्ञ.....


मेरी प्रार्थनाओं में

जब से 
तुम शामि‍ल हुए हो 
मन मेरा 
समि‍धा बन बैठा है 

हर आहुति के साथ 
तेज धधक उठती है 
प्रेम की ज्‍वाला 
और
हर स्‍वाहा के साथ
तुममें जा मि‍लने को
व्‍यग्र, आतुर मन
है पूर्णाहुति की प्रतीक्षा में

आओ
मि‍लकर पूर्ण करें
जीवन का यह यज्ञ
तुम हवन कुंड बनो
मैं समि‍धा बन तुममें
समाहि‍त हो जाउं
और पवि‍त्र श्‍लोक बन
हर जन्‍म तुम्‍हें याद आउं....


तस्‍वीर--बोधगया के बोधि मंदि‍र का शीर्ष और डूबते सूरज पर मेरे कैमरे की नजर...

5 comments:

HARSHVARDHAN said...

सुन्दर रचना।।

नई चिट्ठियाँ : ओम जय जगदीश हरे…… के रचयिता थे पंडित श्रद्धा राम फिल्लौरी

नया ब्लॉग - संगणक

Naveen Mani Tripathi said...

bahut sundar rachana nischay hi mn ko prbhavit karane wali ......samidha to mn bn hi jata hai .

Manu Tyagi said...

प्रिय ब्लागर
आपको जानकर अति हर्ष होगा कि एक नये ब्लाग संकलक / रीडर का शुभारंभ किया गया है और उसमें आपका ब्लाग भी शामिल किया गया है । कृपया एक बार जांच लें कि आपका ब्लाग सही श्रेणी में है अथवा नही और यदि आपके एक से ज्यादा ब्लाग हैं तो अन्य ब्लाग्स के बारे में वेबसाइट पर जाकर सूचना दे सकते हैं

welcome to Hindi blog reader

रीता गुप्ता said...

मैं आपकी हर रचना को पढ़ती हूँ। आपके विचार मुझे बड़े अपने अपने से लगते हैं।

रश्मि शर्मा said...

Thank u so much Rita ji