Saturday, August 10, 2013

रात की झील पर.....


रात की झील पर
तैरती उदास कि‍श्‍ती
हर सुबह
आ लगती है कि‍नारे
मगर न जाने क्‍यों
ये जि‍या बहुत

होता है उदास .....

ऐ मेरे मौला
कहां ले जाउं
अब अपने
इश्‍क के सफ़ीने को
तेरी ही उठाई
आंधि‍यां हैं
है तेरे दि‍ए पतवार....

कहती हूं तुझसे अब
सुन ले हाल
जिंदगी की झील पर
उग आए हैं कमल बेशुमार
उठा एक भंवर
मुझको तो डूबा दे
या मेरे मौला
अब पार तू लगा दे......


तस्‍वीर--साभार गूगल 

8 comments:

Guzarish said...

आपकी इस प्रस्तुति की चर्चा कल सोमवार [12.08.2013]
चर्चामंच 1335 पर
कृपया पधार कर अनुग्रहित करें
सादर
सरिता भाटिया

Arun sathi said...

या मौला, पतवार भी, तुफान भी बहुत खूब

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया said...

बहुत खूब सुंदर प्रस्तुति ,,,

RECENT POST : जिन्दगी.

ताऊ रामपुरिया said...

बेहतरीन रचना.

रामराम.

दिगम्बर नासवा said...

उसका दिया है सब कुछ तो पार भी वो लगायेगा ... बस तैरना यूं ही समय के साथ

सुनीता अग्रवाल "नेह" said...

umda rachna badhayi :)

Vaanbhatt said...

मौला की नाव है...उसी की पतवार और भंवर...तो वो ही पार भी लगाएगा...

sushma verma said...

सुन्दर अभिव्यक्ति...